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Magazine - Year 1982 - Version 2

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ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के दस प्रयोग प्रयोजन

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First 28 30 Last
विज्ञान और बुद्धिवाद का पिछली शताब्दियों में असाधारण रूप से विस्तार हुआ है। तर्क को मान्यता मिली है और कुछ स्वीकार करने से पूर्व तथ्य, प्रमाण और उदाहरण की माँग की जाती है। उस प्रवाह को अब रोका नहीं जा सकता। अगली पीढ़ी तार्किकों की होगी। उनका समाधान तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत किये बिना हो नहीं सकेगा। इस सामयिक यथार्थता को समझा जाना चाहिए।

अध्यात्म एक तर्क सम्मत विज्ञान है। उसके आधार पर चेतना का परिशोधन, परिष्कार एवं उत्कर्ष सम्भव होता है। शरीर सुविधा के लिये जिस प्रकार साधन सम्पदा चाहिए उसी प्रकार व्यक्ति त्व को महामानव स्तर तक विकसित करने के लिए उच्चस्तरीय आस्थाओं की आवश्यकताओं पड़ती है। आस्थाएँ तत्त्वदर्शन पर निर्भर है। उन्हीं को प्रेरणा से बुद्धि तन्त्र एवं श्रम तन्द्ध काम करता है। जीवन का स्वरूप इन्हीं के समन्वय से बनता है। वैभव से सुविधाएँ बढ़ती हैं तो आस्थाओं से अन्तराल विभूतिवान् बनता है। इसी कारण दूरदर्शी मनीषियों ने मनुष्य के लिये सम्पत्ति उपार्जन की तरह आत्म परिष्कार के लिये भी प्रयत्नरत रहना आवश्यक माना है। वैभव का उपार्जन उपभोग करने में तो भौतिकी की सहायता लेनी पड़ती है और चेतना को विभूतिवान् बनाने के लिये आत्मिकी की। दोनों का निर्वाह करना व समान महत्व दिया जाना आवश्यक है।

आत्मविज्ञान पिछले दिनों श्रद्धा पर अवलम्बित रहा है। श्रद्धा भी एक विज्ञान है। किसी निश्चय पर पहुँचने में जितना तर्क प्रमाण का योगदान है, उतना ही प्रयोजन श्रद्धा के अवलम्बन से सध जाता है। उसकी सामर्थ्य निश्चित रूप से इतनी है कि अपने प्रतिपादन को सत्य की तरह श्रद्धालु के मस्तिष्क में उतार सके। इसीलिये प्राचीनकाल में यह सरल समझा गया कि लोग श्रद्धा अपनाये, आप्त निर्धारणों पर विश्वास करें और तद्नुरूप अपनी दिशाधारा का निर्धारण करें, आज को स्थिति भिन्न है। अध्यात्म तत्त्वज्ञान के प्रति अनास्था इस कारण बढ़ती जाती है कि श्रद्धा को मान्यता नहीं दी जा रही, और तत्सम्बन्धी प्रतिपादनों को तर्क, प्रमाण के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा रहा।

संकट टालना हो तो प्रवाह उलटना पड़ेगा। इसके लिये आवश्यकता है कि जनमानस की उत्कृष्टता अपनाये रहने वाली अध्यात्म आस्था को मरणासन्न स्थिति से उबारा जाय। मात्र श्रद्धा का अवलम्बन पर्याप्त न माना जाय, तर्क, तथ्य-प्रमाण को भी समन्वित रखा जाय। अर्थ यह हुआ कि अध्यात्म को यदि जीवित एवं प्रखर रहना है तो फिर उसे विज्ञान की कसौटी पर खरा सिद्ध होने की अग्नि परीक्षा से गुजरना होगा। इसके बिना आज का उपहास कल तिरस्कार बनेगा और अन्ततः विद्रोह रूप धारण कर सभ्यता को मटियामेट कर देगा। स्थिति की गम्भीरता समझी जानी चाहिए और समय रहते आस्था संकट के भँवर में फँसी हुई उत्कृष्टता की पक्षधर अध्यात्म संस्कृति की प्राण रक्षा की जानी चाहिए।

समय की माँग भूतकाल में भी पूरी होकर रही है। अब फिर इस संदर्भ में पूरी होने जा रही है कि अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय हो। श्रद्धा और तर्क एक-दूसरे को काटे नहीं, वरन् सुदृढ़ और परिपुष्ट बनायें। ऐसा सम्भव है, क्योंकि विज्ञान और अध्यात्म दोनों ही सत्य के समर्थक हैं। गलतफहमी दूर होने पर जब यथार्थता सामने आयेगी तो दोनों में से कोई भी उसे अस्वीकार नहीं करेगा। ऐसा सुयोग सौभाग्य तो निश्चिंततः वर्तमान विभीषिकाओं में से अधिकाँश को निरस्त कर सकने में समर्थ होगा। जो शेष रहेगा उसे विवेक युक्त सहयोगी पुरुषार्थ के सहारे सहज ही सम्पन्न कर लिया जायेगा।

अध्यात्म-विज्ञान का समन्वय कैसे-किस प्रकार सम्भव हो, इस अनुसन्धान को प्रज्ञा अभियान ने अपने महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों में सम्मिलित किया है और इसे पूरा कर दिखाने का भार अपने कन्धों पर उठाया है। इसी प्रक्रिया का नाम ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान है। ‘ब्रह्म’ अर्थात् अध्यात्म। ‘वर्चस्’ अर्थात् विज्ञान। दोनों के मिलन की सम्भावना मनीषा के अन्तराल को गदगद कर देती हैं। कार्य चल पड़ा है और विश्वास है कि लक्ष्य तक पहुँच कर ही रुके गा।

ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान का प्रयास है कि अध्यात्म तत्त्वदर्शन के महत्वपूर्ण प्रतिपादनों को प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर कसे जाने योग्य बनाया जाय और हर अविश्वासी को कहा जाय कि वह प्रतिपादन की जाँच-पड़ताल करे और यथार्थता को बिना हठवादिता के स्वीकार करें अध्यात्म के प्रमुख सिद्धान्तों को तर्क, तथ्य, प्रमाण के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास चल रहा है कि ऋषि न तो दिग्भ्रान्त थे, न स्वार्थ प्रेरित दुराग्रही। उनके अगणित अध्यात्म प्रतिपादनों में से दस प्रमुखो को ब्रह्मवर्चस् ने अपने प्रथम प्रयास में अनुसंधान हेतु चुना है। शेष असंख्यों में से प्रत्येक, चरण में से दस-दस को हाथ में लिया और उनकी यथार्थता को विज्ञान एवं दर्शन की हर कसौटी पर कसा और निष्कर्षों को पाठकों के समक्ष प्रकट किया जाता रहेगा। अभी जो परीक्षण हाथ में लिये गए हैं, वे इस प्रकार हैं—

(1)मनःस्थिति से परिस्थिति का निर्माण

लोक मान्यता इससे ठीक उल्टी है। लोग परिस्थिति को प्रमुख मानते हैं और सभी समस्याओं के लिये उन्हें सुधारने का भरपूर प्रयास करते हैं। वे या तो निरर्थक चले जाते हैं, या फिर परिस्थिति बदलने पर भी मनः-स्थिति यथावत् बनी रहती है। एक के सुधरते ही अन्य कारण आ धमकते हैं व चाहा गया सुयोग बन ही नहीं पाता। इस संदर्भ में यह सिद्ध किया जाना है कि मनः-स्थिति यथावत् बनी रहती है। एक के सुधरते ही अन्य कारण आ धमकते हैं व चाहा गया सुयोग बन ही नहीं पाता। इस संदर्भ में यह सिद्ध किया जाना है कि मनः-स्थिति का शरीर, मस्तिष्क, व्यवहार, संपर्क, प्रयास तथा स्वभाव सभी पर प्रभाव पड़ता है। अपना दृष्टिकोण व व्यवहार का स्तर सुधर जाने पर संपर्क क्षेत्र का सहयोग अनायास ही आकर्षित होता है और अभीष्ट सफलताओं का द्वार सरलतापूर्वक खुल जाता है। यहाँ तक कि इसका शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर आश्चर्यजनक प्रभाव होता है।

(2) विचार-क्रान्ति

जन मान्यता यह है कि स्वार्थी व्यक्ति नफे में रहता है और उदार परमार्थी घाटे में। इसी कारण लोग अपने मतलब से मतलब रखते व सरकारी प्रयासों से बचते हैं। स्वार्थान्धता चतुरता मानी जाती है और परमार्थ परायण लोकसेवियों को मूर्ख ठहराया जाता है। ब्रह्मवर्चस् शोध द्वारा यह विचार क्रान्ति की जानी है कि आत्म विस्तार एवं उदार व्यवहार से किस प्रकार व्यक्तित्व विशिष्ट बनता है, लोक सम्मान-आत्म सन्तोष व दैवी अनुग्रह किस प्रकार मिलता चला जाता है। महामानवों के अगणित उदाहरण इसी को सिद्ध करने के लिए दिये जाने हैं कि उदार आत्मीयता बरतने में तो तात्कालिक घाटा उठाना पड़ता है, वह बीज बोने की तरह ऐसा है जिसे तनिक क्षति उठाकर आम्रवृक्ष उगाने जैसा समझा जा सकता है।

(3) आस्तिकता का सशक्त समर्थन

आस्तिकता को वास्तविक तथा नास्तिकता को अवास्तविक सिद्ध करने के अनेकों प्रमाण इसीलिये प्रस्तुत किये जा रहे हैं कि सर्वशक्तिमान नियन्ता की कर्मफल व्यवस्था पर लोग विश्वास रखें। देर में फल मिलने के कारण विश्वास न खोये । दुष्कृतों वाले मनोविकारों से किस प्रकार शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य क्षीण होता है और व्यक्तित्व का स्तर गिरने पर लोक भर्त्सना से कितनी क्षति पहुँचती है, इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हाथों-हाथ दिये जा सकते हैं।

(4)प्रसुप्त का जागरण

व्यक्ति का प्रत्यक्ष स्वरूप सीमित है, प्रकट क्षमताएँ भी नगण्य है। गहराई में उतरें तो प्रतीत होता है कि बीज रूप में उसके अन्तराल में वह सब कुछ विद्यमान है जो सृष्टा में पाया जाता है। दावानल की सारी विशेषताएँ चिनगारी में, वृक्ष की बीज में सन्निहित होती हैं। प्रश्न केवल प्रसुप्त को जगाने भर का है। ब्रह्मवर्चस् शोध प्रयासों द्वारा यह सिद्ध किया जा रहा है कि यदि उच्चस्तरीय साधना प्रयत्नों द्वारा मूर्च्छना से व्यक्ति को जगाया जा सके तो वह अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न देव मानव बन सकता है।

(5) अदृश्य जगत से संपर्क

इन्द्रियाँ जड़-जगत को ही जानती हैं अनुभव करती हैं। इसके अन्तराल में एक अदृश्य जगत है। उसी की प्रेरणा से यह दृश्य जगत विभिन्न प्रकार की उत्साहपूर्वक गतिविधियों में निरत रहता है। यदि दोनों का सम्बन्ध टूट जाय तो फिर सौर-मण्डल के अन्य ग्रहों जैसी निस्तब्ध स्थिति अपने भू-मण्डल की भी बन जायगी। मानवी चेतना का अदृश्य जगत से सम्बन्ध प्रायः नहीं के बराबर है। यदि आत्मा का कौशल उस जगत से भी जुड़ सके तो उस क्षेत्र में भी ऐसी ही शक्तियाँ तथा सम्पदाएँ हस्तगत हो सकती हैं जैसा कि संसार में अनेकों को अनेक प्रकार की सम्पदाएँ उपलब्ध होती हैं। अदृश्य जगत का स्वरूप, वैभव, वर्चस्व, प्रयोग, उपयोग किस प्रकार सम्भव हो और उस पहुँच से व्यक्ति कितना समर्थ सम्पन्न हो सकता है इस प्रक्रिया को खोज निकालना ब्रह्मवर्चस् का एक अनुसंधान क्रम है।

(6) काया का अनुसंधान

मानवी सत्ता एक समग्र प्रयोगशाला है। तप साधना द्वारा इसके उपकरणों को परिष्कृत तथा योग द्वारा जड़ को चेतनामय बनाया जाता है। परिष्कृत व जड़ चेतन समन्वय की परिणति से जा परिचित हैं वे जानते हैं कि अन्तराल में से किन विभूतियों को उभारा-विकसित किया जा सकता है। सिद्ध पुरुष इसी मार्ग पर चलकर ऋद्धि-सिद्धियाँ अर्जित करते हैं। यह अवरुद्ध मार्ग किस प्रकार खुले। षट्चक्र, सहस्रार, कुण्डलिनी, उपत्यिकाओं से सम्बन्ध किस उपाय से जुड़े, यह प्रस्तुत अनुसंधान का विषय है।

(7) चेतना जगत की विभूतियों का प्रतिपादन

संसार में धन, बल, कौशल ये तीन शक्तियाँ ही जानी जाती हैं। चेतना जगत में विशिष्ट स्तर के तीन वैभव हैं। श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा। श्रद्धा अर्थात् आस्था, विश्वास, आत्मबल। प्रज्ञा अर्थात् विवेकशीलता, दूरदर्शिता। निष्ठा अर्थात् कर्मनिष्ठा, पराक्रम, साहस। लोग सम्पदा को तो जानते हैं, पर आत्मिक विभूतियों की गरिमा से अपरिचित ही बने रहते हैं। जनमानस इनका महत्ता पहचाने, पाने को ललचाने, ऐसे प्रतिपादन प्रस्तुत किये जाने का प्रयास किया जाता है।

(8)विश्वास की शक्ति

भौतिक सामर्थ्य के बदले सुविधा, सम्पदा कमाई जाती है लेकिन वास्तविक सामर्थ्य तो आत्मबल एवं आत्मानुशासन है जो साहसिक संकल्पों के रूप में प्रकट होता है। विश्वासों के आधार पर मनोबल व आत्मबल किस प्रकार बढ़ाया जा सकता है। ऐसा विभूति सम्पन्न व्यक्ति किस प्रकार कृतकृत्य होता है इन तथ्यों को प्रत्यक्षवादी प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया जा रहा है।

(9) प्रकृति से संपर्क

प्रकृति में अन्तराल में अद्भुत क्षमताएँ छिपी पड़ी हैं। ब्रह्म विज्ञान नाम से प्रख्यात यह क्षेत्र सुविधाएँ ही नहीं-प्रगति तथा प्रसन्नता का उद्गम केन्द्र है। इस ब्रह्म विज्ञान को कैसे जाना जाय तथा उससे संपर्क स्थापित करे ब्रह्माण्ड-व्यापी अदृश्य शक्तियों को कैसे अपनी अधिकार परिधि में लिया जाय, यह शोध प्रयास का अंग है।

(10)पदार्थ की कारण शक्ति से अनुदान प्राप्ति

पदार्थ की स्थूल सामर्थ्य से सभी परिचित हैं। सूक्ष्म शक्ति किन्हीं विरलों पर ही प्रकट होती है। इसमें भी अधिक गहरे उतरने पर पदार्थ की कारण शक्ति का पता चलता है और उसके अन्तराल में छिपी चेतनात्मक विशेषता से संपर्क बनता है। मन्त्र विज्ञान और यज्ञ विज्ञान पदार्थ की कारण शक्ति को उभारने की ही प्रक्रियाएँ हैं। शब्द को अभिमन्त्रित करके उसे अस्त्र-शस्त्र की तरह शाप, वरदान, की तरह प्रयुक्त किया जा सकता है। यज्ञ विज्ञान में समिधाएँ, शाकल्य, भस्म, जल आदि पदार्थों को संजीवनी बूटी स्तर का बनाया जाता है व शरीरगत, मनोगत व्याधियाँ मिटायी जाती हैं। पर्यावरण सन्तुलन इसी आधार पर सम्भव बनाया जाता है। इस लुप्त विज्ञान को पुनर्जीवित करने का शोध कार्य भी इस क्रम में लिया गया है।

पदार्थ की स्थूल सामर्थ्य से सभी परिचित हैं। सूक्ष्म शक्ति किन्हीं विरलों पर ही प्रकट होती है। इसमें भी अधिक गहरे उतरने पर पदार्थ की कारण शक्ति का पता चलता है और उसके अन्तराल में छिपी चेतनात्मक विशेषता से संपर्क बनता है। मन्त्र विज्ञान और यज्ञ विज्ञान पदार्थ की कारण शक्ति को उभारने की ही प्रक्रियाएँ हैं। शब्द को अभिमन्त्रित करके उसे अस्त्र-शस्त्र की तरह शाप, वरदान, की तरह प्रयुक्त किया जा सकता है। यज्ञ विज्ञान में समिधाएँ, शाकल्य, भस्म, जल आदि पदार्थों को संजीवनी बूटी स्तर का बनाया जाता है व शरीरगत, मनोगत व्याधियाँ मिटायी जाती हैं। पर्यावरण सन्तुलन इसी आधार पर सम्भव बनाया जाता है। इस लुप्त विज्ञान को पुनर्जीवित करने का शोध कार्य भी इस क्रम में लिया गया है।

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