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Magazine - Year 1982 - Version 2

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रहस्यमयी काया का नये सिरे से अनुसंधान हो

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सभी मनुष्यों की काय संरचना एक जैसी है। अस्थियाँ, जोड़, नस-नाड़ियाँ बाहरी और भीतर अवयवों का स्वरूप एवं गठन एक जैसा है। क्रिया-कलापों में भी समानता ही रहती है। साँस लेने से लेकर यात्रा करने तक की गति में नगण्य-सा अन्तर पाया जाता है। इतने पर भी आये दिन ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिनसे प्रतीत होता है कि संरचना में न सही, क्षमता में असाधारण अन्तर पाया जाता है। जो कार्य सर्व साधारण के लिए अकल्पनीय, अप्रत्याशित, असम्भव है उसी को दूसरा व्यक्ति ऐसी सरलतापूर्वक कर दिखाता है मानो किसी सहज स्वाभाविक क्रिया का ही सामान्य प्रदर्शन किया जा रहा हो।

यह अन्तर जादुई नहीं है। न उनके पीछे कोई वरदान चमत्कार की-भूत-प्रेत की-करामात काम कर रही होती है। होता इतना भर ही है कि प्रसुप्त क्षमताओं को जान-बूझकर जागृत किया गया अथवा वह संयोग वश अविज्ञात कारणों से सम्पन्न हो गया। असम्भव को सम्भव बनाने में निमित्त कारण क्या थे? इसकी खोज-बीन करने से पूर्व हमें इस स्थापन के सम्बन्ध में विश्वास करना चाहिए कि मानवी काया में अगणित असामान्य क्षमताएँ बीज रूप से विद्यमान हैं। सृष्टा ने उसे अपना समस्त क्रिया कौशल समेट कर बनाया है। साथ ही एक काम और भी किया है कि अपनी रहस्यमयी दिव्य क्षमताओं का सार संक्षेप इसी काय-कलेवर में इस प्रकार समाविष्ट कर दिया है कि ह सर्वसाधारण के दैनिक प्रयोगों में भले ही परिलक्षित न हो पर जागृति का आधार बनने पर वह प्रकट होने लगे।

चमत्कार उसे कहते हैं जो साधारण प्रचलन में काम न आये। यदा-कदा ही दृष्टिगोचर हो। उस प्रकटीकरण का कार्य कारण विदित न हो। वस्तुतः रहस्य ही चमत्कार है। अविज्ञात का प्रकटीकरण हो जाने पर अचम्भा भी समाप्त हो जाता है। रेल, मोटर, वायुयान, बिजली, रेडियो, टेलीविजन आदि आविष्कारों का एक दो शताब्दी पहले कहीं अता-पता न था। जब वे दीख पड़े तो लोग दाँत तले उँगली दबाकर रह गये और भूत की करतूत मानते रहे। किन्तु कुछ समय बाद उन आविष्कारों के कार्य कारण का पता चला, उपकरण बने और प्रचलन व्यापक हुआ तो वह स्थिति न रही, जिसमें जादू, चमत्कार कहकर किसी प्रकार मन को बहकाया जाता था।

प्रकृति के अपने रहस्य हैं जिनमें से अभी बहुत थोड़े ही विदित हुए हैं। जितने जाने जा चुके उनकी तुलना में उनका अनुपात असंख्य गुना बड़ा है जिनकी सत्ता का विश्वास तो हो गया है किन्तु यह पता नहीं चल सका कि उनके साथ सम्बन्ध स्थापित करने का मार्ग कहाँ होकर जाता है और कितना लम्बा है। पदार्थ विज्ञान के मूर्धन्यवेत्ता यही कहते हैं कि प्रकृति के विशाल भण्डार से जो जाना जा सका-जो पाया जा सका-वह नगण्य है। जो जानना शेष है वह इतना अधिक है कि तुलनात्मक दृष्टि से देखने पर अब तक ही उपलब्धियाँ बच्चों के झुनझुने जैसी लगती हैं जबकि प्रकृति का भाण्डागार हिमालय जितना सुविस्तृत है।

चर्चा काय संरचना के संदर्भ में चल रही होगी। उसकी क्षुद्रता तो यह है कि तनिक-सी प्रतिकूलताएँ सामने आते ही दुर्बलता, रुग्णता के चंगुल में जा फँसती हैं और न केवल अपंग असमर्थ जैसी असहाय बन जाती है वरन् ऐसी पीड़ाएँ सहने के लिए भी बाधित होती है जिनकी तुलना में मरण अधिक शान्तिदायक प्रतीत होता है। एक ओर इतनी दुर्बलता, इतनी अनभिज्ञता कि चिकित्सा उपचार के सारे प्रयत्न निष्फल चले जाते हैं और नित्य कर्म तक के लिए परावलम्बी बनकर रहना पड़े। यह नगण्यता वाला पक्ष है। दूसरा वाला पक्ष ऐसा है, जिसे देखते हुए यह कहने मानने में कोई अत्युक्ति प्रतीत नहीं होती कि मानवी कार्य पिण्ड-समूचे चेतन और चेतन ब्रह्माण्ड की अनुकृति है। इसमें बीज रूप में वह सब कुछ विद्यमान है जो सृष्टा के इस विशाल सृजन में जहाँ-तहाँ परिलक्षित होता है। सौर-मण्डल का विस्तार आश्चर्यजनक है। किन्तु यदि पदार्थ की लघुतम इकाई समझे जाने वाले परमाणु का विश्लेषण किया जाय, तो प्रतीत होगा कि उसमें समूचे सौर-मण्डल की संरचना, गतिशीलता और विधि-व्यवस्था यथावत् विद्यमान है। चिनगारी में दावानल की सभी संभावनाएँ विद्यमान रहती हैं। सिन्धु के रहस्यों का आभास बिन्दु का विश्लेषण करते हुए भी जाना जा सकता है। ब्रह्माण्ड में चेतन और अचेतन स्तर का जो वैभव है उसका आभास पाने और दर्शन करने के लिए काय-कलेवर में सन्निहित रहस्यमयी विशेषताओं का पर्यवेक्षण किया जा सकता है। इस प्रयास में पिण्ड के साथ ब्रह्माण्ड की तुलना करने पर तनिक सी अत्युक्ति नहीं दीखती, वरन् संगति भली प्रकार बैठ जाती है।

काया कितनी समर्थ हो सकती है इसके अनेकानेक उदाहरण, घटनाक्रमों की साक्षी देने वाले प्रमाण इतिहास में विद्यमान हैं। इन पर अविश्वास हो तो अपने समय में भी ऐसे उदाहरण ढूँढ़े जा सकते हैं। वर्तमान की घटनाएँ उपेक्षित पड़ी रहती हैं। साधारणतया वे भूत की करतूत या जादू तिलस्म समझकर कौतूहल भर का विषय बनी रहती हैं। जब उन्हें कोई प्रामाणिक व्यक्ति खोजते हैं और विज्ञ समाज की जानकारी देते हैं तब कहीं यह प्रतीत होता है कि कहीं प्रकृति के रहस्यों की बिजली कौंध रही है। जब तक चर्चा फैलती, खोज की व्यवस्था बनती है तब तक उन चमत्कारी व्यक्ति यों या घटनाओं का अवसान काल आ धमकता है। समय बीत जाने पर उन रहस्यमय घटनाक्रमों का विवरण इतिहास बनकर रह जाता है। होना यह चाहिए कि ऐसे रहस्यों का परिचय मिलते ही कोई समर्थ तन्त्र उनके कारण खोजने के लिए गहराई तक उतर सकने वाले उपायों का अवलम्बन करे और भविष्य में प्रकृति के अधिक रहस्य उपलब्ध करने का द्वार खोले। पर ऐसा होता नहीं। विज्ञान का ध्यान इन दिनों सुविधा साधनों के-युद्ध विनाश के उपकरण ढूँढ़ने के प्रयत्नों में केन्द्रीभूत है। यदि यह दबाव घट सके और प्रकृति की गरिमा समझने के लक्ष्य मानकर शान्त चित्त से जुट सके तो मानवी ज्ञान-गरिमा और उच्चस्तरीय क्षमता में असाधारण अभिवृद्घि हो सकती है।

यहाँ सुविस्तृत पदार्थ जगत के बहुमुखी आधारों की चर्चा न करके मात्र काय कलेवर में सन्निहित विशिष्टताओं पर प्रकाश डाला जा रहा है और उन प्रमाणों को प्रस्तुत किया जा रहा है जिनके आधार पर शरीर में सन्निहित असाधारण स्तर की क्षमताओं पर प्रकाश पड़ सके। कमाने खाने भर के तुच्छ से काम में लगी रहने वाली, और ज्यों-त्यों करके मौत के दिन पूरे करने वाली काया, कितनी समर्थ हो सकती है इसकी जानकारी उन अद्भुत उदाहरणों से मिलती है जो यदा-कदा ही जहाँ तहाँ पाये जाते हैं। इतने पर भी वे यह साक्षी देने के लिए पर्याप्त हैं कि काया उतनी तुच्छ नहीं है, जितनी कि आमतौर से समझी जाती है। उसके अन्तराल में महान सम्भावनाओं का विपुल भण्डार भरा पड़ा है।

यहाँ इस तथ्य को भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि यहाँ अपवाद काम की कोई चीज नहीं। जादू चमत्कार के लिए कहीं कोई गुँजाइश नहीं। प्रकृति का विधान व्यापक है। उसमें से जितना अनुभव अभ्यास में है वही विश्वस्त और पर्याप्त प्रतीत होता है। जो आये दिन अभ्यास में नहीं आता वही चमत्कार है। यह लोक मान्यता हुई। इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। तथ्य अपनी जगह पर सुनिश्चित है। लोक मान्यताएँ आय दिन बनती बिगड़ती रहती हैं, पर तथ्य जहाँ के तहाँ रहते हैं। प्रकृति के अगणित नियम ऐसे हैं जो मनुष्य की प्रस्तुत जानकारी से आगे के हैं। उन्हीं के संयोग मिलते बिगड़ते रहने पर ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं जो मोटी दृष्टि से अपवाद, आश्चर्य या चमत्कार कही समझी जा सकें।

भूकम्प, तूफान, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, ऋतु विपर्यय, दैवी प्रकोप, वज्रपात जैसे अद्भुत घटनाक्रम कभी सामने आते हैं तो लगता है कि प्रकृति में कोई चूक हो रही है। कोई देवी देवता अपना रोष आक्रोश प्रकट कर रहा है। पर वस्तुतः ऐसा कुछ होता नहीं। ज्वालामुखी मनमौजी ढंग से नहीं फट पड़ते, उल्कापात किसी उमंग की परिणति नहीं है, अतिवृष्टि को दैवी प्रकोप नहीं कहना चाहिए वरन् ऐसी अप्रत्याशित घटनाओं के पीछे भी किन्हीं अविज्ञात नियमों की शृंखला जुड़ी समझी जानी चाहिए जो इन घटनाक्रमों के लिए उत्तरदायी है। सृष्टि अनिश्चित नियमों के आधार पर चल रहीं है। पर वे सभी नियम मनुष्य की जानकारी में बँध नहीं सके। उनमें से असंख्य अभी भी पकड़ के बाहर हैं। उन्हें जैसे-जैसे जाना जा सकेगा वैसे ही यह विश्वास हो चलेगा कि जो यहाँ घटित हो रहा है वह किसी सुनिश्चित नियम प्रक्रिया के अंतर्गत ही आता है, भले ही अभी उसे समझ पाने का सुयोग हाथ नहीं लग पाया।

कभी-कभी चित्र विचित्र प्रकृति की सन्तानें मनुष्यों या अन्य प्राणियों के पेट में प्रसव होती देखी गई हैं। यह विज्ञान क्रम के विरुद्ध है इतने पर भी यह नहीं कहा जाता है कि भ्रूण विज्ञान के आधारभूत सिद्धान्तों में ऐसी विचित्रताओं के लिए गुँजाइश नहीं है। गर्भ प्रणाली में कारणवश हेर-फेर होने पर वे नियम अपना काम करने लगते हैं जो सामान्यतया प्रकट नहीं होते। इतने पर भी किसी विचित्र आकृति वाले प्रजनन को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि प्रकृति के अनन्त नियम निर्धारणों का यहाँ उल्लंघन हुआ। सृष्टि व्यवस्था में किसी उच्छृंखलता की तनिक भी गुंजाइश नहीं है। उसमें कभी राई रत्ती भी व्यतिक्रम हुआ तो समझना चाहिए वर्तमान सृष्टि व्यवस्था का-प्रकृति प्रक्रिया का-अन्त हो गया। प्रलय आ पहुँची और किसी अन्य प्रकार की प्रकृति के बनने का कोई अद्भुत समय आ गया। किन्तु जब तक अपनी दुनिया अपने सामने है तब तक यही मानकर चलना होगा कि यह व्यतिक्रम, अपवाद जैसी गुँजाइश कहीं भी नहीं है। यह दूसरी बात है कि उन रहस्यों के आधारभूत कारणों से अपरिचित रहने के कारण अप्रत्याशित घटनाओं की प्रकृति का व्यतिक्रम या दैवी प्रकोप कहकर मन को समझाने, बहकाने का प्रयत्न करें। हमें यही मानकर चलना होगा कि सृष्टिक्रम सुनिश्चित और सुव्यवस्थित है। जो घटना एक जगह घटित हुई वह दूसरी जगह भी उसी रूप में घटित हो सकती है। जो अवसर संयोगवश आ धमके, उन्हें तथ्यों की जानकारी होने पर मानवी प्रयत्नों से भी सम्भव करके दिखाया जा सकता है।

मानवी काया द्वारा यदा-कदा अद्भुत सामर्थ्य का प्रकटीकरण होता है। उन्हें कौतुक कौतूहल में नहीं उड़ा दिया जाना चाहिए कि इस प्रकार का नियम विधान इस सृष्टि में मौजूद है। उसे जाना और प्रयोग में लाया जा सके तो कोई कारण नहीं कि आज की आश्चर्यजनक घटना कल स्वाभाविक क्रम में सम्मिलित न हो सके। मनुष्य द्वारा किये जा सकने वाले स्वेच्छा प्रयोग की परिधि में न आ सके। बालक आश्चर्य करते रहें-इसमें बड़ों को क्या लेना देना? उन्हें तो उस आश्चर्य के आधारभूत कारण को समझ सकने योग्य गहरी डुबकी लगानी चाहिए और प्रयत्न यह करना चाहिए कि उन अविज्ञात रहस्यों को जाना जाय जिसके कारण ऐसे असामान्य घटनाक्रम उपस्थित होते हैं। यदि वे अनुपयुक्त हैं तो भावी सम्भावना में उन्हें न जुड़ने देने का प्रयत्न किया जाय। यदि वे उपयुक्त हैं तो यह प्रयास किया जाय कि उस प्रकार की विशिष्टता उपलब्ध करने, कराने के लिए हमें क्या प्रयत्न करने होंगे, क्या साधन जुटाने होंगे।

विज्ञान अनुसंधान की परम्परा यही रही है कि किसी विचित्रता का आभास मिला तो उसके कारण ढूँढ़ने के लिए एकनिष्ठ तन्मयता के साथ जुटा गया। सफलता असफलता के-आशा निराशा के ज्वार-भाटों में गिरते उभरते वे प्रयत्न समयानुसार फलित हुए और आभास के आधार पर लगाये गये अनुमान का रहस्य जानने में कृत कार्य बन गया। हर वैज्ञानिक अन्वेषणों का यही इतिहास रहा है और आगे भी रहेगा। ऐसी दशा में भावी शोध प्रक्रिया में एक नया विषय और सम्मिलित करने की गुँजाइश है कि मानवी कार्य काया में समय-समय पर प्रकट होने वाली विलक्षणताओं-विचित्रताओं का रहस्य ढूँढ़ निकाला जाय। ज्ञान की अनन्त पिपासा लेकर जन्मे मनुष्य ने आदिम काल से लेकर अब तक लम्बी मंजिल पार की है। भौतिक और आत्मिक क्षेत्रों में ऐसी अगणित विभूतियाँ उपलब्ध की हैं जिन पर सोचने की अभी तो अपने को फुरसत नहीं, किन्तु एक क्षण के लिए आदिम काल में पहुँचने की कल्पना करके उस समय को कठिन परिस्थितियों और आज की स्वर्गोपम सुविधाओं को तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो प्रतीत होगा कि लम्बे अतीत में आविष्कार अनुसंधान के क्षेत्र में कितनी कुछ सफलता हस्तगत की जा चुकी।

जो अतीत से लेकर अब तक की प्रगति यात्रा में ही सका, वह उपक्रम अब से लेकर भविष्य में भी चलता रहेगा। जिज्ञासा कभी समाप्त नहीं हो सकती। शोध प्रयत्नों को कभी विराम नहीं लग सकता । लगा तो समझा यह जाना चाहिए कि वर्तमान के साथ अवरुद्ध होने की जड़ता जकड़ गई, उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना समाप्त हो गई। ऐसा न तो हो सकता है और न होना चाहिए। ज्ञान अनुसंधान के भावों प्रयत्नों में एक महत्वपूर्ण कड़ी यह जुड़नी चाहिए कि मानवी काया कितनी समर्थ है। उस समर्थता का रहस्य खोजा जाय और यह प्रयत्न किया जाय कि मनुष्य यदि संयोगवश घटित होने वाली घटनाओं को सरल स्वाभाविक क्रम में सम्मिलित कर सके तो वह कितना सुखी और समर्थ हो सकता है। पदार्थ की खोज में काय-कलेवर का अनुसंधान भी सम्मिलित रहना चाहिए। न केवल पदार्थों की उपयोगिता तथा उनकी इच्छानुरूप प्रयोग की प्रक्रिया जानना चाहिए वरन् हमें कार्य क्षेत्र में भी आगे बढ़ना चाहिए और इस प्रयास से निरत होना चाहिए कि आज जिस काय कलेवर को तुच्छ असहाय माना जाता है। वह भविष्य में समर्थता की अभिवृद्घि करते हुए उस स्तर तक पहुँच सके जिसे अब तक देव दानव की विशेषता भर माना जाता रहा है।

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