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Magazine - Year 1982 - Version 2

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विचित्रता से भरी यह मानवी काया

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मानवी काया एक सर्वांगपूर्ण प्रयोगशाला है। सृष्टा की विनिर्मित एक ऐसी प्रयोगशाला जिसमें एक से बढ़कर एक-बहुमूल्य-अद्भुत और अनोखे यन्त्र हैं। पिण्ड और ब्रह्माण्ड के अनेकानेक सूक्ष्म रहस्यों को जानने में ये यन्त्र महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित कर सकते हैं। मनुष्य उपलब्ध शरीरगत एवं मनोगत सामर्थ्य का अधिकाँश भाग प्रायः खाने, पीने, सोने,और श्रम करने जैसे सीमित प्रयोजनों में खर्च कर देता है। उसे यह अनुमान भी नहीं रहता है कि प्राप्त शारीरिक एवं मानसिक विशेषताओं का नियोजन पिण्ड शारीरिक एवं ब्रह्माण्ड के सूक्ष्मत्तर रहस्यों को जानकर अनेकों प्रकार की उपलब्धियाँ करतलगत कर सकता है। ऐसी सामर्थ्य उपार्जित कर सकता है जो सामान्यतः अन्य प्रकार के भौतिक प्रयत्नों से सम्भव नहीं है।

पदार्थ के नाभिक में प्रचण्ड शक्ति का भण्डार आदिकाल से ही विद्यमान है। पर जब तक उसकी जानकारी नहीं थी, पदार्थ सत्ता का मोटा उपयोग ही हो पाता था। विपुल शक्ति का स्त्रोत मौजूद होते हुए भी उससे कुछ विशेष लाभ उठाते लम्बे समय तक नहीं बन पड़ा । कारण था उन नियमों से अपरिचित होना जो नाभिकीय शक्ति को अर्जित करने के कारण थे। जैसे ही वे सूत्र हाथ लगे कि परमाणु शक्ति को कैसे कुरेदा और कैसे उपयोग में लाया जाय तो युग ने एक महान करवट ली। मनुष्य ज्योति ने शक्ति के क्षेत्र में डायनामाइट युग से परमाणु युग में छलाँग लगायी और अब परमाणु शक्ति के आधार पर बड़े-बड़े सपने देखे जा रहे हैं।

ठीक इसी प्रकार की अनेकानेक असंख्यों संभावनाएँ प्रकृति के गर्भ और मानवी पिण्ड में मौजूद हैं जो अविज्ञात हैं। मनुष्य की काया स्वयं में एक विलक्षण संरचना है। शरीर शास्त्रियों को अभी सामान्य स्थूल जानकारी मिल सकी हैं। परमाणु नाभिक की तरह शरीर में भी ऊर्जा का प्रचण्ड भण्डार भरा पड़ा है। उसे किस तरह जगाया और उपयोग में लाया जाय विज्ञान इससे अभी अपरिचित है। प्रकृति कभी-कभी विलक्षण घटनाओं के सहारे इस तथ्य का बोध कराती है कि मानवी काया में इतनी प्रचण्ड विद्युत भरी पड़ी है कि यदि वह फूट पड़े तो शरीर को ही भस्मीभूत कर सकती है। ऐसी रहस्यमय घटनाओं के उदाहरण आये दिन मिलते रहते हैं।

काउडर स्पोर्ट, पेन्सिलवानिया में डाँन,ई. गास्नेल मीटर रीडिंग का काम करता था। इसी क्षेत्र में एक वृद्ध फिजिशियन डा. जान इर्विन वेन्टले रहते थे। वृद्ध होते हुए भी वे पूर्णतया स्वस्थ थे। 5 दिस.1966 को नित्य की तरह डान गास्नेल मीटर रीडिंग के लिए निकला। डा. जान डर्विन वेन्टले के दरवाजे पर उसने दस्तक दी। प्रत्युत्तर न मिलने पर उसने आवाज लगायी फिर भी कोई उत्तर नहीं मिला। वह मकान के ही एक पाइप के सहारे ऊपर के कमरे में पहुँचा। कारण यह था कि ऊपर कमरे की ओर से एक विचित्र प्रकार की जलने की गन्ध आ रही थी। कमरे में पहुँचकर देखा तो वहाँ से हल्का नीला धुँआ उठ रहा था। कमरे की सतह पर राख की ढेर पड़ी हुई थी। अन्दर कमरे का दृश्य अत्यन्त वीभत्स था। डा. वेन्टले का दाहिना पैर जूते सहित मात्र अधजली स्थिति में पड़ा था। अवशेष शरीर के सभी अंग जलकर राख हो गये थे। विशेषज्ञों न भली−भाँति घटना का अध्ययन किया और अन्ततः स्वतः जलने की संज्ञा दी। ऐसा कोई सुराग नहीं मिला जो किसी अन्य प्रकार से आग लगने की पुष्टि कर सके। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि कमरे से निकलने वाली दुर्गन्ध माँस के जलने जैसी न होकर मीठी महक से युक्त थी।

इसी तरह की एक घटना जुलाई 1951 के एक दिन प्रातः सेन्द पीटर्स वर्ग फ्लोरिडा में घटी। ‘मेरीरिजर’ नामक एक अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट महिला अपनी कुर्सी पर ही बैठे-बैठे जल गयी। इस कायिका दहन की विशेषता यह थी कि भयंकर अग्नि शरीर से निकली-उसे जलाती रही पर मात्र एक मीटर के घेरे तक ही सीमित रही। ‘मेरी’ का 80 किलो वजनी शरीर पूर्णतया भस्मीभूत होकर चार किलो राख में परिवर्तित हो गया। वेन्टले की भाँति उसका भी एक पैर अध जला उस घेरे में बच गया था। खोपड़ी सिकुड़ कर सन्तरे के आकार में बदल गयाी थी।

अवशेषों की जाँच के लिए पेन्सिलनवानिया स्कूल आफ मेडिसीन के फिजिकल एन्थोपोलाजी के प्रोफेसर डा. ‘विल्टन क्रोगमैन के पास भेजा गया तो खोपड़ी की आकृति को देखकर वे आश्चार्य चकित रह गये। वह एक ख्याति प्राप्त फरेंसिक वैज्ञानिक थे तथा वर्षों का अनुभव था। जब तक की घटनाओं में ऐसी कोई घटना उनके पास नहीं आयी थी कि जलने के उपरान्त खोपड़ी सिकुड़ कर छोटी हो गयी हो। क्योंकि विज्ञान के नियमानुसार जलने के बाद खोपड़ी को या तो फूल जाना चाहिए अथवा टुकड़े-टुकड़े हो जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस विचित्र अग्निकाण्ड में खोपड़ी का सिकुड़कर छोटा हो जाना निस्सन्देह एक आश्चर्य जनक बात है। अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने यह बताया कि बारह घण्टे तक लगातार तीन हजार डिग्री फारेनहाइट तापक्रम पर रहने पर भी शरीर की सम्पूर्ण हड्डियाँ भस्मसात् हो गयी हों ऐसा अब तक देखा-सुना नहीं गया था। पर यह घटना अपने में सबसे विलक्षण है जिसकी यथार्थता पर बिलकुल ही सन्देह करने की गुँजाइश नहीं है।”

पेरिस 1851 में घटी एक घटना और भी अधिक आश्चर्यजनक है। ग्रेट मिस्ट्रीज पुस्तक जिसके लेखक हैं इलेनार दान जान्डट तथा ‘राय स्टेमन’ पुस्तक में वर्णित घटना के अनुसार एक व्यक्ति में अपने एक मित्र से शर्त लगायी कि वह जलती मोमबत्ती को निगल सकता है। सत्यता को परखने के लिए दूसरे मित्र ने उसकी ओर तुरन्त एक जलती मोमबत्ती बढ़ा दी। जैसे ही उस व्यक्ति ने निगलने के लिए मोमबत्ती को अपने मुँह की ओर बढ़ाया वह जोर से ही चिल्लाया। मोमबत्ती की लौ से उसके होठों पर नीली लौ दीखने लगी। आधे घण्टे के भीतर ही पूरे शरीर में आग फैल गयी और कुछ ही समय में उसने शरीर के अंगों, माँस पेशियों, त्वचा एवं हड्डियों को जलाकर राख कर दिया।

नैशविल यूनिवर्सिटी के गणित विभाग के प्रो. जेम्स हैमिल्टन ने आपबीती एक घटना का उल्लेख किया है 1835 में वे उक्त विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। अपनी एक पुस्तक में लिखते हैं कि “एकाएक मुझे अपने बायें पैर के निचले हिस्से मे तीव्र जलन महसूस हुई। झुककर उस भाग को देखा तो स्तम्भित रह गया। जलन वाले भाग से लगभग दस से. मी. लम्बी लौ निकल रही थी। यह लौ ठीक उसी प्रकार की थी जैसी कि लाइटर आदि जलाने से निकलती है। पर कुछ ही क्षणों बाद वह अपने आप बुझ गयी। आग किन किरणों से लगी और बुझ गयी यह रहस्य आज भी हमारे लिए अविज्ञात है।”

फ्रान्सिस हिचिंग की पुस्तक दी वर्ल्ड एटलस आफ मिस्ट्रीज में सन् 1938 का एक अमेरिकी घटना का उल्लेख है कि गर्मी के मौसम में एक दिन नारफाक ब्राड्स नामक स्थान पर नौका विहार कर रही एक महिला के शरीर से अग्नि की लपटें फूट पड़ीं। साथ में उसके पति और बच्चे भी थे। पानी से आग बुझाने का प्रयास किया गया। पर उस भभकती अग्नि पर काबू नहीं पाया जा सका। वह मेरी कारपेन्टर के शरीर को भस्मीभूत करके अपने आप बुझ गयी।

‘स्पान्टेनियस ह्मन कम्बस्टन की घटनाओं की शृंखला में बिहार के भागलपुर जिले की दो वर्षों पूर्व सूर्यग्रहण के अवसर पर घटी एक घटना का उल्लेख यहाँ करना समीचीन होगा। एक युवक अपने घर के आँगन में मौन बैठा था। बारम्बार घरवालों के पूछने पर उसने बताया कि आज उसके कथन की ओर ध्यान नहीं दिया। थोड़ी देर तक वह सूर्य की ओर मुँह किये ताकता रहा। अचानक उसके शरीर से अग्नि की नीली ज्वालाएँ फूटने लगीं। घर के सदस्यों ने शरीर पर पानी फेंका तथा कम्बल से ढक दिया था पर शरीर उस तीव्र ज्वाला में बुरी तरह झुलस गया। आग तो बुझ गयी पर उसे बचाया न जा सका। अस्पताल में पहुँचने पर उसने दम तोड़ दिया।

शरीर शास्त्रियों क मत है कि शरीर की कोशिकाओं का तापक्रम अकस्मात् इतना अधिक बढ़ जाय, ऐसा जीव विज्ञान के अनुसार असम्भव है। आग का स्वतः उत्पन्न हो जाना भी एक अविश्वसनीय घटना है। पर उपरोक्त प्रामाणिक घटनाएँ इस बात की साक्षी हैं कि मानवी काया में ऊर्जा का प्रचण्ड सागर भरा पड़ा है। शरीर विज्ञान के अब तक ज्ञात नियमों के आधार पर शरीर में अचानक आग लग जाने तथा उसके भस्मसात् हो जाने के कारणों की अब तक व्याख्या विवेचना नहीं हो सकी है। वे सूत्र भी पकड़ में नहीं आ सके जिनके कारण शरीर का तापक्रम तीन हजार डिग्री फारेनहाइट तक अचानक बढ़ गया। पर मात्र कारण न समझ में आने से तथ्यों को झुठलाया नहीं जा सकता घटनाओं की विवेचना वैज्ञानिक आधार पर कर सकने के अभाव में उनकी सत्यता को झुठला दिया जाय, यह सम्भव नहीं है।

शरीर विज्ञान अभी अपनी बाल्यावस्था में है स्थूल काया के विषय में उसे मात्र उथली जानकारियाँ ही प्राप्त हो सकी है। अविज्ञात का क्षेत्र कई गुना अधिक है रहस्यों की पिटारी मानवी काया में शक्ति के कितने ही ऐसे सूक्ष्म स्रोत मौजूद हैं जिनसे शरीर शास्त्री पूर्णतया अपरिचित है। उदाहरणार्थ शरीर में स्वतः आग फूट पड़ने की घटनाओं का उल्लेख किया जा चुका है। यह तो एक उदाहरण मात्र है। सूक्ष्म कायिक क्षेत्र में ऐसी असंख्यों संभावनाएँ विद्यमान है जो प्रसुप्तावस्था में हैं। अपरिचित होने के कारण उन सूक्ष्म शक्ति स्रोतों का मनुष्य कुछ उपयोग नहीं कर पाता। पेट और प्रजनन के इर्द-गिर्द ही वह जीवन पर्यन्त चक्कर काटता-अपने धर्म, सामर्थ्य का अधिकाँश भाग नियोजित रखता है। शरीर की सूक्ष्मत्तर शक्ति यों को जानने और उन्हें जागृत करने के लिए वह साँसारिक उपलब्धियों को प्राप्त करने जैसा ही पुरुषार्थ कर सकने का साहस जुटा सके तो उसकी स्थिति आज की तुलना में सर्वथा भिन्न बेहतर हो सकती है। संसार की प्रयोगशालाओं में कितने ही प्रकार के प्रयोग परीक्षण चलते रहते हैं। एक प्रयोगशाला प्रकृति द्वारा मनुष्य को भी दी गयी है जो अपने में परिपूर्ण अमूल्य यन्त्रों से सुसज्जित है। प्रकृति पिण्ड की विलक्षण घटनाओं के माध्यम से यह सन्देश देती है कि इस अन्तर्गत की प्रयोगशाला में भी प्रयोग परीक्षण किया जाय। शरीर की जो प्रचण्ड ऊर्जा जो किन्हीं अविज्ञात व्यतिरेक से काया को जलाकर राख कर सकती है, उसे शरीर में प्रदीप्त करने तथा नियन्त्रण करके सुनियोजन द्वारा सदुपयोग करने की विद्या का ज्ञान हो सके तो उसके सहारे कितने ही महत्वपूर्ण कार्य हो सकते हैं।

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