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Magazine - Year 1985 - Version 2

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भगवान की समीपता और अनुकम्पा

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सारे शहर में जो बिजली काम करती है वह उत्पादक जनरेटर में उत्पन्न होती है। फिर जगह−जगह हलके भारी व ट्रांसफारमर अपने−अपने क्षेत्र के लायक पावर उसमें से खींचते हैं। मुहल्लों और घरों के लिए कितनी शक्ति चाहिए उस अनुपात से हलके भारी तार लगाने पड़ते हैं। भगवान को एक असीम शक्ति स्रोत समझा जा सकता है। उसी की सामर्थ्य से बल्ब, पंखे, हीटर, कूलर आदि जलते हैं और विविध प्रयोजनों की पूर्ति होती है। दृष्टिगोचर बिजली अनेक स्थानों पर पड़ती है पर उसका उद्गम केन्द्र उत्पादक स्थान पर एक ही जगह होता है।

मनुष्य समेत सब प्राणियों को भगवान ने अपना अंश उतनी मात्रा में समान रूप से दिया है जिससे दैनिक जीवनचर्या के आवश्यक काम−धाम सरलतापूर्वक निपटते रहें। किन्तु यदि किन्हीं की आत्मिक महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए अधिक सामर्थ्य चाहिए तो ट्रान्सफारमर, मीटर, स्टार्टर, तार आदि उपकरण उसी हिसाब से बढ़ाने पड़ते हैं। इतना करने पर अभीष्ट प्रयोजनों की पूर्ति होने लगती है। इसी प्रक्रिया को ईश्वर के साथ घनिष्ठता स्थापना कह सकते हैं। पानी की टंकी में ढेरों पानी भरा होता है पर अपने नल का छेद जितना मोटा होता है उसी अनुपात से पानी निकलता है। ज्यादा मोटी धार चाहिए तो पाइप बदलना पड़ता है। छोटे स्थान वाले के स्थान पर बड़ा लगाना पड़ता है। छोटे चूल्हे में, छोटे बर्तन में जरा−सा खाना पकाने के लिए धीमी आग जलती रहे तो भी काम चल जाता है पर यदि बड़े बर्तन में ज्यादा सामान पकाना हो तो चूल्हा बड़ा बनाना पड़ेगा और ईधन अधिक जलाना पड़ेगा। इन तथ्यों से पता चलता है कि बिजलीघर, पानी की टंकी या अग्नि देवता से किसी का व्यक्तिगत राग−द्वेष नहीं है। न वे किसी पर कृपा करते हैं और न रुष्ट होते हैं। एक सिद्धान्त निर्धारित है उसे जो अपनाते हैं वे अधिक लाभ उठाने की प्रक्रिया पूरी करते हैं। इसी को कहते हैं ईश्वर के साथ घनिष्ठता की स्थापना। इसके लिए खुशामद या चापलूसी का रास्ता अपनाना बेकार है। वे घटिया लोगों द्वारा घटिया स्तर वालों के साथ अपनाये जाने वाले ओछे हथकण्डे हैं। राज दरबारों में कभी चारण लोग नियुक्त रहते थे। मालिक सामन्त की प्रशंसा में कविताएँ लिखा करते थे, जिस अधिक गर्व फुलाने वाली कविता बन पड़ती थी उस दिन अच्छा इनाम मिलता था। बच्चों को कम कीमत का खिलौना दिया जाय तो वे कम प्रसन्नता व्यक्त करते हैं पर यदि कोई अधिक कीमत वाला चाबीदार खिलौना ला दिया जाय तो अधिक प्रसन्न होते और उछलने लगते हैं। प्रसन्नता व्यक्त करते और गोदी में दौड़कर चढ़ते हैं। ईश्वर के बारे में अनेक लोगों की मान्यता यही है कि उसकी प्रशंसा के गीत गाये जाँय, नाम रटा जाय तो चारणों की तरह अधिक लाभ उठाया जा सकता है। पूजा−अर्चा की सस्ती या महंगी सामग्री देकर भी लाभान्वित हुआ जा सकता है। यह रिश्वत वाला तरीका हुआ जो ओछे लोगों द्वारा उथले अफसरों के साथ बरता और योग्यता न होते हुए भी ऐसी ही उलटी−तिरछी तिकड़में चलाकर मतलब निकाला जा सकता है। ईश्वर के साथ यह हथकण्डे बरतना व्यर्थ है। उसकी हैसियत और हस्ती बड़ी है। वे सिद्धान्त के अनुरूप ही किसी पर अनुग्रह करते और बेरुखी दिखाते हैं।

बैंक से लोन लेना हो या चैक भुनाना हो तो उसके लिए पात्रता सिद्ध करनी पड़ती है। बैंक मैनेजर को चन्दन पुष्प चढ़ाकर उससे मन मानी रकम का चैक नहीं भुनाया जा सकता। अफसर के चुनाव में पब्लिक सर्विस, कमीशन, उम्मीदवारों की कई प्रकार की कड़ी परीक्षा लेता है। यहाँ तक कि मेडिकल कालेज के दाखिले में पी॰ एम॰ टी॰ का इम्तहान देना पड़ता है। छात्रवृत्ति हर किसी को नहीं मिलती। इसके लिए अच्छी श्रेणी से उत्तीर्ण होना आवश्यक है। यदि इन झंझटों से बचकर कोई शॉटकट अपनाना चाहे और प्रशंसा करने, उपहार देने की नीति अपनाना चाहे तो अभीष्ट सफलता सम्भव न हो सकेगी।

ईश्वर के साथ घुलने या उसे अपने साथ घुलाने के लिए आवश्यक है कि दोनों पक्षों का स्तर समान हो। दूध में पानी या शकर मिलाई जा सकती है क्योंकि उनके कण एक जैसे वजन के होते हैं। यदि बालू मिला दी जाय तो घुलेगी नहीं वजनदार होने के कारण नीचे बैठ जायेगी। विवाह निश्चित करते समय लड़की लड़के की योग्यता, आयु आदि का विधि वर्ग मिलाना पड़ता है। वर पच्चीस साल का, वधू पाँच साल की वाला प्रस्ताव रखने वाले का उपहास ही होगा। लोक-सभा विधान-सभा की सीट पर कोई भी आदमी इधर−उधर की बातें बनाकर बैठ नहीं सकता। इसके लिए उसे निर्धारित क्षेत्र के मतदाताओं के विश्वास वोट प्राप्त करने होते हैं।

जिन्हें ईश्वर की महत्ता का बोध और विश्वास हो और जो उसका अतिरिक्त अनुग्रह चाहते हैं उन्हें याचक का दृष्टिकोण मन से बिलकुल ही हटा देना चाहिए। खुशामद या रिश्वत का हथकण्डा भी भूल जाना चाहिए। इसमें समय की बर्बादी भर है, और फलतः निराशा, थकान और खीज ही हाथ लगती है। व्यक्तियों के साथ लोकाचार भी काम दे जाते हैं पर भगवान व्यक्ति नहीं, शक्ति है उनकी सारी व्यवस्था सुनिश्चित सिद्धान्तों पर चल रही है। उनसे न व्यक्तिगत अनुग्रह की आशा करनी चाहिए और न निष्ठुरता की। बिजली से लाभ उठाना है तो उसकी पद्धति जाननी चाहिए और तारों का सही उपयोग करना चाहिए। आग से लाभ उठाना है तो उसका सही उपयोग समझना चाहिए। इसमें भूल करने पर वे अपने घर में रहते हुए भी− सज-धज, के साथ रखने पर भी संकट खड़ा करेगी। बिजली के खुले तार छूते ही प्राण संकट सामने होगा। आग को इधर−उधर बखेरने पर न केवल घर जलेगा वरन फैली हुई आग से मुहल्ले भर का सफाया हो जायेगा। बिजली या आग की मनुहार करने भर से इच्छित लाभ उठाया जाना सम्भव नहीं है।

आत्मा को परमात्मा के निकट बैठने योग्य और आदान−प्रदान का क्रम चलाने योग्य बनाने के लिए समस्त ध्यान अपनी पात्रता विकसित करने पर केन्द्रीभूत करना चाहिए। अतिरिक्त क्षमताएँ उपलब्ध होने का द्वार खुल जायेगा। इसमें उपेक्षा बरतने और भक्त वत्सल नाम की व्याख्या विवेचना करते रहने पर कोई काम बनने वाला नहीं है। भगवान निष्ठुर भी है। उसकी निष्ठुरता श्मशान घाटों में जलती हुई जवानियां, अस्पतालों में कराहते हुए, बन्दी गृह में प्रताड़ना सहते हुए, लोगों को देखकर समझी जा सकती है। वे अपने आप में न निष्ठुर हैं न दयालु। जो जैसा है उसके लिए वैसी ही प्रतिक्रिया बन कर सामने आ खड़ी होती है।

इस संदर्भ में पूजा उपासना का भी महत्व है ताकि उस आधार पर हमें हमारे कर्त्तव्य और लक्ष्य का बोध निरन्तर बना रहे। उपासना उपक्रम में उन्हीं तथ्यों का सार संक्षेप एवं संकेत है जिनके सहारे व्यक्ति को अपने कषाय−कल्मषों का परिमार्जन करने का प्रयास संकल्प पूर्वक करते रहने की प्रेरणा मिलती रहे। शरीर में दुष्प्रवृत्तियों का अभ्यास रहता है और मन में अनेकों दुर्भावनाएँ जन्म−जन्मान्तरों से लिपटी चली आती हैं। इनका परिशोधन आवश्यक है। कपड़ा रँगने से पहले उसे अच्छी तरह धोया जाता है। मैले−कुचैले तेल, तारकोल में सने कपड़े पर कोई भी रंग चढ़ाया जाय, चढ़ेगा ही नहीं। खेत में बुवाई करने से पूर्व उसकी जुताई करनी पड़ती है। अन्यथा खर−पतवार, कंकड़, कचरा, भरे हुए खेत में कितना ही बढ़िया बीज डालने पर भी कुछ उगने वाला नहीं है। भक्ति, भावना, पूजा−पाठ, जप-तप, मन्त्र−जप, साधन विधान का प्रतिफल होता तो है पर इससे पूर्व व्यक्तित्व में पवित्रता और प्रखरता का अधिकाधिक समावेश होना चाहिए। इसके अतिरिक्त अपनी परिशोधित क्षमताओं को लोक मंगल के खेत में बोया जाना चाहिए ताकि वे बीज की तरह गलें और विशाल वृक्ष बनकर फूलें फलें।

सघन वृक्षों में आकर्षण शक्ति होती है और वह आसमान में उड़ते हुए बादलों को नीचे खींचती तथा बरसने के लिए मजबूर करती हैं। जिस क्षेत्र में पेड़ कट जाते हैं उस क्षेत्र के ऊपर होकर बादल उड़ते हुए निकल जाते हैं बरसते नहीं। पेड़ कटने की वजह से वर्षा बन्द हो जाती है और वह भूमि रेगिस्तान बन जाती है। ठीक यह बात भक्त और भगवान के सम्बन्ध में है। भक्त का पहला काम आत्म−शोध करना होता है। व्यक्तित्व को पवित्र एवं प्रखर बनाना पड़ता है। इसके बाद खिले हुए फूल पर भौंरे−तितलियाँ, मधु−मक्खियाँ, दैवी शक्तियाँ बैठना−अनुग्रह बरसाना आरम्भ करती हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि गन्दा, गलीज, दूषित, निकृष्ट, पतित जीवन जिया जाता रहे और साथ ही दूसरी ओर उल्टा-पुल्टा नाम जप करके सिद्धियों का, स्वर्ग मुक्ति का लाभ भी उठाया जाता रहे। पतित व्यक्तियों का भी उद्धार तो हुआ है पर उन्हें भगवान का आश्रय लेने से पूर्व अपनी अभ्यस्त कुटिलताओं को तिलाञ्जलि देनी पड़ी है।

बाल्मीकि डाकू से ऋषि बने पर यह भी स्पष्ट है कि जिस दिन से राम नाम लिया उस दिन से चोरी डाके आदि का नाम नहीं लिया। गणिका का उद्धार तो हुआ पर जिस दिन से शरणागत हुई उस दिन से उसका मन दुराचार से सैकड़ों योजन पीछे हट गया। अंगुलिमाल का काम नित्य हत्याएँ करना था पर 108 अंगुलियाँ काट कर देवी को चढ़ाता था पर जिस दिन से बुद्ध की शरण में आया उस दिन से एक भी ऐसा पर कुकृत्य नहीं किया। अजामिल जब कसाई था तब था पर भक्त समुदाय में सम्मिलित होने पर करुणा का पुँज बन गया और छुरा नदी में बहा दिया। सदन कसाई की कथा भी ऐसी है। तुलसीदास, बिल्व मंगल का पिछला जीवन कामुक रहा होगा पर भक्ति रस का पान करते ही वह घिनोनापन शरीर और मन से पूरी तरह निकाल दिया।

ऐसा नहीं हो सकता कि घिनौना जीवन जिया जाता रहे। चिन्तन और चरित्र दुष्प्रवृत्तियों से घिरा रहे और जीभ से राम नाम के अक्षरों को उच्चारण करने भर से यह आशा की जाने लगे कि भक्तों जैसी सिद्धि और सद्गति पीछे−पीछे फिरेगी। राम का नाम और राम का काम दोनों परस्पर गुँथे होने चाहिए। किसने कितनी बार किन अक्षरों का उच्चारण किया इस आधार पर भक्ति का लक्ष पूरा नहीं होता। पहली शर्त अन्तःकरण की पवित्रता श्रद्धा, सद्भावना और सेवा परायणता है। इसके उपरान्त पूजा उपासना का कर्मकाण्ड है। उसे शोभा-सज्जा की श्रेणी में गिना गया है। चरित्र स्वास्थ्य है और उपचार उस पर चढ़ाया हुआ श्रृंगार। दोनों साथ−साथ चलें तो शोभा होती है पर यदि स्वास्थ्य गल गया हो। मृत्यु सिर पर मंडराई हो तो रेशमी वस्त्र और स्वर्ण अलंकार और तेल फुलेल लगा देने पर भी स्थिति उपहासास्पद बनी रहेगी।

बिजली की धारा धातु में होकर गुजरती है। आग में सूखा ईधन जलता है। परिश्रमी छात्र उत्तीर्ण होता है। ईश्वर की निकटता के लाभों को समझने और पाने के इच्छुकों का पूजा से भी पहला कर्त्तव्य यह बनता है कि अपने चरित्र एवं चिन्तन को उत्कृष्ट स्तर का बनाये। व्यक्तित्व में पवित्रता और प्रखरता का अधिकाधिक समावेश करें। जो साधन अपने पास हैं उन्हें लोक मंगल के लिए खेत में बोयें। हरी−भरी फसल की आशा इसी आधार पर की जा सकती है।

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