नई शताब्दी-नारी शताब्दी
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अंधकार युग से उभरकर अनेक सत्प्रवृत्तियों की तरह नारी भी अब नए सिरे से
अपने वर्चस्व का परिचय देने के लिए ऊपर आ रही है। इसे कल्पना या संभावना
नहीं, वरन सुनिश्चित भवितव्यता ही समझना चाहिए।
विदेशों में यह क्रम पहले से ही चल पड़ा है। समुन्नत देशों में नारी का प्रवेश उन सभी क्षेत्रों में है, जिनमें कि पुरुष अपने पुरुषार्थ का परिचय देते रहे हैं। अमेरिका, जापान, जर्मनी, रूस आदि की महिलाएँ राजनीति से लेकर वैज्ञानिक और आर्थिक क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्य कर रही हैं। उनकी समाजसेवा भी ऐसी है, जिसके लिए मुक्त कंठ से प्रशंसा की जा सकती है। मांटेसरी की शिक्षा क्रांति, फ्लोरेंस नाइटिंगेल का रेडक्रॉस आंदोलन, मैडम क्यूरी के वैज्ञानिक अनुसंधान, मदर टेरेसा की दरिद्रों के प्रति करुणा व मेरी स्टोप का परिवार- नियोजन कार्यक्रम ऐसी उपलब्धियाँ हैं, जिनका चिरकाल तक भावभरा स्मरण होता रहेगा। राजनीति के क्षेत्र में इंदिरा गाँधी, गोल्डामायर, माग्रेरेट थेचर, भंडार नायके, कोरा एक्वीनो आदि का नाम हर किसी की जबान पर रहा है। बेनजीर भुट्टो ने पाकिस्तान में हेरोइन तस्करों के विरुद्ध अपने ढंग की जंग छेड़ी। जापान में तो कमाल ही हुआ है। वहाँ की एक महिला टाकोका डोई ने जनमानस पर अपनी ऐसी छाप छोड़ी कि पहले टोकियो असेम्बली के चुनाव में तथा उसके बाद पूरे जापान के चुनावों में महिला प्रधान प्रजातांत्रिक पार्टी को बहुमत दिलाकर ही छोड़ा। संसार भर में महिलाएँ अपने वर्चस्व के ऐसे प्रमाण- परिचय दे रही हैं, जिन्हें देखते हुए उन पर किसी भी प्रकार पिछड़ेपन का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
यह सब गत शताब्दी में संभव हुआ है। अब, इस उभार में और अधिक उफान आने की पूरी- पूरी संभावना है। इसके लक्षण भी पग- पग पर प्रमाणों के साथ सामने आ रहे हैं। उदाहरण के लिए भारत के एक छोटे प्रांत केरल को लिया जा सकता है। वहाँ की लड़कियों ने शिक्षा के क्षेत्र में अग्रगामी होकर भारत के अन्य सभी क्षेत्रों को पीछे छोड़ दिया है। स्कूल में प्रवेश पाने के बाद ग्रेजुएट होने से पूर्व कोई पढ़ाई बंद नहीं करतीं, वरन आगे भी अनेकानेक क्षेत्रों में योग्यता बढ़ाने का क्रम यथावत बनाए रखती हैं। महिलाओं ने आग्रह पूर्वक सरकार से यह कानून पास कराया है कि २६- २७ वर्ष से कम की महिला और २९ वर्ष से कम आयु का कोई पुरुष शादी न कर सके। इन प्रयासों के तीन सत्परिणाम सामने आए हैं- एक तो यह कि प्रगति- पथ में पग- पग पर रोड़ा अटकाने वाली जनसंख्या- वृद्धि संतोषजनक ढंग से रुक गई है। दूसरे, वहाँ के शिक्षितों ने देश- विदेश में आजीविका पाने में आश्चर्यजनक सफलता पाई है। तीसरे, प्रदेश की समृद्धि में संतोष जनक अभिवृद्धि हुई है। फलतः: सरकार ने जनता को खाद्य- पदार्थों की कीमतों में असाधारण छूट दी है। अपराधों की संख्या नाममात्र को रह गयी है। इन सभी बातों में नारी समाज के निजी उत्साह ने प्रमुख भूमिका निभाई है। यों पुरुषों ने भी उनके मार्ग में कोई बड़ा अवरोध खड़ा नहीं किया है। केरल की एक महिला तो अमेरिकी नौसेना विभाग में बड़े ऊँचे पद पर रही है।
यह गत शताब्दी में हुई नारी- प्रगति की हलकी- सी झलक मात्र है। यदि विश्व भ्रमण पर निकला जाय तो प्रतीत होगा कि अनेक देशों या क्षेत्रों में इस संदर्भ में नया उत्साह उभरा है और नारी प्रगति को देखते हुए यह निष्कर्ष निकलता है कि यह हवा आगे भी रुकने वाली नहीं है और वह लक्ष्य पूरा होकर रहेगा, जिसमें नर और नारी एक समान का उद्घोष किया गया है।
विदेशों में यह क्रम पहले से ही चल पड़ा है। समुन्नत देशों में नारी का प्रवेश उन सभी क्षेत्रों में है, जिनमें कि पुरुष अपने पुरुषार्थ का परिचय देते रहे हैं। अमेरिका, जापान, जर्मनी, रूस आदि की महिलाएँ राजनीति से लेकर वैज्ञानिक और आर्थिक क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्य कर रही हैं। उनकी समाजसेवा भी ऐसी है, जिसके लिए मुक्त कंठ से प्रशंसा की जा सकती है। मांटेसरी की शिक्षा क्रांति, फ्लोरेंस नाइटिंगेल का रेडक्रॉस आंदोलन, मैडम क्यूरी के वैज्ञानिक अनुसंधान, मदर टेरेसा की दरिद्रों के प्रति करुणा व मेरी स्टोप का परिवार- नियोजन कार्यक्रम ऐसी उपलब्धियाँ हैं, जिनका चिरकाल तक भावभरा स्मरण होता रहेगा। राजनीति के क्षेत्र में इंदिरा गाँधी, गोल्डामायर, माग्रेरेट थेचर, भंडार नायके, कोरा एक्वीनो आदि का नाम हर किसी की जबान पर रहा है। बेनजीर भुट्टो ने पाकिस्तान में हेरोइन तस्करों के विरुद्ध अपने ढंग की जंग छेड़ी। जापान में तो कमाल ही हुआ है। वहाँ की एक महिला टाकोका डोई ने जनमानस पर अपनी ऐसी छाप छोड़ी कि पहले टोकियो असेम्बली के चुनाव में तथा उसके बाद पूरे जापान के चुनावों में महिला प्रधान प्रजातांत्रिक पार्टी को बहुमत दिलाकर ही छोड़ा। संसार भर में महिलाएँ अपने वर्चस्व के ऐसे प्रमाण- परिचय दे रही हैं, जिन्हें देखते हुए उन पर किसी भी प्रकार पिछड़ेपन का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
यह सब गत शताब्दी में संभव हुआ है। अब, इस उभार में और अधिक उफान आने की पूरी- पूरी संभावना है। इसके लक्षण भी पग- पग पर प्रमाणों के साथ सामने आ रहे हैं। उदाहरण के लिए भारत के एक छोटे प्रांत केरल को लिया जा सकता है। वहाँ की लड़कियों ने शिक्षा के क्षेत्र में अग्रगामी होकर भारत के अन्य सभी क्षेत्रों को पीछे छोड़ दिया है। स्कूल में प्रवेश पाने के बाद ग्रेजुएट होने से पूर्व कोई पढ़ाई बंद नहीं करतीं, वरन आगे भी अनेकानेक क्षेत्रों में योग्यता बढ़ाने का क्रम यथावत बनाए रखती हैं। महिलाओं ने आग्रह पूर्वक सरकार से यह कानून पास कराया है कि २६- २७ वर्ष से कम की महिला और २९ वर्ष से कम आयु का कोई पुरुष शादी न कर सके। इन प्रयासों के तीन सत्परिणाम सामने आए हैं- एक तो यह कि प्रगति- पथ में पग- पग पर रोड़ा अटकाने वाली जनसंख्या- वृद्धि संतोषजनक ढंग से रुक गई है। दूसरे, वहाँ के शिक्षितों ने देश- विदेश में आजीविका पाने में आश्चर्यजनक सफलता पाई है। तीसरे, प्रदेश की समृद्धि में संतोष जनक अभिवृद्धि हुई है। फलतः: सरकार ने जनता को खाद्य- पदार्थों की कीमतों में असाधारण छूट दी है। अपराधों की संख्या नाममात्र को रह गयी है। इन सभी बातों में नारी समाज के निजी उत्साह ने प्रमुख भूमिका निभाई है। यों पुरुषों ने भी उनके मार्ग में कोई बड़ा अवरोध खड़ा नहीं किया है। केरल की एक महिला तो अमेरिकी नौसेना विभाग में बड़े ऊँचे पद पर रही है।
यह गत शताब्दी में हुई नारी- प्रगति की हलकी- सी झलक मात्र है। यदि विश्व भ्रमण पर निकला जाय तो प्रतीत होगा कि अनेक देशों या क्षेत्रों में इस संदर्भ में नया उत्साह उभरा है और नारी प्रगति को देखते हुए यह निष्कर्ष निकलता है कि यह हवा आगे भी रुकने वाली नहीं है और वह लक्ष्य पूरा होकर रहेगा, जिसमें नर और नारी एक समान का उद्घोष किया गया है।

