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क्राँति -बीज

महापूर्णाहुति की वेला। सभी शिष्य साधक ब्रह्ममुहूर्त में ध्यानस्थ। ध्यान की गहराइयों में दिव्य नाद ध्वनित हो उठा। गुरुदेव की वाणी शब्दरूप लेने लगी” मेरे पुत्रों! मैं भी एक किसान हूँ। मैंने भी कुछ बीज बोए थे। उनमें अंकुर आए और फूल भी लगे। उन फूलों की सुगंध से मेरा सारा जीवन भर गया। उस सुगंध ने मुझे रूपांतरित कर दिया। मुझे नया जीवन दिया।”

“ अदृश्य और अज्ञात ने अपने बंद द्वार में मेरे लिए खोल दिए और मैंने उस परम सत्य को देखा, जो आँखों से देखा नहीं जा सकता है। शाश्वत के उस संगीत को सुना, जिसे सुनने में कान समर्थ नहीं होते हैं। मेरी यह दिव्य अनुभूतियाँ अब वैसे ही मुझसे बहने और प्रवाहित होने को उत्सुक है जैसे पहाड़ों के झरने सागर की ओर प्रवाहित होते और भागते हैं।”

“याद रहे अदलियाँ जब पानी से भर जाती हैं, तो उन्हें बरसाना पड़ता है। फूल जब सुवास से भर जाते हैं, तो उन्हें हवाओं को अपनी को अपनी सुगंध लुटा देनी होती है और जब कोई दीया जलता है, तो आलोक उससे बहता ही है।”

“ ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ है। मैंने अपने जीवन के अनमोल रहस्य अपने साहित्य में सँजोए है। मेरे ये विचार क्राँति-बीज है। वे जिसके पास पहुंचेंगे,जो भी इन्हें सँभालेगा-फैलाएगा, उसके जीवन में देवत्व के, अमृत के और प्रभु प्रेम के फूल अवश्य ही मुस्कराएँगे। उसका जीवन भी उसी सुगंध से भर उठेगा, जिससे मेरा भरा था। ये मेरे क्राँति बीज जिस भी खेत में पड़ेंगे, वहाँ की मिट्टी अमृत के फूलों में परिणत हो जाएगी।”

“ जो भी मेरे पास था, उसे क्राँति-बीजों के रूप में तुम सबको सौंप चुका। मेरा प्रत्येक विचार क्राँति बीज है और मेरा समूचा साहित्य इन क्राँति-बीजों का अक्षय भंडार है। सार−संक्षेप मैंने दैवीचेतना के संदेशवाहक के रूप में क्राँति धर्मी साहित्य के रूप में विनिर्मित किया है। मेरे इन्हें तुम्हारे जीवन में बोया, अब तुम सबको इन्हें समूचे विश्व के प्रत्येक मानव के जीवन में बोना है, ताकि हर कही देवत्व के फूल खिल सकें। मेरे इन क्राँति -बीजों को हर कही बोने के साथ ही तुम सब अपने जीवन में भी इनकी देखभाल करना,क्योंकि मैं तो बो चला, देखना तुम कि बीज,बीज न रह जाए। “

ध्यान टूटने के बाद भी साधकों को लगा कि गुरुसत्ता का यह संदेश सतत् ध्वनित हो रहा है कि उनके क्राँति -बीजों की सफलता देवत्व के फूल बनकर मुस्कराने में ही है। जीवन की मिट्टी को सुगंध से भरने में ही है।