गायत्री मंत्राहुतिः
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गायत्री मंत्राहुतिः
. प्रेरणा- देव संस्कृति में यज्ञ बहुत व्यापक अर्थों में लिया जाता है। उच्च आदर्शों को जीवन में प्रयुक्त करने के लिये किये गये संकल्पबद्ध प्रयासों को यज्ञ कहा जाता रहा है। ज्ञान-यज्ञ, भूदान-यज्ञ, नेत्रदान-यज्ञ आदि शब्दों के भाव से सभी परिचित हैं। इनमें कहीं अग्निहोत्र नहीं होता, फिर भी ये यज्ञ कहे जाते हैं। युग निर्माण अभियान के अन्तर्गत यही प्रयास किया जाता रहा है कि जन-जन को यज्ञीय-आदर्शनिष्ठ, परमार्थनिष्ठ, परमार्थपरक पुरुषार्थ करते रहने की प्रेरणा दी जाये, उसका अभ्यास कराया जाये। इस अभियान में अग्निहोत्र को कम और जीवन यज्ञ प्रक्रिया को सदैव अधिक महत्त्व दिया जाता रहा है। प्रत्यक्ष यज्ञों के तीन पक्ष होते हैं। एक अग्निहोत्र, दूसरा मंत्र प्रयोग और तीसरा साधकों-याजकों की श्रद्धा-भावना। इन तीनों के संयोग से ही यज्ञ बनता है। दीप यज्ञ में अग्निहोत्र को स्वचालित (ऑटोमैटिक) प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है। दीपक में घी और अगरबत्तियों में हवन सामग्री की आहुति स्वचालित ढंग से चलती रहती है। उसके साथ जोड़ने होते हैं, मंत्र और श्रद्धा भावना कुण्ड में हाथ से आहुति डालने की क्रिया पर ध्यान रखने के कारण मंत्र और भावनाओं पर पूरी एकाग्रता नहीं बन पाती। दीप यज्ञ में आहुतियां स्वचालित हो जाने से उधर ध्यान बंटाने की आवश्यकता नहीं रह जाती। साध पूरे मनोयोग से मंत्र और भावना के साथ एकात्मता स्थापित कर सकते हैं। इसीलिए दीपयज्ञ अधिक प्रभावशाली सिद्ध हो रहे हैं।
क्रिया और भावना- सभी याजक ध्यान मुद्रा में बैठें। (एक जयकारा बुलवायें और नीचे लिखी प्रार्थना खण्ड–खण्ड करके दुहरवायें। -हे यज्ञदेव! युगशक्ति-महाकाल के/ महासंकल्प में/ हम अपने स्नेह/ और सद्भाव की आहुतियां/ श्रद्धापूर्वक दे रहे हैं। -इन आहुतियों की सुगन्धि के/ प्रभाव से/ सूक्ष्म जगत् का शोधन होता चले/ नवयुग के अवतरण के लिए/ दिव्य वातावरण बने। क्रिया और भावना – यह प्रार्थना दुहराने के बाद सस्वर गायत्री मंत्र स्वाहा सहित एक साथ बोला जाय। ‘इदं गायत्र्यै इदं न मम’ भी कहा जाय। 24 या समयावधि के अनुसार 12 बार आहुतियां दी जायें। भावना की जाय कि इस सामूहिक आध्यात्मिक प्रयोग से एक प्रचण्ड ऊर्जा पैदा हो रही है, जिससे सूक्ष्म जगत् का शोधन हो रहा है। इस प्रयास में हम जो साधन-श्रद्धा लगा रहे हैं। वह सब परमात्मा की दी हुई हैं, उन्हीं के दिव्य अनुदान उन्हीं के लिए अर्पित किये जा रहे हैं।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् स्वाहा ।
इदं गायत्र्यै इदं न मम । —यजु0 36.3
(आवश्यकतानुसार जन्म-दिन, विवाह-दिन के उपलक्ष्य में भगवान् महाकाल को महामृत्युंजय मंत्र से आहुतियां दी जायें।)
. प्रेरणा- देव संस्कृति में यज्ञ बहुत व्यापक अर्थों में लिया जाता है। उच्च आदर्शों को जीवन में प्रयुक्त करने के लिये किये गये संकल्पबद्ध प्रयासों को यज्ञ कहा जाता रहा है। ज्ञान-यज्ञ, भूदान-यज्ञ, नेत्रदान-यज्ञ आदि शब्दों के भाव से सभी परिचित हैं। इनमें कहीं अग्निहोत्र नहीं होता, फिर भी ये यज्ञ कहे जाते हैं। युग निर्माण अभियान के अन्तर्गत यही प्रयास किया जाता रहा है कि जन-जन को यज्ञीय-आदर्शनिष्ठ, परमार्थनिष्ठ, परमार्थपरक पुरुषार्थ करते रहने की प्रेरणा दी जाये, उसका अभ्यास कराया जाये। इस अभियान में अग्निहोत्र को कम और जीवन यज्ञ प्रक्रिया को सदैव अधिक महत्त्व दिया जाता रहा है। प्रत्यक्ष यज्ञों के तीन पक्ष होते हैं। एक अग्निहोत्र, दूसरा मंत्र प्रयोग और तीसरा साधकों-याजकों की श्रद्धा-भावना। इन तीनों के संयोग से ही यज्ञ बनता है। दीप यज्ञ में अग्निहोत्र को स्वचालित (ऑटोमैटिक) प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है। दीपक में घी और अगरबत्तियों में हवन सामग्री की आहुति स्वचालित ढंग से चलती रहती है। उसके साथ जोड़ने होते हैं, मंत्र और श्रद्धा भावना कुण्ड में हाथ से आहुति डालने की क्रिया पर ध्यान रखने के कारण मंत्र और भावनाओं पर पूरी एकाग्रता नहीं बन पाती। दीप यज्ञ में आहुतियां स्वचालित हो जाने से उधर ध्यान बंटाने की आवश्यकता नहीं रह जाती। साध पूरे मनोयोग से मंत्र और भावना के साथ एकात्मता स्थापित कर सकते हैं। इसीलिए दीपयज्ञ अधिक प्रभावशाली सिद्ध हो रहे हैं।
क्रिया और भावना- सभी याजक ध्यान मुद्रा में बैठें। (एक जयकारा बुलवायें और नीचे लिखी प्रार्थना खण्ड–खण्ड करके दुहरवायें। -हे यज्ञदेव! युगशक्ति-महाकाल के/ महासंकल्प में/ हम अपने स्नेह/ और सद्भाव की आहुतियां/ श्रद्धापूर्वक दे रहे हैं। -इन आहुतियों की सुगन्धि के/ प्रभाव से/ सूक्ष्म जगत् का शोधन होता चले/ नवयुग के अवतरण के लिए/ दिव्य वातावरण बने। क्रिया और भावना – यह प्रार्थना दुहराने के बाद सस्वर गायत्री मंत्र स्वाहा सहित एक साथ बोला जाय। ‘इदं गायत्र्यै इदं न मम’ भी कहा जाय। 24 या समयावधि के अनुसार 12 बार आहुतियां दी जायें। भावना की जाय कि इस सामूहिक आध्यात्मिक प्रयोग से एक प्रचण्ड ऊर्जा पैदा हो रही है, जिससे सूक्ष्म जगत् का शोधन हो रहा है। इस प्रयास में हम जो साधन-श्रद्धा लगा रहे हैं। वह सब परमात्मा की दी हुई हैं, उन्हीं के दिव्य अनुदान उन्हीं के लिए अर्पित किये जा रहे हैं।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् स्वाहा ।
इदं गायत्र्यै इदं न मम । —यजु0 36.3
(आवश्यकतानुसार जन्म-दिन, विवाह-दिन के उपलक्ष्य में भगवान् महाकाल को महामृत्युंजय मंत्र से आहुतियां दी जायें।)

