विषमता की यह विकृति अब समाप्त होनी चाहिए
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भारतीय महिलाओं का एक विराट् रूप है और उसके अन्दर अनेक विषमतायें भरी हुई हैं। इस देश में जो कुछ एक महिला को सुलभ है, उसकी झलक दूसरे वर्ग की महिला को सुलभ भी नहीं होती।
महिलाओं का एक बड़ा वर्ग सड़क पर मेहनत-मजदूरी कर अपना जीवन गुजार लेता है। उनके बच्चे किसी वृक्ष की छाया में धरती-मां की गोद में बड़े होते हैं। वे सुबह से शाम तक जीविकोपार्जन करने में लगी रहती हैं। गरीबी से घिरा उनका जीवन उनके बच्चों का विकास होने को रोक देता है। भारत के वे फूल खिलने से पूर्व ही मुरझा जाते हैं। उन्हें कहां फुर्सत कि वे उनके स्वास्थ्य पर ध्यान दे सकें। स्वास्थ्य के नियमों का जानना तो दूर रहा, वे यह भी नहीं जानतीं कि मक्खी व मच्छरों से उनको क्या हानि होती है।
उनको तुम्हारी दुनिया से कोई मतलब नहीं, चाहे आबादी इससे चौगुनी हो जावे। एक बार एक महिला से पूछा गया कि आपके कितने बच्चे हैं? उसने कहा—9 बच्चे हैं और 10वां होने वाला है। उस पढ़ी-लिखी महिला ने उसके सामने आबादी बढ़ने तथा भारत की गरीबी का चित्र खींचा। उसको परिवार-नियोजन केन्द्र द्वारा बच्चे बन्द करने के उपाय भी समझाये गये लेकिन उसे यह सब सुनकर आश्चर्य हुआ। इन सबसे वे पूर्ण अनभिज्ञ पाई गई। उन्होंने कहा—हमारा हर बच्चा काम करता है, हमें तो हाथों की आवश्यकता है। उनका कर्त्तव्य केवल बच्चों को जन्म देने तक ही सीमित होकर रह गया है।
इस प्रकार उनका जीवन स्वाभाविक ढंग से बीत जाता है। उन्हें शायद कभी कोई तकलीफ ही महसूस नहीं होती और न शायद यह अहसास होता है कि उनके जीवन में आधुनिक-जीवन के साधनों का कितना अभाव है?
दूसरी तरफ गांवों में कुछ सम्पन्न-घर की महिलाएं भी होती हैं, जो पढ़ी-लिखी तो नहीं होतीं, लेकिन पहनने ओढ़ने के ढंग से आप अनुमान लगा सकते हैं कि वे आधुनिक बहिरंग रूप से परिचित हो चुकी हैं। यदि उनके गांव में कभी कोई पढ़ी-लिखी महिला सभा आदि का आयोजन करें तो वे अच्छे कपड़े पहनकर पाउडर आदि लगाकर ही पहुंचेगी। यह जागरुकता बहुत ही कम है और वह भी सन्तोष प्रद नहीं।
यह तो हुआ ग्रामीण दृश्य, शहरों में हमें दूसरी तरह की झांकी देखने को मिलती है। शहर के सम्पन्न परिवारों के अतिरिक्त मध्यम वर्ग या निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों में जागृति अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में दिखलाई देती है। वे अपने बच्चों को शाला तथा पति को कार्य पर भेजने के बाद शीघ्रता से घर के काम-काज समेट कर, मुस्तैदी से बाहर के काम कर अपने पति को मदद देतीं हैं।
इसके अतिरिक्त युवा पीढ़ी की जागरुकता शिक्षा के विकास के साथ-साथ बढ़ रही है। हजारों की संख्या में कॉलेज जाने वाले छात्राओं को यह अहसास तो अवश्य होता है कि दुनियां कैसी है, देश कैसा है, क्या बन रहा है और क्या बनेगा? लेकिन उसके बनाने में यह युवा-पीढ़ी कितना योगदान कर सकती है, इससे वे अनभिज्ञ हैं। वे आधुनिकता का नकली मुखौटा पहने हुए हैं। स्वाधीन-भारत की सच्ची नारी के रूप से वे कोसों दूर हैं। इनका अन्तरंग, उन दैवी गुणों से, जिसे हम शालीनता, शिष्टता, नम्रता, कर्तव्य-निष्ठा के नाम से पुकारते हैं, बिल्कुल ही रिक्त है। इनकी शिक्षा केवल अक्षर-ज्ञान पर टिकी हुई है। अतः वे कर्तव्यों से शून्य जीवन जीने की आदी होती जा रही हैं। उनका दृष्टिकोण व्यक्तिवादी ही बनता जा रहा है। उनकी दुनिया परिवार तक ही सीमित रहकर छोटी होती जा रही है। यह देश के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
अब अन्य उच्च पदों पर कार्य करने वाली महिलाओं पर भी दृष्टि डालें। एक विशिष्ट व्यक्तित्व की महिला इस प्रजातन्त्र-देश की प्रधानमन्त्री है। श्रीमती भण्डारनायके के बाद विश्व के प्रजातान्त्रिक इतिहास में श्रीमती इन्दिरा गांधी दूसरी महिला हैं, जिन्हें प्रधानमन्त्री का पद प्राप्त हुआ। कई महिलाएं संसद के वरिष्ठ पदों पर हैं, कई हाई कोर्ट की जज, बड़ी-बड़ी वकील-बैरिस्टर महिलाएं राजदूत आदि हैं लेकिन भारत जैसे विशाल देश में ऐसी महिलाएं नगण्य के बराबर ही हैं।
इसका अर्थ यह हुआ कि देश स्वतन्त्र हुआ। स्वतन्त्रता की ज्योति का प्रकाश भी बिखरा, पर उस प्रकाश ने सबको बराबर रोशनी नहीं दी।
अन्त में भारत की उन महिलाओं का वर्ग भी आता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी के संस्कारों में जकड़ी हुई हैं। वे आधुनिक युग से बहुत दूर हैं। वे अपनी रूढ़िवादिताओं को छोड़ने को किसी मूल्य पर भी तैयार नहीं इसीलिए जो बच्चे आधुनिक-शिक्षा पा रहे हैं, उनके बीच और उनकी पहिले की पीढ़ी में बड़ा अन्तर होता जा रहा है। मां और बेटी में अन्दर ही अन्दर अलगाव बढ़ता जा रहा है। बेटी अपनी मां के साथ उस तरह का सम्बन्ध चाह कर भी स्थापित नहीं कर पाती, जिसमें एकत्व हो। इसका मुख्य कारण यह है कि एक ओर जहां लड़कियों को शिक्षा दी जा रही है, उनके माता पिता को शिक्षित बनाने का इन्तजाम नहीं किया जा रहा है।
इतनी विषमताएं अन्य देशों की नारियों में नहीं पाई जाती हैं। लेकिन भारत में यह परिवर्तन का चक्र घूम रहा है। इन विषमताओं के मिटाने का आधार सही शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार ही हो सकता है। इसलिए हमें शिक्षा का रूप बदलना पड़ेगा। शिक्षा ऐसी हो जो भारतीय-नारी के अन्तरंग को आलोकित कर सके—उसमें उसके दैवी-गुणों को विकसित कर सके। वे अपने ज्ञान के प्रकाश को केवल भारतीय-नारियों में ही नहीं, विश्व की नारियों में बिखेर दें।
इससे भारत में ही नहीं, विश्व में भी सुख व शान्ति का साम्राज्य फैल जावेगा।
प्रस्तुत अवगति के कारणों पर विचार करते हैं, तो उनमें सबसे अधिक भयावह भूल यह प्रतीत होती है कि अपनी ही कुल्हाड़ी से अपना ही आधा अंग क्षत-विक्षत करके रख दिया। आधी शक्ति नर की और आधी नारी की है। आधी शक्ति को असमर्थ बना दिया जाय तो शेष आधी को ही शेष सारा भार वहन करना पड़ेगा। अक्षम न होने पर आधी शक्ति जो काम कर सकती थी, उससे वंचित रहना पड़ेगा। समुन्नत नारी कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करती—पैर से पैर मिला कर चलती तो प्रगति की मंजिल कितनी आसान रहती।
हमारी भूलों में यह सबसे अग्रणी, सबसे भारी और सबसे अधिक दुखदायी है कि नारी को ऐसे बन्धनों में बांधने की चेष्टा की गई जो मनुष्य के मौलिक अधिकारों का अपहरण और हनन करते हैं। अपने साथ अनीति बरतना प्रकारान्तर से आत्म-हत्या ही है। नारी और नर दो वर्ग-दो पक्ष नहीं हैं, एक ही चेतना के, एक ही सत्ता के दो अविच्छिन्न पहलू हैं, दोनों को समान रूप से विकसित होने देना ही श्रेयस्कर है। न मालिकी श्रेयस्कर है न गुलामी हितकर है। यह सहकारिता का युग है। इसमें सहयोग की गरिमा एक स्वर से स्वीकार कर ली गई है और यह समझ लिया गया है कि सहयोग स्वेच्छा से ही हो सकता है।
समुन्नत देशों में जहां भी नारी को मनुष्योचित अधिकार मिले हैं, वहीं वह पुरुष के कन्धे से कन्धा मिलाकर काम कर रही हैं, किन्तु भारत में नारी समाज आज भी नितान्त पिछड़ी हुई स्थिति में पड़ा है। पिछड़ी हुई नारी, नर के लिए किसी भी क्षेत्र में सहायक न हो सकेगी। भारत में यह प्रयोग दीर्घकाल तक हो चुका और वह सर्वथा हानिकारक सिद्ध हुआ, अब उस प्रचलन को बनाये रखने में कोई बुद्धिमानी नहीं है।
यूगोस्लेविया की महिलायें उस देश की पूरी कृषि व्यवस्था संभालती हैं। पुरुष फौज, पुलिस, दफ्तर, कारखाने संभालते हैं। कृषि, पशुपालन में उन्हें कोई श्रम या हस्तक्षेप नहीं करना पड़ता चीन, रूस आदि श्रम निष्ठ देशों में जाकर देखा जाय तो पता चलेगा कि पारिवारिक और राष्ट्रीय सम्पदा सुरक्षा और सुख-सुविधा बढ़ाने में वे कितना बड़ा योगदान दे रही हैं। रूस की शिक्षा व्यवस्था का अधिकांश उत्तरदायित्व महिलायें ही वहन करती हैं। शिक्षा संस्थाओं में पुरुषों की संख्या बहुत ही कम दिखाई पड़ेगी। अस्पतालों एवं स्वास्थ्य संस्थाओं का उत्तरदायित्व भी प्रायः उन्हीं का है। डॉक्टर, कम्पाउण्डर नर्स आदि का कार्य करती हुई महिलायें ही देखी जायंगी, पुरुष तो जहां-तहां ही दृष्टिगोचर होंगे।
जापान की महिलायें उद्योग-धन्धों के विकास में पुरुषों के कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करती हैं। घर-घर में लगे, छोटे कुटीर-उद्योगों में संलग्न रहकर वे अपने समय का उपयोग घर परिवार को और समूचे राष्ट्र को सम्पन्न बनाने में करती हैं। जर्मनी में कल-कारखानों को संभालने में महिलायें पुरुष इन्जीनियरों, कारीगरों एवं व्यवस्थापकों से घटिया नहीं बढ़िया ही सिद्ध होती हैं। इंगलैण्ड, फ्रांस, कनाडा, अमेरिका में दुकानें चलाने में महिलाओं की प्रमुखता है।
नाट्य, अभिनय, चलचित्र क्षेत्रों में उन्हीं का वर्चस्व है, अवसर न मिले तो बात दूसरी है अन्यथा साहित्य सृजन में उनकी सहज क्षमता को पुरुष चुनौती नहीं दे सकता। कवि और चित्रकार जब भी उन्हें बनने दिया गया है उन्होंने अपनी वरिष्ठता ही सिद्ध की है। मूर्तिकार तो वे अद्वितीय हैं। पत्थर की नहीं वे प्राणवान प्रतिमाएं अपने शरीर की प्रयोगशाला में बनाकर प्रस्तुत करती हैं। उनके समान मूर्तिकार, चित्रकार, कलाकार कौन हो सकता है? उनसे अधिक आकर्षक सुन्दर, कलात्मक, कोमल कलाकृति इस संसार में दूसरी नहीं है। परमेश्वर ने अपना सारा दृश्यमान और चेतनात्मक सौन्दर्य उसी में उड़ेल दिया है।
नारी को विश्वस्त मित्र और सम्मानास्पद स्वजन का स्थान मिलना चाहिये। उसे प्रताड़ित, पददलित रखने में नहीं, सघन सहयोगी बनाने में लाभ समझा जाना चाहिये। उदारता के बीज बोकर नारी की सत्ता द्वारा धरती की—माता के प्रतिदानों की, अपेक्षा कम नहीं कुछ अधिक ही पाने की आशा की जानी चाहिए। यही नीति श्रेयस्कर है। लाखों वर्षों तक इसी नीति पर चलकर भारत ने बहुत कुछ पाया था।
गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में गोरे और काले रंग वालों के बीच बरते जाने वाले भेद-भाव के विरुद्ध जब आन्दोलन किया था तो उन्हें यह कहकर चिढ़ाया जाता था कि ‘‘पहिले अपने देश में अछूतों और स्त्रियों के साथ बरते जाने वाले भेद-भाव को दूर कराइये तब गोरे और काले का अन्तर मिटाने का प्रयास करना।’’ वस्तुतः हम जब भी जहां भी मनुष्य के साथ बरती जाने वाली अनीति के विरुद्ध आवाज उठाते हैं तो विपक्षी लोग तत्काल गाल पर करारा तमाचा जड़ देते हैं और कहते हैं—‘‘निर्लज्ज लोगो अपने घर को सुधारो, अछूतों और स्त्रियों के साथ तुम लोग क्या कर रहे हो उसे देखो और समानता के सिद्धान्त की दुहाई देते हुए शर्म करो।’’ वस्तुतः हम इस योग्य हैं नहीं कि मनुष्य द्वारा मनुष्य के साथ बरती जाने वाली अनीति का साहसपूर्वक विरोध कर सकें। आदर्श और व्यवहार में इतना अन्तर बरतने वाले लोग ढोंगी ही कहे जा सकते हैं। दुनिया हमें इसी दृष्टि से देखती है और अपने द्वारा उठाई गई न्याय की मांग सर्वथा उपहास्यास्पद बन जाती है। इस स्थिति को सुधारे बिना हम मानवी न्याय का समर्थन करने में—उसे प्राप्त करने के लिए कुछ योगदान दे सकने में असमर्थ ही रहेंगे।
जनसंख्या में आधे नर होते हैं आधी नारी। भारत की आबादी 60 करोड़ के लगभग है इनमें 30 करोड़ नारियां हैं। उन्हें शिक्षा एवं स्वावलम्बन के अभाव ने पर्दा प्रथा, अनुभव हीनता एवं सामाजिक कुरीतियों ने बेतरह जकड़ रखा है। वे घर के कैदखानों में बन्दी रहकर रोटी बनाने, चौकीदारी करने एवं बच्चे जनने का काम कर रही हैं। ये काम भी वे अपने पिछड़ेपन के कारण ठीक तरह कर नहीं पातीं। स्वास्थ्य और आहार का सन्तुलन मिल सकना—व्यवस्था बुद्धि के अभाव में गृह व्यवस्था, सज्जा एवं सुरक्षा की दृष्टि से भी आधा अधूरा ही काम कर पाती हैं। आवश्यक जानकारी एवं शारीरिक मानसिक स्थिति की दुर्बलता के कारण उनके लिए स्वस्थ, समुन्नत एवं सुसंस्कारी संतानें प्रस्तुत कर सकना भी कठिन है। पिछड़ापन किसी को भी कुछ करने नहीं देता फिर भारतीय नारी भी यदि अपने थोड़े से उत्तरदायित्वों को भी ठीक तरह न निभा सके तो इसमें आश्चर्य की बात ही क्या है।
मनुष्य द्वारा मनुष्य की प्रताड़ना-नितान्त पाशविक है। सभ्य देशों की अदालतों से कोड़े मारने का दण्ड उठा दिया गया है। छोटे बच्चों को मारना अध्यापकों के लिए अपराध है। पशुओं की प्रताड़ना भी अब दण्डनीय अपराध की धाराओं में गिन ली गई है। पशुवध अपराध नहीं है पर उनके साथ क्रूरता का व्यवहार करना कानून का उल्लंघन है। किसी जमाने में बड़े-बूढ़े लोग वयस्क लड़कों को भी मार-पीट लिया करते थे अब अन्यान्य वृद्धियों के साथ स्वाभिमान भी बढ़ा है। जवान लड़के यह पसन्द नहीं करते कि बड़े-बूढ़े उनके साथ गाली-गलौज या मार पीट करें जहां ऐसे प्रसंग आते हैं वहां विद्रोह खड़ा हो जाता है और अवांछनीय घटनाएं घटित हो जाती हैं। मानवी स्वाभिमान एक तथ्य है, उसे सुरक्षित रखा ही जाना चाहिए।
मानसिक स्वास्थ्य-सुशिक्षा से, सुसंस्कारी वातावरण से और ज्ञान अनुभव संचय करने की परिस्थितियों से बनता है, वैसी परिस्थितियां कहां हैं। जन्म से मरण पर्यन्त एक छोटे से पिंजड़े में घुटते रहना पड़े और शिक्षा की प्रकाश किरणें समीप तक न पहुंचे तो समाज संसार से पूरी तरह कटी हुई नारी का बौद्धिक विकास कैसे होगा भावना पर खराद चढ़ाने वाली संगीत साहित्य कला का जिसे दर्शन तक नहीं होता उससे उदात्त और परिष्कृत भावनाओं की आशा करना व्यर्थ है। जन्मजात रूप से मनुष्य एक अविकसित पशु मात्र है। उसका विकास तो प्रगति की परिस्थितियां करती हैं। वह स्रोत सूख जाय तो यह किसी प्रकार सम्भव नहीं कि कोई अपने व्यक्तित्व का प्रखर निर्माण कर सके। यह स्वीकार करते हुए मर्मान्तक पीड़ा होती है कि भारतीय नारी शारीरिक और मानसिक दोनों ही दृष्टि से अस्वस्थ और जर्जर हो चली है।
इस पीड़ित नारी से नर को क्या लाभ मिला? उसे असहाय बना कर किसने क्या पाया? घर परिवार के लोगों की इससे क्या सुविधा बढ़ी? पति को उससे क्या सहयोग मिला? बच्चे क्या अनुदान पा सके? देश की अर्थ-व्यवस्था और प्रगति में पिछड़ी नारी ने क्या योगदान दिया? समाज को समुन्नत बनाने में वह क्या योगदान दे सकी? स्वयं नारी, जीवन का क्या सौभाग्य पा सकी? इन प्रश्नों पर विचार करने से लगता है नारी को पीड़ित, पद-दलित, प्रतिबन्धित, उपेक्षित रखा जाना किसी प्रकार उचित नहीं हुआ। समय पूछता है कि अनुचित को कब तक सहन किया जायेगा और कब तक उसे इसी तरह चलने दिया जायेगा?
महिलाओं का एक बड़ा वर्ग सड़क पर मेहनत-मजदूरी कर अपना जीवन गुजार लेता है। उनके बच्चे किसी वृक्ष की छाया में धरती-मां की गोद में बड़े होते हैं। वे सुबह से शाम तक जीविकोपार्जन करने में लगी रहती हैं। गरीबी से घिरा उनका जीवन उनके बच्चों का विकास होने को रोक देता है। भारत के वे फूल खिलने से पूर्व ही मुरझा जाते हैं। उन्हें कहां फुर्सत कि वे उनके स्वास्थ्य पर ध्यान दे सकें। स्वास्थ्य के नियमों का जानना तो दूर रहा, वे यह भी नहीं जानतीं कि मक्खी व मच्छरों से उनको क्या हानि होती है।
उनको तुम्हारी दुनिया से कोई मतलब नहीं, चाहे आबादी इससे चौगुनी हो जावे। एक बार एक महिला से पूछा गया कि आपके कितने बच्चे हैं? उसने कहा—9 बच्चे हैं और 10वां होने वाला है। उस पढ़ी-लिखी महिला ने उसके सामने आबादी बढ़ने तथा भारत की गरीबी का चित्र खींचा। उसको परिवार-नियोजन केन्द्र द्वारा बच्चे बन्द करने के उपाय भी समझाये गये लेकिन उसे यह सब सुनकर आश्चर्य हुआ। इन सबसे वे पूर्ण अनभिज्ञ पाई गई। उन्होंने कहा—हमारा हर बच्चा काम करता है, हमें तो हाथों की आवश्यकता है। उनका कर्त्तव्य केवल बच्चों को जन्म देने तक ही सीमित होकर रह गया है।
इस प्रकार उनका जीवन स्वाभाविक ढंग से बीत जाता है। उन्हें शायद कभी कोई तकलीफ ही महसूस नहीं होती और न शायद यह अहसास होता है कि उनके जीवन में आधुनिक-जीवन के साधनों का कितना अभाव है?
दूसरी तरफ गांवों में कुछ सम्पन्न-घर की महिलाएं भी होती हैं, जो पढ़ी-लिखी तो नहीं होतीं, लेकिन पहनने ओढ़ने के ढंग से आप अनुमान लगा सकते हैं कि वे आधुनिक बहिरंग रूप से परिचित हो चुकी हैं। यदि उनके गांव में कभी कोई पढ़ी-लिखी महिला सभा आदि का आयोजन करें तो वे अच्छे कपड़े पहनकर पाउडर आदि लगाकर ही पहुंचेगी। यह जागरुकता बहुत ही कम है और वह भी सन्तोष प्रद नहीं।
यह तो हुआ ग्रामीण दृश्य, शहरों में हमें दूसरी तरह की झांकी देखने को मिलती है। शहर के सम्पन्न परिवारों के अतिरिक्त मध्यम वर्ग या निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों में जागृति अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में दिखलाई देती है। वे अपने बच्चों को शाला तथा पति को कार्य पर भेजने के बाद शीघ्रता से घर के काम-काज समेट कर, मुस्तैदी से बाहर के काम कर अपने पति को मदद देतीं हैं।
इसके अतिरिक्त युवा पीढ़ी की जागरुकता शिक्षा के विकास के साथ-साथ बढ़ रही है। हजारों की संख्या में कॉलेज जाने वाले छात्राओं को यह अहसास तो अवश्य होता है कि दुनियां कैसी है, देश कैसा है, क्या बन रहा है और क्या बनेगा? लेकिन उसके बनाने में यह युवा-पीढ़ी कितना योगदान कर सकती है, इससे वे अनभिज्ञ हैं। वे आधुनिकता का नकली मुखौटा पहने हुए हैं। स्वाधीन-भारत की सच्ची नारी के रूप से वे कोसों दूर हैं। इनका अन्तरंग, उन दैवी गुणों से, जिसे हम शालीनता, शिष्टता, नम्रता, कर्तव्य-निष्ठा के नाम से पुकारते हैं, बिल्कुल ही रिक्त है। इनकी शिक्षा केवल अक्षर-ज्ञान पर टिकी हुई है। अतः वे कर्तव्यों से शून्य जीवन जीने की आदी होती जा रही हैं। उनका दृष्टिकोण व्यक्तिवादी ही बनता जा रहा है। उनकी दुनिया परिवार तक ही सीमित रहकर छोटी होती जा रही है। यह देश के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
अब अन्य उच्च पदों पर कार्य करने वाली महिलाओं पर भी दृष्टि डालें। एक विशिष्ट व्यक्तित्व की महिला इस प्रजातन्त्र-देश की प्रधानमन्त्री है। श्रीमती भण्डारनायके के बाद विश्व के प्रजातान्त्रिक इतिहास में श्रीमती इन्दिरा गांधी दूसरी महिला हैं, जिन्हें प्रधानमन्त्री का पद प्राप्त हुआ। कई महिलाएं संसद के वरिष्ठ पदों पर हैं, कई हाई कोर्ट की जज, बड़ी-बड़ी वकील-बैरिस्टर महिलाएं राजदूत आदि हैं लेकिन भारत जैसे विशाल देश में ऐसी महिलाएं नगण्य के बराबर ही हैं।
इसका अर्थ यह हुआ कि देश स्वतन्त्र हुआ। स्वतन्त्रता की ज्योति का प्रकाश भी बिखरा, पर उस प्रकाश ने सबको बराबर रोशनी नहीं दी।
अन्त में भारत की उन महिलाओं का वर्ग भी आता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी के संस्कारों में जकड़ी हुई हैं। वे आधुनिक युग से बहुत दूर हैं। वे अपनी रूढ़िवादिताओं को छोड़ने को किसी मूल्य पर भी तैयार नहीं इसीलिए जो बच्चे आधुनिक-शिक्षा पा रहे हैं, उनके बीच और उनकी पहिले की पीढ़ी में बड़ा अन्तर होता जा रहा है। मां और बेटी में अन्दर ही अन्दर अलगाव बढ़ता जा रहा है। बेटी अपनी मां के साथ उस तरह का सम्बन्ध चाह कर भी स्थापित नहीं कर पाती, जिसमें एकत्व हो। इसका मुख्य कारण यह है कि एक ओर जहां लड़कियों को शिक्षा दी जा रही है, उनके माता पिता को शिक्षित बनाने का इन्तजाम नहीं किया जा रहा है।
इतनी विषमताएं अन्य देशों की नारियों में नहीं पाई जाती हैं। लेकिन भारत में यह परिवर्तन का चक्र घूम रहा है। इन विषमताओं के मिटाने का आधार सही शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार ही हो सकता है। इसलिए हमें शिक्षा का रूप बदलना पड़ेगा। शिक्षा ऐसी हो जो भारतीय-नारी के अन्तरंग को आलोकित कर सके—उसमें उसके दैवी-गुणों को विकसित कर सके। वे अपने ज्ञान के प्रकाश को केवल भारतीय-नारियों में ही नहीं, विश्व की नारियों में बिखेर दें।
इससे भारत में ही नहीं, विश्व में भी सुख व शान्ति का साम्राज्य फैल जावेगा।
प्रस्तुत अवगति के कारणों पर विचार करते हैं, तो उनमें सबसे अधिक भयावह भूल यह प्रतीत होती है कि अपनी ही कुल्हाड़ी से अपना ही आधा अंग क्षत-विक्षत करके रख दिया। आधी शक्ति नर की और आधी नारी की है। आधी शक्ति को असमर्थ बना दिया जाय तो शेष आधी को ही शेष सारा भार वहन करना पड़ेगा। अक्षम न होने पर आधी शक्ति जो काम कर सकती थी, उससे वंचित रहना पड़ेगा। समुन्नत नारी कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करती—पैर से पैर मिला कर चलती तो प्रगति की मंजिल कितनी आसान रहती।
हमारी भूलों में यह सबसे अग्रणी, सबसे भारी और सबसे अधिक दुखदायी है कि नारी को ऐसे बन्धनों में बांधने की चेष्टा की गई जो मनुष्य के मौलिक अधिकारों का अपहरण और हनन करते हैं। अपने साथ अनीति बरतना प्रकारान्तर से आत्म-हत्या ही है। नारी और नर दो वर्ग-दो पक्ष नहीं हैं, एक ही चेतना के, एक ही सत्ता के दो अविच्छिन्न पहलू हैं, दोनों को समान रूप से विकसित होने देना ही श्रेयस्कर है। न मालिकी श्रेयस्कर है न गुलामी हितकर है। यह सहकारिता का युग है। इसमें सहयोग की गरिमा एक स्वर से स्वीकार कर ली गई है और यह समझ लिया गया है कि सहयोग स्वेच्छा से ही हो सकता है।
समुन्नत देशों में जहां भी नारी को मनुष्योचित अधिकार मिले हैं, वहीं वह पुरुष के कन्धे से कन्धा मिलाकर काम कर रही हैं, किन्तु भारत में नारी समाज आज भी नितान्त पिछड़ी हुई स्थिति में पड़ा है। पिछड़ी हुई नारी, नर के लिए किसी भी क्षेत्र में सहायक न हो सकेगी। भारत में यह प्रयोग दीर्घकाल तक हो चुका और वह सर्वथा हानिकारक सिद्ध हुआ, अब उस प्रचलन को बनाये रखने में कोई बुद्धिमानी नहीं है।
यूगोस्लेविया की महिलायें उस देश की पूरी कृषि व्यवस्था संभालती हैं। पुरुष फौज, पुलिस, दफ्तर, कारखाने संभालते हैं। कृषि, पशुपालन में उन्हें कोई श्रम या हस्तक्षेप नहीं करना पड़ता चीन, रूस आदि श्रम निष्ठ देशों में जाकर देखा जाय तो पता चलेगा कि पारिवारिक और राष्ट्रीय सम्पदा सुरक्षा और सुख-सुविधा बढ़ाने में वे कितना बड़ा योगदान दे रही हैं। रूस की शिक्षा व्यवस्था का अधिकांश उत्तरदायित्व महिलायें ही वहन करती हैं। शिक्षा संस्थाओं में पुरुषों की संख्या बहुत ही कम दिखाई पड़ेगी। अस्पतालों एवं स्वास्थ्य संस्थाओं का उत्तरदायित्व भी प्रायः उन्हीं का है। डॉक्टर, कम्पाउण्डर नर्स आदि का कार्य करती हुई महिलायें ही देखी जायंगी, पुरुष तो जहां-तहां ही दृष्टिगोचर होंगे।
जापान की महिलायें उद्योग-धन्धों के विकास में पुरुषों के कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करती हैं। घर-घर में लगे, छोटे कुटीर-उद्योगों में संलग्न रहकर वे अपने समय का उपयोग घर परिवार को और समूचे राष्ट्र को सम्पन्न बनाने में करती हैं। जर्मनी में कल-कारखानों को संभालने में महिलायें पुरुष इन्जीनियरों, कारीगरों एवं व्यवस्थापकों से घटिया नहीं बढ़िया ही सिद्ध होती हैं। इंगलैण्ड, फ्रांस, कनाडा, अमेरिका में दुकानें चलाने में महिलाओं की प्रमुखता है।
नाट्य, अभिनय, चलचित्र क्षेत्रों में उन्हीं का वर्चस्व है, अवसर न मिले तो बात दूसरी है अन्यथा साहित्य सृजन में उनकी सहज क्षमता को पुरुष चुनौती नहीं दे सकता। कवि और चित्रकार जब भी उन्हें बनने दिया गया है उन्होंने अपनी वरिष्ठता ही सिद्ध की है। मूर्तिकार तो वे अद्वितीय हैं। पत्थर की नहीं वे प्राणवान प्रतिमाएं अपने शरीर की प्रयोगशाला में बनाकर प्रस्तुत करती हैं। उनके समान मूर्तिकार, चित्रकार, कलाकार कौन हो सकता है? उनसे अधिक आकर्षक सुन्दर, कलात्मक, कोमल कलाकृति इस संसार में दूसरी नहीं है। परमेश्वर ने अपना सारा दृश्यमान और चेतनात्मक सौन्दर्य उसी में उड़ेल दिया है।
नारी को विश्वस्त मित्र और सम्मानास्पद स्वजन का स्थान मिलना चाहिये। उसे प्रताड़ित, पददलित रखने में नहीं, सघन सहयोगी बनाने में लाभ समझा जाना चाहिये। उदारता के बीज बोकर नारी की सत्ता द्वारा धरती की—माता के प्रतिदानों की, अपेक्षा कम नहीं कुछ अधिक ही पाने की आशा की जानी चाहिए। यही नीति श्रेयस्कर है। लाखों वर्षों तक इसी नीति पर चलकर भारत ने बहुत कुछ पाया था।
गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में गोरे और काले रंग वालों के बीच बरते जाने वाले भेद-भाव के विरुद्ध जब आन्दोलन किया था तो उन्हें यह कहकर चिढ़ाया जाता था कि ‘‘पहिले अपने देश में अछूतों और स्त्रियों के साथ बरते जाने वाले भेद-भाव को दूर कराइये तब गोरे और काले का अन्तर मिटाने का प्रयास करना।’’ वस्तुतः हम जब भी जहां भी मनुष्य के साथ बरती जाने वाली अनीति के विरुद्ध आवाज उठाते हैं तो विपक्षी लोग तत्काल गाल पर करारा तमाचा जड़ देते हैं और कहते हैं—‘‘निर्लज्ज लोगो अपने घर को सुधारो, अछूतों और स्त्रियों के साथ तुम लोग क्या कर रहे हो उसे देखो और समानता के सिद्धान्त की दुहाई देते हुए शर्म करो।’’ वस्तुतः हम इस योग्य हैं नहीं कि मनुष्य द्वारा मनुष्य के साथ बरती जाने वाली अनीति का साहसपूर्वक विरोध कर सकें। आदर्श और व्यवहार में इतना अन्तर बरतने वाले लोग ढोंगी ही कहे जा सकते हैं। दुनिया हमें इसी दृष्टि से देखती है और अपने द्वारा उठाई गई न्याय की मांग सर्वथा उपहास्यास्पद बन जाती है। इस स्थिति को सुधारे बिना हम मानवी न्याय का समर्थन करने में—उसे प्राप्त करने के लिए कुछ योगदान दे सकने में असमर्थ ही रहेंगे।
जनसंख्या में आधे नर होते हैं आधी नारी। भारत की आबादी 60 करोड़ के लगभग है इनमें 30 करोड़ नारियां हैं। उन्हें शिक्षा एवं स्वावलम्बन के अभाव ने पर्दा प्रथा, अनुभव हीनता एवं सामाजिक कुरीतियों ने बेतरह जकड़ रखा है। वे घर के कैदखानों में बन्दी रहकर रोटी बनाने, चौकीदारी करने एवं बच्चे जनने का काम कर रही हैं। ये काम भी वे अपने पिछड़ेपन के कारण ठीक तरह कर नहीं पातीं। स्वास्थ्य और आहार का सन्तुलन मिल सकना—व्यवस्था बुद्धि के अभाव में गृह व्यवस्था, सज्जा एवं सुरक्षा की दृष्टि से भी आधा अधूरा ही काम कर पाती हैं। आवश्यक जानकारी एवं शारीरिक मानसिक स्थिति की दुर्बलता के कारण उनके लिए स्वस्थ, समुन्नत एवं सुसंस्कारी संतानें प्रस्तुत कर सकना भी कठिन है। पिछड़ापन किसी को भी कुछ करने नहीं देता फिर भारतीय नारी भी यदि अपने थोड़े से उत्तरदायित्वों को भी ठीक तरह न निभा सके तो इसमें आश्चर्य की बात ही क्या है।
मनुष्य द्वारा मनुष्य की प्रताड़ना-नितान्त पाशविक है। सभ्य देशों की अदालतों से कोड़े मारने का दण्ड उठा दिया गया है। छोटे बच्चों को मारना अध्यापकों के लिए अपराध है। पशुओं की प्रताड़ना भी अब दण्डनीय अपराध की धाराओं में गिन ली गई है। पशुवध अपराध नहीं है पर उनके साथ क्रूरता का व्यवहार करना कानून का उल्लंघन है। किसी जमाने में बड़े-बूढ़े लोग वयस्क लड़कों को भी मार-पीट लिया करते थे अब अन्यान्य वृद्धियों के साथ स्वाभिमान भी बढ़ा है। जवान लड़के यह पसन्द नहीं करते कि बड़े-बूढ़े उनके साथ गाली-गलौज या मार पीट करें जहां ऐसे प्रसंग आते हैं वहां विद्रोह खड़ा हो जाता है और अवांछनीय घटनाएं घटित हो जाती हैं। मानवी स्वाभिमान एक तथ्य है, उसे सुरक्षित रखा ही जाना चाहिए।
मानसिक स्वास्थ्य-सुशिक्षा से, सुसंस्कारी वातावरण से और ज्ञान अनुभव संचय करने की परिस्थितियों से बनता है, वैसी परिस्थितियां कहां हैं। जन्म से मरण पर्यन्त एक छोटे से पिंजड़े में घुटते रहना पड़े और शिक्षा की प्रकाश किरणें समीप तक न पहुंचे तो समाज संसार से पूरी तरह कटी हुई नारी का बौद्धिक विकास कैसे होगा भावना पर खराद चढ़ाने वाली संगीत साहित्य कला का जिसे दर्शन तक नहीं होता उससे उदात्त और परिष्कृत भावनाओं की आशा करना व्यर्थ है। जन्मजात रूप से मनुष्य एक अविकसित पशु मात्र है। उसका विकास तो प्रगति की परिस्थितियां करती हैं। वह स्रोत सूख जाय तो यह किसी प्रकार सम्भव नहीं कि कोई अपने व्यक्तित्व का प्रखर निर्माण कर सके। यह स्वीकार करते हुए मर्मान्तक पीड़ा होती है कि भारतीय नारी शारीरिक और मानसिक दोनों ही दृष्टि से अस्वस्थ और जर्जर हो चली है।
इस पीड़ित नारी से नर को क्या लाभ मिला? उसे असहाय बना कर किसने क्या पाया? घर परिवार के लोगों की इससे क्या सुविधा बढ़ी? पति को उससे क्या सहयोग मिला? बच्चे क्या अनुदान पा सके? देश की अर्थ-व्यवस्था और प्रगति में पिछड़ी नारी ने क्या योगदान दिया? समाज को समुन्नत बनाने में वह क्या योगदान दे सकी? स्वयं नारी, जीवन का क्या सौभाग्य पा सकी? इन प्रश्नों पर विचार करने से लगता है नारी को पीड़ित, पद-दलित, प्रतिबन्धित, उपेक्षित रखा जाना किसी प्रकार उचित नहीं हुआ। समय पूछता है कि अनुचित को कब तक सहन किया जायेगा और कब तक उसे इसी तरह चलने दिया जायेगा?

