खाली हूजिए, आप लबालब भर जायेंगे।
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पाने के लिए छोड़ना आवश्यक है। जो सिर्फ पाना ही चाहता है। छोड़ने की बात सामने आते ही नानी मरती है। वे उपहासास्पद बनते हैं और खाली हाथ निराश लौटते हैं।
किसान जानता है कि फसल काटने की योजना बनाते समय उसे घर में जमा किया हुआ बीज खर्च डालने की तैयारी करनी चाहिए। जो बीज बोने का खर्च और श्रम सहन न करे किन्तु कोठे भर देने जितनी फसल पाने के मनसूबे बाँधता रहे, इसकी इच्छा पूरी होना सम्भव नहीं।
विद्यार्थी पढ़कर अफसर बन जाते हैं, पर इसके लिए उन्हें चौदह वर्ष अनवरत श्रम करके स्नातकोत्तर परीक्षा पास करनी पड़ती है। फीस और किताब, कापी का खर्च सहन करना पड़ता है। गणेशजी का वरदान पाकर बिना कुछ किये विद्वान और पदाधिकारी बनने के स्वप्न इस जमाने में पूरे हो सकेंगे ऐसी आशा किसी को भी नहीं करनी चाहिए।
मल त्यागने के उपरान्त पेट खाली होने पर ही भूख लगती है और स्वादिष्ट व्यंजन खाने का अवसर मिलता है। जो मल त्याग नहीं करना चाहता उसे नया भोजन प्राप्त करने की भी आशा नहीं करनी चाहिए। साँस छोड़ने के बाद ही नई प्राण वायु मिलती है। जो सांस बन्द किये बैठा है उसके श्वाँस−प्रश्वास कैसे चलेंगे और जीवित रहना कैसे सम्भव होगा?
बाजार में हर चीज का मूल्य माँगा जाता है। उसे चुकाने पर कुछ भी मनचाही वस्तु खरीदी जा सकती है। जिसकी जेब खाली है या कुछ भी खर्च करने का मन नहीं है उसे मेले ठेले का तमाशा भर देख आने के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगने वाला नहीं है।
परिजनों का−मित्र सम्बन्धियों का−स्नेह सहयोग प्राप्त करने, की इच्छा रखना उचित है, पर यह भूल नहीं जाना चाहिए कि दूसरों के मन में वैसा करने का उत्साह उत्पन्न करने के लिए बहुत पहले से ही अपना रवैया बदलना पड़ता है। हम किसी के काम न आयें− किसी की किसी अवसर पर कोई सेवा सहायता न करें तो फिर दूसरे भी वस्तुस्थिति का लेखा−जोखा निकालते हैं और अपने पिछले व्यवहार को स्मरण करते हैं। बहाने बनाना सब को आता है यदि हम यही नीति अपनाते रहे हैं तो यह आशा करना व्यर्थ है कि आड़े समय पर कोई हमारे काम आयेगा।
यह संसार दर्पण की तरह है इसमें अपना ही चेहरा हर किसी के चेहरे में झाँकता हुआ देख सकते हैं। जैसे भी हम भले−बुरे कुछ हैं वैसी ही मुखाकृति दूसरों की भी दिखा देगी। यहाँ क्रिया की प्रतिक्रिया होती रहती है। कुएँ या गुम्बज की तरह प्रति ध्वनि सुनने को मिलती रहती है। जैसा भी कुछ हम अपने मुँह से बोलते हैं, उलट कर वैसी ही आवाज सुनते हैं। हमारा चिन्तन एवं व्यवहार यदि यह है कि हमें किसी के लिए त्याग न करना पड़े, दूसरे ही सदा हमारी सेवा सहायता के लिए दौड़े आयें। सदा सद्भावना व्यक्त करते रहें और हम अपनी उपेक्षा वृत्ति पर ही कायम रहें तो समझना चाहिए कि यह मनोरथ कभी पूरा न हो सकेगा।
रबड़ की गेंद जिस दिशा में जितने जोर से मारी जाती है वहाँ से वह ठीक उलटी दिशा में उतने ही जोर से वापस आती है। देखना यह है कि हम दूसरों के साथ कैसा रवैया अपनाते और कैसा व्यवहार करते हैं। उसकी प्रतिक्रिया ठीक वैसी ही होगी। अपना स्वभाव, दृष्टिकोण और व्यवहार जब दूसरों के साथ टकराता है तो ठीक वैसी ही प्रतिध्वनि प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।
देना घाटे का सौदा नहीं है। सत्पात्रों के हाथ हमारी सेवा, सद्भावना एवं सहायता पहुँचती है तो निश्चित रूप से वह अनेक गुनी होकर वापस लौटती है। हमारी उदारता भी ऐसी ही है यदि हम अपने को खाली करते रहेंगे तो बदले में ईश्वरीय व्यवस्था हमें उसी अनुपात से भर देगी। खाली तालाब चाहे उथला हो या गहरा वर्षा आते ही लबालब भर जाता है।

