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Books - आधी जनशक्ति अपंग न रहे

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नारी को वर्तमान स्थिति बदलनी ही होगी

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प्रसिद्ध इतिहासज्ञ कालाईल ने कहा है—‘‘मनुष्य की बुद्धिमत्ता इस बात में है कि वह अपनी पिछली गल्तियों को न दुहराये। किसी जाति के विकास का भी यही आधार है। इतिहास का सबसे बड़ा लाभ यही है कि वह किसी जाति की पिछली गल्तियों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है और उन आधारों को भी दर्शाता है जो उसके विकास में सहायक होते हैं। इसलिये प्रत्येक विकासशील जाति अपने इतिहास से सीख लेकर ही आगे बढ़ सकती है।’’ कालाईल का यह प्रतिपादन पूर्णतः सटीक है और इसकी पुष्टि के लिये हम यदि इतिहास का अध्ययन करें तो प्रतीत होगा कि जब जब किसी समाज ने अपनी पिछली भूलें दुहराई हैं तब तब उन्हीं विफलताओं और दुःस्थितियों का सामना करना पड़ा है। भारतीय इतिहास में ही विदेशी आक्रमणकारियों ने जब जब आक्रमण किये तब तब एक ही कारण से हमें उनके सामने घुटने टेकने पड़ते। वह कारण था—आपसी फूट। लगातार डेढ़ हजार वर्ष तक विदेशी आक्रान्ताओं से हम पददलित होते रहे हैं इसका एक मात्र यही कारण है कि हम शौर्य, साहस, पराक्रम और वीरता में किसी से कम न होते हुए भी आपसी ताल मेल और सामंजस्य स्थापित नहीं कर सके।

बड़ी कीमत चुकाकर हमने अपनी इस भूल को समझा और स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात उस त्रुटि को सुधारने के लिए यथा सम्भव प्रयत्न करते रहे हैं। किन्तु इससे भी भयंकर एक और भूल हमसे होती रही है—जिसकी ओर हमने अभी ध्यान नहीं दिया है। वह है नारी की—मातृशक्ति की उपेक्षा, अवहेलना। उपेक्षा ही नहीं उसका पददलन, शोषण और उस पर दुर्भावनापूर्ण आक्षेपों, धारणाओं, मान्यताओं तथा प्रतिबन्धों का आरोपण। इस भूल ने भारतीय समाज को बड़ी बुरी तरह क्षति पहुंचायी है। दुनिया के कई देश जो भारत के साथ ही स्वतन्त्र हुए थे या उसके दो चार वर्ष आगे-पीछे उन्हें स्वतन्त्रता मिली थी आज भारत से कई क्षेत्रों में आगे हैं, जबकि हम लोग अभी तक अपनी दिशा ही स्थिर नहीं कर पाये हैं कि हमें किस दिशा में और किस क्षेत्र में आगे बढ़ना है।

अस्तित्व बोध—जो किसी भी व्यक्ति या समाज के लिये प्रगति बाधा का पहला चरण है, उसके जन्म-उत्सव से ही आरम्भ होता है और मनुष्य तथा मनुष्यता के जन्म का उत्सव है—नारी। उसे मनुष्य और मनुष्यता की जननी होने के कारण ही मनीषियों ने उसे मातृशक्ति कह कर सम्मानित सम्बोधित किया है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि अतीत काल में जब तक भारतीय समाज ने नारी को मातृशक्ति के पद पर प्रतिष्ठित रखा तब तक उसने ऐसे ऐसे श्रेष्ठ मानव रत्न समाज को दिये जिन्होंने अपने समय को इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण युग के रूप में अंकित किया। उसे गृह लक्ष्मी, कुलमाता, परिवार की स्वामिनी और समाज की माता कहा जाता रहा है तब तक भारतीय समाज विश्व रंग मंच पर प्रमुख और मार्गदर्शक भूमिका निभाता रहा।

उस घड़ी को दुर्भाग्य कहें या हमारी मूर्खता जब लोगों ने स्त्री को गृहलक्ष्मी की गौरवगरिमा से वंचित कर उसे घर आंगन की शोभा बनाकर चहारदीवारी में पटक दिया। पहले जहां स्त्रियां समाज और राष्ट्र तक को प्रभावित करने वाले कार्यक्रमों और गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं उन्हें घरेलू कार्यों में परामर्श देने के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया। इससे पूर्व प्राचीन काल में जहां ऋषिकाएं लोकशिक्षण और समाज का मार्गदर्शन करने में आगे बढ़कर कन्धे से कन्धा मिलाकर हाथ बंटाती वहां उसकी स्वयं की शिक्षा अनावश्यक और अनर्थकारी समझी जाने लगी। अतीत साक्षी है इस बात का कि स्त्री न केवल समाज निर्माण के मोर्चे पर कार्य करती थी बल्कि राष्ट्र रक्षा और संस्कृति व धर्म के गौरव की रक्षा के लिए वह युद्ध क्षेत्र तक में जाती थी और कई अवसरों पर तो पुरुष से भी बढ़ चढ़कर साहस का प्रदर्शन करती थी। रामायण में एक युद्ध के अवसर पर कैकयी द्वारा राजा दशरथ के मोर्चे पर साथ देने तथा संकट की घड़ी में उनके प्राण बचाने की घटना सर्वविदित है यह भी सभी जानते हैं कि दशरथ ने कैकयी के इसी शौर्य साहस से प्रभावित होकर उसे दो वरदान मांगने के लिए कहा था और कैकयी ने वे वरदान अपने लिए सुरक्षित रखते हुए राम के राज्याभिषेक के समय मांगे थे।

इस तरह की ढेरों घटनायें मिल जायेंगी। परन्तु दुर्भाग्य कि पराक्रम और शौर्य के क्षेत्र में भी पीछे न रहने वाली नारी कालान्तर में अपनी आत्म-रक्षा के लिए भी असमर्थ हो गयी। यह भी हो सकता है कि विदेशी आक्रमणकारियों के अत्याचारों से अपनी कुल मर्यादा की रक्षा और सतीत्व को बचाने के लिए उसे घर के अन्दर ही सुरक्षित रखने की बात सोची गयी हो किन्तु इस रूप में हमें बड़ी महंगी कीमत चुकानी पड़ी। तत्काल ऐसा करना भले ही समझदारी की बात रही हो परन्तु उसके दूरगामी परिणाम समाज की जीवनी शक्ति को नष्ट करने के रूप में ही सामने आये। इस बात में भी कोई दम नहीं दीखता कि स्त्रियों की सतीत्व रक्षा के लिए उन्हें प्रतिबन्धित किया गया और उनके कार्यक्षेत्र को सीमित बना दिया गया। क्योंकि भारतीय नारियों में उस स्तर का पराक्रम और शौर्य पहले से ही रहा है। उसके साथ छल तो विदेशी आक्रमण से पूर्व ही किया जाने लगा। प्राचीन और दासता के मध्यवर्ती युग में स्त्रियों को मनोरंजन का साधन मानने, उनका क्रय-विक्रय होने तथा सम्पत्ति के रूप में उनकी गणना करने की परिपाटी चल पड़ी थी। उस मध्यवर्ती काल के सम्बन्ध में इतिहासकार बताते हैं कि उन दिनों उस व्यक्ति को समाज में उतना ही बड़प्पन और मान मिलता था जिसके पास जितनी अधिक स्त्रियां थीं। स्त्रियों का अपहरण, उनकी लूट और उनके क्रय-विक्रय की परम्परा ही इस बात की द्योतक है कि तत्कालीन पुरुष समाज ने मातृशक्ति को सिंहासन से उतारकर किस बर्बरतापूर्वक गन्दी नाली में फेंक दिया था।

प्रकृति कभी किसी को माफ नहीं करती और न ही किसी भूल या त्रुटि को क्षमा करती है। नारी के साथ—मातृ शक्ति के साथ किये गये इस बर्बरतापूर्ण अत्याचार का दुष्परिणाम कालान्तर में ही निकलकर सामने आने लगा। जब स्त्री को सम्पत्ति ही मान लिया गया, उसे निर्जीव वस्तुओं की श्रेणी में रख दिया गया तो इस तथ्य की ओर किसका ध्यान गया होगा कि वह मां भी है, जननी भी है। इस दृष्टि से उसे गुणवती और सक्षम बनाने की ओर ध्यान भी नहीं ही गया होगा। केवल उसे सजाने गुड़िया बनाकर अधिकाधिक आकर्षक रूप देने की ओर ही पुरुष का ध्यान केन्द्रित रहा होगा। इस तरह विलासिता के उन्माद में कुचली और वासना के पंक में लथेड़ी गयी नारी से श्रेष्ठ सन्तान-तेजस्वी व्यक्तित्व प्राप्त करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।

माना कि उस काल में सभी स्त्रियों को इस तरह की स्थिति का शिकार नहीं होना पड़ा होगा। नारी को रमणी माना गया होगा किन्तु मां, बहिन और पूज्य सम्बन्ध तब भी रहे होंगे। उनके लिए पुत्र और भाइयों का वैसा ही आदर भाव रहा होगा, परन्तु समाज का वातावरण ही तो इस प्रकार का हो गया था जिसमें प्रत्येक स्त्री अपने आपको असुरक्षित और दीन दयनीय स्थिति में फंसी अनुभव करती होगी। सुरक्षा और मर्यादा के नाम पर घर से बाहर न जाने, विद्यालय में शिक्षा प्राप्त न करने, पुरुषों के बीच न जाने जैसे निषेध और पर्दा करने, पति और पुत्र से ही बात करने तथा घर के अन्दर ही सीमित रहने जैसे प्रतिबन्ध नारी को—मातृशक्ति को कुण्ठित करने लगे। उसका विकास अवरुद्ध हुआ और वह जीवित यन्त्र की भांति रहने लगी जिसे तेल और ईंधन दिया जाता रहे तो उपयोग किया जा सके। नर और मनुष्यता की जननी के साथ जड़ वस्तु या मूक पशु की भांति व्यवहार उसके व्यक्तित्व को निर्जीव बनाने लगा और वह सन्तान को जन्म भर देने योग्य रह गयी। पुरुष को—मनु सन्तानों के संस्कार कहां से मिलते, कैसे प्राप्त होता उन्हें वह वातावरण जिसमें इतना जीवन उत्पन्न हो सके कि वह संस्कृति का भाल पूर्ववत् उन्नत रख सके। कैसे मिलता समाज को वह बल जिसमें कि वह विदेशी और विधर्मी के प्रति झुकते जा रहे सिर को तानकर खड़ा रख सके।

उन्हीं घड़ियों में आरम्भ हुई वह काल रात्रि जिसका अन्धकार डेढ़ हजार वर्ष तक छाया रहा और सामाजिक व सांस्कृतिक चेतना से शून्य भारतीय केवल अपनी ही चिन्ता करते हुए, अपने स्वार्थ की पूर्ति ही पर्याप्त समझते हुए मृतप्राय जीवन जीता रहा। कहा जाता है कि इतिहास किसी के गिरने के बाद एक बार फिर सम्हलने का अवसर देता है। ठोकर खाकर आदमी गिरता है तो उसे दुबारा उठने का मौका मिलता है। सम्हल कर न चलने के कारण ठोकर लगी हो अथवा कमजोरी के कारण कोई गिर पड़ा हो यदि उठने के बाद सम्हल कर नहीं चलता अथवा कमजोरी को नहीं मिटाता तो दुबारा उससे भी भयंकर स्थिति सामने आती है, जिसकी परिणिति पुनः गिरने से लेकर मरने तक के रूप में होती है।

इन दिनों हमारे समाज की स्थिति गिरने के बाद उठने वाले व्यक्ति की तरह है। डेढ़ हजार वर्ष पूर्व हमारे पतन का कारण यही रहा है कि हम संस्कृति की गौरव पताका को थामे रहने वाले समर्थ व्यक्तित्व उत्पन्न करने में असमर्थ हो गये। अपनी नादानियों के कारण हो या गलतियों की वजह से हमने उस आधार को ही तहस-नहस करना आरम्भ कर दिया था जिस पर कि ऐसे समर्थ व्यक्तित्व उत्पन्न हो सकें। समर्थ और सशक्त व्यक्तित्वों का उदय आविर्भाव ही हमारे यहां अवरुद्ध हो गया। केवल इसलिए कि हमने मातृशक्ति की अपवंचना आरम्भ कर दी उसे उसके गौरव से वंचित करना शुरू कर दिया।

इस अपराध का दण्ड लम्बे समय तक भुगतने के बाद हमें अवसर मिला है कि हम अपनी भूल को सुधारें और मातृशक्ति के पुनरुत्थान की आवश्यकता समझें। अब तक हमारी प्रवृत्ति जिस भी दिशा में रही है इस ओर, उससे निराश ही होना पड़ता है। अपनी भूल को सुधारने के स्थान पर हम उसका कलेवर बदलने की ओर ही अधिक उन्मुख है। पहले नारी को सम्पत्ति बनाकर कैद किया गया तो अब उसे विभिन्न आकर्षक रूपों में प्रदर्शित करने की भूल कर रहे हैं। उसे जननी, माता, गृहलक्ष्मी और गृह स्वामिनी के रूप में पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिए जरा भी प्रयास नहीं किये हैं। उसके प्रति हमारा दृष्टिकोण अब भी नहीं बदला है। कहने को आज की नारी स्वतन्त्र है, परन्तु आधुनिकता, सभ्यता और प्रगतिशीलता के नाम पर उसे जिस दिशा में धकेला जा रहा है उससे लगता है कि अब नारी को आत्महत्या के लिए तैयार करने के प्रयत्न चल रहे हैं। पहले उसे जबरन बेड़ियों में जकड़ा गया, अब उसे बेड़ियों में गौरव का आभास करा कर उन्हें पहनने के लिए तैयार किया जा रहा है।

कहा जाता है कि न्यायालय किसी अपराधी को पहली बार अपराध करने पर उदारतापूर्वक विचार करता है और उसी के अनुसार दण्ड देता है। उस दण्ड का उद्देश्य यह रहता है कि व्यक्ति को अपने अपराध का बोध हो और उस दण्ड से सीख लेकर अपने सुधार के लिए यत्न करता रहे। अपराधी इस पर भी अपना सुधार करने के लिए प्रयत्न नहीं करता और दुबारा अपराध कर्मों में प्रवृत्त होता है तो उसे अगली बार कड़ा दण्ड दिया जाता है। पहली बार नारी का अवमूल्यन कर—उसे उसकी गौरव गरिमा से गिराकर हमने एक अपराध किया और इतिहास ने उसका दण्ड अंधेरी काल कोठरी की तरह अन्धकारपूर्ण परिस्थितियों में सैकड़ों वर्षों तक रहने का दण्ड दिया। कहा जा सकता है कि वह पहला अपराध था जिसका दण्ड देते समय इतिहास ने उदारतापूर्वक विचार किया। अब भी यदि हम अपने समाज को इस अवांछनीय कृत्य से विमुख न कर सके तो काल पुरुष हमें कौन-सा और कितना कड़ा दण्ड देगा—कुछ कहना सम्भव नहीं है।

नारी को घर परिवार का उत्तरदायित्व विशेष रूप से संभालना पड़ता है, यह सही है, पर यह गलत है कि उसे उतने ही क्षेत्र में सीमित रहना चाहिए और घर से बाहर के क्षेत्र में कोई रुचि नहीं लेनी चाहिए। घर से बाहर एक कदम भी नहीं रखना चाहिए। ऐसा प्रतिबन्ध तो ठीक उसी प्रकार का होगा, जिसके आधार पर पुरुष को घर में प्रवेश करने से रोका जाय। जब तक घर में स्त्री का और बाहर पुरुष का कार्य क्षेत्र है और स्त्री को घर तक ही सीमित रहने के लिए कहा जा रहा है, तो न्याय की मांग यह है कि पुरुष को भी उसी प्रकार के बन्धन स्वीकार करने चाहिए। उसे घर में प्रवेश नहीं करना चाहिए, दुकान, दफ्तर या खेत में ही गुजर करते हुए सन्तोष करना चाहिए। पुरुष यदि इस तर्क को स्वीकार नहीं कर सकते तो अकेली स्त्री को ही उस सीमा बन्धन में बांधना किस तर्क एवं न्याय के आधार पर उचित ठहराया जा सकता है?

विशेष कार्य तो हर किसी के जिम्मे होता है पर वह उतने तक ही सीमित रहने के लिए विवश नहीं किया जाता। पण्डित, लेखक, धोबी, मेहतर, नाई, मोची, चित्रकार, सैनिक, अध्यापक, अफसर, किसान, माली, मजदूर, व्यापारी आदि अपने-अपने अलग-अलग प्रकार के काम करते हैं। पर उन पर यह प्रतिबन्ध नहीं है कि वे उन निर्धारित कार्यों के अतिरिक्त और कुछ कर ही नहीं सकते, जो विशेष कार्य वे करते हैं उन्हें सदा उतने तक ही सीमित रहने, अन्य कुछ भी न करने के लिए वे प्रतिबन्धित नहीं हैं, ड्यूटी पूरी करने के उपरान्त वे कुछ भी करते हैं। आवश्यकता एवं इच्छानुरूप अपना काम बदल भी लेते हैं। कितने ही पुरुष रसोई बनाने की बर्तन साफ करने, बच्चे खिलाने जैसे घरेलू कामों की नौकरी करके अपना गुजारा करते हैं, ऐसा कोई नियम नहीं है कि उन्हें यह कह कर उन कामों से रोका जाय कि यह तो स्त्रियों के करने के हैं पुरुष उन्हें नहीं कर सकते। इसी प्रकार स्त्रियों पर भी यह बन्धन नहीं होना चाहिए कि उन्हें घर के पिंजड़े में ही कैद रहना चाहिए। मुर्गी और कबूतर पालने वाले उनके लिए दरबा बनाते तो हैं पर यह बन्धन नहीं लगाते कि निरन्तर उन्हें उसी में बन्द रहना पड़ेगा। खुली हवा में घूमने का भी उन्हें अवसर देते हैं, और विश्वास करते हैं कि वे अपने दरबे को, घर को पहचानते हैं, इस लिए उसे छोड़कर सदा के लिए कहीं नहीं चले जायेंगे। अपने घर की स्त्रियों पर यदि मुर्गी या कबूतर जितना विश्वास किया जा सके तो न्याय की रक्षा हो सकती है। आखिर पालतू बिल्ली चौबीस घण्टे कोठे में ही तो कैद नहीं रहती, वह भी मन बहलाने के लिए कहीं इधर-उधर जाती और लौट आती है। क्या इतनी सुविधा स्त्रियों को नहीं मिल सकती?

प्राणी को पिंजड़े में कैद करने पर उसकी प्रकृति प्रदत्त स्फूर्ति क्रमशः नष्ट होती चली जाती है। इसका प्रत्यक्ष परिचय पालतू और अन्य पशुओं को सामने रख कर उनका तुलनात्मक अध्ययन करके जाना जा सकता है। पिंजड़े में पलने वाले और उन्मुक्त आकाश में उड़ने वाले समान आयु और स्वास्थ्य के तोतों को, किन्हीं पक्षी विशेषज्ञों के सुपुर्द कर के पूछा जाय कि इनके शारीरिक, मानसिक स्थिति में क्या कुछ अन्तर है? वे बतायेंगे कि पालतु का शरीर जीर्ण हो गया और मन टूट गया। यह हारा थका और निराश दिखाई पड़ता है। व्यापक क्षेत्र में पुरुषार्थ करने में जंगली तोते के नस नाडियों में समर्थता बनी हुई है और आहार व सुरक्षा की समस्या पल-पल पर नये ढंग से हल करने के अभ्यास ने उसकी चिन्त चेतना को प्रखर रखा है। उत्तरदायित्व वहन करने में कुछ असुविधा तो होती है, पर उसके बदले समान चेतना की अभिवृद्धि का वरदान भी मिलता है।

बिना चिन्ता के गुजर कर लेना स्त्रियों का सौभाग्य बताया जाता है। उन्हें न तो उपार्जन के परिश्रम करना पड़ता है और न समस्याओं के समाधान में माथापच्ची करनी पड़ती है। इस दृष्टि से वे पुरुष की तुलना में अधिक सुखी कही जाती हैं। पर वस्तुस्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। यह तथाकथित निश्चितता मानव जीवधारी की मूल प्रकृति से सर्वथा विपरीत है। यदि ऐसा न होता तो कैदखाने में पूर्ण निश्चिन्तता का अवसर होने के कारण कोई कैदी वहां से छुटकारा पाने का इच्छुक न होता। पिंजड़े में बन्द रहने वाले तोते, मैना आदि पक्षी दरवाजा खोल देने पर भी उसी में बैठे रहते। चिड़ियां घरों में रहने वाले पशु पक्षी, आहार और सुरक्षा की दृष्टि से पूर्ण निश्चिंत होते हैं। उन्हें अपनी आवश्यकताएं जुटाने के लिए कोई दौड़ धूप नहीं करनी पड़ती, फिर भी उन्हें मुक्त करने का अवसर देखा जा सकता है कि वे वहां रहना पसंद करते हैं या दरवाजा खुलते ही ताबड़तोड़ भागते हैं। इस छुटकारे में उनके लिए खतरा ही खतरा है। असंख्य चिन्ताएं और समस्याएं उनके सामने खड़ी होंगी फिर भी ‘स्वतन्त्रता’ अपने आप में इतनी बड़ी चीज है जिसके लिए कितना ही बड़ा खतरा उठाया जा सकता है। इस लक्ष्य को पशु-पक्षी ही जानते हों, मनुष्य की आत्मा इस तथ्य से अपरिचित हो, ऐसी बात नहीं है। सिखाया, सधाया और कैद करके रखा गया सिंह, सरकस वालों के लिए लाभदायक हो सकता है, पर यदि उस प्राणी से पूछा जाय कि आपको इस निश्चिन्त और सुविधा सम्पन्न स्थिति में, वन प्रदेश में रहकर हर पेट पालने की झंझटों में उलझे जीवन, जीवन की तुलना में अच्छा लगता है या बुरा? तो उसका उत्तर कटघरा खोलकर पूछा जा सकता है। वह मूक प्राणी अपनी आन्तरिक अभिलाषा का परिचय पिंजड़े से निकल कर कहीं खड़ा होने के रूप में देगा।

स्वतन्त्रता की आकांक्षा ईश्वर प्रदत्त है। यह आत्मा की भूख है। इसके लिए बड़े से बड़े कष्ट सहे जा सकते है। दास-दासी राजा-रईसों के यहां पलते, अच्छा खाते और अच्छा पहनते थे, अच्छे मकान में रहते थे। विचारशील लोगों ने दास प्रथा के अन्त का आन्दोलन चलाया और तब चैन लिया जब वह समाप्त हो गई। स्वतन्त्र जीवन जीने वाले दीन दरिद्रों को जिस स्तर का जीवन यापन करना पड़ता है उसकी तुलना में वे दास-दासी सुखी थे, फिर मोटी दृष्टि से तो यह स्वतन्त्रता उनके लिए हानिकारक ही हुई? इसी तर्क के अनुसार विदेशी पराधीनता को भी कई सुविधाओं की दृष्टि से उपलब्ध स्वाधीनता की तुलना में अच्छा ठहराया जा सकता है। उस जमाने में हमें बाह्य आक्रमणों से बचने के लिए सुरक्षा समस्या पर ध्यान नहीं देना पड़ता था। अंग्रेज स्वयं उसकी जिम्मेदारी सम्भालते थे। ऐसी ही और बातें भी हो सकती हैं। स्वतन्त्रता आन्दोलन के नेता पराधीनता में रहने के लाभों और स्वाधीनता के कठिन उत्तरदायित्वों को भी जानते थे फिर भी उन्होंने प्राण हथेली पर रख स्वतन्त्रता संग्राम लड़ा और सारे देश को उसके लिए बड़े से बड़ा त्याग बलिदान करने का आह्वान किया। जिस तर्क के अनुसार स्त्रियों को पराधीनता में सुखी रहने की बात कही जाती है उसी तर्क का प्रयोग करने पर स्वतन्त्रता आन्दोलन और उसके लिए किया गया त्याग बलिदान भी निरर्थक ठहराया जा सकता है। इतना ही नहीं छोटे देशों को बड़े देशों की पराधीनता स्वेच्छापूर्वक स्वीकार करने के लिए कहा जा सकता है। हर कोई जानता है कि इस प्रकार की वकालत चाहे कितनी ही तर्कों और तथ्यों सहित प्रस्तुत की जाय, सदा निन्दनीय ही ठहराई जायगी और उस प्रतिपादनकर्ता को निहित स्वार्थों का एजेन्ट कहा जायगा। स्त्रियों को पुरुषों की पराधीनता में ही रहना चाहिए, ऐसा निर्देश करने वाले कोई भी क्यों न हों, मानवी अन्तरात्मा की मूलभूत आकांक्षा एवं प्रकृति से अपरिचित ही ठहराये जायेंगे। शास्त्रों की, सन्तों की, परम्पराओं की दुहाई कितना ही गला फाड़ कर क्यों न दी जाती रहें, तथ्य अपने स्थान पर अटल बने रहेंगे। दलीलें उन्हें झुठला नहीं सकती। नारी दासी है और पुरुष उसका स्वामी, यह बात उसी स्थिति में सही हो सकती थी जब नारी मिट्टी या धातु जैसे जड़ पदार्थों की बनी इच्छा, आकांक्षा और चेतना से रहित रही होती। अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि वह पशु स्तर की होती, जिसे मनुष्यों द्वारा बांधा, बेचा और दुहा जोता जाता है। जैसा कि भूतकाल में उसे भोग्या, रमणी, कामिनी आदि के रूप में माना जाता रहा है यदि उतनी सी ही बात हो तो योरोप की पुरानी मान्यता के अनुसार यह कहा जा सकता है कि ‘‘स्त्रियों में आत्मा नहीं होती। ये पुरुष के उपभोग के लिए बनी हैं, उन्हें स्वतन्त्र इच्छा रखने का अधिकार नहीं है।’’

हम फल, शाक, चीनी, साबुन, कपड़े आदि का मन चाहा उपभोग करते हैं क्योंकि वे भोग्य हैं। स्त्री यदि भोग्या है, उसका जन्म रसोइदारिन, चौकीदारिन और वासना तृप्ति का साधन बनाने के लिए हुआ हो तो वह पुरुष की क्रीत दासी कहला सकती है। उसके स्वामियों को उसे खरीदने, बेचने दान देने, बांधने और पीटते पीटते मार डालने अथवा मन चाहा उपयोग करने की छूट मिल सकती है। उसके मालिक जिस भी स्थिति में रखना चाहें बिना उफ किये उसी को शिरोधार्य करने के लिए कहा जा सकता है। किन्तु स्थिति इससे भिन्न हो, उसे भोग्या या दासी से ऊंचा माना जाय। प्राणधारी का, मनुष्य का दर्जा दिया जाय तो फिर यह सोचना पड़ेगा कि उसका भी अपना कुछ चेतनात्मक अस्तित्व है और उसके साथ जुड़ी हुई स्वतन्त्रता की आकांक्षा के लिए भी कोई स्थान है।

मनुष्य के भीतर बैठा हुआ असुर सदा से दुर्बलों का शोषण करने के लिए लालायित रहा है और उसने जब अवसर पाया है, अपनी घात चलाई है। जो पशु उसकी पकड़ में आ गये अब उनका प्राण कठिन दीखता है। समर्थों ने दुर्बलों को दास बनाया और उनसे लगभग पशुओं जैसा व्यवहार किया। नारी की प्रजनन विशेषता के कारण उसे शारीरिक दृष्टि से दुर्बल पाया और उसे भी शोषण का एक सामान बना लिया। यह प्रवृत्ति पूंजीवाद, उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, अधिनायकवाद सामन्तवाद, पुरोहितवाद आदि के रूप में अभी भी प्रकट और प्रच्छन्न रूप से ढंग और कलेवर बदलती और सिर उठाती देखी जा सकती है। तर्कों के आधार पर इन सभी अवांछनीयताओं को उचित एवं आवश्यक सिद्ध करने का भी प्रयत्न होता रहता है। समर्थ, दुर्बलों का शोषण करें, इसलिए ‘उपयोगितावाद’ का एक स्वतन्त्र दर्शन है। ‘‘सरवाइवल आफ दी फिटेस्ट’’ की उक्ति को समर्थ से लेकर दुर्बल तक अपने-अपने ढंग से चरितार्थ करते दिखाई पड़ते हैं। सत्ताधारी, दुर्बलों को चूसते हैं। दुर्बल व्यक्ति घर की नारियों को पददलित बनाने में नहीं चूकते। वे नारियां भी जब सास बनती हैं तो अपनी पुत्र वधुओं के साथ उसी तरह का व्यवहार करती हैं। वे पुत्र भी अपने बच्चों को मारने-पीटने में कोताही नहीं करते। यह कुचक्र असुरता की प्रतिच्छाया में ही चलता है। मानवता को पैरों तले कुचल कर ही यह दुष्प्रवृत्तियां जीवित रहतीं और फलती-फूलती हैं। समूचे नारी समाज को आज इसी आसुरी शोषण का शिकार रहना पड़ रहा है। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण है नारी को घर के क्षेत्र में, पुरुष के अधिनायकत्व में मौत के दिन पूरे करना।

न्याय, औचित्य और स्वतन्त्रता का समर्थन करने वाले मानवी आदर्श को मान्यता देने वाले उदात्त लोगों की पंक्ति में हमें खड़ा होना चाहिए और इस बात का प्रयत्न करना चाहिए कि नारी घर के उत्तरदायित्व तो सम्भाले, पर उतने ही क्षेत्र में कैद न रहे। उसके ऊपर लगे पर्दा प्रतिबन्ध शिथिल होने चाहिए और उसे विश्वसनीय माना जाना चाहिए। अनुभव बढ़ाने का, समाज का स्वरूप समझने का अवसर मिलना चाहिए। शिक्षा प्राप्त करने के लिए, बाजार से सौदा खरीदने के लिए, अन्य आवश्यक काम निपटाने के लिए, घर के पुरुषों का हाथ बटाने के लिए, लोक मंगल प्रयोजनों के लिए घर से बाहर जाने का अवसर देना चाहिए। इससे मानव जाति की आधी शक्ति मूर्छित आत्मा को जगाने का पथ प्रशस्त होगा और समूची मानव जाति को इस प्रगतिशील कदम का लाभ मिलेगा।

***

*समाप्त*

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