यह दयनीय दुर्दशा कब तक!
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जिस वर्ग में आशा उत्साह और साहस का उभार होता है वह क्षेत्र में आगे बढ़ता है और सुसम्पन्न बनता है। जिनमें भोग जन्य शिथिलता बढ़ती है उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में पिछड़ना पड़ता है। इस तथ्य को अमेरिका के नर और नारी वर्ग की स्थिति का विश्लेषण करते हुए सहज ही समझा जा सकता है।
अमरीकी जनगणना विभाग द्वारा प्रकाशित नई रिपोर्ट के अनुसार उस देश में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। ये शारीरिक दृष्टि से भी पुरुषों की अपेक्षा अधिक स्वस्थ और सबल हैं और औसत अमेरिकी महिला—वहां के पुरुषों की तुलना में 7 वर्ष अधिक जीवित रहती हैं।
जन गणना के अनुसार अमेरिका की जनसंख्या 21 करोड़ है। इनमें प्रतिशत के हिसाब से पुरुष 95 और स्त्रियां 100 हैं पांच प्रतिशत स्त्रियां अधिक हैं। वे पुरुषों की तुलना में लगभग 1 करोड़ अधिक हैं।
उस सुसम्पन्न देश में स्वास्थ्य, सबलता, दीर्घ जीवन और संख्या की दृष्टि से महिलाएं पुरुषों से क्यों आगे बढ़ती चली जा रही हैं और क्रमशः क्यों पिछड़ते जा रहे हैं—इसका विचारकों ने यह बताया है कि अमरीकी पुरुष, सम्पन्नता के बाहुल्य का उपयोग विलासिता की वृद्धि में करता चला जा रहा है, उसकी आकांक्षा मात्र यह है कि किस प्रकार वासना और विलासिता के साधन जुटाने और उनके उपभोग में निरत रहने का अधिक से अधिक अवसर प्राप्त करे। इसी घुड़दौड़ में पुरुष समाज का ध्यान केन्द्रित है। शिक्षा, आजीविका, सुशासन, सुविधा के प्रचुर साधन होने के कारण अब उन्हें जीवन के किसी क्षेत्र में बड़ा संघर्ष नहीं करना पड़ता। निश्चिन्तता उत्पन्न करती है और कोई बड़ा लक्ष्य सामने न रहने पर मनुष्य व्यसन और व्यभिचार में अधिकाधिक निमग्न होता चला जाता है। उस देश के पुरुषों की मनःस्थिति और क्रिया पद्धति का ढलान अब इसी दिशा में बढ़ता चला जा रहा है।
प्रकृति का अकाट्य नियम सदा से यही रहता है कि पुरुषार्थी और संघर्षशील प्रगति करते हैं और विलासी गलते गिरते चले जाते हैं। इसी नियम के आधार पर उस देश के पुरुष क्रमशः अपना स्वास्थ्य, सौंदर्य, दीर्घ जीवन बल, पुरुषार्थ खोते चले जा रहे हैं। नारी को सन्तुष्ट करने योग्य काम शक्ति में भी ह्रास होने का रहस्योद्घाटन वहां की स्वास्थ्य अन्वेषी संस्थाओं ने किया है। उनका कहना है—मनःस्थिति पुरुषों की अधिक विचलित रहती है। जहां तक काम पुरुषार्थ का प्रश्न है, नारी की तुलना में नर की स्थिति क्रमशः दयनीय होती चली जा रही है।
संसार के सभी क्षेत्रों में नारी पीड़ित और पद दलित रही है। योरोप एवं अमेरिका भी इसके अपवाद नहीं हैं। शिक्षा और प्रगति शीलता की बढ़ोतरी ने नारी को नर की समानता का अवसर दिया है। उसका पूरा लाभ वहां की महिलाएं उठा रही हैं। वे अधिक सुयोग्य अधिक समर्थ बनने पर अपना ध्यान केन्द्रित किए हुए हैं। पुरुष के सहयोग का वे लाभ तो उठाती हैं पर उनकी गुलाम बनने से सर्वथा इन्कार करती हैं। पुरुष का लक्ष्य भले ही विलासिता बन गया हो पर वहां की नारी ने प्रगतिशीलता पर ही अपनी महत्वाकांक्षाएं केन्द्रित की हैं और उसी आधार पर अपनी रीति नीति निर्धारित की है। यही कारण है कि उनके दृष्टिकोण के अनुरूप प्रकृति उनकी सहायता कर रही है और वे क्रमशः हर क्षेत्र में अग्रणी बनती चली जा रही हैं। शिक्षा, शिल्प, विज्ञान, स्वास्थ्य, साहस, प्रगति हर क्षेत्र में वे पुरुषों की तुलना में अधिक सफलता प्राप्त कर रही हैं। प्रतियोगिता के हर अवसर पर पुरुष की तुलना में उस देश की नारी की सफलता का प्रतिशत क्रमशः बढ़ता ही चला जा रहा हैं।
जिन देशों में नारी को प्रगति के अवसर नहीं मिल रहे हैं और वह कड़े प्रतिबन्धों के बीच बाधित जीवन जी रही है वहां स्वभावतः पुरुषों की स्थिति अच्छी और नारियों की गई गुजरी है। मध्य पूर्व के इस्लाम धर्मानुयायी अपनी स्त्रियों पर पर्दा बुर्का आदि तरह तरह के प्रतिबन्ध लगाते रहे हैं। एक-एक पुरुष की बहुत सी स्त्रियां हरम में रखना और उनकी आकांक्षाओं पर प्रतिबन्ध लगाये रहना उस क्षेत्र की परम्परा जैसी बन गई है। यही कारण है कि उन देशों में स्त्रियों का स्वास्थ्य अपेक्षाकृत गिरा हुआ है। मृत्यु दर उन्हीं की बढ़ी चढ़ी है। साथ ही महिलाओं की संख्या घटती और पुरुषों की बढ़ती जाती हैं। हर पुरुष को विवाह करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है और गृहस्थी बसाने के लिए भारी जोड़-तोड़ मिलाने पड़ते हैं।
भारत में महिलाओं की मृत्यु संख्या पुरुषों की तुलना में अधिक है। वे ही अधिक कमजोर पाई जाती हैं और बीमार भी अधिक पड़ती हैं। उसका कारण नारी को बाधित और प्रतिबन्धित करने वाली सामाजिक कुरीतियां ही प्रमुख हैं। वे जब तक इसी रूप में बनी रहेंगी—स्वभावतः नारी को दयनीय स्थिति में ही पड़ी रहना पड़ेगा।
अमेरिका का उदाहरण यह सिद्ध करता है कि प्रगतिशीलता ही सफलताओं की जननी है। प्रकृति उन्हीं को आगे बढ़ाती है जिनमें उत्साह, साहस और पुरुषार्थ का उभार उठता है और महत्वकांक्षाएं बढ़ी चढ़ी रहती हैं। अमेरिकी नारी ने अपने को इस कसौटी पर वहां के पुरुषों की तुलना में अधिक अग्रगामी सिद्ध किया है फलस्वरूप उन्हें प्रकृति ने मुक्त हस्त से सहायता दी है और वे क्रमशः आगे को बढ़ती चली जाती हैं।
अगले दिनों नारी द्वारा विश्व का नेतृत्व किये जाने की सम्भावना इसीलिये अधिक है कि पद दलित वर्ग को अगले दिनों अनीति मूलक प्रतिबन्धों से छुटकारा पाने का अवसर मिलने ही वाला है। ऐसी दशा में वे अपने को सुविकसित एवं सुयोग्य वर बनाने का प्रयत्न करेगी फलस्वरूप प्रकृति का पूर्ण सहयोग भी उन्हें मिलेगा और विश्व के नव निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करेंगी।
पुरुष के हाथ में चिरकाल से सर्वतोमुखी शक्ति रही है। नारी का स्वत्व अपहरण करके भी उसी ने अपनी मुट्ठी में रखा है। पर उसका सदुपयोग नहीं किया वरन् अनीति मूलक रीति नीति ही अपनायी है। युद्ध, शोषण और उत्पीड़न में ही प्रायः इसका पुरुषार्थ नियोजित होता रहा है। प्रकृति को यह सहन नहीं। वह उसके हाथ से उतने समय के लिए सत्ता छीनने वाली है जब तक कि उसे वर्चस्व के सदुपयोग करने की बात समझ में न आ जाय।
विश्व सन्तुलन नारी के पक्ष में जा रहा है। अमेरिका में बढ़ता हुआ नारी वर्चस्व, उस प्रभात कालीन सूर्योदय के समान है जिसका प्रकाश क्रमशः अधिक प्रखर और अधिक व्यापक ही होने वाला है। हम देखेंगे कि समस्त विश्व में नारी किस प्रकार पिछड़ेपन से अपना पीछा छुड़ा कर प्रगतिशील बनती है और अपनी स्वाभाविक महानता को विकसित करके किस प्रकार विश्व में प्रेम और न्याय का शासन स्थापित करने में योगदान करती है। पुरुष के लिए यह उदाहरण आत्म चिन्तन करने और आत्म सुधार करने का अच्छा अवसर होगा।
नर नारी का संतुलित समन्वय ही मानव जाति का भविष्य उज्ज्वल करेगा। असन्तुलन दूर होना ही चाहिए। इसे प्रकृति किस प्रकार व्यवस्थित करने जा रही है इसका उभार हमें अमेरिका में देखना चाहिए। विश्व में उसी क्रम के विस्तार की आशा करनी चाहिए। पिछड़ता पुरुष भी आज नहीं तो कल आत्म-ग्लानि अनुभव करेगा और कुमार्गगामिता छोड़कर वह रीति नीति अपनायेगा जिसके आधार पर नर नारी दोनों ही भगवान के दांई-बांई भुजा के रूप में पारस्परिक सहयोग और सद्भाव का परिचय देते हुए सुखी समाज का सृजन कर सके।
दिन-दिन गिरती हुई नारियों की दशा देखकर जब उस पर विचार किया जाता है तो यही पता चलता है कि वह स्वार्थी पुरुषों द्वारा जाने-अनजाने एक लम्बे समय से छली जा रही है। नारी के प्रति बहुत से व्यवहार उसके विकास के विरुद्ध एक प्रकार के मोहक षड़यन्त्र जैसे लगते हैं जिसमें बेचारी अबोध अबला फंसती पिसती चली आ रही है और आज भी मुक्त नहीं हो पा रही है। कितना अच्छा हो कि पुरुष अपने स्वार्थ के लिए षड़यन्त्र करना बन्द कर दे जिससे कि समाज का यह अर्धांग भी विकसित एवं उन्नत हो सके।
अशिक्षा नारी के लिये एक षड्यन्त्र है जिसके आधार में ऐसी सुन्दर बातें बना रखी हैं जो देखने सुनने में नारी के लिये बड़ी हितकर तथा सद्भावना पूर्ण मालूम होती हैं कि—‘‘नारियों के लिये पढ़ना जरूरी नहीं। उन्हें कोई नौकरी-चाकरी तो करना नहीं, किसी घर की मालकिन बनना है। तब घर गृहस्थी का काम सीख लेना काफी है। पढ़ाई-लिखाई में सिर खपाने की क्या जरूरत।’’
‘‘कन्यायें जब तक घर गृहस्थी का काम-काज सीखकर तैयार होती हैं तब तक विवाह योग्य हो जाती हैं। ब्याह कर पराये घर चली जाती हैं। उन बेचारियों के पास इतना समय कहां कि वे घर गृहस्थी का काम सीखने के साथ-साथ पाठशाला भी जा सकें और शिक्षा में समय दे सकें।’’
विवाहिताओं के प्रति अशिक्षा के पक्ष में सहानुभूति दिखलाने और बहकाने के तर्क भी कुछ कम दिलचस्प नहीं होते। कहा जाता है। कि—‘‘वधुयें घर की शोभा और कुल की लाज होती हैं। उनका खुले आम बाहर निकलने का सस्तापन उनका गौरव घटाता है। पाठशाला जाने-आने में उन्हें बहुत कुछ बेपरदगी करनी होगी। घर का काम-काज छोड़कर पढ़ने जाना पड़ेगा और बाद में आकर घर का काम निपटाना होना जिससे दूना परिश्रम पड़ जायेगा, जिसका प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर अच्छा नहीं पड़ेगा और यदि दो एक बच्चे हुए तो पाठशाला के समय बेचारे मां के लिए रोते-बिलखते रहेंगे जिससे जननी और जात दोनों को मानसिक पीड़ा होगी।’’ जिससे उनकी जिन्दगी एक नीरस मन्त्र की तरह बनकर रह जाती है। आदि-आदि न जाने कितने तर्क उनकी शिक्षा के विरोध में दिये जाते हैं, जो कि बड़े ही लुभावने, सद्भावना पूर्ण और स्वयं नारी को लुभाने वाले हो सकते हैं।
यों तर्क देने की बात ही क्या। जब तर्क ही आधार हैं तब तो जिन्दगी को मौत और दिन को रात कहने के लिये अनेक लक्षणों को निकाला और दिखाया जा सकता है। किन्तु सत्य इनसे भिन्न होता है। वास्तविकता यह है कि वह नारी को अशिक्षित एवं अविकसित रखकर उसे उसके अधिकार एवं अस्तित्व का ज्ञान नहीं होने देना चाहता है कि वह उसे पशु की तरह जिस प्रकार बर्तता, लूटता और मिटाता आया है वैसी ही मनमानी आगे भी करता रह सके। शिक्षा नारी के मुख में जुबान, हृदय में भावना, बुद्धि में विचार और आत्मा में जागरण उत्पन्न कर देगी। तब ऐसी स्थिति में पुरुष की अनुचित मनमानी न चल पायेगी। नहीं तो सहनशीलता, सादगी, परिश्रम, दक्षता, कुशलता, सामंजस्य, शीलता आदि ऐसा कौन-सा गुण है जो कि शिक्षा द्वारा नहीं पाया जा सकता और इनके विपरीत ऐसा कौन-सा दुर्गुण हो सकता है जिसका समावेश अशिक्षा नहीं कर सकती। यह बात दूसरी है कि शिक्षा के विषय अनुकूलता, उपयुक्तता तथा उपयोगिता का विचार न रखा जाये और नारी के पल्ले उस प्रकार की शिक्षा-दीक्षा बांध दी जाये जो उसके अनुकूल एवं अनुरूप न हो। नारी के प्रति इस प्रकार का षड़यन्त्र बन्द किया जाये और अवसर दिया जाये तो वह अवश्य ही जपने अन्य कर्तव्यों की उपेक्षा किये बिना उसे ग्रहण कर लेगी और परिवार में अपनी विकसित शालीनता से गौरव की वृद्धि कर देगी।
नारी को बहु प्रजनन के व्यामोह में डालने के लिए कहा जाता है कि—‘‘यह कितनी भाग्यवान नारी है, इसके आठ सन्तान हैं। भगवान सबको ऐसा बनाये। घर में छः बहुयें और दो जमाई आयेंगे। घर जल्दी ही नाती-पोतों से भर जायेगा। कमाई उठाये धरते न बनेगी। एक बहू रोटी बनायेगी तो एक पैर दावेगी। कोई सिर में तेल लगायेगी तो कोई पंखा झलेगी। बच्चे सब पल जायेंगे आज का परिश्रम बुढ़ापे में सुख बन जायेगा। पलंग पर बैठी हुक्म चलायेगी। तिनका टारने की भी जरूरत न होगी। मरेगी तो नाती-पोतों के कन्धों जायगी ऐसी फली-फूली फुलवारी छोड़कर जाने वाली को स्वर्ग से लेने के लिये विमान आते हैं।’’ आदि-आदि न जाने कितनी बातें कहकर नारियों को बहु सन्तान के लिये प्रेरित किया जाता है। उन्हें अधिक सन्तानों से होने वाली हानियों तथा तकलीफों का अनुभव ही नहीं होने दिया जाता। इसका नतीजा यह होता है कि वह अधिकाधिक सन्तानों को परमात्मा की कृपा मानकर निषेधवती हो ही नहीं पाती और पुरुष की पाशविक प्रवृत्ति में बलिदान होती रहती है।
अकाल वृद्धा, बुझे रूप, ठले शरीर, जर्जर स्वास्थ्य, रुग्णा नारियां जो देखने में आती हैं वे सब अधिक प्रजनन की मारी हुई होती हैं। हाथ में शीशी, शिथिल चाल, सूखे ओंठ वधू के योग्य वस्त्र जिस श्वेत केशिनी को देखें समझ लें कि यह वह तरुणी हैं जो बहु सन्तान की सौभाग्य-वादिता के षड़यन्त्र में फंसी पुरुष की वासना की मारी अकाल वृद्धा है जो अशिक्षा, अज्ञान और अन्ध-विश्वास के कारण अपने अस्तित्व को भूली हुई अपने को इसी योग्य समझती है।
कितना जरूरी है कि नारी को बहु सन्तान की सौभाग्य शीलता के षड़यन्त्र से मुक्त कर स्वास्थ्यपूर्ण सुन्दर जिन्दगी जीने दिया जाये जिससे वह अपने स्वाभाविक सौन्दर्य एवं शारीरिक सौष्ठव को सुरक्षित रख सके और आदि से अन्त तक अकाल कंकाल के बजाय मानवी मालूम हो सके। परिवार नियोजन के पुण्य से उसे पवित्र किया जाये जिससे वह केवल दो सन्तानों को रुचि से पाल सके और अपने वात्सल्य को बिन्दु-बिन्दु बांटने के बजाय एक स्थान पर केन्द्रित कर उसका सुख ले सके और स्वस्थ सुयोग्य सन्तान की जननी होने का गौरव पा सके इसी में परिवार, समाज तथा राष्ट्र की भलाई है।
साहित्यकार और कलाकार उनमें भी विशेषकर कवि, कहानीकार तथा चित्रकार तो नारी पर कृपा करें ही। उनकी लेखनी और तूलिका नारी के जिस उद्दीपक रूप का चित्रण करने में संलग्न है वह राष्ट्र की जननी के प्रति इतना भीषण षड्यन्त्र है जो समग्र राष्ट्र के आमूल पतन का कारण बनता जा रहा है। यह स्पष्टोक्ति अतिशयोक्ति नहीं कही जा सकती कि नारी को विलासिनी और पुरुष को कामुक बनने के लिए बढ़ावा देने में इन लेखकों तथा आलेखकों का बहुत बड़ा हाथ है। श्रृंगारिक कवितायें, प्रेम-परक कथायें और उद्दीपक चित्रों ने तो नारी के पवित्र तप को ही छिपा डाला है। कवियों की उपमाओं रूपकों तथा अलंकारों, शशिमुखी, लवंगलता थिकवैनी, गजमामिनी, सुकुमारी, लाजवती, सुन्दरी, सुनमनी, प्रेयसी, प्रणयमती, प्राणप्रिया आदि के ठगोरे सम्बोधनों ने तो नारी की अकल ही काट दी है। उसे सुनहरे और जादू जैसे स्वप्नों में खोकर आत्म-विस्मृत ही कर दिया है जिनसे वह पुरुष की वासना के अधिकाधिक अनुकूल बनकर उपयोगी सर्वस्व को निरुपयोगी बनाती चली जा रही है। कथाकारों ने तो उसे प्रेम की उस मरुमरीचिका में भुलाया है जहां जाकर उसका फिर सुरक्षित लौटना सम्भव नहीं। वह पुरुष के उस भ्रामक तथा अव्यावहारिक प्रेम को पाने के लिए अपना कितना और क्या कुछ गंवाकर कैसी बनती जाये इसका विचार हृदय कंपा देता है।
शताब्दियों से नारी को इस तरह पददलित किया गया—पैरों तले रौंदा गया, उस पर तरह-तरह के बन्धन, प्रतिबन्ध लगाये गये और उसे घर की चहारदिवारी में ही काराबद्ध रखा गया। यह व्यवहार तो पशु के साथ ही किया जा सकता है। हालांकि उचित इसे भी नहीं कहा जा सकता। परन्तु यहां तक भी गनीमत थी। नारी की दुर्दशा और समाज में उसका पिछड़ापन भी किसी सभ्य समाज के लिए लज्जा की बात हो सकती है, पर हमारे देश में तो उससे भी एक कदम आगे बढ़कर उसके साथ आवारा पशु की तरह व्यवहार किया जाता है।
घरों में पालतू जानवर पाले जाते हैं। जब तक वे दूध देते हैं या घरों के लिए उसका उपयोग होता है तब तक तो उसे चारा पानी दिया जाता रहता है और जैसे ही वह फालतू हो जाता है उसे कसाई के हाथों बेच दिया जाता है। नारी के प्रति तो इससे भी गिरा हुआ दृष्टिकोण अपनाया जाता है। आये दिनों समाचार पत्रों में इस तरह के समाचार छपते रहते हैं कि अमुक स्थान पर अमुक स्त्री की हत्या कर दी गई और हत्या भी इतने नृशंस ढंग से कि क्रूर से क्रूर अत्याचारी, डाकू, बदमाश भी क्या करते होंगे। समाचार-पत्रों को यदि ध्यानपूर्वक पढ़ा जाय तो प्रत्येक अंक में एक दो समाचार ऐसे अवश्य मिलेंगे जिनमें किसी साधारण से कारण को लेकर गृहस्वामी ने गृहणी की हत्या कर दी।
यहां ऐसे ही कुछ समाचार संकलित कर प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें गृहणी की हत्या का एक ही ढंग अपनाया गया—मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा देना। ठीक उसी तरह जिस प्रकार कि किसी बेकार पड़े कूड़े के ढेर को मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा दी जाती है। इन घटनाओं के मूल में जायें तो ऐसे छोटे-छोटे कारण दिखाई देंगे जिनके लिए किसी की हत्या करना तो क्या निन्दा करना भी उचित नहीं लगता। उदाहरण के लिए सद्यः विवाहित दम्पति के प्रथम परिचय और प्रारम्भ के आकर्षण को ही लें जो किसी भी तरह अस्वाभाविक नहीं कहा जाता, परन्तु कुछ महीनों पूर्व इसी कारण भाई-बहिन दोनों के द्वारा अपनी भाभी की हत्या कर देने का समाचार अखबारों में प्रकाशित हुआ था।
घटना कोरबा (म. प्र.) के पास कोहड़िया गांव की है। जहां देवर और ननद दोनों ने मिलकर अपनी भाभी की हत्या कर डाली। बताया जाता है कि कोहड़िया निवासी सम्बन्धित परिवार में मृत महिला जिसका नाम कमला था—कुछ दिनों पूर्व ही ब्याह कर आयी थी। हत्या का कारण तो ज्ञात नहीं हो सका, पर चर्चा है कि नवविवाहित दम्पत्तियों की तरह कमला और उसके पति भी बड़े ही स्निग्ध स्नेहपूर्ण ढंग से प्रेमपूर्वक रहते थे। इस पर कमला की ननद और देवर ने महसूस किया कि उनकी भाभी ने उनके भाई पर जादू कर दिया है और इस कारण वह उनकी उपेक्षा करने लगा है। कह नहीं सकते कि हत्या का यही कारण रहा हो, परन्तु देवर और ननद ने मिलकर अपनी भाभी के कपड़ों पर मिट्टी का तेल छिड़क दिया और फिर आग लगा दी। कमला जोर से चीखकर बाहर भागी। लोगों ने उसकी चीख सुनी और उसके कपड़ों में आग लगी देखी तो आग बुझाने का प्रयत्न किया। आग तो बुझ गई पर वह महिला बुरी तरह घायल हो जल गयी थी। किसी राहगीर ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी। पुलिस ने घायल महिला को अस्पताल पहुंचाया। वह इतनी बुरी तरह जल गयी थी कि उपचार करने पर भी उसे बचाया न जा सका।
घर के दूसरे सदस्य ही स्त्री पर अत्याचार करते हों ऐसी बात भी नहीं है। पुरुष भी उसके साथ कोई मानवीयता बरतना आवश्यक नहीं समझते। पति की दृष्टि में वह जीवन साथी की अपेक्षा विलासिनी और भोग्या ही अधिक रहती है जिसके लिए हर स्थिति में अपने पति की इच्छा पूरी करना ही उसकी नियति है। फिर पति भले ही स्वयं घृणित जीवन जी रहा हो या कुमार्ग पर चल रहा हो। पति को तो उसका प्रेमपूर्ण अनुशासन तक सहन नहीं होता। उसके सुझाव परामर्श उसे अनुचित हस्तक्षेप लगते हैं तथा स्थिति ज्यादा बिगड़ती है तो वह मारपीट तक के लिए उतारू हो जाता है।
कुछ समय पूर्व एक पति ने अपनी पत्नी की केवल इसलिए हत्या कर डाली थी कि वह उसे दुराचारी जीवन जीने से अक्सर रोका करती थी। घटना मुजफ्फर जिले के फतेहाबाद गांव की है जहां एक 20 वर्षीय महिला की अमानुषिक ढंग से हत्या कर देने का समाचार पिछले दिनों अखबारों में प्रकाशित हुआ था। हत्या के बाद उस महिला के शव को नदी में बहा दिया गया ताकि पुलिस को पता न चले। बताया जाता है कि रात के सन्नाटे में उक्त महिला के हाथ पांव बांध दिये गये और उसके पति ने महिला के बदन पर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा दी। इस बीच अन्दर से घर के दरवाजे भी बन्द कर लिये गये थे, ताकि पड़ौसी घटना स्थल पर न पहुंचे। महिला के मुंह में कपड़ा भी ठूंस दिया गया ताकि वह शोर न मचा सके। बताया जाता है कि उस महिला का दाम्पत्य-जीवन पिछले कुछ महीनों से अत्यन्त कटु हो गया था क्योंकि उसके पति के कई स्त्रियों से अनुचित सम्बन्ध थे जिसका वह विरोध करती रहती थी। दुराचारी पति ने उसे अपने मार्ग से हटाने के लिए उसकी हत्या ही कर डाली।
अब कोई बताये कि ऐसी स्थिति में कोई स्त्री किस प्रकार पति के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन कर सकती है और सच्चे अर्थों में जीवन साथी की भूमिका निभा सकती है। जहां पति को अनैतिक मार्ग पर जाने से बचने की सलाह देना भी क्लेश का कारण बन जाये और मारपीट से लेकर हत्या तक की नौबत आ जाय वहां नारी का दर्जा कितना गिरा हुआ होगा यह कहने-सुनने की अपने आसपास के जीवन में ही देखने की बात है क्योंकि चर्चा जिस समाज की की जा रही है वह अपना ही समाज है। अपने उसी समाज में नारी के साथ यह नृशंसता और क्रूरतापूर्ण बर्ताव किया जाता है। जहां के ऋषियों ने गाया है कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता’।
लेकिन अपने इस समाज में नारी की नहीं उसके साथ आयी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। यह देखा जाता है कि विवाह के बाद कोई युवती अपने साथ कितना दान-दहेज लायी है। विवाह का आधार जीवन साथी की आवश्यकता पूरी करना नहीं वधू पक्ष से अधिक से अधिक रकम ऐंठ लेना ही बन गया है और उसकी सफलता इसमें नहीं समझी जाती कि पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति कितना सामञ्जस्य तथा प्रेम भाव विकसित कर पाते हैं वरन् यह समझा जाता है कि विवाह के बाद भी कौन पत्नी अपने मायके से कितना धन लाने में सफल होती है। कम दहेज मिलने के कारण वधू को ताने मारना, उसके मायके वालों पर व्यंग करना तो जैसे आम बात हो गयी है। कई बार तो कम दहेज मिलने के कारण बहू की हत्या तक कर दी जाती है। उसे नृशंसता पूर्वक जला देने की घटनाएं आये दिनों समाचार पत्रों में छपती हैं।
गंगानगर के पास पीली बंगा निवासी बनवारीलाल सुनार के पुत्र श्री किशनलाल का विवाह जुलाई 75 में चन्दूराम की लड़की सुलोचना के साथ हुआ था। विवाह के समय लड़के के पिता ने दहेज में जेवर, कपड़े के अलावा 5 हजार 1 सौ 1 रुपये नकद की मांग की। लड़की के बाप ने लड़की की खुशी के लिए अपना खेत बेच दिया और दो हजार 1 सौ रुपये टीके की रस्म अदायगी, पर ही दिये। विवाह के समय जेवर कपड़ा और अन्य सामान के साथ विदाई के समय जब एक हजार रुपये थाली में रखकर उसने लड़के के बाप को दिये तो वह नाराज हो गया। बड़ी मुश्किल से कन्या पक्ष ने समधियों को राजी किया और हाथ-पैर जोड़कर चार हजार एक सौ एक रुपये बाद में देने का वायदा किया तब जाकर बारात विदा हुई।
बताया जाता है कि ससुराल में लड़की को रोज ही कम दहेज मिलने के लिए तंग किया जाता था। उसका पति किशन लाल अपने मां-बाप के सामने ही अपनी पत्नी को बुरी तरह मारता-पीटता और सुलोचना के सास-ससुर यह सब चुपचाप देखते रहते। एक बार उन लोगों ने उसे घर से भी निकाल दिया, पर पड़ौसियों द्वारा समझाने बुझाने पर उसे फिर रख लिया। लेकिन कुछ दिनों बाद ही उसकी ससुराल वालों ने उसे खूब मारा पीटा और रात के समय ही घर से बाहर निकाल दिया। सुलोचना उस समय गर्भवती थी। वह रात भर बाहर पड़ी रही और किसी तरह दूसरे दिन अपने पीहर पहुंची। लड़की के बाप ने फिर उसके सास-ससुर से बड़ी मिन्नतें कीं और तब वे लड़की को दूसरी बार फिर से रखने के लिये राजी हो गये।
इसके बाद बताया जाता है कि 11 सितम्बर 1976 को लड़की के पति और सास ने फिर उसे बुरी तरह मारा तथा उसके सारे जेवर उतार लिये गये। उसी रात लगभग डेढ़ बजे वह सो रही थी तो उसके पति, सास, ससुर, और देवर चारों ने मिलकर उस पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी। उसकी चीख सुनकर पड़ौसी जागे और घटना स्थल पर पहुंचे। उस समय तो आग बुझा दी गयी और लड़की को अस्पताल पहुंचाया गया, परन्तु अस्पताल में कई महीने तक तड़पने के बाद उसने दम तोड़ दिया।
विवाह में कम दहेज लाने के कारण यह आशा की जाती है कि स्त्री अपने मायके से और धन लाये। मुंह मांगी रकम न मिलने के कारण किसी बहू को किस प्रकार सताया जाता है और ससुराल वाले उसकी जान के ग्राहक किस प्रकार बन जाते हैं यह उपरोक्त घटना में देखा गया। परन्तु कई प्रकार मात्र इसी कारण वर्तमान पत्नी से छुटकारा पाकर नया ब्याह रचाने तथा दूसरी शादी कर दहेज में फिर से मोटी रकम पाने के दुःस्वप्न भी देखे जाते हैं। यहां तक कि पहली पत्नी की हत्या कर देने में भी कोई झिझक नहीं होगी। गंगा नगर में ही घटी इसी तरह की एक घटना से कुछ समय पहले घटी बताते हैं कि रेशमारानी नाम की लड़की का विवाह एक अच्छे परिवार में सम्पन्न हुआ था। वह स्वयं भी खाते-पीते परिवार में पली बढ़ी थी और विवाह के समय वरपक्ष द्वारा उसके माता-पिता से दहेज में ढेरों साज सामान के साथ-साथ स्कूटर भी मांगा गया। दहेज में पहले ही इतना कुछ दिया जा चुका था कि उसके बाद कुछ और देने से परिवार पर असह्य आर्थिक दबाव पड़ता था। फिर भी वह कन्या पक्ष अपना वायदा पूरा करने के लिए जी तोड़ कोशिश करता रहा। वायदा पूरा होने में देरी होते देख ससुराल पक्ष बालों ने यह समझ लिया कि रेशमा के माता-पिता स्कूटर नहीं देना चाहते। इसी से उन्होंने रेशमा को जिन्दा जला दिया। बताया जाता है कि इस हत्या के पीछे दूसरा विवाह कर मोटी रकम प्राप्त करना भी एक था।
गृहणियों की हत्या का उद्देश्य चाहे पर्याप्त दहेज न मिलना रहा हो अथवा बाद में मायके से अपने पति की मांग पूरी न कर पाना रहा हो गृहणी द्वारा पति के व्यक्तिगत जीवन में उचित किन्तु अनपेक्षित हस्तक्षेप करना रहा हो अथवा पत्नी का सुन्दर और उसकी चमड़ी का सांवलापन रहा हो। कारण चाहे जो भी रहा हो परन्तु उपरोक्त घटनाएं हमारे समाज में नारी की स्थिति का चित्रण करने में पूरी तरह सटीक और प्रतिनिधि घटनाएं हैं।
समाचार पत्रों में आये दिन छपने वाले ऐसे समाचारों पर एक निगाह दौड़ाई जाय जिनमें छोटे-छोटे कारणों को लेकर नारी को उत्पीड़न किया गया तो पता चलेगा कि उसकी हमारे समाज में क्या स्थिति है। स्थिति का अच्छा या बुरा होना तो दूर रहा उसे हर घड़ी सन्देह तथा अविश्वास की दृष्टि से देखा जाता है। वातावरण और संसर्ग दोष से कितने ही व्यक्ति पथ-भ्रष्ट हो जाते हैं। यह भी एक तथ्य है कि नारी की अपेक्षा पुरुष ही अधिक पथ भ्रष्ट होते है और दाम्पत्य जीवन की एकनिष्ठ मर्यादा को तोड़कर उच्छृंखल स्वतन्त्र आचरण करते हैं। पुरुषों में जितनी कामुकता और लम्पटता देखने को मिलती है उसका तो एक अंश भी नारी में शायद ही कहीं देखने को मिले। फिर भी नारी को सदैव शंका और अविश्वास की दृष्टि से देखा जाता है।
पर्दा, प्रथा, घर तक ही सीमित रहने के प्रतिबन्ध और लोक लाज की तथाकथित मर्यादायें नारी के लिए ही बनीं। इसका एक कारण यह था कि उस पर अविश्वास किया जाता रहा। बेचारी नारी ने इन प्रतिबन्धों को मर्यादा मानकर सहज रूप से स्वीकार भी कर लिया, फिर भी उस पर सन्देह रखना बन्द नहीं किया गया। आये दिनों समाचार पत्रों में ऐसी घटनायें प्रकाशित होती रहती हैं, जिनमें आनुमानिक सन्देह के कारण ही किसी को घर से बाहर निकाल दिया गया अथवा उसका बुरी तरह उत्पीड़न किया गया। यहां तक कि उसे जान तक से मार डालने के समाचार भी प्रकाश में आते रहते हैं।
अभी कुछ महीनों पूर्व नवभारत टाइम्स में छपे एक समाचार के अनुसार अपनी पत्नी के चाल चलन पर सन्देह करने के कारण सीलमपुर (नयी दिल्ली) रघुवीर नामक युवक ने उसे विष देकर मार डाला। रघुवीर ने अपनी पत्नी सन्तोष को दरियागंज ले जाकर वहां विषपान कराया। विष उसे धोखे से खिलाया गया था और जब सन्तोष के प्राण पखेरू उड़ गये तो उसके शव को स्कूटर पर लाद कर रघुवीर निजामुद्दीन इलाके के रिजरोड पर लाया और सड़क के किनारे मिट्टी में दबा दिया। पत्नी की हत्या करने और उसका शव दबा देने के बाद उसकी आत्मा कचोटने लगी और वह विक्षिप्त-सा होकर निरुद्देश्य ही सड़क पर घूमने लगा। पुलिस के एक सिपाही को शक हुआ तो उसने टोका। इस पर रघुवीर हड़बड़ा उठा। पुलिस सिपाही को सन्देह हुआ तो उसने जोर देकर पूछा अन्ततः रघुवीर ने अपना अपराध उगल दिया और कहा कि उसे सन्तोष के चाल-चलन पर सन्देह था।
चरित्र पर सन्देह को लेकर पत्नी का उत्पीड़न करने उसे यातनायें देने की घटनायें तो इतनी हैं कि लगता है पुरुष चारित्रिक सन्देह का तो केवल बहाना भर बनाते हैं अन्यथा स्त्री को प्रताड़ित करना, उसे यातनाएं देना, कष्ट पहुंचाना जैसे उसके स्वभाव के ही अंग हैं, अन्यथा परिवारों में छोटी-छोटी बातों को लेकर कलहपूर्ण वातावरण नहीं बना रहता।
बाहर से कोई अपने पारिवारिक जीवन में कितना ही सुखी सन्तुष्ट क्यों न दिखाई दे, परन्तु औसत परिवारों में जिस प्रकार का वातावरण रहता है, उससे असन्तोष ही झलकता है। यदि ऐसा न रहा होता तो परिवारों में स्वर्ग का सा वातावरण—सुख-सन्तोष छाया रहता। पारिवारिक वातावरण में क्लेश कलह का विष घोलने के लिए भी अधिकांशतः पुरुष ही जिम्मेदार हैं। सब्जी में नमक कम है, दाल कच्ची रह गयी है, कुर्ते के बटन टूटे हुए हैं, बच्चे धूल मिट्टी में खेल रहे हैं जैसी छोटी-छोटी बातों को लेकर पति अपनी पत्नी पर जिस तरह बरस पड़ता है, उससे लगता है कि पत्नी पुरुष की जीवन संगिनी—अभिन्न सहचरी नहीं उसकी खरीदी हुई दासी और गुलाम है।
कई बार तो स्थिति ऐसी बन जाती है कि स्वभाव से सम्वेदनशील महिलायें उन्हें सहन नहीं कर पातीं और अन्दर ही अन्दर टूट जाती हैं। परिवार के सभी सदस्यों को सन्तुष्ट रखने का गम्भीर दायित्व और फिर ऊपर से ताने उलाहने भरा पति का व्यवहार उसके व्यक्तित्व को ही खोखला कर देता है। इन सब बोझों से लदी असामान्य रूप से थकी हुई चिड़चिड़ी, उदास और निराश स्त्रियों की एक बड़ी संख्या है। इन असह्य परिस्थितियों में कई बार तो स्त्रियां आत्म-हत्या तक कर लेती हैं।
थाना बारहदरी (बरेली) के हजियापुर क्षेत्र के श्री नत्थूलाल की पत्नी श्रीमती जमुना ने रात के समय जबकि घर के सब लोग सो रहे थे तब अपने शरीर पर मिट्टी का तेल छिड़क लिया और कपड़ों में आग लगाकर आत्महत्या कर ली। जमुना ने आत्महत्या क्यों की इसका तो कुछ पता नहीं चल सका है कि कुछ दिनों से पति-पत्नी में काफी झगड़ा होता रहता था और पति उसके साथ मारपीट भी कर बैठता था।
गृह कलह और मनमुटाव के कारण भी स्त्रियों की हत्या कर दी जाती है। कुछ समय पूर्व मथुरा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री विक्रम सिंह ने मोहल्ला कटौती कुआं के कारे नामक व्यक्ति को उसकी पत्नी रामश्री की हत्या के आरोप में आजन्म कठिन कारावास के दण्ड का आदेश दिया था। अभियोग के अनुसार कारे ने 22-23 अक्टूबर 72 की रात को लगभग सवा बारह बजे अपनी पत्नी को एक कोठरी में बन्द कर ईंटों से मार-मार कर हत्या कर दी। वह बेचारी चीखती रही और तड़पती रही। लोगों ने दरवाजा खुलवाकर रामश्री को बचाने के भरसक प्रयास किये किन्तु कारे ने रामश्री को प्राणहत कर ही दम लिया, फिर भी उसने दरवाजा नहीं खोला। अन्ततः कोतवाली पुलिस ने कोठरी के जंगले तोड़कर कारे को रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया।
छोटी-छोटी बातों को लेकर नारी पर कितने नृशंस अत्याचार किये जा सकते हैं—इसकी छोटी-सी झांकी ऊपर की पंक्तियों में दिखाई देती है। किसी विचारक ने भारत में नारियों की स्थिति का विश्लेषण करते हुए बड़े ही मार्मिक स्वरों में पूछा था—‘क्या कारण है कि रसोईघर में होने वाली दुर्घटनायें हों, अथवा घर से बाहर होने वाली हत्या या आत्म हत्याओं में स्त्रियां ही इनका शिकार क्यों होती है?
उत्तर एक ही है कि नारियों पर जरा-जरा सी बातों के लिए झूठे और नृशंस जुल्म ढाये जाते हैं उन्हें सताया जाता है। अपने देश में प्रचलित विवाह परम्पराओं को ही लें। किसी ने ठीक ही कहा है कि भारत में लड़कियों के साथ नहीं, लड़कियों के माता-पिता से मिलने वाले उपहार, दहेज से ही विवाह किया जाता है। भारतीय पुरुष अपनी जीवन संगिनी से भी अधिक उसके द्वारा लाये जाने वाले उपहारों को अधिक महत्व देते हैं। तभी तो अधिक दहेज न मिलने के कारण कम दहेज लाने के कारण भारतीय गृहिणियों को बुरी तरह सताया जाता है। कुछ दिनों पूर्व की ही घटना है जब मुजफ्फर नगर की एक विवाहिता लड़की की दिल्ली में सन्देहास्पद स्थिति में मृत्यु हुई। इस लड़की का विवाह एक वर्ष पूर्व दिल्ली के ही एक इन्जीनियर कॉलेज के प्राध्यापक से हुआ था।
अपनी बेटी की आकस्मिक मृत्यु की सूचना पाकर लड़की के पिता ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करायी और यह आरोप लगाया कि उसकी धेवती का जन्म होने के पश्चात् ससुराल वालों ने लड़की पर इस कारण अत्याचार किया कि उसके पिता ने जन्म होने पर अधिक सामान क्यों नहीं भेजा था। लड़की के पिता ने यह भी आरोप लगाया कि उसकी लड़की को इस कारण काफी सताया गया और उसके कपड़ों पर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा दी गयी तथा उसे जल जाने के बाद अस्पताल भेजा गया जहां तड़प-तड़प कर उसने दम तोड़ दिया। लड़की के पिता को इसकी कोई सूचना नहीं दी गयी।
अपनी पुत्री की इस प्रकार हुई मृत्यु से—दुखी पिता ने यह भी आरोप लगाया कि उसका दामाद सौ पचास रुपयों के लिए भी उसे सताता रहता था जबकि उसकी लड़की एम. ए. पास थी और बहुत सुन्दर तथा सुशील थी तथा उसने अपनी बेटी के विवाह में लगभग 35 हजार रुपया खर्च किया था। कहा जाता है कि इस लड़की के पति ने कई बार उसे मार डालने की भी धमकी दी थी इस आशय के पत्र पुलिस उप-अधीक्षक को दिखलाये गये हैं। उक्त प्राध्यापक के बड़े भाई के बारे में भी ऐसा ही समाचार मिला है कि उसने भी अपनी पहली पत्नी को छोड़कर जिसके दो बच्चे हो गये थे, दूसरा विवाह कर लिया है। कहा जाता है कि यह प्राध्यापक भी पुनः विवाह कर 40-50 हजार रुपये प्राप्त करने का इच्छुक था।
नई पीढ़ियां माता के पेट से ही पैदा होती हैं—घर परिवार का वातावरण महिलायें ही बनाती हैं—संस्कार, स्वभाव और चरित्र का प्रशिक्षण घर की पाठशाला में ही होता है परिवार का स्नेह सौजन्य पूरी तरह स्त्रियों के हाथ में रहता है यदि नारी की स्थिति सुसंस्कृत सुविकसित स्तर की हो तो निस्सन्देह हमारे घर-परिवार स्वर्गीय वातावरण से भरे-पूरे रह सकते हैं, उसमें रहने वाले लोग कल्पवृक्ष जैसी शीतल छाया का रसास्वादन कर सकते हैं। हीरे जैसे बहुमूल्य रत्न किन्हीं विशेष खदानों से निकलते हैं पर यदि परिवार का वातावरण परिष्कृत हो तो उसमें से एक से एक बहुमूल्य नवरत्न निकलते रह सकते हैं और उस सम्पदा से कोई देश समाज, समुन्नत स्थिति में बना रह सकता है। देश की आधी जनसंख्या नारी है, यदि वह पक्ष दुर्बल और भारभूत बनकर रहेगा तो नर के रूप में शेष आधी आबादी की अपनी भारी शक्ति उस अशक्त पक्ष का भार ढोने में ही नष्ट होती रहेगी। प्रगति तो तभी सम्भव थी जब गाड़ी के दोनों पहिये साथ साथ आगे की ओर लुढ़कते। एक पहिया पीछे की ओर खिंचे दूसरा आगे की ओर बढ़े तो उससे खींचतान भर होती रहेगी हाथ कुछ नहीं लगेगा। प्रगतिशील देशों में नारी भी नर के कन्धे से कन्धा मिलाकर आगे बढ़ने की—अपने देश को आगे बढ़ाने की सुविकसित स्थिति में रहती है। फलस्वरूप वे बहुत कुछ कर गुजरती हैं पर हमारी प्रतिगामी परिस्थितियां तो वैसा कुछ बन पड़ने का अवसर ही नहीं आने देतीं। जब तक यह स्थिति बनी रहेगी, मात्र पुरुषों को विकसित बनाने वाले सारे प्रयास अधूरे और असफल ही सिद्ध होते रहेंगे। यदि हमें सचमुच ही प्रगति की दिशा में आगे बढ़ना हो तो नारी को साथ लेकर ही चलना होगा। एकांगी प्रयास कभी भी सफल न हो सकेंगे।
नारी जागरण भारत की सबसे प्रथम और सबसे प्रमुख आवश्यकता है। इसकी पूर्ति के लिए विशालकाय और सरगामी कार्यक्रम बनाने पड़ेंगे। सरकारी स्कूलों में कन्या शिक्षा का प्रयास चल रहा है—महिला कल्याण के लिए भी सरकारी प्रयत्न हो रहे हैं आंसू पोंछने की दृष्टि से और आशा का दीपक संजोये रहने की दृष्टि से उनका भी कुछ न कुछ उपयोग ही है पर बात उतने भर से बनेगी नहीं हमें नारी जागरण का समग्र राष्ट्र को प्रभावित करने वाला—रचनात्मक कदम बढ़ाना पड़ेगा अन्यथा आधे राष्ट्र की सर्वतोमुखी प्रगति का अत्यन्त जटिल अतीव विस्तृत और अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न हजार वर्षों में भी हल न हो सकेगा। इसके लिए गैर सरकारी प्रयत्न ही प्रधान भूमिका सम्पन्न कर सकते हैं।
अमरीकी जनगणना विभाग द्वारा प्रकाशित नई रिपोर्ट के अनुसार उस देश में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। ये शारीरिक दृष्टि से भी पुरुषों की अपेक्षा अधिक स्वस्थ और सबल हैं और औसत अमेरिकी महिला—वहां के पुरुषों की तुलना में 7 वर्ष अधिक जीवित रहती हैं।
जन गणना के अनुसार अमेरिका की जनसंख्या 21 करोड़ है। इनमें प्रतिशत के हिसाब से पुरुष 95 और स्त्रियां 100 हैं पांच प्रतिशत स्त्रियां अधिक हैं। वे पुरुषों की तुलना में लगभग 1 करोड़ अधिक हैं।
उस सुसम्पन्न देश में स्वास्थ्य, सबलता, दीर्घ जीवन और संख्या की दृष्टि से महिलाएं पुरुषों से क्यों आगे बढ़ती चली जा रही हैं और क्रमशः क्यों पिछड़ते जा रहे हैं—इसका विचारकों ने यह बताया है कि अमरीकी पुरुष, सम्पन्नता के बाहुल्य का उपयोग विलासिता की वृद्धि में करता चला जा रहा है, उसकी आकांक्षा मात्र यह है कि किस प्रकार वासना और विलासिता के साधन जुटाने और उनके उपभोग में निरत रहने का अधिक से अधिक अवसर प्राप्त करे। इसी घुड़दौड़ में पुरुष समाज का ध्यान केन्द्रित है। शिक्षा, आजीविका, सुशासन, सुविधा के प्रचुर साधन होने के कारण अब उन्हें जीवन के किसी क्षेत्र में बड़ा संघर्ष नहीं करना पड़ता। निश्चिन्तता उत्पन्न करती है और कोई बड़ा लक्ष्य सामने न रहने पर मनुष्य व्यसन और व्यभिचार में अधिकाधिक निमग्न होता चला जाता है। उस देश के पुरुषों की मनःस्थिति और क्रिया पद्धति का ढलान अब इसी दिशा में बढ़ता चला जा रहा है।
प्रकृति का अकाट्य नियम सदा से यही रहता है कि पुरुषार्थी और संघर्षशील प्रगति करते हैं और विलासी गलते गिरते चले जाते हैं। इसी नियम के आधार पर उस देश के पुरुष क्रमशः अपना स्वास्थ्य, सौंदर्य, दीर्घ जीवन बल, पुरुषार्थ खोते चले जा रहे हैं। नारी को सन्तुष्ट करने योग्य काम शक्ति में भी ह्रास होने का रहस्योद्घाटन वहां की स्वास्थ्य अन्वेषी संस्थाओं ने किया है। उनका कहना है—मनःस्थिति पुरुषों की अधिक विचलित रहती है। जहां तक काम पुरुषार्थ का प्रश्न है, नारी की तुलना में नर की स्थिति क्रमशः दयनीय होती चली जा रही है।
संसार के सभी क्षेत्रों में नारी पीड़ित और पद दलित रही है। योरोप एवं अमेरिका भी इसके अपवाद नहीं हैं। शिक्षा और प्रगति शीलता की बढ़ोतरी ने नारी को नर की समानता का अवसर दिया है। उसका पूरा लाभ वहां की महिलाएं उठा रही हैं। वे अधिक सुयोग्य अधिक समर्थ बनने पर अपना ध्यान केन्द्रित किए हुए हैं। पुरुष के सहयोग का वे लाभ तो उठाती हैं पर उनकी गुलाम बनने से सर्वथा इन्कार करती हैं। पुरुष का लक्ष्य भले ही विलासिता बन गया हो पर वहां की नारी ने प्रगतिशीलता पर ही अपनी महत्वाकांक्षाएं केन्द्रित की हैं और उसी आधार पर अपनी रीति नीति निर्धारित की है। यही कारण है कि उनके दृष्टिकोण के अनुरूप प्रकृति उनकी सहायता कर रही है और वे क्रमशः हर क्षेत्र में अग्रणी बनती चली जा रही हैं। शिक्षा, शिल्प, विज्ञान, स्वास्थ्य, साहस, प्रगति हर क्षेत्र में वे पुरुषों की तुलना में अधिक सफलता प्राप्त कर रही हैं। प्रतियोगिता के हर अवसर पर पुरुष की तुलना में उस देश की नारी की सफलता का प्रतिशत क्रमशः बढ़ता ही चला जा रहा हैं।
जिन देशों में नारी को प्रगति के अवसर नहीं मिल रहे हैं और वह कड़े प्रतिबन्धों के बीच बाधित जीवन जी रही है वहां स्वभावतः पुरुषों की स्थिति अच्छी और नारियों की गई गुजरी है। मध्य पूर्व के इस्लाम धर्मानुयायी अपनी स्त्रियों पर पर्दा बुर्का आदि तरह तरह के प्रतिबन्ध लगाते रहे हैं। एक-एक पुरुष की बहुत सी स्त्रियां हरम में रखना और उनकी आकांक्षाओं पर प्रतिबन्ध लगाये रहना उस क्षेत्र की परम्परा जैसी बन गई है। यही कारण है कि उन देशों में स्त्रियों का स्वास्थ्य अपेक्षाकृत गिरा हुआ है। मृत्यु दर उन्हीं की बढ़ी चढ़ी है। साथ ही महिलाओं की संख्या घटती और पुरुषों की बढ़ती जाती हैं। हर पुरुष को विवाह करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है और गृहस्थी बसाने के लिए भारी जोड़-तोड़ मिलाने पड़ते हैं।
भारत में महिलाओं की मृत्यु संख्या पुरुषों की तुलना में अधिक है। वे ही अधिक कमजोर पाई जाती हैं और बीमार भी अधिक पड़ती हैं। उसका कारण नारी को बाधित और प्रतिबन्धित करने वाली सामाजिक कुरीतियां ही प्रमुख हैं। वे जब तक इसी रूप में बनी रहेंगी—स्वभावतः नारी को दयनीय स्थिति में ही पड़ी रहना पड़ेगा।
अमेरिका का उदाहरण यह सिद्ध करता है कि प्रगतिशीलता ही सफलताओं की जननी है। प्रकृति उन्हीं को आगे बढ़ाती है जिनमें उत्साह, साहस और पुरुषार्थ का उभार उठता है और महत्वकांक्षाएं बढ़ी चढ़ी रहती हैं। अमेरिकी नारी ने अपने को इस कसौटी पर वहां के पुरुषों की तुलना में अधिक अग्रगामी सिद्ध किया है फलस्वरूप उन्हें प्रकृति ने मुक्त हस्त से सहायता दी है और वे क्रमशः आगे को बढ़ती चली जाती हैं।
अगले दिनों नारी द्वारा विश्व का नेतृत्व किये जाने की सम्भावना इसीलिये अधिक है कि पद दलित वर्ग को अगले दिनों अनीति मूलक प्रतिबन्धों से छुटकारा पाने का अवसर मिलने ही वाला है। ऐसी दशा में वे अपने को सुविकसित एवं सुयोग्य वर बनाने का प्रयत्न करेगी फलस्वरूप प्रकृति का पूर्ण सहयोग भी उन्हें मिलेगा और विश्व के नव निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करेंगी।
पुरुष के हाथ में चिरकाल से सर्वतोमुखी शक्ति रही है। नारी का स्वत्व अपहरण करके भी उसी ने अपनी मुट्ठी में रखा है। पर उसका सदुपयोग नहीं किया वरन् अनीति मूलक रीति नीति ही अपनायी है। युद्ध, शोषण और उत्पीड़न में ही प्रायः इसका पुरुषार्थ नियोजित होता रहा है। प्रकृति को यह सहन नहीं। वह उसके हाथ से उतने समय के लिए सत्ता छीनने वाली है जब तक कि उसे वर्चस्व के सदुपयोग करने की बात समझ में न आ जाय।
विश्व सन्तुलन नारी के पक्ष में जा रहा है। अमेरिका में बढ़ता हुआ नारी वर्चस्व, उस प्रभात कालीन सूर्योदय के समान है जिसका प्रकाश क्रमशः अधिक प्रखर और अधिक व्यापक ही होने वाला है। हम देखेंगे कि समस्त विश्व में नारी किस प्रकार पिछड़ेपन से अपना पीछा छुड़ा कर प्रगतिशील बनती है और अपनी स्वाभाविक महानता को विकसित करके किस प्रकार विश्व में प्रेम और न्याय का शासन स्थापित करने में योगदान करती है। पुरुष के लिए यह उदाहरण आत्म चिन्तन करने और आत्म सुधार करने का अच्छा अवसर होगा।
नर नारी का संतुलित समन्वय ही मानव जाति का भविष्य उज्ज्वल करेगा। असन्तुलन दूर होना ही चाहिए। इसे प्रकृति किस प्रकार व्यवस्थित करने जा रही है इसका उभार हमें अमेरिका में देखना चाहिए। विश्व में उसी क्रम के विस्तार की आशा करनी चाहिए। पिछड़ता पुरुष भी आज नहीं तो कल आत्म-ग्लानि अनुभव करेगा और कुमार्गगामिता छोड़कर वह रीति नीति अपनायेगा जिसके आधार पर नर नारी दोनों ही भगवान के दांई-बांई भुजा के रूप में पारस्परिक सहयोग और सद्भाव का परिचय देते हुए सुखी समाज का सृजन कर सके।
दिन-दिन गिरती हुई नारियों की दशा देखकर जब उस पर विचार किया जाता है तो यही पता चलता है कि वह स्वार्थी पुरुषों द्वारा जाने-अनजाने एक लम्बे समय से छली जा रही है। नारी के प्रति बहुत से व्यवहार उसके विकास के विरुद्ध एक प्रकार के मोहक षड़यन्त्र जैसे लगते हैं जिसमें बेचारी अबोध अबला फंसती पिसती चली आ रही है और आज भी मुक्त नहीं हो पा रही है। कितना अच्छा हो कि पुरुष अपने स्वार्थ के लिए षड़यन्त्र करना बन्द कर दे जिससे कि समाज का यह अर्धांग भी विकसित एवं उन्नत हो सके।
अशिक्षा नारी के लिये एक षड्यन्त्र है जिसके आधार में ऐसी सुन्दर बातें बना रखी हैं जो देखने सुनने में नारी के लिये बड़ी हितकर तथा सद्भावना पूर्ण मालूम होती हैं कि—‘‘नारियों के लिये पढ़ना जरूरी नहीं। उन्हें कोई नौकरी-चाकरी तो करना नहीं, किसी घर की मालकिन बनना है। तब घर गृहस्थी का काम सीख लेना काफी है। पढ़ाई-लिखाई में सिर खपाने की क्या जरूरत।’’
‘‘कन्यायें जब तक घर गृहस्थी का काम-काज सीखकर तैयार होती हैं तब तक विवाह योग्य हो जाती हैं। ब्याह कर पराये घर चली जाती हैं। उन बेचारियों के पास इतना समय कहां कि वे घर गृहस्थी का काम सीखने के साथ-साथ पाठशाला भी जा सकें और शिक्षा में समय दे सकें।’’
विवाहिताओं के प्रति अशिक्षा के पक्ष में सहानुभूति दिखलाने और बहकाने के तर्क भी कुछ कम दिलचस्प नहीं होते। कहा जाता है। कि—‘‘वधुयें घर की शोभा और कुल की लाज होती हैं। उनका खुले आम बाहर निकलने का सस्तापन उनका गौरव घटाता है। पाठशाला जाने-आने में उन्हें बहुत कुछ बेपरदगी करनी होगी। घर का काम-काज छोड़कर पढ़ने जाना पड़ेगा और बाद में आकर घर का काम निपटाना होना जिससे दूना परिश्रम पड़ जायेगा, जिसका प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर अच्छा नहीं पड़ेगा और यदि दो एक बच्चे हुए तो पाठशाला के समय बेचारे मां के लिए रोते-बिलखते रहेंगे जिससे जननी और जात दोनों को मानसिक पीड़ा होगी।’’ जिससे उनकी जिन्दगी एक नीरस मन्त्र की तरह बनकर रह जाती है। आदि-आदि न जाने कितने तर्क उनकी शिक्षा के विरोध में दिये जाते हैं, जो कि बड़े ही लुभावने, सद्भावना पूर्ण और स्वयं नारी को लुभाने वाले हो सकते हैं।
यों तर्क देने की बात ही क्या। जब तर्क ही आधार हैं तब तो जिन्दगी को मौत और दिन को रात कहने के लिये अनेक लक्षणों को निकाला और दिखाया जा सकता है। किन्तु सत्य इनसे भिन्न होता है। वास्तविकता यह है कि वह नारी को अशिक्षित एवं अविकसित रखकर उसे उसके अधिकार एवं अस्तित्व का ज्ञान नहीं होने देना चाहता है कि वह उसे पशु की तरह जिस प्रकार बर्तता, लूटता और मिटाता आया है वैसी ही मनमानी आगे भी करता रह सके। शिक्षा नारी के मुख में जुबान, हृदय में भावना, बुद्धि में विचार और आत्मा में जागरण उत्पन्न कर देगी। तब ऐसी स्थिति में पुरुष की अनुचित मनमानी न चल पायेगी। नहीं तो सहनशीलता, सादगी, परिश्रम, दक्षता, कुशलता, सामंजस्य, शीलता आदि ऐसा कौन-सा गुण है जो कि शिक्षा द्वारा नहीं पाया जा सकता और इनके विपरीत ऐसा कौन-सा दुर्गुण हो सकता है जिसका समावेश अशिक्षा नहीं कर सकती। यह बात दूसरी है कि शिक्षा के विषय अनुकूलता, उपयुक्तता तथा उपयोगिता का विचार न रखा जाये और नारी के पल्ले उस प्रकार की शिक्षा-दीक्षा बांध दी जाये जो उसके अनुकूल एवं अनुरूप न हो। नारी के प्रति इस प्रकार का षड़यन्त्र बन्द किया जाये और अवसर दिया जाये तो वह अवश्य ही जपने अन्य कर्तव्यों की उपेक्षा किये बिना उसे ग्रहण कर लेगी और परिवार में अपनी विकसित शालीनता से गौरव की वृद्धि कर देगी।
नारी को बहु प्रजनन के व्यामोह में डालने के लिए कहा जाता है कि—‘‘यह कितनी भाग्यवान नारी है, इसके आठ सन्तान हैं। भगवान सबको ऐसा बनाये। घर में छः बहुयें और दो जमाई आयेंगे। घर जल्दी ही नाती-पोतों से भर जायेगा। कमाई उठाये धरते न बनेगी। एक बहू रोटी बनायेगी तो एक पैर दावेगी। कोई सिर में तेल लगायेगी तो कोई पंखा झलेगी। बच्चे सब पल जायेंगे आज का परिश्रम बुढ़ापे में सुख बन जायेगा। पलंग पर बैठी हुक्म चलायेगी। तिनका टारने की भी जरूरत न होगी। मरेगी तो नाती-पोतों के कन्धों जायगी ऐसी फली-फूली फुलवारी छोड़कर जाने वाली को स्वर्ग से लेने के लिये विमान आते हैं।’’ आदि-आदि न जाने कितनी बातें कहकर नारियों को बहु सन्तान के लिये प्रेरित किया जाता है। उन्हें अधिक सन्तानों से होने वाली हानियों तथा तकलीफों का अनुभव ही नहीं होने दिया जाता। इसका नतीजा यह होता है कि वह अधिकाधिक सन्तानों को परमात्मा की कृपा मानकर निषेधवती हो ही नहीं पाती और पुरुष की पाशविक प्रवृत्ति में बलिदान होती रहती है।
अकाल वृद्धा, बुझे रूप, ठले शरीर, जर्जर स्वास्थ्य, रुग्णा नारियां जो देखने में आती हैं वे सब अधिक प्रजनन की मारी हुई होती हैं। हाथ में शीशी, शिथिल चाल, सूखे ओंठ वधू के योग्य वस्त्र जिस श्वेत केशिनी को देखें समझ लें कि यह वह तरुणी हैं जो बहु सन्तान की सौभाग्य-वादिता के षड़यन्त्र में फंसी पुरुष की वासना की मारी अकाल वृद्धा है जो अशिक्षा, अज्ञान और अन्ध-विश्वास के कारण अपने अस्तित्व को भूली हुई अपने को इसी योग्य समझती है।
कितना जरूरी है कि नारी को बहु सन्तान की सौभाग्य शीलता के षड़यन्त्र से मुक्त कर स्वास्थ्यपूर्ण सुन्दर जिन्दगी जीने दिया जाये जिससे वह अपने स्वाभाविक सौन्दर्य एवं शारीरिक सौष्ठव को सुरक्षित रख सके और आदि से अन्त तक अकाल कंकाल के बजाय मानवी मालूम हो सके। परिवार नियोजन के पुण्य से उसे पवित्र किया जाये जिससे वह केवल दो सन्तानों को रुचि से पाल सके और अपने वात्सल्य को बिन्दु-बिन्दु बांटने के बजाय एक स्थान पर केन्द्रित कर उसका सुख ले सके और स्वस्थ सुयोग्य सन्तान की जननी होने का गौरव पा सके इसी में परिवार, समाज तथा राष्ट्र की भलाई है।
साहित्यकार और कलाकार उनमें भी विशेषकर कवि, कहानीकार तथा चित्रकार तो नारी पर कृपा करें ही। उनकी लेखनी और तूलिका नारी के जिस उद्दीपक रूप का चित्रण करने में संलग्न है वह राष्ट्र की जननी के प्रति इतना भीषण षड्यन्त्र है जो समग्र राष्ट्र के आमूल पतन का कारण बनता जा रहा है। यह स्पष्टोक्ति अतिशयोक्ति नहीं कही जा सकती कि नारी को विलासिनी और पुरुष को कामुक बनने के लिए बढ़ावा देने में इन लेखकों तथा आलेखकों का बहुत बड़ा हाथ है। श्रृंगारिक कवितायें, प्रेम-परक कथायें और उद्दीपक चित्रों ने तो नारी के पवित्र तप को ही छिपा डाला है। कवियों की उपमाओं रूपकों तथा अलंकारों, शशिमुखी, लवंगलता थिकवैनी, गजमामिनी, सुकुमारी, लाजवती, सुन्दरी, सुनमनी, प्रेयसी, प्रणयमती, प्राणप्रिया आदि के ठगोरे सम्बोधनों ने तो नारी की अकल ही काट दी है। उसे सुनहरे और जादू जैसे स्वप्नों में खोकर आत्म-विस्मृत ही कर दिया है जिनसे वह पुरुष की वासना के अधिकाधिक अनुकूल बनकर उपयोगी सर्वस्व को निरुपयोगी बनाती चली जा रही है। कथाकारों ने तो उसे प्रेम की उस मरुमरीचिका में भुलाया है जहां जाकर उसका फिर सुरक्षित लौटना सम्भव नहीं। वह पुरुष के उस भ्रामक तथा अव्यावहारिक प्रेम को पाने के लिए अपना कितना और क्या कुछ गंवाकर कैसी बनती जाये इसका विचार हृदय कंपा देता है।
शताब्दियों से नारी को इस तरह पददलित किया गया—पैरों तले रौंदा गया, उस पर तरह-तरह के बन्धन, प्रतिबन्ध लगाये गये और उसे घर की चहारदिवारी में ही काराबद्ध रखा गया। यह व्यवहार तो पशु के साथ ही किया जा सकता है। हालांकि उचित इसे भी नहीं कहा जा सकता। परन्तु यहां तक भी गनीमत थी। नारी की दुर्दशा और समाज में उसका पिछड़ापन भी किसी सभ्य समाज के लिए लज्जा की बात हो सकती है, पर हमारे देश में तो उससे भी एक कदम आगे बढ़कर उसके साथ आवारा पशु की तरह व्यवहार किया जाता है।
घरों में पालतू जानवर पाले जाते हैं। जब तक वे दूध देते हैं या घरों के लिए उसका उपयोग होता है तब तक तो उसे चारा पानी दिया जाता रहता है और जैसे ही वह फालतू हो जाता है उसे कसाई के हाथों बेच दिया जाता है। नारी के प्रति तो इससे भी गिरा हुआ दृष्टिकोण अपनाया जाता है। आये दिनों समाचार पत्रों में इस तरह के समाचार छपते रहते हैं कि अमुक स्थान पर अमुक स्त्री की हत्या कर दी गई और हत्या भी इतने नृशंस ढंग से कि क्रूर से क्रूर अत्याचारी, डाकू, बदमाश भी क्या करते होंगे। समाचार-पत्रों को यदि ध्यानपूर्वक पढ़ा जाय तो प्रत्येक अंक में एक दो समाचार ऐसे अवश्य मिलेंगे जिनमें किसी साधारण से कारण को लेकर गृहस्वामी ने गृहणी की हत्या कर दी।
यहां ऐसे ही कुछ समाचार संकलित कर प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें गृहणी की हत्या का एक ही ढंग अपनाया गया—मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा देना। ठीक उसी तरह जिस प्रकार कि किसी बेकार पड़े कूड़े के ढेर को मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा दी जाती है। इन घटनाओं के मूल में जायें तो ऐसे छोटे-छोटे कारण दिखाई देंगे जिनके लिए किसी की हत्या करना तो क्या निन्दा करना भी उचित नहीं लगता। उदाहरण के लिए सद्यः विवाहित दम्पति के प्रथम परिचय और प्रारम्भ के आकर्षण को ही लें जो किसी भी तरह अस्वाभाविक नहीं कहा जाता, परन्तु कुछ महीनों पूर्व इसी कारण भाई-बहिन दोनों के द्वारा अपनी भाभी की हत्या कर देने का समाचार अखबारों में प्रकाशित हुआ था।
घटना कोरबा (म. प्र.) के पास कोहड़िया गांव की है। जहां देवर और ननद दोनों ने मिलकर अपनी भाभी की हत्या कर डाली। बताया जाता है कि कोहड़िया निवासी सम्बन्धित परिवार में मृत महिला जिसका नाम कमला था—कुछ दिनों पूर्व ही ब्याह कर आयी थी। हत्या का कारण तो ज्ञात नहीं हो सका, पर चर्चा है कि नवविवाहित दम्पत्तियों की तरह कमला और उसके पति भी बड़े ही स्निग्ध स्नेहपूर्ण ढंग से प्रेमपूर्वक रहते थे। इस पर कमला की ननद और देवर ने महसूस किया कि उनकी भाभी ने उनके भाई पर जादू कर दिया है और इस कारण वह उनकी उपेक्षा करने लगा है। कह नहीं सकते कि हत्या का यही कारण रहा हो, परन्तु देवर और ननद ने मिलकर अपनी भाभी के कपड़ों पर मिट्टी का तेल छिड़क दिया और फिर आग लगा दी। कमला जोर से चीखकर बाहर भागी। लोगों ने उसकी चीख सुनी और उसके कपड़ों में आग लगी देखी तो आग बुझाने का प्रयत्न किया। आग तो बुझ गई पर वह महिला बुरी तरह घायल हो जल गयी थी। किसी राहगीर ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी। पुलिस ने घायल महिला को अस्पताल पहुंचाया। वह इतनी बुरी तरह जल गयी थी कि उपचार करने पर भी उसे बचाया न जा सका।
घर के दूसरे सदस्य ही स्त्री पर अत्याचार करते हों ऐसी बात भी नहीं है। पुरुष भी उसके साथ कोई मानवीयता बरतना आवश्यक नहीं समझते। पति की दृष्टि में वह जीवन साथी की अपेक्षा विलासिनी और भोग्या ही अधिक रहती है जिसके लिए हर स्थिति में अपने पति की इच्छा पूरी करना ही उसकी नियति है। फिर पति भले ही स्वयं घृणित जीवन जी रहा हो या कुमार्ग पर चल रहा हो। पति को तो उसका प्रेमपूर्ण अनुशासन तक सहन नहीं होता। उसके सुझाव परामर्श उसे अनुचित हस्तक्षेप लगते हैं तथा स्थिति ज्यादा बिगड़ती है तो वह मारपीट तक के लिए उतारू हो जाता है।
कुछ समय पूर्व एक पति ने अपनी पत्नी की केवल इसलिए हत्या कर डाली थी कि वह उसे दुराचारी जीवन जीने से अक्सर रोका करती थी। घटना मुजफ्फर जिले के फतेहाबाद गांव की है जहां एक 20 वर्षीय महिला की अमानुषिक ढंग से हत्या कर देने का समाचार पिछले दिनों अखबारों में प्रकाशित हुआ था। हत्या के बाद उस महिला के शव को नदी में बहा दिया गया ताकि पुलिस को पता न चले। बताया जाता है कि रात के सन्नाटे में उक्त महिला के हाथ पांव बांध दिये गये और उसके पति ने महिला के बदन पर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा दी। इस बीच अन्दर से घर के दरवाजे भी बन्द कर लिये गये थे, ताकि पड़ौसी घटना स्थल पर न पहुंचे। महिला के मुंह में कपड़ा भी ठूंस दिया गया ताकि वह शोर न मचा सके। बताया जाता है कि उस महिला का दाम्पत्य-जीवन पिछले कुछ महीनों से अत्यन्त कटु हो गया था क्योंकि उसके पति के कई स्त्रियों से अनुचित सम्बन्ध थे जिसका वह विरोध करती रहती थी। दुराचारी पति ने उसे अपने मार्ग से हटाने के लिए उसकी हत्या ही कर डाली।
अब कोई बताये कि ऐसी स्थिति में कोई स्त्री किस प्रकार पति के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन कर सकती है और सच्चे अर्थों में जीवन साथी की भूमिका निभा सकती है। जहां पति को अनैतिक मार्ग पर जाने से बचने की सलाह देना भी क्लेश का कारण बन जाये और मारपीट से लेकर हत्या तक की नौबत आ जाय वहां नारी का दर्जा कितना गिरा हुआ होगा यह कहने-सुनने की अपने आसपास के जीवन में ही देखने की बात है क्योंकि चर्चा जिस समाज की की जा रही है वह अपना ही समाज है। अपने उसी समाज में नारी के साथ यह नृशंसता और क्रूरतापूर्ण बर्ताव किया जाता है। जहां के ऋषियों ने गाया है कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता’।
लेकिन अपने इस समाज में नारी की नहीं उसके साथ आयी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। यह देखा जाता है कि विवाह के बाद कोई युवती अपने साथ कितना दान-दहेज लायी है। विवाह का आधार जीवन साथी की आवश्यकता पूरी करना नहीं वधू पक्ष से अधिक से अधिक रकम ऐंठ लेना ही बन गया है और उसकी सफलता इसमें नहीं समझी जाती कि पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति कितना सामञ्जस्य तथा प्रेम भाव विकसित कर पाते हैं वरन् यह समझा जाता है कि विवाह के बाद भी कौन पत्नी अपने मायके से कितना धन लाने में सफल होती है। कम दहेज मिलने के कारण वधू को ताने मारना, उसके मायके वालों पर व्यंग करना तो जैसे आम बात हो गयी है। कई बार तो कम दहेज मिलने के कारण बहू की हत्या तक कर दी जाती है। उसे नृशंसता पूर्वक जला देने की घटनाएं आये दिनों समाचार पत्रों में छपती हैं।
गंगानगर के पास पीली बंगा निवासी बनवारीलाल सुनार के पुत्र श्री किशनलाल का विवाह जुलाई 75 में चन्दूराम की लड़की सुलोचना के साथ हुआ था। विवाह के समय लड़के के पिता ने दहेज में जेवर, कपड़े के अलावा 5 हजार 1 सौ 1 रुपये नकद की मांग की। लड़की के बाप ने लड़की की खुशी के लिए अपना खेत बेच दिया और दो हजार 1 सौ रुपये टीके की रस्म अदायगी, पर ही दिये। विवाह के समय जेवर कपड़ा और अन्य सामान के साथ विदाई के समय जब एक हजार रुपये थाली में रखकर उसने लड़के के बाप को दिये तो वह नाराज हो गया। बड़ी मुश्किल से कन्या पक्ष ने समधियों को राजी किया और हाथ-पैर जोड़कर चार हजार एक सौ एक रुपये बाद में देने का वायदा किया तब जाकर बारात विदा हुई।
बताया जाता है कि ससुराल में लड़की को रोज ही कम दहेज मिलने के लिए तंग किया जाता था। उसका पति किशन लाल अपने मां-बाप के सामने ही अपनी पत्नी को बुरी तरह मारता-पीटता और सुलोचना के सास-ससुर यह सब चुपचाप देखते रहते। एक बार उन लोगों ने उसे घर से भी निकाल दिया, पर पड़ौसियों द्वारा समझाने बुझाने पर उसे फिर रख लिया। लेकिन कुछ दिनों बाद ही उसकी ससुराल वालों ने उसे खूब मारा पीटा और रात के समय ही घर से बाहर निकाल दिया। सुलोचना उस समय गर्भवती थी। वह रात भर बाहर पड़ी रही और किसी तरह दूसरे दिन अपने पीहर पहुंची। लड़की के बाप ने फिर उसके सास-ससुर से बड़ी मिन्नतें कीं और तब वे लड़की को दूसरी बार फिर से रखने के लिये राजी हो गये।
इसके बाद बताया जाता है कि 11 सितम्बर 1976 को लड़की के पति और सास ने फिर उसे बुरी तरह मारा तथा उसके सारे जेवर उतार लिये गये। उसी रात लगभग डेढ़ बजे वह सो रही थी तो उसके पति, सास, ससुर, और देवर चारों ने मिलकर उस पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी। उसकी चीख सुनकर पड़ौसी जागे और घटना स्थल पर पहुंचे। उस समय तो आग बुझा दी गयी और लड़की को अस्पताल पहुंचाया गया, परन्तु अस्पताल में कई महीने तक तड़पने के बाद उसने दम तोड़ दिया।
विवाह में कम दहेज लाने के कारण यह आशा की जाती है कि स्त्री अपने मायके से और धन लाये। मुंह मांगी रकम न मिलने के कारण किसी बहू को किस प्रकार सताया जाता है और ससुराल वाले उसकी जान के ग्राहक किस प्रकार बन जाते हैं यह उपरोक्त घटना में देखा गया। परन्तु कई प्रकार मात्र इसी कारण वर्तमान पत्नी से छुटकारा पाकर नया ब्याह रचाने तथा दूसरी शादी कर दहेज में फिर से मोटी रकम पाने के दुःस्वप्न भी देखे जाते हैं। यहां तक कि पहली पत्नी की हत्या कर देने में भी कोई झिझक नहीं होगी। गंगा नगर में ही घटी इसी तरह की एक घटना से कुछ समय पहले घटी बताते हैं कि रेशमारानी नाम की लड़की का विवाह एक अच्छे परिवार में सम्पन्न हुआ था। वह स्वयं भी खाते-पीते परिवार में पली बढ़ी थी और विवाह के समय वरपक्ष द्वारा उसके माता-पिता से दहेज में ढेरों साज सामान के साथ-साथ स्कूटर भी मांगा गया। दहेज में पहले ही इतना कुछ दिया जा चुका था कि उसके बाद कुछ और देने से परिवार पर असह्य आर्थिक दबाव पड़ता था। फिर भी वह कन्या पक्ष अपना वायदा पूरा करने के लिए जी तोड़ कोशिश करता रहा। वायदा पूरा होने में देरी होते देख ससुराल पक्ष बालों ने यह समझ लिया कि रेशमा के माता-पिता स्कूटर नहीं देना चाहते। इसी से उन्होंने रेशमा को जिन्दा जला दिया। बताया जाता है कि इस हत्या के पीछे दूसरा विवाह कर मोटी रकम प्राप्त करना भी एक था।
गृहणियों की हत्या का उद्देश्य चाहे पर्याप्त दहेज न मिलना रहा हो अथवा बाद में मायके से अपने पति की मांग पूरी न कर पाना रहा हो गृहणी द्वारा पति के व्यक्तिगत जीवन में उचित किन्तु अनपेक्षित हस्तक्षेप करना रहा हो अथवा पत्नी का सुन्दर और उसकी चमड़ी का सांवलापन रहा हो। कारण चाहे जो भी रहा हो परन्तु उपरोक्त घटनाएं हमारे समाज में नारी की स्थिति का चित्रण करने में पूरी तरह सटीक और प्रतिनिधि घटनाएं हैं।
समाचार पत्रों में आये दिन छपने वाले ऐसे समाचारों पर एक निगाह दौड़ाई जाय जिनमें छोटे-छोटे कारणों को लेकर नारी को उत्पीड़न किया गया तो पता चलेगा कि उसकी हमारे समाज में क्या स्थिति है। स्थिति का अच्छा या बुरा होना तो दूर रहा उसे हर घड़ी सन्देह तथा अविश्वास की दृष्टि से देखा जाता है। वातावरण और संसर्ग दोष से कितने ही व्यक्ति पथ-भ्रष्ट हो जाते हैं। यह भी एक तथ्य है कि नारी की अपेक्षा पुरुष ही अधिक पथ भ्रष्ट होते है और दाम्पत्य जीवन की एकनिष्ठ मर्यादा को तोड़कर उच्छृंखल स्वतन्त्र आचरण करते हैं। पुरुषों में जितनी कामुकता और लम्पटता देखने को मिलती है उसका तो एक अंश भी नारी में शायद ही कहीं देखने को मिले। फिर भी नारी को सदैव शंका और अविश्वास की दृष्टि से देखा जाता है।
पर्दा, प्रथा, घर तक ही सीमित रहने के प्रतिबन्ध और लोक लाज की तथाकथित मर्यादायें नारी के लिए ही बनीं। इसका एक कारण यह था कि उस पर अविश्वास किया जाता रहा। बेचारी नारी ने इन प्रतिबन्धों को मर्यादा मानकर सहज रूप से स्वीकार भी कर लिया, फिर भी उस पर सन्देह रखना बन्द नहीं किया गया। आये दिनों समाचार पत्रों में ऐसी घटनायें प्रकाशित होती रहती हैं, जिनमें आनुमानिक सन्देह के कारण ही किसी को घर से बाहर निकाल दिया गया अथवा उसका बुरी तरह उत्पीड़न किया गया। यहां तक कि उसे जान तक से मार डालने के समाचार भी प्रकाश में आते रहते हैं।
अभी कुछ महीनों पूर्व नवभारत टाइम्स में छपे एक समाचार के अनुसार अपनी पत्नी के चाल चलन पर सन्देह करने के कारण सीलमपुर (नयी दिल्ली) रघुवीर नामक युवक ने उसे विष देकर मार डाला। रघुवीर ने अपनी पत्नी सन्तोष को दरियागंज ले जाकर वहां विषपान कराया। विष उसे धोखे से खिलाया गया था और जब सन्तोष के प्राण पखेरू उड़ गये तो उसके शव को स्कूटर पर लाद कर रघुवीर निजामुद्दीन इलाके के रिजरोड पर लाया और सड़क के किनारे मिट्टी में दबा दिया। पत्नी की हत्या करने और उसका शव दबा देने के बाद उसकी आत्मा कचोटने लगी और वह विक्षिप्त-सा होकर निरुद्देश्य ही सड़क पर घूमने लगा। पुलिस के एक सिपाही को शक हुआ तो उसने टोका। इस पर रघुवीर हड़बड़ा उठा। पुलिस सिपाही को सन्देह हुआ तो उसने जोर देकर पूछा अन्ततः रघुवीर ने अपना अपराध उगल दिया और कहा कि उसे सन्तोष के चाल-चलन पर सन्देह था।
चरित्र पर सन्देह को लेकर पत्नी का उत्पीड़न करने उसे यातनायें देने की घटनायें तो इतनी हैं कि लगता है पुरुष चारित्रिक सन्देह का तो केवल बहाना भर बनाते हैं अन्यथा स्त्री को प्रताड़ित करना, उसे यातनाएं देना, कष्ट पहुंचाना जैसे उसके स्वभाव के ही अंग हैं, अन्यथा परिवारों में छोटी-छोटी बातों को लेकर कलहपूर्ण वातावरण नहीं बना रहता।
बाहर से कोई अपने पारिवारिक जीवन में कितना ही सुखी सन्तुष्ट क्यों न दिखाई दे, परन्तु औसत परिवारों में जिस प्रकार का वातावरण रहता है, उससे असन्तोष ही झलकता है। यदि ऐसा न रहा होता तो परिवारों में स्वर्ग का सा वातावरण—सुख-सन्तोष छाया रहता। पारिवारिक वातावरण में क्लेश कलह का विष घोलने के लिए भी अधिकांशतः पुरुष ही जिम्मेदार हैं। सब्जी में नमक कम है, दाल कच्ची रह गयी है, कुर्ते के बटन टूटे हुए हैं, बच्चे धूल मिट्टी में खेल रहे हैं जैसी छोटी-छोटी बातों को लेकर पति अपनी पत्नी पर जिस तरह बरस पड़ता है, उससे लगता है कि पत्नी पुरुष की जीवन संगिनी—अभिन्न सहचरी नहीं उसकी खरीदी हुई दासी और गुलाम है।
कई बार तो स्थिति ऐसी बन जाती है कि स्वभाव से सम्वेदनशील महिलायें उन्हें सहन नहीं कर पातीं और अन्दर ही अन्दर टूट जाती हैं। परिवार के सभी सदस्यों को सन्तुष्ट रखने का गम्भीर दायित्व और फिर ऊपर से ताने उलाहने भरा पति का व्यवहार उसके व्यक्तित्व को ही खोखला कर देता है। इन सब बोझों से लदी असामान्य रूप से थकी हुई चिड़चिड़ी, उदास और निराश स्त्रियों की एक बड़ी संख्या है। इन असह्य परिस्थितियों में कई बार तो स्त्रियां आत्म-हत्या तक कर लेती हैं।
थाना बारहदरी (बरेली) के हजियापुर क्षेत्र के श्री नत्थूलाल की पत्नी श्रीमती जमुना ने रात के समय जबकि घर के सब लोग सो रहे थे तब अपने शरीर पर मिट्टी का तेल छिड़क लिया और कपड़ों में आग लगाकर आत्महत्या कर ली। जमुना ने आत्महत्या क्यों की इसका तो कुछ पता नहीं चल सका है कि कुछ दिनों से पति-पत्नी में काफी झगड़ा होता रहता था और पति उसके साथ मारपीट भी कर बैठता था।
गृह कलह और मनमुटाव के कारण भी स्त्रियों की हत्या कर दी जाती है। कुछ समय पूर्व मथुरा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री विक्रम सिंह ने मोहल्ला कटौती कुआं के कारे नामक व्यक्ति को उसकी पत्नी रामश्री की हत्या के आरोप में आजन्म कठिन कारावास के दण्ड का आदेश दिया था। अभियोग के अनुसार कारे ने 22-23 अक्टूबर 72 की रात को लगभग सवा बारह बजे अपनी पत्नी को एक कोठरी में बन्द कर ईंटों से मार-मार कर हत्या कर दी। वह बेचारी चीखती रही और तड़पती रही। लोगों ने दरवाजा खुलवाकर रामश्री को बचाने के भरसक प्रयास किये किन्तु कारे ने रामश्री को प्राणहत कर ही दम लिया, फिर भी उसने दरवाजा नहीं खोला। अन्ततः कोतवाली पुलिस ने कोठरी के जंगले तोड़कर कारे को रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया।
छोटी-छोटी बातों को लेकर नारी पर कितने नृशंस अत्याचार किये जा सकते हैं—इसकी छोटी-सी झांकी ऊपर की पंक्तियों में दिखाई देती है। किसी विचारक ने भारत में नारियों की स्थिति का विश्लेषण करते हुए बड़े ही मार्मिक स्वरों में पूछा था—‘क्या कारण है कि रसोईघर में होने वाली दुर्घटनायें हों, अथवा घर से बाहर होने वाली हत्या या आत्म हत्याओं में स्त्रियां ही इनका शिकार क्यों होती है?
उत्तर एक ही है कि नारियों पर जरा-जरा सी बातों के लिए झूठे और नृशंस जुल्म ढाये जाते हैं उन्हें सताया जाता है। अपने देश में प्रचलित विवाह परम्पराओं को ही लें। किसी ने ठीक ही कहा है कि भारत में लड़कियों के साथ नहीं, लड़कियों के माता-पिता से मिलने वाले उपहार, दहेज से ही विवाह किया जाता है। भारतीय पुरुष अपनी जीवन संगिनी से भी अधिक उसके द्वारा लाये जाने वाले उपहारों को अधिक महत्व देते हैं। तभी तो अधिक दहेज न मिलने के कारण कम दहेज लाने के कारण भारतीय गृहिणियों को बुरी तरह सताया जाता है। कुछ दिनों पूर्व की ही घटना है जब मुजफ्फर नगर की एक विवाहिता लड़की की दिल्ली में सन्देहास्पद स्थिति में मृत्यु हुई। इस लड़की का विवाह एक वर्ष पूर्व दिल्ली के ही एक इन्जीनियर कॉलेज के प्राध्यापक से हुआ था।
अपनी बेटी की आकस्मिक मृत्यु की सूचना पाकर लड़की के पिता ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करायी और यह आरोप लगाया कि उसकी धेवती का जन्म होने के पश्चात् ससुराल वालों ने लड़की पर इस कारण अत्याचार किया कि उसके पिता ने जन्म होने पर अधिक सामान क्यों नहीं भेजा था। लड़की के पिता ने यह भी आरोप लगाया कि उसकी लड़की को इस कारण काफी सताया गया और उसके कपड़ों पर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा दी गयी तथा उसे जल जाने के बाद अस्पताल भेजा गया जहां तड़प-तड़प कर उसने दम तोड़ दिया। लड़की के पिता को इसकी कोई सूचना नहीं दी गयी।
अपनी पुत्री की इस प्रकार हुई मृत्यु से—दुखी पिता ने यह भी आरोप लगाया कि उसका दामाद सौ पचास रुपयों के लिए भी उसे सताता रहता था जबकि उसकी लड़की एम. ए. पास थी और बहुत सुन्दर तथा सुशील थी तथा उसने अपनी बेटी के विवाह में लगभग 35 हजार रुपया खर्च किया था। कहा जाता है कि इस लड़की के पति ने कई बार उसे मार डालने की भी धमकी दी थी इस आशय के पत्र पुलिस उप-अधीक्षक को दिखलाये गये हैं। उक्त प्राध्यापक के बड़े भाई के बारे में भी ऐसा ही समाचार मिला है कि उसने भी अपनी पहली पत्नी को छोड़कर जिसके दो बच्चे हो गये थे, दूसरा विवाह कर लिया है। कहा जाता है कि यह प्राध्यापक भी पुनः विवाह कर 40-50 हजार रुपये प्राप्त करने का इच्छुक था।
नई पीढ़ियां माता के पेट से ही पैदा होती हैं—घर परिवार का वातावरण महिलायें ही बनाती हैं—संस्कार, स्वभाव और चरित्र का प्रशिक्षण घर की पाठशाला में ही होता है परिवार का स्नेह सौजन्य पूरी तरह स्त्रियों के हाथ में रहता है यदि नारी की स्थिति सुसंस्कृत सुविकसित स्तर की हो तो निस्सन्देह हमारे घर-परिवार स्वर्गीय वातावरण से भरे-पूरे रह सकते हैं, उसमें रहने वाले लोग कल्पवृक्ष जैसी शीतल छाया का रसास्वादन कर सकते हैं। हीरे जैसे बहुमूल्य रत्न किन्हीं विशेष खदानों से निकलते हैं पर यदि परिवार का वातावरण परिष्कृत हो तो उसमें से एक से एक बहुमूल्य नवरत्न निकलते रह सकते हैं और उस सम्पदा से कोई देश समाज, समुन्नत स्थिति में बना रह सकता है। देश की आधी जनसंख्या नारी है, यदि वह पक्ष दुर्बल और भारभूत बनकर रहेगा तो नर के रूप में शेष आधी आबादी की अपनी भारी शक्ति उस अशक्त पक्ष का भार ढोने में ही नष्ट होती रहेगी। प्रगति तो तभी सम्भव थी जब गाड़ी के दोनों पहिये साथ साथ आगे की ओर लुढ़कते। एक पहिया पीछे की ओर खिंचे दूसरा आगे की ओर बढ़े तो उससे खींचतान भर होती रहेगी हाथ कुछ नहीं लगेगा। प्रगतिशील देशों में नारी भी नर के कन्धे से कन्धा मिलाकर आगे बढ़ने की—अपने देश को आगे बढ़ाने की सुविकसित स्थिति में रहती है। फलस्वरूप वे बहुत कुछ कर गुजरती हैं पर हमारी प्रतिगामी परिस्थितियां तो वैसा कुछ बन पड़ने का अवसर ही नहीं आने देतीं। जब तक यह स्थिति बनी रहेगी, मात्र पुरुषों को विकसित बनाने वाले सारे प्रयास अधूरे और असफल ही सिद्ध होते रहेंगे। यदि हमें सचमुच ही प्रगति की दिशा में आगे बढ़ना हो तो नारी को साथ लेकर ही चलना होगा। एकांगी प्रयास कभी भी सफल न हो सकेंगे।
नारी जागरण भारत की सबसे प्रथम और सबसे प्रमुख आवश्यकता है। इसकी पूर्ति के लिए विशालकाय और सरगामी कार्यक्रम बनाने पड़ेंगे। सरकारी स्कूलों में कन्या शिक्षा का प्रयास चल रहा है—महिला कल्याण के लिए भी सरकारी प्रयत्न हो रहे हैं आंसू पोंछने की दृष्टि से और आशा का दीपक संजोये रहने की दृष्टि से उनका भी कुछ न कुछ उपयोग ही है पर बात उतने भर से बनेगी नहीं हमें नारी जागरण का समग्र राष्ट्र को प्रभावित करने वाला—रचनात्मक कदम बढ़ाना पड़ेगा अन्यथा आधे राष्ट्र की सर्वतोमुखी प्रगति का अत्यन्त जटिल अतीव विस्तृत और अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न हजार वर्षों में भी हल न हो सकेगा। इसके लिए गैर सरकारी प्रयत्न ही प्रधान भूमिका सम्पन्न कर सकते हैं।

