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Magazine - Year 1985 - Version 2

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समष्टि एवं व्यष्टि में संव्याप्त एकरूपता

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पृथ्वी यों मोटे तौर से एकाकी लगती है। उसकी सम्पदा एवं हलचल अपनी ही परिधि में अपने ही लिए काम करती दिखाई पड़ती है, पर वस्तुतः वह अन्तर्ग्रही आदान-प्रदान पर जीवित है। सूर्य की ऊर्जा का शोषण पृथ्वी का वातावरण करता है और उस ईंधन से जड़ परमाणुओं और चेतन जीवाणुओं की विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ चल सकने की सामर्थ्य मिलती है। पृथ्वी अपनी विशिष्टताओं को बनाये रहने में बहुत कुछ सूर्य पर निर्भर है। दूर रहते हुए भी वह पृथ्वी को इतना उदार दुलार देता है कि उसे देखते हुए पति-पत्नी अथवा प्रेमी-प्रेमिका जैसा रिश्ता मानने को जी करता है। पृथ्वी भी तो उसी का मुँह निहारते और परिक्रमा करते रहने में अपने जीवन की सार्थकता मानती है।

चन्द्रमा का पृथ्वी पर कितना प्रभाव पड़ता है यह समुद्र तट पर जाकर प्रतिदिन के सामान्य और पूर्णिमा अमावस्या के ज्वार-भाटे देखकर सहज ही जाना जा सकता है। चन्द्रमा को रसराज कहा गया है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में वनस्पतियों तथा प्राणियों में सरसता की जो घट−बढ़ होती रहती है उससे पता चलता है कि न केवल समुद्र को वरन् पृथ्वी की समग्र सरसता को वह व्यापक रूप से प्रभावित करता है। यह तो ग्रहों के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव का एक उदाहरण मात्र है। वास्तविकता यही है कि ब्राह्मी चेतना का यह सारा व्यापार आपसी आदान-प्रदान की एक सुनियोजित विधि-व्यवस्था के अंतर्गत चल रहा है।

सौर मण्डल के अन्यान्य ग्रह-उपग्रह अपने-अपने स्तर के रंग−बिरंगे−छोटे−बड़े उपहार पृथ्वी को अनवरत रूप से भेजते हैं। पृथ्वी भी चुप नहीं बैठी रहती। वह भी आदान−प्रदान का शिष्टाचार और समूह कर्त्तव्य समझती है। तद्नुसार अपने अनुदान अन्य ग्रहों को भेजती है। इन सम्प्रेषणों का लाभ वे ग्रह भी उसी प्रकार उठाते हैं। जिस प्रकार कि पृथ्वी उनसे। इस आदान−प्रदान का महत्वपूर्ण केन्द्र ध्रुवीय क्षेत्र है। अन्तर्ग्रही आदान−प्रदान इन्हीं छिद्रों से होता है। उत्तरी ध्रुव से ग्रहण की और दक्षिणी ध्रुव से विसर्जन की प्रक्रिया सम्पन्न होती रहती है। उत्तर में आदान का, दक्षिण में प्रदान का संयन्त्र नियति ने फिट करके रखा है। उत्तर को मुख और दक्षिण को मलद्वार कह सकते हैं। जितना उपयोगी है उतना पचाकर पृथ्वी का शरीर अपने में धारण कर लेता है और जो अनावश्यक है, उसे मलरूप में विसर्जित कर देता है। प्राणी शरीर की तरह धरती भी एक शरीर है जिससे अपनी जीवनचर्या की सामग्री अंतर्ग्रही शक्ति भण्डार से उपलब्ध करनी पड़ती है। शरीर को हवा, पानी और अन्न भी तो बाहर से ही उपलब्ध करना पड़ता है। अन्तर्ग्रही हाट से आवश्यक वस्तुएँ खरीदे बिना धरती की गुजर नहीं हो सकती। ठीक इसी प्रकार प्राणी को भी अपनी सूक्ष्म चेतनात्मक उपलब्धियों के लिए अन्तर्ग्रही−ब्रह्माण्डीय चेतना पर निर्भर रहना पड़ता है।

मस्तिष्क मुख है। ग्रहण शक्ति उसी में है। जननेन्द्रिय विसर्जन संस्थान है। दोनों को प्राणि सत्ता के ध्रुव केन्द्र कहा जा सकता है। ऊर्ध्व केन्द्र को शिव और अधः संस्थान को शक्ति संस्थान माना गया है। इन्हें ब्रह्मवर्चस और कुंडलिनी केन्द्र भी कहते हैं। इनके बीच पारस्परिक सम्बन्ध सन्तुलन ठीक बना रहे तो सब कुछ ठीक बना रहेगा और अभीष्ट प्रगति का लक्ष्य पूरा होता रहेगा। इनके बीच असन्तुलन या अवरोध उत्पन्न होने से अपच और तज्जनित अनेकों रोग−विकार उत्पन्न होने लगते हैं। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार दक्षिणी ध्रुव समुद्र तल से 19000 फुट उभरा हुआ है। इसे विश्व शरीर की जननेन्द्रिय का उभार कह सकते हैं। पुराणों में इसे शिवलिंग कहा गया है। नारी की जननेंद्रिय में भी यह उभार छोटे रूप में “मॉन्स प्यूबीस” नाम से जाना जाता है। समष्टि और व्यष्टि में कितनी एकरूपता है, इसकी झाँकी ध्रुवों की संरचना में दृष्टिगोचर होती है।

सोवियत रूस के वैज्ञानिक डॉ॰ ओ॰ ए॰ उशाकोव ने अपने ध्रुव शोध के विवरणों में एक और नया तथ्य प्रतिपादित किया है। वे कहते हैं कि जीवन का आधार मानी जाने वाली ऑक्सीजन वायु पृथ्वी की अपनी उपज अथवा सम्पत्ति नहीं है। वह सूर्य से प्राण रूप में प्रवाहित होती हुई चली आती है और धरती के वातावरण में यहाँ की तात्विक प्रक्रिया के साथ सम्मिश्रित होकर प्रस्तुत ‘ऑक्सीजन’ बन जाती है। यदि सूर्य अपने उस प्राण प्रवाह में कटौती कर दे अथवा पृथ्वी ही किसी कारण उसे ठीक तरह ग्रहण न कर सके तो ऑक्सीजन की न्यूनता के कारण धरती का जीवन संकट में पड़ जायेगा। पृथ्वी से 62 मील ऊँचाई पर यह प्राण का ऑक्सीजन रूप में परिवर्तन आरम्भ होता है। यह ऑक्सीजन बादलों की तरह चाहे जहाँ नहीं बरसता रहता वरन् वह भी सीधा उत्तरी ध्रुव पर आता है और फिर वहाँ से समस्त विश्व में वितरित होता है। ध्रुव प्रभा में रंग−बिरंगी झिलमिल का दीखना विद्युत मण्डल के साथ ऑक्सीजन की उपस्थिति का प्रमाण है।

कभी-कभी सूर्य मण्डल में विशेष उत्क्रान्ति उत्पन्न होने से उस प्रवाह की एक लहर पृथ्वी पर भी चली आती है और ध्रुव प्रदेश में चुम्बकीय आँधी तूफानों का सिलसिला चल पड़ता है। इनकी प्रतिक्रिया उसे ध्रुव क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रखती वरन् समस्त विश्व को प्रभावित करती है। कई बार यह चुम्बकीय तूफान बड़े उपयोगी और सुखद परिणाम उत्पन्न करते हैं और कई बार इनमें कुछ ऐसे तत्व घुले हुए चले आते हैं जिनका प्रभाव समस्त विश्व को कई प्रकार के संकटों में धकेल देने की सामर्थ्य रखता है।

अंतर्ग्रहीय ऊर्जायें पृथ्वी पर उत्तरी ध्रुव क्षेत्र में होकर छनी हुई उपयुक्त एवं आवश्यक मात्रा में ही प्रवेश करती हैं और पृथ्वी को अभीष्ट परिपोषण देने के उपरान्त दक्षिणी ध्रुव में होती हुई बहिर्गमन कर जाती हैं। एक सिरे से प्रवेश करके चूहा जिस प्रकार बिल के दूसरे सिरे से निकल भागता है उसी प्रकार अन्तर्ग्रहीय विकिरण धरती के एक सिरे से प्रवेश करता और दूसरे से बाहर निकलता रहता है। उत्तरी ध्रुव क्षेत्र में एक ऐसी चुम्बकीय छलनी है जो केवल उसी प्रवाह को भीतर प्रवेश करने देती है जो उपयोगी है। छलनी में बारीक आटा ही छनता है और भूसी ऊपर रह जाती है। ठीक इसी प्रकार ध्रुवीय छलनी में भी पृथ्वी के लिए उपयोगी विकिरण आते हैं और शेष को पीछे धकेल दिया जाता है।

उत्तरी ध्रुव पर यह छानने की क्रिया टकराव के रूप में देखी जा सकती है। इस टकराव से एक विलक्षण प्रकार के ऊर्जा कम्पन उत्पन्न होते हैं जिनकी प्रत्यक्ष चमक उस क्षेत्र में प्रायः देखने को मिलती रहती है उसे ध्रुव प्रभा या मेरु प्रकाश कहते हैं। इसका दृश्यमान प्रत्यक्ष रूप जितना अद्भुत है उससे अधिक रहस्यमय उसका अदृश्य रूप है। इस मेरुप्रभा का प्रभाव स्थानीय ही नहीं होता वरन् समस्त भूतल को यह प्रभावित करता है। भूगर्भ में, समुद्र तल में, वायुमण्डल में, ईथर के महासागर में जो विभिन्न प्रकार की हलचलें होती रहती हैं चढ़ाव−उतार आते हैं उनका बहुत कुछ सम्बन्ध इन ध्रुव प्रभा एवं मेरु प्रकाश से होता है। इतना ही नहीं उसकी हलचलें प्राणधारियों की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करती हैं। मनुष्यों पर तो उसके प्रभाव विशिष्ट रूप से होता है। सुविज्ञ लोग उस प्रवाह में से अपने लिए उपयोगी तत्व खींच लेने, धारण कर लेने में भी सफल होते हैं और उससे असाधारण लाभ प्राप्त करते हैं।

सूर्य एक सेकेंड में 200 ट्रिलियन अर्थात् 100 मिलियन (1000,00000 किलोवाट) किलोवाट ऊर्जा पृथ्वी पर फेंकता है। वह ऊर्जा इतनी अधिक होती है कि उससे हाइडल पावर उत्पन्न करने वाले मानव निर्मित बिजली घरों के समान अनेकों करोड़ बिजली घर स्थापित हो सकते हैं। सारी पृथ्वी की चार अरब आबादी तथा चींटी, मक्खी, कौवे, गिद्ध, भेड़, बकरी, गाय, हाथी, शेर, पेड़−पौधे, बादल, समुद्र सभी इस शक्ति से ही गतिशील हैं। जिसमें यह शक्ति (प्राणतत्व) जितनी अधिक है, वह उतना ही शक्तिशाली और वैभव का स्वामी है। कीड़े−मकोड़े उसके एक कण से ही जीवित हैं तो वृक्ष−वनस्पतियाँ उसका सबसे अधिक भाग उपयोग में लाती है। मनुष्य इन सबसे भाग्यशाली है क्योंकि वह इस शक्ति के सुरक्षित और संचित कोश को भी प्राणायाम और योग साधनाओं द्वारा मनचाही मात्रा में प्राप्त करने की सामर्थ्य रखता है। इस प्रचण्ड प्राण ऊर्जा के सुनियोजन की चमत्कारी फलश्रुतियाँ हैं। प्रश्न मात्र क्रमबद्ध सदुपयोग का है।

उपरोक्त वर्णन से ऐसा लगता है कि सूर्य असीम शक्ति का भण्डार है, पर वस्तुतः वह भी विराट् ब्रह्माण्ड के महासंचालक ब्रह्मसूर्य का एक नगण्य−सा घटक ही है। सूर्य अपनी शक्ति उसी प्रकार अपने सूत्र संचालक महासूर्य से प्राप्त करता है जैसे कि अपनी पृथ्वी सौर मण्डल के अधिष्ठाता अपने सूर्य से। जीव और ईश्वर की दूरी ही उसकी शक्ति को दुर्बल बनाती है। यदि यह दूरी घटती जाय तो निश्चित रूप से सामर्थ्य बढ़ेगी और स्थिति वह न रहेगी, जो आज कृमि−कीटकों जैसी दिखाई पड़ रही है।

ब्राह्मी चेतना के महासागर में तैर रही हमारी पृथ्वी में एक दूसरे किस्म का वायुमण्डल भी है जिसे आकर्षण चुम्बकत्व अथवा ग्रेविटी के नाम से पुकारते हैं। यह चुम्बकत्व अथवा ग्रेविटी के नाम से पुकारते हैं। यह चुम्बकत्व ‘प्लाज्मा’ को प्रभावित करता है और उसकी प्रतिक्रिया लौटकर फिर पृथ्वी पर आती है। इस प्रकार का आदान−प्रदान और भी विस्तृत क्षेत्र पर अधिकार जमाता है। इस चुम्बकीय प्रत्यावर्तन को सम्पन्न करने वाला वायु मण्डल की तरह का ही एक भू−चुम्बकीय मण्डल भी है। यह भी पृथ्वी का ही विस्तार है, इसे उसी का आधार साधन अथवा अधिकार क्षेत्र कह सकते हैं। इस प्लाज्मा प्रवाह के कारण ही सूर्य की शक्ति का धरती तक नियन्त्रित रूप से आना सम्भव होता है और अन्य ग्रहों से उसका संपर्क बनता है। इसलिए धरती की परिधि नापनी हो तो उसकी गणना वायु मण्डल को आधार मानकर नहीं वरन् चुम्बक मण्डल की परिधि के आधार पर करनी चाहिए।

इस प्लाज्मा को ही प्रकारान्तर से सूक्ष्म जगत का प्राण तत्व माना जा सकता है। पृथ्वी सौभाग्यशाली है कि उसे जीवन मिला, उससे भी बड़े सौभाग्यशाली वे हैं जो इस पर निवास करते हैं। संव्याप्त प्राण सत्ता से जिस प्रकार पृथ्वी के दोनों ध्रुव आदान−प्रदान की प्रक्रिया सम्पन्न करते हैं, उसी प्रकार मानवी चेतन सत्ता के दोनों ध्रुव जो मेरुदण्ड के दो छोरों पर सहस्रार एवं मूलाधार चक्र चलाते रहते हैं। उपयोगी को ग्रहण कर यदि उस ऊर्जा से अपनी चेतना का स्तर ऊँचा उठाया जा सके तो मानव जीवन को और भी सार्थक क्रियाशील एवं लोकोपयोगी बनाया जा सकता है।

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