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Books - युग यज्ञ पद्धति

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गायत्री स्तवनम्

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 गायत्री स्तवनम्  प्रेरणा- गायत्री महामंत्र का देवता है ‘‘सविता’’। सविता-प्रकाश, ऊर्जा, चेतना के आदि स्रोत को कहते हैं। भूमण्डल के लिए प्रत्यक्ष स्रोत सूर्य है, इसलिए सामान्य रूप से सविता से सूर्य की संगति बिठा ली जाती है। सविता को ज्योतिपुंज, दिव्य मण्डल के रूप में ही जाना जा सकता है। परमात्मा को उच्चतम आदर्शों-शक्तियों का समन्वय-समुच्चय कहा जाता है। इस प्रकार परमात्मा के प्रकट-भासित होने वाले स्वरूप को ही सविता कहा गया है। गायत्री स्तवन में उसी प्राण शक्ति के, प्रकाश एवं ऊर्जा के आदि स्रोत, चेतना युक्त दिव्य मण्डल को संबोधित किया गया है। उसकी महानताओं, दिव्य क्षमताओं का स्मरण करते हुए उनसे प्रार्थना की गयी है कि वह हमें पवित्र बनाये। वह ‘‘सविता’’ अनादि, स्वप्रकाशित, सभी लोकों का प्रकाशक, सभी तेजों का विशाल पुंज है। दुःख-दारिद्र्य, व्याधियों, आदि का नष्ट करने वाला है। वह त्रैलोक्य में देवों, सिद्धों, ऋषियों सभी जनों से पूजित है। उसकी महिमा का गान वेदों, ज्ञानियों, सिद्धों, चारणों ने किया है। वह उत्पत्ति, पालन और प्रलय की शक्तियों से युक्त, काल का भी काम (महाकाल) अनादि रूप है। वही सब प्राणियों में विशुद्ध आत्मतत्त्व के रूप में स्थित होकर सबका पालन-नियंत्रण करता है। वह अगम्य है, ज्ञान का घन है, सूक्ष्म अन्तःकरण के योग से उसका बोध होता है। सिद्ध-योगीजन उस तक पहुंचने के लिए योग मार्ग का अनुसरण करते हैं। जिसका स्मरण वेदज्ञ, ब्रह्मज्ञ सदैव करते रहते हैं। उस दिव्य ज्ञानपुंज को नमन करते हुए हम उससे बार-बार उस पवित्रता की याचना करते हैं, जो हमें उसकी कृपा का पात्र बनाए रख सके।

क्रिया और भावना- सभी याजक गायत्री स्तवन सुनें- अन्तिम चरण ‘‘पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यं’’ स्वयं भी दुहरायें। मन से प्रार्थना करें कि हमारी भावना, विचारणा, स्वभाव को इतनी पवित्रता प्राप्त हो कि हम देव प्रयोजन में सक्रिय-सहयोगी बन सकें।

 समयावधि के अनुसार हिन्दी या संस्कृत में पाठ करें
ॐ यन्मण्डलं दीपितकरं विशालं, रत्नप्रभं तीव्रमनादिरूपम् ।
 दारिद्रय-दुःखक्षयकारणं च, पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ।।1।।
शुभ ज्योति के पुंज, अनादि, अनुपम। ब्रह्माण्ड व्यापी आलोक कर्त्ता।।
 दारिद्र्य, दुःख भय से मुक्त कर दो। पावन बना दो हे देव सविता।।1।।

यन्मण्डलं देवगणैः सुपूजितं, विप्रैः स्तुतं मानवमुक्तिकोविदम् ।
तं देवदेवं प्रणमामि भर्गं । पुनातु0 ।।2।।
ऋषि देवताओं से नित्य पूजित। हे भर्ग! भव बन्धन-मुक्ति कर्त्ता ।।
स्वीकार कर लो वंदन हमारा। पावन0 ।।2।।

यन्मण्डलं ज्ञानघनं त्वगम्यं, त्रैलोक्यपूज्यं त्रिगुणात्मरूपम् ।
 समस्त-तेजोमय-दिव्यरूपं । पुनातु0 ।।3।।
हे ज्ञान के घन, त्रैलोक्य पूजित। पावन गुणों के विस्तार कर्त्ता।।
 समस्त प्रतिभा के आदि कारण। पावन0 ।।3।।

 यन्मण्डलं गूढमतिप्रबोधं, धर्मस्य वृद्धिं कुरुते जनानाम् ।
 यत् सर्वपापक्षयकारणं च । पुनातु0 ।।4।।
 हे गूढ़ अन्तःकरण में विराजित । तुम दोष-पापादि संहार कर्त्ता।।
शुभ धर्म का बोध हमको करा दो। पावन0 ।।4।।

 यन्मण्डलं व्याधिविनाशदक्षं, यदृग्-यजुः-सामसु सम्प्रगीतम् ।
 प्रकाशितं येन च भूर्भुवः स्वः । पुनातु0 ।।5।।
हे व्याधि-नाशक, हे पुष्टिदाता। ऋग्, साम, यजु वेद संचार कर्त्ता।।
 हे भूर्भुवः स्वः में स्व प्रकाशित। पावन0 ।।5।।

यन्मण्डलं वेदविदो वनन्ति, गायन्ति यच्चारण-सिद्धसंघाः,
 यद्योगिनो योगजुषां च संघाः । पुनातु0 ।।6।।
सब वेदविद् चारण, सिद्ध योगी। जिसके सदा से हैं गान कर्त्ता।।
हे सिद्ध सन्तों के लक्ष्य शाश्वत। पावन0 ।।6।।

 यन्मण्डलं सर्वजनेषु पूजितं, ज्योतिश्च कुर्यादिह मर्त्यलोके ।
यत्काल-कालादिमनादिरूपम् । पुनातु0 ।।7।।
हे विश्व मानव से आदि पूजित। नश्वर जगत् में शुभ ज्योति कर्त्ता।।
हे काल के काल-अनादि ईश्वर। पावन0 ।।7।।


 यन्मण्डलं विष्णुचतुर्मुखास्यं, यदक्षरं पापहरं जनानाम् ।
 यत्कालकल्पक्षयकारणं च । पुनातु0 ।।8।।
 हे विष्णु ब्रह्मादि द्वारा प्रचारित। हे भक्त पालक, हे पाप हर्त्ता ।।
 हे काल-कल्पादि के आदि स्वामी। पावन0 ।।8।।

 यन्मण्डलं विश्वसृजां प्रसिद्धं, उत्पत्ति-रक्षा-प्रलयप्रगल्भम्।
यस्मिन् जगत्संहरतेऽखिलं च । पुनातु0 ।।9।।
हे विश्व मण्डल के आदि कारण। उत्पत्ति-पालन-संहार कर्त्ता ।।
होता तुम्हीं में लय यह जगत् सब। पावन0 ।।9।।

 यन्मण्डलं सर्वगतस्य विष्णोः,
 आत्मा परंधाम-विशुद्धतत्त्वम् सूक्ष्मान्तरैर्योगपथानुगम्यम् । पुनातु0 ।।10।।
हे सर्वव्यापी, प्रेरक नियन्ता। विशुद्ध आत्मा, कल्याण कर्त्ता।।
शुभ योग पथ पर हमको चलाओ। पावन0 ।।10।।

यन्मण्डलं ब्रह्मविदो वदन्ति, गायन्ति यच्चारण-सिद्धसङ्घाः । यन्मण्डलं वेदविदः स्मरन्ति । पुनातु0 ।।11।।
 हे ब्रह्मनिष्ठों से आदि पूजित। वेदज्ञ जिसके गुणगान कर्त्ता।।
 सद्भावना हम सब में जगा दो। पावन0 ।।11।।

यन्मण्डलं वेद-विदोपगीतं, यद्योगिनां योगपथानुगम्यम्।
तत्सर्ववेदं प्रणमामि दिव्यं। पुनातु0 ।।12।।
हे योगियों के शुभ मार्गदर्शक। सद्ज्ञान के आदि संचार कर्त्ता।
प्रणिपात स्वीकार लो हम सभी का। पावन0 ।।12।।
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