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Magazine - Year 1982 - Version 2

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अनेकता से एकता की ओर महायात्रा

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संसार की विचित्रता विभिन्नता में भी एक विशेषता यह दिखायी देती है कि समस्त जड़-चेतन में एक ही चेतना कार्य कर रही है। उसकी चेतन तरंगें ही स्थूल जगत का सृजन करती पेड़-पौधों वनस्पतियों और जीव-जन्तुओं का उत्पादन करती है सृष्टि की विविध संरचनाओं में स्वरूप की भिन्नता होते हुए भी उनके कारण सत्ता की पूर्ण एकता है। यह ‘एकत्व’ ही संसार की आदि कारण सत्ता है। उसी को विविध धर्म सम्प्रदायों में अनेकों नामों से सम्बोधित किया गया है। उससे मिलने, प्राप्त करने को ही जीवन का परम लक्ष्य माना गया है।

समस्त संसार उससे ही उत्पन्न होता उसी में लय हो जाता है। जाने-अनजाने सभी प्राणी उस ‘एकत्व’ के उद्गम स्थल की और बढ़े चले जा रहे हैं। नहीं जिस प्रकार अनेकों चक्राकार पथों से होते हुए एक महासमुद्र में मिलने के लिए दौड़ती हुई चली जाती हैं। तथा मिलने के उपरान्त ही विश्राम पाती है। उसी प्रकार सभी प्राणी अपना गन्तव्य स्थान न जानते हुए भी परमात्मा की और बढ़ते चले जा रहे हैं। मानव चित्त अनेकानेक आकर्षणों में उस ‘एक’ का अनुसन्धान करता है। कभी लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है कभी साँसारिक विक्षोभों से टकराकर पीछे हटता है। पुनः नयी शक्ति नयी प्रेरणा के साथ अपने लक्ष्य की ओर उन्मुख होता है।

‘एकत्व’ की प्राप्ति, एकत्व की अनुभूति एकत्व का दर्शन ही जीवन का लक्ष्य है। यही परम सत्य है वही सबमें समाया हुआ है, सबका आदि कारण है। इस सत्य को जानते हुए ही श्रुति कहती है—

“वृक्ष इव स्तब्धों दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं-पूर्ण-पुरुषेण सर्वम्।”

अर्थात्-वृक्ष की भाँति आकाश में शान्ति भाव से जो विराजमान् है वह एक है। उसी परम पुरुष में, परिपूर्ण परमात्मा में समस्त जगत परिपूर्ण है।

यथा सौम्य वयाँसि वासोवृक्ष सम्प्रतिष्ठन्तो। एवं हवै तत् सर्व पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते-उपनिषद्

अर्थात्-हे सौम्य! पक्षी गण जैसे वास-वृक्ष में आकर स्थिर होते हैं, उसी प्रकार यह समस्त संसार परमात्मा में प्रतिष्ठित होता है।

वह एक चेतना ही सबमें समायी हुई क्रिया-कल्लोल करती विभिन्न रूपों में दिखाई देती है। अपनी चेतन तरंगों का प्रकृति में आरोहण करके सृष्टि का निर्माण करती हैं। भासित होने वाली संसार की अनेकता-खण्डता में एकता-अखण्डता का दर्शन करना ही तत्व ज्ञान है। तत्व ज्ञानियों ने इस रहस्य को जाना, अनुभव किया तत्पश्चात् कहा—

“एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्।”

अर्थात्-सृष्टि की विचित्रता एवे विभिन्नता में भी अपरिमेय ध्रुव की एकता देखनी होगी।

“एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेषभूतपाल। एष सेतुर्विधरण एवाँ लोकानामसम्मेदाय॥

अर्थात्-यह एक ही सबका ईश्वर है। समस्त जीवों का अधिपति एवं पालन कर्ता है। एक आधार बनकर लोक को धारण करता तथा ध्वंस से रक्षा करता है।” वह एक परमात्मा सबसे अधिक प्रिय है।

तदेतत् प्रेयः पुत्राय प्रेयोविन्तात्। प्रेमोऽन्यस्मात् सर्वस्मादन्तरतरं यदयमात्मा॥

अर्थात्-वह एक परमात्मा सबके अन्दर है। वह पुत्र प्रिय, वित्त से प्रिय तथा सबसे अधिक प्रिय है।

संसार में दुःख-क्लेशों की कमी नहीं है। आघात-प्रतिघातों की सीमा नहीं है। सुख-दुःख-विछोह-मिलन हानि लाभ से सारा संसार विक्षुब्ध हो रहा है। किन्तु इस संग्राम में भी शान्ति रूप में वह परमात्मा विद्यमान है। यही कारण है कि इतने आघातों के बाद भी संसार ध्वंस नहीं होता। भाई-भाई-मित्र-शत्रु जितना आपसी संघर्ष से आन्दोलित होते हैं। उत्साही स्वतः एकत्व भाव से जुड़ते चले जाते हैं। पाप-तापों के बीच में भी कल्याणकारी मंगलमयी भावना सबमें विद्यमान है। संसार में कितनी अशान्ति, कितना असमंजस है फिर भी देखते हैं कि मांगलिक आदर्श संसार में चिरकाल से विद्यमान है। वही कारण है कि मानवी संस्कृति एवं सभ्यता का अस्तित्व अब तक बना हुआ है अन्यथा यह संसार आपसी संघर्षों के कारण बहुत पहले ही नष्ट हो गया होता। मांगलिक आदर्श, कल्याणकारी भावों का प्रणेता वही परमात्मा है जो सबके अन्तःकरण को प्रेरित, आन्दोलित करता रहता है तथा एकत्व के भाव का सृजन करता है।

पर्वत्र एक परमात्मा विद्यमान है। संसार मंगलमय है। सभी उस ‘एक’ से गुँथे हैं। सैद्धान्तिक रूप से यह सत्य स्वीकार तो सभी करते हैं किन्तु आपसी संघर्षों, दुःख-क्लेशों पाप-संतापों को देखकर यह प्रश्न उठता है कि इन सबका कारण क्या है? मंगलमय संसार अमंगलकारी कैसे हो गया। एकता-अनेकता में, अखण्डता, खण्डता में कैसे परिवर्तित हो गयी। तथ्यों की गहराई में जाने पर पता लगता है कि जीवन को खण्डित करके देखना ही सारी समस्याओं-दुःख-क्लेशों पाप संतापों का कारण है। अपना आपा ही जब सबमें प्रकाशित है तो फिर अपने पराये का भेद कहाँ? भेद तो सही दृष्टिकोण के अभाव के कारण दीख पड़ता है।

समस्त क्षुद्रताओं की, विखण्डता की संकीर्णता का उस ‘एकत्व’ में जोड़ सके तो सम्पूर्ण पाप-तापों से परिमाण पाना सम्भव है। अपनी हृदय की भावनाओं, चिन्तन एवं कर्म चेष्टाओं को उस ‘एक’ में घुला दे तो किसी प्रकार की बाधा हमें अधीर नहीं बना सकती, कोई विघ्न निराश नहीं कर सकता है। किसी मनुष्य से क्षोभ उत्पन्न नहीं हो सकता। जब अपना स्वरूप ही सबमें है तो कौन मित्र तथा कौन शत्रु है। शक्ति का अहंकार, बुद्धि का दम्भ एवं ऐश्वर्य का गर्व इस भावना के उदय होते ही स्वतः नष्ट हो जाएगा । मनुष्यों के बीच पाई जाने वाली पृथकता की प्रवृत्ति का अन्त होते ही देवोपम मनःस्थिति स्वर्णिम परिस्थिति का वर्णन होने लगेगा।

इस स्थिति में स्वभावतः सभी कार्यों में धैर्य एवं शान्ति का समावेश होने लगता है। चंचलता एवं उद्विग्नता समाप्त हो जाती है। समस्त वृत्तियों में सौंदर्य और मंगल उद्भासित हो उठता है। संसार की समस्त वेदनाएँ माधुर्य से ओत-प्रोत दीखने लगती हैं। विखण्डता की दृष्टि की समस्त दुःखों का कारण है।

“मृत्योः स मृत्यु माप्नोतिय इह नानेव पश्यति।”

अर्थात्-मृत्यु से वह मृत्यु को प्राप्त करता है जो संसार को विखण्ड करके देखता है।”

खण्डता में कुरुपता है-सौंदर्य है एक में। खण्डता में चंचलता है-शान्ति है एक में। खण्डता में विरोध है-मंगल है एक में। खण्डता में मृत्यु है-अमृतत्व है एक में। उस एक को विच्छिन्न करके देखने से हम असंख्यों प्रकार के आधारों ने विच्छिन्न करके देखने से हम असंख्यों प्रकार के आघातों से अपनी सुरक्षा नहीं कर सकते। खण्डता से संकीर्णता पनपती एवं बढ़ती है। फलस्वरूप वह अहं के पोषण में ही केन्द्रीभूत हो जाती है। खण्ड शरीर के परिपोषण में लगी क्षमता अखण्ड चेतना को नहीं देख पाती। व्यक्ति गत संग्रह उपयोग की प्रवृत्ति बढ़ती है तथा परस्पर इस प्रतियोगिता की भावना से ईर्ष्या उत्पन्न होती है जो सभी झगड़ों की जड़ है। विखण्डता की यह भावना अखण्ड चेतना के दर्शन से मनुष्य को सदा दूर रखती, जिसके कारण साधनों, वस्तुओं के प्रति मोह जीवन के अन्तिम दिनों तक बना रहता है। परिणाम यह होता है उस ‘एक’ परमात्मा के सान्निध्य से प्राप्त होने वाले आनन्द से सदा वंचित रह जाते हैं।

मनुष्य और मनुष्य के बीच पनपने वाले विभेद क्रम ही समस्त विग्रहों का मूल है। यदि एकता की-आत्मीयता की भावना विकसित हो-सब अपने दिखायी पड़े-सबसे एकता की सूत्र-शृंखला बँधी दिखायी पड़े तो व्यक्तिगत संकीर्ण स्वार्थपरता का अन्त होने में देर न लगे। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना ही आध्यात्मिक समाजवाद है। उसी के प्रखर रहने पर भूतकाल स्वर्णिम युग बनकर रहा। उज्ज्वल भविष्य के लिए भी उसी एकता एवं आत्मीयता के तत्व दर्शन को सुविस्तृत करना होगा। आत्म-कल्याण एवं विश्व-कल्याण का यह एक ही उपाय है।

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