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Magazine - Year 1985 - Version 2

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विलक्षण विभूतियों से सम्पन्न यह जीव−जगत

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प्रकृति ने सारी विशेषतायें मनुष्य को ही नहीं सौंप दी हैं। अन्य प्राणियों को प्रकृति के अन्यान्य घटकों को भी उसने जीवन यापन की सामान्य कुशलताओं के अतिरिक्त ऐसी विभूतियाँ भी प्रदान ही हैं जिनके सहारे वे विपत्ति के समय आत्म−रक्षा कर सकें।

पशु−पक्षियों को प्रायः दुर्गतिगत प्रतिकूलताओं में ही जूझना पड़ता है। उन्हीं से बचाव सम्भव हो सके तो समझना चाहिए कि आधी विपत्ति टल गई। आहार-विहार के साधन मनुष्य की अपेक्षा उन्हें पहले से ही अधिक मिले हुए हैं। गाय, घोड़ा आदि की त्वचा में सटा हुआ जो बालों का कलेवर होता है वह उन्हें सर्दी−गर्मी से बचाता रहता है। मनुष्य का जो प्रयोजन कपड़ों से सधता है उसे वे इन बालों के सहारे ही चला लेते हैं। पक्षियों का सारा शरीर छोटे−छोटे परों से आच्छादित रहता है। उड़ने वाले पंखों से वे उड़ने चलने का काम लेते हैं पर छोटे पर जो सारे शरीर पर सटे होते हैं उन्हें सर्दी-गर्मी का कष्ट नहीं सहने देते। जिनके शरीर पर बाल कम होते हैं उनकी त्वचा मोटी होती है। इसके नीचे भी एक चर्बी की परत रहती है। ऊँट रेगिस्तानी जानवर है उसकी अंग संरचना ऐसी है कि एक बार भरपेट पानी पी लेने तो उसी से लम्बी अवधि बिना पानी के काट लेता है। पानी न मिलने पर भी ऊँटनी अपने बच्चे को दूध पिलाती रहती है। पशु−पक्षियों के लिए प्रकृति ने उनका आहार उनके कार्य−क्षेत्र में ही विपुल मात्रा में फैला रखा है। छाया के लिए गुफाएँ, झाड़ियाँ पेड़ों के कोतर उन्हें उपलब्ध हैं।

भूकम्प जैसी प्रकृतिगत उथल−पुथल होती है तो उनकी अतीन्द्रिय क्षमता साथ देती है और पूर्वाभास मिल जाने से वे संकट की घड़ी में असुरक्षित स्थान छोड़कर ऐसी जगह चले जाते हैं जहाँ उन्हें संकट का सामना न करना पड़े। उनकी इन गतिविधियों को देखकर मनुष्य भी अपनी सुरक्षा का प्रबन्ध कर लेते हैं।

गणितीय गणना के आधार पर प्राकृतिक हलचलों की भविष्यवाणी का विज्ञान अभी अत्यन्त अविकसित है। इस दृष्टि से पशु−पक्षी मनुष्य से आगे हैं। जीव वैज्ञानिकों का कहना है कि पशु−पक्षियों की छठी ज्ञानेन्द्रिय काफी विकसित होती है जिससे पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में हुए परिवर्तनों को वे तत्काल जान लेते हैं। किसी समय मनुष्य में भी यह छठी इन्द्रिय काफी विकसित स्थिति में थी किन्तु अन्य ज्ञानेन्द्रियों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण यह क्रमशः क्षीण होती गई और अब तो सर्वथा निष्क्रिय हो चली है। फिर भी कभी−कभी किन्हीं मनुष्यों में इस छठी ज्ञानेन्द्रिय की सक्रियता के उदाहरण आज भी यत्र−तत्र मिलते रहते हैं। मैनचेस्टर विश्व−विद्यालय के जीव वैज्ञानिकों ने इस छठी ज्ञानेन्द्रिय को ‘चुम्बकीय ज्ञानेन्द्रिय’ बताया है। प्रयोगों के आधार पर पता चला है कि मनुष्य भी अन्य जीवधारियों की भाँति पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र से दिशा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य इस चुम्बकीय शक्ति का उपयोग अपने दैनिक जीवन में करता रहता है। यदि वह उसे विकसित करे तो उसके उच्चस्तरीय लाभों से भी लाभान्वित हो सकता है।

इस चुम्बकीय शक्ति की उपस्थिति का पता लगाने के लिए कुछ छात्रों को आँखों पर पट्टी बाँधकर घुमावदार रास्तों से बावन कि॰ मी॰ दूर ले जाया गया। छात्र आँखों पर पट्टी बाँधे ही सही मार्ग बताते हुए विश्व विद्यालय तक लौट आये। दुबारा 80 कि॰ मी॰ दूर ले जाये जाने पर भी उनने वापसी के मार्ग में कोई भूल नहीं की। लेकिन जब उनके सिर पर चुम्बक रख दिये गये तो उनका ज्ञान लुप्त हो गया। पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को मापना उनके लिए सम्भव नहीं रहा। वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर में चुम्बकीय शक्ति की उपस्थिति का अर्थ है कि इसमें कहीं न कहीं चुम्बकीय ज्ञानेन्द्रिय (कम्पास) भी अवश्य ही होनी चाहिए। भले ही उसकी जानकारी आज नहीं, कल मिले। यह क्षमता मनुष्य में होती है, इसकी जानकारी भी वैज्ञानिकों को जीवन जगत से ही मिली है।

जहाजों पर काम करने वालों के लिए चूहे बहुत मददगार होते हैं। जहाज से चूहों को बाहर जाते देखकर वे लोग जहाज खड़ा कर देते हैं और सवारियों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचा देते हैं। चूहों के जहाज छोड़ने का अर्थ है कि निकट भविष्य में किसी तूफान या दुर्घटना की सम्भावना है। ऐसे में वे बचाव का पूर्व संकेत दे देते हैं।

गृह स्वामी अथवा घर के किसी सदस्य के रुग्ण हो जाने पर पालतू कुत्ते दुःखी हो जाते हैं। कुत्ते को यह आभास भी हो जाता है कि वह बीमार व्यक्ति जीवित बचेगा अथवा नहीं। यदि उस व्यक्ति के जिंदा बचने की सम्भावना नहीं होती है तो कुत्ता उसके कमरे के बाहर बैठकर रोने लगता है और आस−पास चक्कर काटता रहता है। अक्सर देखा गया है कि ऐसे प्रायः उसी रात स्वर्ग सिधार जाते हैं।

वर्षा आने के पूर्व छोटी काली चींटी अपने अण्डे लेकर ऊँचे स्थानों पर चली जाती हैं, मेंढक की टर्राहट सुनकर ग्रामीण कृषक शीघ्र ही वर्षा होने का पूर्व अनुमान लगा लेते हैं। घरेलू चिड़िया जब पानी में नहाने लगती है तो समझा जाता है कि दो−चार दिनों में वर्षा होने वाली है। लोमड़ी अपना बिल सूखे और स्वच्छ स्थान पर बनाती है। वर्षा को सूचना उसे दो−दिन पूर्व ही मिल जाती है। इस प्रकार समय रहते वह अपने बच्चों को दूसरे सुरक्षित बिलों में पहुँचाकर निश्चिन्त हो जाती है। कुछ लोग चील को आकाश में मँडराते देखकर भी वर्षा की पूर्व जानकारी ले लेते हैं। मधुमक्खी को वर्षा होने की पूर्व सूचना कुछ घण्टों पूर्व की प्राप्त हो जाती है और वे छत्ते से निकलकर उसके चारों ओर मंडराने लगती हैं। धीरे-धीरे उनके चक्कर लगाने का क्षेत्र विस्तृत होता जाता है और अन्ततः वे आँखों से ओझल हो जाती हैं। वर्षा समाप्त होने पर वे पुनः छत्ते में लौट आती हैं। ग्रामवासियों के लिए आने वाली वर्षा का यही संकेत पर्याप्त होता है।

पहाड़ी हिरनों को भी बर्फीले तूफान आने के काफी पहले ही उसका पूर्वाभास हो जाता है। इसी प्रकार जंगली चिड़ियाँ तूफान आने की पूर्व सूचना जोरों से चहचहाकर शोर मचाकर देती हैं।

चूहों का बिलों से निकलकर इधर−उधर भागने लगना भूकम्प की पूर्व सूचना का ठोस संकेत है। इसी तरह समुद्री मछलियाँ भी भूकम्प आने से पहले विशेष हरकतें करने लगती हैं। ऐसा पहले कई बार हो चुका है कि इन जीवों की हलचलों से सावधान हो असंख्यों ने अपनी जान बचायी है।

ऐसा कहा जाता है कि महामारी फैलने के समय यदि गौरैया घर या गाँव छोड़कर भाग जाय तो मृत्यु की सम्भावनाएँ सुनिश्चित हैं। इसी प्रकार चेचक आदि फैलने पर जब तक गौरैया आँगन में आकर चहचहाती हैं और चारा देने पर चुगती रहती हैं लोग आश्वस्त रहते हैं कि संक्रमण का किसी प्रकार कोई खतरा नहीं। जो भी व्याधि है, वह शीघ्र ही टल जायेगी।

भारतीय प्राणि विज्ञान सर्वेक्षण, कलकत्ता के पक्षी विभाग के विशेषज्ञ डा॰ सुधीन सेन गुप्त ने मैना (एक्रीडोयरेस ट्रिस्टीस) पक्षी पर अपने दस वर्षीय शोध कार्य के दौरान एक विलक्षण बात का पता लगाया है। उनके अनुसार मैना को मौसम का पूर्वज्ञान होता है और इसकी सूचना वह 12 से 36 घण्टे पूर्व दे सकती है। यदि वर्षा अथवा तूफान आने की सम्भावना होती है तो इस कालावधि में वह जोर−जोर से चहकने लगती है और मौसम की खराबी का संकेत करती है।

अध्ययन में पाया गया कि अप्रैल एवं मई के महीनों में भी दिन के समय में मैना थोड़े−थोड़े समयांतराल पर उसी प्रकार की अप्रत्याशित एवं उदात्त चहक लगाती है। सितम्बर में भी अपेक्षाकृत तेज आवाज लगाते पाई गईं, किन्तु दोनों आवाजों में काफी भिन्नता होती है।

अप्रैल−मई के दौरान वह किक−किकू, किक−किकू की आवाज लगाते पायी गई जबकि सितम्बर में पिकू−पिकू। अध्ययन में पहली प्रकार की आवाज प्रजनन से सम्बद्ध पायी गई जबकि दूसरी मौसम सूचक।

इस प्रकार की आवाजें मैना कुछ मिनटों के अन्तराल के बाद एक मिनट तक लगातार करती रहती है। किन्तु वर्षा या आँधी आने के बाद इस प्रकार की आवाज करना वह बन्दर कर देती है।

प्रयोग के दौरान डा॰ सेनगुप्त ने कुछ मैनों को पृथक−पृथक कमरों में बन्द कर उनकी आवाजों का अध्ययन किया तो उन्होंने पाया कि बन्दी अवस्था में भी वे उसी प्रकार की आवाजें करती हैं जैसा उन्मुक्त अवस्था में अर्थात् इससे उसके मौसम सम्बन्धी पूर्वानुमान पर कोई अन्तर आता नहीं देखा गया।

मात्र पशु−पक्षी ही नहीं, जीव जगत के अंग वनस्पति समुदाय में भी यह विशेषता पायी जाती है। वर्षा होने न होने सम्बन्धी भविष्य वाणियाँ अब तक जिन आधारों पर की जाती रही हैं वे बहुधा तीर−तुक्का सिद्ध होती रही हैं। किन्तु प्रकृति के प्राँगण में उगने वाले कई वृक्ष−वनस्पति ऐसे पाये गये हैं जिनकी भविष्यवाणियाँ हमेशा अचूक सिद्ध होती हैं। रालामण्डल के आस−पास बहुतायत से पाई जाने वाली सुनहरी लिली (ग्लोरिओसा सुपरबा’’−ग्लोरी लिली) में अत्यन्त मनोहर लाल−पीले फूल खिलते हैं। वर्षा न होने वाली हो तो पौधे में केवल पत्तियाँ ही दृष्टिगोचर होती हैं किन्तु वर्षा होने की खुशखबरी देने के लिए ये कलियों का रंगीन लबादा ओढ़ लेती हैं। कुछ ऐसे ही गुण−धर्म सुगन्धित पत्तियों वाले मधुमालती नामक वृक्ष में पाए जाते हैं। इसकी शाखाएँ कलियों के गुच्छों से हमेशा लदी हुई रहती हैं। बादलों के घिर आने पर इसकी बन्द कलियों का खिल जाना वर्षा के शुभागमन की सूचना देता है किन्तु बादलों की नीयत यदि कहीं अन्यत्र जाकर बरसने की है तो ये उनका मनोभाव झट ताड़ जाती हैं और उनके स्वागत में अपनी प्रसन्नता नहीं प्रकट करतीं। यदि गठालू (डायोस्कोरिया) नामक बेल के ऊपरी कन्दों की वृद्धि बन्द हो जाय तो समझा जाता है कि आगे वर्षों नहीं होगी। जिस साल वर्षा बिलकुल नहीं होने से सूखा पड़ने की सम्भावना हो उस वर्ष तो इसके कन्द पहले से ही भूमि पर टपक−टपककर शोक सन्तप्तों की तरह दम तोड़ने लगते हैं।

चेतना का आलोक सर्वत्र संव्याप्त है। प्राण स्पन्दन सृष्टि के कण−कण में है। मनुष्य सर्व सामर्थ्य सम्पन्न माना जाता है तो क्या हुआ? उससे भी विलक्षण सामर्थ्य जीव जगत के उसके सहचरों−सहजीवियों में विद्यमान है। इस प्रसुप्त सामर्थ्य को साधना द्वारा मानव भी जगा एवं विकसित कर सकता है। यह चमत्कार या कोई सिद्धि नहीं, एक सहज प्राप्त हो सकने वाली विभूति है जो पुरुषार्थ द्वारा निश्चित ही सुलभ हो सकती है, ऐसा मत ऋषियों का ही नहीं, आधुनिक वैज्ञानिकों का भी है।

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