पूर्णाहुतिः
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प्रेरणा- परमात्मा अपने आप में पूर्ण है। प्रकृति जिस कार्य को प्रारम्भ करती है, उसे पूर्णता तक पहुंचाती है। किसी कार्य को अपूर्ण छोड़ देना प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करना है। यज्ञ जैसे आध्यात्मिक प्रयोगों को तो पूर्णता तक पहुंचाया ही जाना चाहिए।
गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है कि यह सृष्टि यज्ञमय बनायी गयी है। प्रकृति का हर पुरुषार्थ यज्ञीय भावना-परमार्थ प्रक्रिया के अनुशासन में ही चल रहा है। शरीर का प्रत्येक अंग ‘‘पूर्ण है’’, किन्तु शरीर का क्रम संयुक्त पुरुषार्थ से चलता है। जल, अग्नि, वायु सभी अपने आप में पूर्ण हैं, किन्तु इनके सहयोग-संयोग से ही वृक्ष, वनस्पतियों, खेती आदि का चक्र चलता है, जीवन के विकास के लिए, पूर्णता के लिए, यज्ञीय प्रक्रिया अनिवार्य है।
जीवन को यज्ञमय बनाना यज्ञ की पूर्णता है; किंतु यज्ञ आधे-अधूरे मन से नहीं होता। दीपक अधूरा हो-पूर्ण न हो, तो ज्योति धारण नहीं कर सकता। अगरबत्ती में सभी घटक ठीक ढंग से संजोये न जायें, तो सतत जलते रह कर सुगंधि फैलाना उसके लिए संभव नहीं होगा। इसी प्रकार भावना, विचारणा के संयोग से संकल्प बने और कर्म-पुरुषार्थ उसे धारण करें, तभी जीवन में यज्ञीय ऊर्जा एवं सुगंधि पैदा हो सकती है। दीपयज्ञ की पूर्णाहुति के अन्तर्गत हम श्रेष्ठ संकल्प जाग्रत् करके उन्हें अपने पुरुषार्थ से, जीवन प्रक्रिया से जोड़ते हैं—यही सच्ची पूर्णाहुति है।
क्रिया और भावना- दाहिने हाथ में अक्षत-पुष्प लें। अक्षत अटूट निष्ठा के और पुष्प उल्लास के प्रतीक हैं। भावना करें कि हम दीपयज्ञ से जाग्रत् दिव्य ऊर्जा को अपने अन्दर स्थापित कर रहे हैं। बाहर दीपकों से प्रकाश और अगरबत्तियों की सुगन्धि से वातावरण सुरम्य बन रहा है। हम अपने अन्दर संकल्प की अखण्ड-ज्योति और सत्कर्मों की सुगन्धि स्थापित करें। अपने अंदर जो दोष-दुर्गुण जड़ जमाये बैठे हैं, उनमें से किसी एक को देवशक्तियों की साक्षी में छोड़ने का संकल्प लें। संकल्प सूत्र धारण करते समय जिन अनुशासन-अनुबन्धों को स्वीकार किया था, उनके न्यूनतम ही सहीं, नियमित प्रयोग का स्वरूप निश्चित करें। महाकाल की साक्षी में यज्ञीय, दिव्य वातावरण में पूर्णाहुति संकल्प करें।
(आगे दिया गया संकल्प खण्ड–खण्ड में सबसे दुहरवायें) हम (अपना नाम लें)/ भगवान् महाकाल की साक्षी में/ यज्ञ की/ पूर्णाहुति के रूप में/ यह संकल्प लेते हैं/ कि अपनी (बुराई का नाम लें) बुराई को/ आज से छोड़ दिया। नित्य गायत्री मंत्र की/ उपासना करेंगे। जप के समय भावना करेंगे कि/ हम अपने अंदर/ भगवान् के प्राण एवं प्रकाश को/ धारण कर रहे हैं। अपने दुर्गुणों को हटाने/ श्रेष्ठ गुणों को बढ़ाने/ मन को साधने के लिए/ युग साहित्य का स्वाध्याय/ मनन, चिंतन/ सत्संग/ नियमित रूप से करेंगे। समाज में उत्तम कार्यों/ उत्तम विचारों/ और उत्तम भावनाओं का/ प्रचार-प्रसार/ ईश्वर की आराधना मानकर करेंगे। ईश्वर की साझेदारी के/ इन अनुशासनों को/ जीवन का एक अंग बनाते हैं।/ इनके लिए/ नित्य कम से कम/ .........समय/ तथा .............अंशदान/ निकालते रहेंगे/ यह अनुशासन जीवन भर पालेंगे। हे यज्ञ रूप प्रभो!/ हमारे अन्दर/ सत्कर्मों की ऐसी सुगंधि पैदा करें/ जिसके प्रभाव से/ आस-पास के व्यक्तियों में भी/ सत्कर्म करने की उमंगें उठें। इस प्रकार/ दीप से दीप जलने लगें।
(भावनापूर्वक पूर्णाहुति मंत्र बोलें।)
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं, पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्णमेवावशिष्यते स्वाहा ।
। ॐ सर्वं वै पूर्ण स्वाहा ।।
(अक्षत-पुष्प दीपयज्ञ की थाली में छोड़ दें अथवा स्वयंसेवक उन्हें एकत्रित करके देवमंच पर अर्पित करें।)
क्रिया और भावना- दाहिने हाथ में अक्षत-पुष्प लें। अक्षत अटूट निष्ठा के और पुष्प उल्लास के प्रतीक हैं। भावना करें कि हम दीपयज्ञ से जाग्रत् दिव्य ऊर्जा को अपने अन्दर स्थापित कर रहे हैं। बाहर दीपकों से प्रकाश और अगरबत्तियों की सुगन्धि से वातावरण सुरम्य बन रहा है। हम अपने अन्दर संकल्प की अखण्ड-ज्योति और सत्कर्मों की सुगन्धि स्थापित करें। अपने अंदर जो दोष-दुर्गुण जड़ जमाये बैठे हैं, उनमें से किसी एक को देवशक्तियों की साक्षी में छोड़ने का संकल्प लें। संकल्प सूत्र धारण करते समय जिन अनुशासन-अनुबन्धों को स्वीकार किया था, उनके न्यूनतम ही सहीं, नियमित प्रयोग का स्वरूप निश्चित करें। महाकाल की साक्षी में यज्ञीय, दिव्य वातावरण में पूर्णाहुति संकल्प करें।
(आगे दिया गया संकल्प खण्ड–खण्ड में सबसे दुहरवायें) हम (अपना नाम लें)/ भगवान् महाकाल की साक्षी में/ यज्ञ की/ पूर्णाहुति के रूप में/ यह संकल्प लेते हैं/ कि अपनी (बुराई का नाम लें) बुराई को/ आज से छोड़ दिया। नित्य गायत्री मंत्र की/ उपासना करेंगे। जप के समय भावना करेंगे कि/ हम अपने अंदर/ भगवान् के प्राण एवं प्रकाश को/ धारण कर रहे हैं। अपने दुर्गुणों को हटाने/ श्रेष्ठ गुणों को बढ़ाने/ मन को साधने के लिए/ युग साहित्य का स्वाध्याय/ मनन, चिंतन/ सत्संग/ नियमित रूप से करेंगे। समाज में उत्तम कार्यों/ उत्तम विचारों/ और उत्तम भावनाओं का/ प्रचार-प्रसार/ ईश्वर की आराधना मानकर करेंगे। ईश्वर की साझेदारी के/ इन अनुशासनों को/ जीवन का एक अंग बनाते हैं।/ इनके लिए/ नित्य कम से कम/ .........समय/ तथा .............अंशदान/ निकालते रहेंगे/ यह अनुशासन जीवन भर पालेंगे। हे यज्ञ रूप प्रभो!/ हमारे अन्दर/ सत्कर्मों की ऐसी सुगंधि पैदा करें/ जिसके प्रभाव से/ आस-पास के व्यक्तियों में भी/ सत्कर्म करने की उमंगें उठें। इस प्रकार/ दीप से दीप जलने लगें।
(भावनापूर्वक पूर्णाहुति मंत्र बोलें।)
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं, पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्णमेवावशिष्यते स्वाहा ।
। ॐ सर्वं वै पूर्ण स्वाहा ।।
(अक्षत-पुष्प दीपयज्ञ की थाली में छोड़ दें अथवा स्वयंसेवक उन्हें एकत्रित करके देवमंच पर अर्पित करें।)

