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Magazine - Year 1982 - Version 2

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गणितीय नियमों में बँधे हम सब

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First 9 11 Last
संसार एक सुनिश्चित और व्यवस्थित क्रम से चल रहा है। यद्यपि इस ब्रह्माण्ड के प्रत्येक घटक ग्रह नक्षत्र से लेकर कीट पतंगों तक सब कुछ गतिशील है। सब चलते हैं, कुछ भी स्थित नहीं रहता और सब की गति अलग-अलग है परन्तु सब इतने व्यवस्थित ढंग से गतिशील हैं कि कोई किसी की व्यवस्था में व्यतिक्रम नहीं पहुँचाता। उदाहरण के लिए अपने सौर मण्डल को ही लिया जाए। पृथ्वी समेत इस परिवार में नौ ग्रह हैं इनमें कुछ सूरज के सबसे पास हैं और यम [प्लूटो] सबसे दूर। यह आकार में सबसे छोटे हैं फिर भी दोनों की स्थिति एकदम भिन्न हैं। बुध सूरज के पास रहने से गरमी में झुलसता रहता हैं तो प्लूटो सरदी के मारे जमा रहता है।

नवग्रह अपनी-अपनी कक्षा में पृथ्वी की परिक्रमा बड़े अनुशासित ढंग से करते रहते हैं। यदि उनमें से कोई भी ग्रह अपनी कक्षा छोड़कर थोड़ा भी इधर-उधर जाए तो उसके अस्तित्व के लिए संकट उत्पन्न हो सकता है। पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी 9 करोड़ 30 लाख मील है। यदि पृथ्वी अपनी कक्षा से हट कर जरा भी सूर्य की और खिसक तो न केवल वहाँ का मौसम भयानक रूप से गर्म हो उठे बल्कि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर जमी हुई बर्फ पिघल कर जल प्रलय का दृश्य उपस्थित कर दे। इसी प्रकार यदि पृथ्वी अपनी कक्षा छोड़कर सूर्य से जरा-सी दूरी पर खिसक जाए तो यहाँ इतनी शीत पड़ने लगे कि समुद्र और नदी नालों सहित पृथ्वी का सम्पूर्ण जल भण्डार जमकर बर्फ हो जाए और जीना भी दूभर होने लगे।

पृथ्वी की तरह अन्यान्य ग्रह भी अपनी समान दूरी पर रहते हुए इस सौर परिवार के अनुशासित सदस्य बनकर जी रहे हैं। इसी आधार पर प्राचीन काल में मनीषियों ने ज्योतिष विद्या की शोध की थी और ग्रह नक्षत्रों का अध्ययन कर वे निष्कर्ष प्राप्त किए थे जो आज भी सत्य हैं। इतना ही नहीं उन्होंने गहन अन्वेषणों और अनुसंधानों के आधार पर यह भी देखा और जाना था कि ग्रह नक्षत्र ही नहीं मनुष्य और अन्य प्राणियों का जीवनक्रम भी एक गणितीय नियम के अनुसार चलता है। इन नियमों की शोध भी कर ली गई थी परन्तु कालान्तर में वह विद्या लुप्त हो गई तथा ज्योतिष के नाम पर जीविका कमाने, लोगों को ठगने वालों का ही वर्ग बढ़ने और फलने फूलने लगा।

ऐसी बात नहीं है कि ज्योतिर्विज्ञान कोई कपोल कल्पना और कोरी गप्पबाजी हो। जब निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस विद्या का उपयोग किया जाने लगा तो स्वाभाविक ही इस विद्या का दुरुपयोग हुआ, सचाई को छिपाया गया ओर लाभ को महत्व देने के कारण झूठे नियम सिद्धान्त गढ़े गए। इतने पर भी यह विद्या पूरी तरह लुप्त नहीं हुई हैं। प्रसिद्ध पाश्चात्य ज्योतिषी कीरो ने अपनी पुस्तक ‘बुक आफ नेबर्स’ में अपनी भारत यात्रा का वर्णन करते हुए यह लिखा है कि जब मैं भारत यात्रा के लिए गया तो मुझे कुछ ऐसे ब्राह्मणों के सान्निध्य में रहने का सुअवसर मिला जो प्रकृति के बहुत से गूढ़ रहस्यों का अपने हृदय में छिपाये हुए थे। उन्होंने कृपा करके मुझे ऐसी कई बातों का ज्ञान कराया। उनमें से एक तो यह थी कि अंकों का मनुष्य जीवन पर असाधारण प्रभाव पड़ता हैं। कहा जा सकता है मानवीय जीवन की घटनाएँ एक सुनिश्चित गणितीय नियमों के अनुसार घटती हैं।

कीरो के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में नौ वर्षों का एक चक्र आता हैं और प्रति नवें वर्ष उसके जीवन की महत्वपूर्ण घटना घटती है। उन्होंने अपनी पुस्तक में कई उदाहरणों से यह सिद्ध किया हे। इतिहास की घटनाएँ भी कई बार इस चमत्कारिक अन्तर से घटती है कि उनमें भी अंकों की एक लयबद्धता देखी जा सकती हैं। सन् 1215 में जन्मे फाँस के सन्त लुई एक महान क्राँति दृष्टा थे। उनके ठीक 539 वर्ष बाद सम् 1754 में फाँस के सम्राट लुई सोलहवें का जन्म हुआ। दोनों के जीवन क्रम में इतनी समानता थी कि कई लोग लुई 16 वें को सेण्ट लुई का अवतार मानते हैं। सेण्ट लुई के जन्म के 10 वर्ष बाद उनकी बहन इसाबले का जन्म हुआ। सम्राट लुई की बहन भी उनसे 10 वर्ष छोटी थी और उसका नाम भी इसाबले से मिलता-जुलता ही था इलिजाबेथ। दोनों के पिताओ की मृत्यु उनकी आयु के 12 वें वर्ष में हुई। 15 वर्ष की आयु में सेण्ट लुई बीमार पड़े ओर सम्राट लुई भी इसी अवस्था में उसी रोग के शिकार हुए। दोनों का विवाह 17वें वर्ष में हुआ।

सेण्ट लुई 29 वें वर्ष में सन् 1243 में इंग्लैण्ड के बादशाह हेनरी तृतीय से युद्ध के बाद सन्धि वार्ता की और इसके 539 वर्ष बाद लुई 16 वें ने भी 29 वर्ष की अवस्था में इंग्लैण्ड के बादशाह जार्ज तृतीय से युद्ध के बाद सन्धि की। सन् 1249 में पूर्वी देश का एक राजकुमार सेण्ट लुई से ईसाई बनने के लिए मिला। सम्राट लुई के पास भी 1749 में एक राजकुमार ने अपना राजदूत इसी आशय से भेजा। 35 वर्ष की आयु में सन्त लुई अपना क्रान्तिकारी विचारों के कारण बन्दी बनाए गए ओर इसी आयु में सम्राट लुई को भी बन्दी बनना पड़ा। इसी आयु में 1250 में सेण्ट लुई को सन्त पद से सत्ता से टाये गए। 36 वर्ष की आयु में सन्त लुई ने ट्रिस्टन की स्थापना की व क्रान्ति का उद्घोष किया तो सम्राट लुई ने भी 36 वें वर्ष में वैस्टिन के पतन के साथ क्रान्ति का शुभारम्भ किया उसी वर्ष सेण्ट लुई ने जैकब की स्थापना की थी और 539 वर्ष बाद सम्राट लुई ने भी।

सन् 1256 में सेण्ट लुई की माँ इसाबेल का स्वर्गवास हुआ। 539 वर्ष बाद उसी प्रकार सम्राट लुई की माँ ने भी 1792 में देह त्याग किया। 39वें वर्ष में सेण्ट लुई अवकाश ग्रहण कर जैकोबिन बने। सम्राट लुई का जीवन भी 539 वर्ष बाद 1793 में जैकोबियनों के हाथों हुआ। इस प्रकार दोनों के जीवन की घटनाओं में अद्भुत साम्य है। सभी घटनाएँ 539 वर्ष अन्तर से हुई।

इसी प्रकार लिंकन और कैनेडी के जीवन में अद्भुत साम्य हैं। लिंकन व कैनेडी दोनों गहरी धार्मिक भावनाओं वाले थे वे दोनों ही बाइबिल के प्रेमी पाठक थे। दोनों विश्व शान्ति के उपासक थे। 40 वर्ष की आयु में दोनों ने राष्ट्रपति बनना चाहा। दोनों ने नीग्रो स्वतन्त्रता के लिए निरन्तर प्रयत्न किये। लिंकन के चार बच्चे थे उनमें से दो मर गए, शेष दो से उन्हें गहरा प्यार था। कैनेडी के भी चार बच्चे हुए उनमें से दो का निधन हो गया शेष दो से उन्हें भी अगाध स्नेह था।

लिंकन और कैनेडी के जीवन क्रम में प्रायः 100 वर्षा का अन्तर पाया जाता है। लिंकन 1860 में अमेरिका के राष्ट्रपति बने और कैनेडी 1960 में लिंकन तीन वर्ष तक ही अमेरिका के राष्ट्रपति रह सके ओर 1863 में उनकी हत्या कर दी गई कैनेडी की हत्या भी इसके 100 वर्ष बाद 1963 में हुई। दोनों ही अपना शासनकाल पूरा न कर सके। दोनों गोली से मारे गए ओर एक ही दिन-शुक्रवार को लिंकन की मृत्यु के बाद उनका पद सम्हाला उपराष्ट्रपति जान्सन ने जो दक्षिण अमेरिका के थे, कैनेडी की मृत्यु के बाद भी इस जिम्मेदारी को सम्हालने वाले उपराष्ट्रपति का नाम भी जान्सन ही था।

लिंकन की धर्मपत्नी बहुत फैशन प्रिय ओर फिजूल खर्च करने वाली थी कैनेडी की पत्नी भी विलासिता प्रिय थी। लिंकन के प्राणों की सर्वाधिक चिन्ता कैनेडी नामक अधिकारी को रहती थी ओर कैनेडी की सुरक्षा के लिए उनका निजी सचिव लिंकन सर्वाधिक सतर्क रहता था।

इसके अतिरिक्त अमेरिका के हर पाँचवें चुनाव में चुना जाने वाला राष्ट्रपति अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है, यह भी एक विचित्र बात है। सन् 1840 से 1960 तक हर बीसवें साल चुनाव में जीते हुए राष्ट्रपति को अपना कार्यकाल पूरा किये बिना ही अकाल मृत्यु का पात्र बनना पड़ा है। 1840 का चुनाव विलियम हेनरी हैसिसन जीते थे जो पद ग्रहण करने के एक माह बाद ही निमोनिया से मर गए । 1860 में राष्ट्रपति चुने गए अब्राहम लिंकन की हत्या हो गई। 20 वर्ष बाद 1880 में जब गारफील्ड अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो कुछ ही महीनों बाद उन्हें भी मार डाला गया। 1900 में मैक्किनली अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे और वे अपना पद सम्हालने के छह महीने बाद ही हत्यारे की गोली का शिकार हुए। 1920 में राष्ट्रपति बने हार्डिग पद ग्रहण के ढाई वर्ष बाद ही काल कवलित हो गए। 1940 में वे चौथी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने फ्रेंकलिन रुजवेल्ट की भी एक महीने बाद अकाल मृत्यु हो गई। सन् 1960 में राष्ट्रपति पद का चुनाव कैनेडी ने जीता था, पर वे भी अपना कार्यकाल पुरा कहाँ कर पाए?

भारतीय इतिहास में प्रति नवें दसवें वर्ष महत्वपूर्ण घटनाएँ घटती रहीं। अधिक दूर न जाएँ , प्रथम स्वाधीनता संग्राम के समय से ही देखें तो प्रति नवें दसवें वर्ष यहाँ ऐतिहासिक परिवर्तन होते रहे हैं। पहला स्वतन्त्रता संग्राम 1857 में लड़ा गया दूसरे 9 वर्ष बाद 1866 में उड़ीसा में भयंकर दुर्भिक्ष जिसमें एक ही वर्ष के भीतर 10 लाख व्यक्ति मारे। यह दुर्भिक्ष लगातार फैलता गया और 68−69 तक राजपूताना तथा बुन्देलखण्ड तक पहुँच गया।

सन् 1875 में आर्य समाज की स्थापना हुई। जिसने भारतीय संस्कृति को एक नई दिशा व नया आधार प्रदान किया तथा पराधीन राष्ट्र ने आत्म-गौरव की भावना उत्पन्न की। सन् 1884 में ए.ओ. ह्यूम ने देश की युवा शक्ति को ललकारते हुए ‘इण्डियन नेशनल यूनियन' के स्थापना की जो अगले वर्ष इण्डियन नेशनल काँग्रेस के रूप में विकसित हुई।

सन् 1892 में काँग्रेस अधिवेशन में पहली बार सरकार की कटु आलोचना की गई। इस अधिवेशन के अध्यक्ष गोपालकृष्ण गोखले थे। सन् 1902 में बंगाल के भीतर वह राजनीतिक चेतना जागृत हुई जिसे तोड़ने के लिए लार्ड कर्जन बंगला का कदम उठाया और उसकी प्रतिक्रिया यह हुई कि 1905 तक विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तथा स्वदेशी के प्रचार का कार्यक्रम तीव्रगति से चल पड़ा। 1911 में क्रान्तिकारी गतिविधियाँ उग्रतर हो गई और अंग्रेजी शासन का तख्ता उलटने के लिए आवेगपूर्ण कदम उठाए जाने लगे।

सन् 1920 में कलकत्ता के विशेष काँग्रेस अधिवेशन में असहयोग आन्दोलन की रूपरेखा बनाई गई और जोर-शोर से यह आन्दोलन आरम्भ किया। इसके 9 वर्ष बाद 1929 में काँग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने पूर्ण स्वतन्त्रता का झण्डा फहराते हुए कहा, “काँग्रेस के संविधान की प्रथम धारा में स्वराज्य शब्द अभिप्राय पूर्ण स्वतन्त्रता से है।” सन् 1938 में बिहार संयुक्त प्रान्त और मद्रास आदि स्थानों पर व्यापक साम्प्रदायिक दंगे हुए। सन् 1947 में भारत को स्वतन्त्रता मिलने तथा देश-विभाजन होने की घटनाएँ तो सर्वविदित ही हैं।

इसके नौ वर्ष बाद 1956 में चीन सरकार ने पहली बार वह नक्शा प्रकाशित किया जिसमें भारत के सीमा क्षेत्रों को अपने देश का भूभाग बताया गया। यही सन् 62 की चीन भारत की लड़ाई के बीज पड़े। 1950 के नौ वर्ष बाद 1956 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया और 62 के बाद नौ वर्ष के अन्तराल से ही सन् 1971 में पुनः भारत पाक संघर्ष हुआ।

व्यक्तियों के जीवन क्रम में तो ऐसी कई संगतियाँ मिल जाएगी जिनसे सिद्ध होता है कि मनुष्य का जीवन क्रम और इतिहास किन्हीं गणितीय नियमों के आधार पर चलता है। इन नियमों को समझा जा सके तो इस तथ्य की पुष्टि में पर्याप्त आधार मिल जाते हैं कि सारा संसार एक नियम व्यवस्था के अंतर्गत चल रहा है। व्यक्ति हो या समाज, देश या विश्व, ग्रह नक्षत्र हों या ब्रह्माण्ड न केवल मर्यादा नियमों का वरन् समय मर्यादाओं से भी बँधे हुए हैं। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनुष्य भाग्य के हाथ की कठपुतली है, बल्कि उसे इस व्यवस्था को समझना चाहिए तथा उस व्यवस्था की नियामक सत्ता के निर्देशों आदेशों का पालन करना चाहिए।

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