गायत्री की दैनिक साधनाएं
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
नित्य प्रति की गायत्री साधना में किन्हीं विशेष नियमों के पालन करने की आवश्यकता नहीं होती। अनुष्ठान का, पुरश्चरण का, उद्यापन का तंत्र साधना का विधि विधान विस्तृत है। पर दैनिक साधना सरल है। इसमें प्रायः कोई विशेष भूल नहीं होती। हो भी जाय तो अनिष्ट की कोई आशंका नहीं। गायत्री परम सात्विक स्वभाव की स्नेहमयी माता है जो बालकों से कुछ त्रुटि रह जाने पर भी रुष्ट नहीं होती और रुष्ट हो जाय तो कुछ अनिष्ट नहीं करती। इसलिए जो लोग इस डर से वेदमाता की उपासना नहीं करते कि कुछ भूल हो जाने पर कोई उलटा परिणाम न निकले उन्हें भली भांति समझ रखना चाहिए कि उलटे परिणाम की बात केवल तांत्रिक प्रयोगों में है। नित्य प्रति की दैनिक साधना में ऐसी कोई बात नहीं है।
जिन्होंने नियमित रूप से अभी तक गायत्री की उपासना नहीं की है, जो उसका आरम्भ ही कर रहे हैं उन्हें सबसे पहले द्विजत्व का व्रत लेना चाहिये। गायत्री की आध्यात्मिक माता, किसी सुयोग्य आचार्य को अध्यात्मिक पिता, मानकर ऐसा संकल्प करना चाहिये कि मैं अब पशुवृत्तियों से मन हटा कर देव वृत्तियों को अपना लक्ष मानता हूं। अब मैं निरन्तर दैवी विचारों और दिव्य कर्मों में मन लगाऊंगा और पुराने बुरे स्वभावों को छोड़ने का प्रयत्न करता रहूंगा। यही द्विजत्व है। भोगवाद को जीवनोद्देश्य न मानकर आत्मोन्नति को लक्ष स्वीकार करना यही द्विजत्व का संकल्प है। अपने संकल्प की ओर धीरे धीरे कदम बढ़ाता हुआ द्विज एक न एक दिन पशुता से पूर्ण मुक्त होकर सर्वांश में देव बन जायेगा। द्विजत्व की प्रतिज्ञा के तत्व हैं (1) अज्ञान (2) अशक्ति (3) अभाव, इन तीनों का निवारण। ज्ञान, शक्ति तथा समृद्धि को अपने तथा दूसरों के लिए अधिकाधिक बढ़ाना है। यही तीन प्रतिज्ञाएं यज्ञोपवीत के तीन धागे हैं। इस उत्तरदायित्व को कंधे पर धारण करना ही द्विजत्व है।
विधि पूर्वक कर्म काण्ड के साथ यह दीक्षा ली जा सके तो ठीक, अन्यथा एक दिन उपवास रखकर एकान्त सेवन करते हुए यज्ञ प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि मेरी आज से आध्यात्मिक माता गायत्री, मेरा आत्म पिता अमुक आचार्य, मेरा कार्य क्रम यज्ञोपवीत है। गायत्री आचार्य और यज्ञोपवीत की मन ही मन या पूजा सामग्री के साथ पूजा करके अपना द्विजत्व ग्रहण करते हुए गायत्री की उपासना आरम्भ कर देनी चाहिए। इसके लिए शुक्ल पक्ष की पंचमी, एकादशी तथा पूर्णिमा शुभ हैं। उस दिन दूसरे से या अपने आप दीक्षा लेकर साधना आरम्भ कर देनी चाहिए। इस अवसर पर गुरु पूजन तथा धर्म कार्य के लिए कुछ दान पुण्य भी करना आवश्यक है। शास्त्र में उल्लेख है कि बिना दान का यज्ञ निष्फल होता है।
गायत्री साधना के लिए प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है। सूर्योदय से एक घण्टा पूर्व से लेकर एक घण्टा पश्चात् तक के दो घंटे उपासना के लिए सर्वोत्तम हैं। शरीर को शुद्ध करके साधना पर बैठना चाहिए। साधारणतः स्नान द्वारा ही शरीर की शुद्धि होती है पर किसी विवशता, ऋतु प्रतिकूलता, यात्रा या अस्वस्थता की दशा में हाथ, पांव, मुंह धोकर या गीले कपड़े से शरीर पोंछ कर भी काम चलाया जा सकता है। साधना के लिए एकान्त खुली हवा की ऐसी जगह ढूंढ़नी चाहिए जहां का वातावरण शांतिमय हो। कुश, खजूर, बेंत आदि वनस्पतियों के बने हुए आसन उत्तम है। माला तुलसी या चन्दन की लेनी चाहिए। पालती मार कर सीधे साधे ढंग से बैठना चाहिये। पद्मासन आदि कष्ट साध्य आसन लगाकर बैठने से शरीर और मन दोनों को कष्ट होता है। रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर बैठना चाहिए। प्रातःकाल की साधना पूर्व की ओर और सायंकाल की साधना के लिये पश्चिम की ओर मुंह करके बैठना चाहिये। सूर्य अस्त होने के पश्चात् एक घंटा रात जाने तक साधना की जा सकती है। सूर्यास्त से एक घण्टा बाद और सूर्यास्त से दो घण्टे पूर्व यह तीन घण्टे छोड़ कर रात्रि के अन्य भाग योग मार्गी गायत्री साधना में निषिद्ध हैं। रात्रि में तान्त्रिक प्रयोग किए जाते हैं।
मल-मूत्र त्याग के किसी अनिवार्य कार्य के लिए साधन के बीच में उठना पड़े तो शुद्ध जल से हाथ पांव धोकर तब बैठना चाहिए। एकान्त में जप करते समय माला को ढकने की जरूरत नहीं है पर जहां बहुत आदमियों की दृष्टि पड़ती हो वहां उसे कपड़े से ढक लेना चाहिये या गौमुखी में हाथ डाल लेना चाहिये। माला जपते समय सुमेरु (माला के मध्य का सबसे बड़ा दाना) उल्लंघन न करना चाहिए। एक माला पूरी करके उसे मस्तक तथा नेत्रों से लगा कर फिर पीछे की तरफ उलटा ही वापिस कर लेना चाहिये। सुमेरु का उल्लंघन नहीं किया जाता। इसलिये माला पूरी होने पर उसे हर बार उलट कर ही नया आरम्भ करना चाहिये। तर्जनी उंगली से माला का स्पर्श नहीं करना चाहिये। जहां माला न हो वहां उंगलियों के पोरों की सहायता से जप किया जा सकता है।
जप इस प्रकार करना चाहिये कि कण्ठ से ध्वनि होती रहे, होंठ हिलते रहें पर पास बैठा हुआ मनुष्य भी स्पष्ट रूप से मन्त्र को न सुन सके। सूतक, रोग, अशौच, चारपाई पर पड़े होने, रास्ता चलने आदि परिस्थितियों में होने की दशा में मन ही मन इस प्रकार जप करना चाहिए कि कण्ठ, होंठ, जिह्वा आदि का संचालन न हो। ऐसा मानसिक जप सोते जागते चाहे जिस दिशा में किया जा सकता है।
साधना विधि का निर्देश प्राप्त करने के लिए एक ही गुरू होना चाहिए। वह जो विधि बतावे उसी के आधार पर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक उपासना आरम्भ कर देनी चाहिए। अनेक लोग अनेक प्रकार से साधना करते हैं और ग्रन्थों में भी अनेक विधियां लिखी हैं जिनका आपस में सामंजस्य नहीं क्योंकि अधिकारी भेद से, प्रयोजन भेद से, देश काल भेद से अनेक प्रकार की विधियां प्रचलित हैं। कई व्यक्तियों की सलाह परस्पर विरोधी हो सकती है। ऐसी दशा में साधक भ्रम में पड़ सकता है अतएव किसी एक ही आधार पर अपना कार्य क्रम निर्धारित करना चाहिए। अगर गलत विधि बताई गई है तो उसमें पाप बताने वाले पर पड़ेगा वही उसका दण्ड भुगतेगा। जो साधक अपने मन से नहीं वरन् किसी के आदेश से कार्य कर रहा है उसे किसी प्रकार की हानि नहीं है। उसके लिए वह गलत साधना ही सच्ची साधना का फल देगी। मुद्रा, शाप मोचन, कवच, कीलक, अर्गल आदि क्रियाओं की आवश्यकता तांत्रिक पुरश्चरण में होती है। योग की दक्षिण मार्गी साधना में उनकी कुछ भी आवश्यकता नहीं है।
उपरोक्त नियमों को ध्यान में रखते हुये प्रातः या सायं काल स्वस्थ चित्त से साधना के लिये बैठना चाहिये। पास में जल का भरा पात्र रख लेना चाहिये। और आरम्भ में ब्रह्म संध्या करनी चाहिये। ब्रह्म संध्या की रीति यह है— आचमन—
(1) जल भरे हुए पात्र में से दाहिने हाथ की हथेली पर जल लेकर उसका तीन बार आचमन करे। आचमनों के समय गायत्री पढ़ें। तीन आचमनों का तात्पर्य गायत्री की ह्रीं—सत्व प्रधान, श्रीं—समृद्धि प्रधान और क्लीं—बल प्रधान शक्तियों का मातृ दुग्ध की तरह पान करना है। शिखा बन्धन—
(2) आचमन के पश्चात् शिखा को जल से गीला करके उसमें ऐसी गांठ लगानी चाहिये जो सिरा खींचने से खुल जाय। उसे आधी गांठ कहते हैं। गांठ लगाते समय गायत्री मन्त्र का उच्चारण करते जाना चाहिये। शिखा बन्धन का प्रयोजन ब्रह्म रंध्र में स्थित शतदल कमल चक्र की सूक्ष्म शक्तियों का जागरण करना है। प्राणायाम—
(3) ब्रह्म संध्या का तीसरा कोष प्राणायाम है। वह इस प्रकार करना चाहिये
(अ) स्वस्थ चित्त से बैठिये, मुख को बन्द कर लीजिए नेत्रों को बन्द या अधखुला रखिये। अब सांस को धीरे-धीरे नासिका द्वारा भीतर खींचना आरम्भ कीजिए और ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ इस मन्त्र का मन ही मन उच्चारण करते चलिए। और भावना कीजिए कि ‘विश्व व्यापी दुख नाशक, सुख स्वरूप, ब्रह्म की चैतन्य प्राण शक्ति को मैं नासिका द्वारा आकर्षित कर रहा हूं।’ इस भावना और इस मन्त्र भाग के साथ धीरे धीरे सांस खींचिए और जितनी अधिक वायु भीतर भर सकें भर लीजिए।
(ब) अब वायु का भीतर रोकिए और ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ इस भाग का जप कीजिए साथ ही भावना कीजिए कि ‘नासिका द्वारा खींचा हुआ वह प्राण श्रेष्ठ है। सूर्य के समान तेजस्वी है। इसका तेज मेरे अंग प्रत्यंग में रोम-रोम में भरा जा रहा है।’ इस भावना के साथ पूरक की अपेक्षा आधे समय तक वायु को भीतर रोक रखे। (स) अब नासिका द्वारा वायु को धीरे धीरे बाहर निकालना आरम्भ कीजिए और ‘भर्गो देवस्य धीमहि’ इस मन्त्र भाग को जपिए तथा भावना कीजिए कि ‘‘यह दिव्य प्राण मेरे पापों को नाश करता हुआ विदा हो रहा।’’ वायु को निकाल लेने में प्रायः उतना ही समय लगाना चाहिए जितना वायु खींचने में लगा था।
(द) जब भीतर की वायु बाहर निकल जावे तो जितनी देर वायु को भीतर रोक रखा था उतनी ही देर बाहर रोक रखें अर्थात् बिना सांस लिए रहें और ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ इस मन्त्र को जपते रहें। साथ ही भावना करें कि ‘‘भगवती वेदमाता आद्यशक्ति गायत्री हमारी सद्बुद्धि को जागृत कर रही हैं।’’
यह एक प्राणायाम हुआ। अब इसी प्रकार पुनः इन क्रियाओं की पुनरुक्ति करते हुए दूसरा प्राणायाम करें। संध्या में यह पांच प्राणायाम करने चाहिये। जिससे शरीर स्थित प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान नामक पांच प्राणों का व्यायाम, प्रस्फुरण और परिमार्जन हो जाता है।
अघमर्षण—
(4) अघमर्षण के लिए दाहिने हाथ की हथेली पर जल लेकर उसे दाहिने नथुने के समीप ले जाना चाहिए। समीप का अर्थ है छै अंगुल दूर। बाएं हाथ के अंगूठे से बांया नथुना बन्द कर लें और दाहिने नथुने से धीरे-धीरे सांस खींचना आरम्भ करें। सांस खींचते समय भावना करें कि ‘‘गायत्री माता का पुण्य प्रतीक यह जल अपनी दिव्य शक्तियों सहित पापों का संहार करने के लिए सांस के साथ मेरे अन्दर प्रवेश कर रहा है। और भीतर से पापों को, मलों को, विकारों को, संहार कर रहा है।’’
जब पूरी सांस खींच चुकें तो बांया नथुना खोल दें और दाहिना नथुना अंगूठे से बन्द कर दें और सांस बाहर निकालनी आरम्भ करें। दाहिनी हथेली पर रखे हुए जल को अब बांए नथुने के सामने करें और भावना करें कि ‘नष्ट हुए पापों की लाशों का समूह सांस के साथ बाहर निकल कर इस जल में गिर रहा है।’ जब सांस पूरी बाहर निकल जाय तो उस जल को बिना देखे घृणा पूर्वक बाईं ओर पटक देना चाहिए।
अघमर्षण क्रिया में जल को हथेली पर भरते समय ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ दाहिने नथुने से सांस खींचते समय ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ इतना मन्त्र भाग जपना चाहिए और बाएं नथुने से सांस छोड़ते समय ‘भर्गो देवस्य धीमहि’ और जल पटकते समय ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ इस मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए। वह क्रिया तीन बार करनी चाहिए जिससे काया के, वाणी के और मन के त्रिविध पापों का संहार हो सके।
न्यास—
(5) न्यास कहते हैं धारण करने को। अंग प्रत्यंगों में गायत्री की सतोगुणी शक्ति को धारण करने, स्थापित करने, भरने ओत-प्रोत करने के लिए न्यास किया जाता है। गायत्री की ब्रह्म संध्या में अंगूठा और अनामिका उंगली का प्रयोग प्रयोजनीय ठहराया गया है। अंगूठा और अनामिका उंगली को मिला कर विभिन्न अंगों का स्पर्श इस भावना से करना चाहिए कि मेरे यह अंग गायत्री शक्ति से पवित्र तथा बलवान हो रहे हैं। अंग स्पर्श के साथ निम्न प्रकार मन्त्रोच्चार करना चाहिए—
(1) ॐ भूर्भुवः स्वः—मूर्धायै। (2) तत्सवितुः—नेत्राभ्यां। (3) वरेण्यं—कर्णाभ्यां। (4) भर्गो—मुखाय। (5) देवस्य—कण्ठाय। (6) धीमहि—हृदयाय। (7) धियो यो नः—नाभ्यै। (8) प्रचोदयात्—हस्त पादाभ्यां।
यह पंच कर्म—आचमन, शिखा बन्धन, प्राणायाम, अघमर्षण, न्यास को पूरे करने के पश्चात् माता गायत्री और पिता आचार्य को ध्यान द्वारा मानसिक प्रणाम करना चाहिये यदि दोनों के चित्र हों तो उन्हें केवल प्रणाम करके अथवा धूप, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प, चन्दन आदि मांगलिक द्रव्यों से पूजन करके जप आरम्भ कर देना चाहिए। कम से कम 108 मन्त्रों की एक माला तो जपनी ही चाहिए इससे अधिक सुविधानुसार जितना हो सके उतना उत्तम है। जप काल में ध्यान मुद्रा रखते हुए नेत्र अधर खुले रखने चाहिए। मस्तिष्क के मध्य में दीपक की लौ के समान तेज स्वरूप दिव्य शक्ति गायत्री का ध्यान करना चाहिए। इस तेज की ज्योति के मध्य में कभी कभी भगवती की मुस्कुराती दिव्य मुखाकृति साधक को दिखाई पड़ती है।
जप पूरा हो जाने पर भगवती को प्रणाम करके उनसे विसर्जित होने की प्रार्थना करनी चाहिए और उठ कर उस समय सूर्य जिस दिशा में रहा हो उस दिशा में जल का अर्घ दे देना चाहिये। यह नित्य प्रति की सर्व सुलभ साधना है। इसमें किसी विशेष प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है पर जहां तक बन पड़े सात्विक आहार विहार रखना ही उचित है क्योंकि माता सतोगुणी बालकों से ही प्रसन्न रहती है।
सर्व सुलभ ध्यान
जप के उपरान्त अथवा किसी अन्य सुविधा के समय में नित्य गायत्री का ध्यान किया जाना चाहिए। एकान्त, कोलाहल रहित, शान्त वातावरण के स्थान में स्थिर चित्त होकर ध्यान के लिए बैठना चाहिए। शरीर शिथिल रहे। यदि जप काल में ध्यान किया जा रहा है तब तो पालती मार कर, मेरुदण्ड सीधा रखकर ही ध्यान करना ही उचित है। यदि अलग समय में करना हो तो आराम कुर्सी पर लेट कर या मसनद, दीवार, वृक्ष आदि का सहारा लेकर साधना करना चाहिए। शरीर बिलकुल शिथिल कर दिया जाय। इतना शिथिल मानो देह निर्जीव हो गया हो। इस स्थिति में नेत्र बन्द करके दोनों हाथों को गोदी में रख कर ऐसा ध्यान करना चाहिए कि— इस संसार में सर्वत्र केवल नील आकाश है, उसमें कहीं कोई वस्तु नहीं है। प्रलय काल में जैसी स्थिति होती है, आकाश के अतिरिक्त और कहीं कुछ नहीं रह जाता वैसी स्थिति का कल्पना चित्र मन में भली भांति अंकित करना चाहिए। जब यह कल्पना चित्र मानस लोक में भली भांति अंकित हो जाय तो सुदूर आकाश में एक छोटे ज्योति पिण्ड को सूक्ष्म नेत्रों से देखना चाहिए। सूर्य के समान प्रकाशवान एक छोटे नक्षत्र के रूप में गायत्री का ध्यान करना चाहिए। यह ज्योति पिण्ड अधिक समय तक ध्यान करने पर समीप आता है, बड़ा होता जाता है और उसका तेज अधिक प्रखर होता जाता है।
चन्द्रमा या सूर्य के मध्य भाग में ध्यान पूर्वक देखा जाय तो उसमें काले काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं। इसी प्रकार इस गायत्री तेज पिण्ड में भी ध्यान पूर्वक देखने से आरम्भ में भगवती गायत्री की धुंधली प्रतिमा दृष्टि गोचर होती है। धीरे धीरे ध्यान करने वाले को यह मूर्ति अधिक स्पष्ट, अधिक स्वच्छ और अधिक चैतन्य, हंसती, बोलती, चेष्टा करती, संकेत करती तथा भाव प्रकट करती हुई दिखाई पड़ती है। इस पुस्तक के आरम्भ में भगवती गायत्री का एक चित्र दिया हुआ है। उस चित्र को ध्यान आरम्भ करने से पूर्व कई बार प्रेम से, गौर से, भली भांति से अंग प्रत्यंगों का निरीक्षण करके उस मूर्ति को मनःक्षेत्र में इस प्रकार बिठाना चाहिए कि ज्योति-पिण्ड में ठीक वैसी ही प्रतिमा की झांकी होने लगे। थोड़े दिनों में यह तेजोमण्डल में आवेष्टित भगवती गायत्री की छवि अत्यन्त सुन्दर अत्यन्त हृदय ग्राही रूप से ध्यानावस्था में दृष्टिगोचर होने लगती है।
जैसे सूर्य की किरणें धूप में बैठे मनुष्य के ऊपर पड़ती हैं और वह किरणों की उष्णता को प्रत्यक्ष अनुभव करता है वैसे ही यह ज्योति पिण्ड जब समीप आने लगता है तो ऐसा अनुभव होता है मानों कोई दिव्य प्रकाश अपने मस्तक में, अन्तःकरण में और शरीर के रोम-रोम में प्रवेश करके अपना अधिकार जमा रहा है। जैसे अग्नि में पड़ने से लोहा भी धीरे धीरे गरम और लाल रंग का अग्निवर्ण हो जाता है वैसे ही जब गायत्री तेज को ध्यानावस्था में साधक अपने अन्दर धारण करता है तो वह भी सच्चिदानन्द स्वरूप, ऋषि कल्प हो कर ब्रह्म तेज से झिलमिलाने लगता है। उसे अपना सम्पूर्ण स्वरूप तप्त स्वर्ण की भांति रक्त वर्ण अनुभव होता है और अन्तःकरण में एक अलौकिक दिव्य तत्व का प्रकाश सूर्य के समान प्रकाशित हुआ दीखता है। इस तेज संस्थान में आत्मा के ऊपर चढ़े हुए अनेक कलुष कषाय जल बल कर भस्म हो जाते हैं और साधक अपने को ब्रह्म स्वरूप, निर्मल, निर्भय, निष्पाप, निरासक्त अनुभव करता है।
शक्ति का अकूत भण्डार अनुष्ठान
यदि धन अपने पास हो तो उसके बदले में कोई भी वस्तु खरीदी जा सकती है। यदि शारीरिक बल अपने पास हो तो उससे किसी भी प्रकार का काम पूरा किया जा सकता है। यदि बुद्धि बल अपने पास हो तो उससे कठिन से कठिन उलझनें सुलझाई जा सकती हैं। इसी प्रकार यदि आत्म बल अपने पास हो तो उससे जीवन को उन्नत बनाने, मनोकामनाएं पूरी करने, सामने उपस्थित कठिनाइयों को सरल बनाने एवं आपत्तियों से छूटने के कार्य सम्पन्न किए जा सकते हैं। गायत्री अनुष्ठान आत्म-बल संचय की एक विशेष प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया द्वारा जो आत्म बल संचय होता है वह दैवी वरदान की तरह आपत्तियों का निवारण और सम्पत्तियों का आयोजन करने में बड़ी भारी सहायता करता है।
अब कोई नया काम आरम्भ करना है, जब सांसारिक प्रयत्न असफल हो रहे हों, आपत्तियों के निवारण का मार्ग न दीखता हो, चारों ओर अन्धकार छाया हुआ हो, भविष्य चिन्ताजनक दिखाई दे रहा हो, परिस्थितियां दिन दिन बिगड़ती जा रही हों, सीधा करते उलटा परिणाम निकलता हो तो स्वभावतः मनुष्य के हाथ पैर फूल जाते हैं। ऐसे अवसरों पर अनुष्ठान की प्रक्रिया द्वारा गायत्री माता को पुकारना बहुधा सफल होते देखा गया है। बच्चा साधारण रीति से दिन भर मां, मां पुकारता रहता है। माता भी दिन भर लल्ला बेटा, कह कर उत्तर देती रहती है। यह लाड़ प्यार दिन भर चलता रहता है। पर जब कोई विशेष बल पूर्वक, विशेष स्वर से माता को पुकारता है। इस विशेष पुकार को सुनकर माता अपने अन्य कामों को छोड़ कर बालक के पास दौड़ जाती है और उसकी सहायता करती है। अनुष्ठान साधक की ऐसी ही पुकार है जिसमें विशेष बल एवं विशेष आकर्षण होता है। उस आकर्षण से गायत्री शक्ति विशेष रूप से साधक के समीप एकत्रित हो जाती है। और उस शक्ति को जिस कार्य में प्रयुक्त किया जाता है उसी में सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है।
अनुष्ठान किसी विशेष संख्या में मन्त्रों का जप, किसी विशेष अवधि में, किन्हीं विशेष नियमोपनियमों के साथ करने को कहते हैं। प्रायः इस प्रकार के अनुष्ठान किए जाते हैं— (1) चौबीस दिन में चौरासी हजार मन्त्र का अनुष्ठान (2) नौ दिन में चौबीस हजार का अनुष्ठान (3) चालीस दिन में सवा लाख का अनुष्ठान (4) सवा वर्ष (पन्द्रह मास में) चौबीस लाख का अनुष्ठान। 24 हजार का छोटा और 24 लक्ष से बड़ा अनुष्ठान नहीं होता। साधारणतः ‘ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्’ यही मन्त्र जपा जाता है। पर किन्हीं विशेष प्रयोजनों के लिए व्याहृतियों से पहले या पीछे ह्रीं, श्रीं, क्लीं, हुं, ऐं, उं, यं आदि बीज अक्षर भी लगाए जाते हैं। बीज अक्षरों के प्रयोग के लिए किसी अनुभवी की सलाह ले लेना आवश्यक है। अशिक्षित, बहुधन्धी, कार्य, व्यस्त, रोगी स्त्री पुरुष या बालक केवल ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ इस पंचाक्षरी मन्त्र से भी गायत्री का अनुष्ठान कर सकते हैं।
अनुष्ठान के दिनों में ब्रह्मचर्य से रहना आवश्यक है। बीच में किसी दिन स्वप्नदोष हो जाय तो उसके प्रायश्चित स्वरूप उस दिन एक माला अधिक जप लेनी चाहिए शिर के बाल नहीं काटने चाहिये। ठोड़ी की हजामत अपने हाथ ही बनानी चाहिए। चारपाई या पलंग का त्याग करके चटाई या तख्त पर सोना चाहिए। उनकी कठोरता कम करने के लिए ऊपर गद्दे बिछाये जा सकते हैं। आहार विहार सात्विक रहना चाहिए। मद्य, मांस तो पूर्ण रूप से त्याग देना उचित है। अन्य नशीली, बासी, बुरी, गरिष्ठ, चटपटी, तामसिक, उष्ण उत्तेजक वस्तुओं से बचने का यथा सम्भव प्रयत्न करना चाहिए। कुविचार, कुकर्म, विलासिता, अनीति आदि बुराइयों से वैसे तो सदा ही बचना चाहिए पर अनुष्ठान काल में इनका विशेष ध्यान रखना चाहिए। जनन या मृत्यु या सूतक हो जाने पर सूतक निवृत्ति का अनुष्ठान स्थिर रखना चाहिए। शुद्धि होने पर उसी संख्या से आरम्भ किया जा सकता है जहां से बन्द किया था। इस विशेष काल के प्रायश्चित के लिये एक हजार मन्त्र विशेष रूप से जपने चाहिए। अनुष्ठान काल में चाम के जूतों के स्थान पर रबड़ तले वाले कपड़े के जूते या लकड़ी की चट्टी प्रयोग करना उचित है। अपने शरीर और वस्त्रों का दूसरों से जहां तक हो सके कम ही स्पर्श होने देना चाहिए। उस अवधि में एक समय अन्नाहार दूसरे समय फल या दूध लेकर अर्द्ध उपवास का क्रम चल सके तो बहुत उत्तम है। इनके अतिरिक्त उन नियमों को भी पालन करना चाहिए जो दैनिक सर्व सुलभ साधनाओं के प्रकरण में लिखे गये हैं।
जितने दिन में जितने मन्त्र पूरे करने हों उनका हिसाब लगाकर यह देख लेना चाहिए कि प्रति दिन कितने मन्त्र जपने हैं। 108 दाने की माला होती है उससे यह हिसाब लग जाता है कि कितनी मालाएं नित्य जपनी हैं। मालाओं की गिनती याद रखने के लिए किसी स्लेट आदि पर पेन्सिल से रेखाएं खींचते जाना चाहिए या गंगा जल में खड़िया मिट्टी सान कर गोलियां बना लेनी चाहिए। एक माला जप लेने पर एक गोली इस डिब्बे से निकालकर उस डिब्बे में डाल दी। इस प्रकार जब सब गोली एक डिब्बे में से खाली हो जांय तब समझना चाहिए कि जप पूरा हो गया। इस क्रम से जप संख्या में भूल नहीं पड़ती।
अनुष्ठान के आरम्भ में पूजन करना चाहिए। शीशे में मढ़ी हुई गायत्री की तस्वीर या प्रतिमा को सामने रख कर धूप, दीप, नैवेद्य, चन्दन, अक्षत, पुष्प, जल आदि मांगलिक पदार्थों से पूजा करनी चाहिए। पूजा से पूर्व आह्वान मन्त्र पढ़ना चाहिए और प्रतिदिन जप समाप्त करते समय विसर्जन मन्त्र पढ़ना चाहिए। दोनों मन्त्र इस प्रकार हैं—
गायत्री आह्वान का मन्त्र—
गायत्री वरदा देवी त्र्यक्षरे ब्रह्म वाहिनी। गायत्री छन्दसां माता ब्रह्म योने नमोस्तुते॥ गायत्री विसर्जन मन्त्र— उत्तमे शिखरे देवि भूम्यां पर्वत मूर्धनि। ब्राह्मणेभ्योह्यनुज्ञानं गच्छ देवि यथासुखम्॥
अनुष्ठान का पथ प्रदर्शक एवं संरक्षक किसी आचार्य को ब्रह्मा रूप में वरण करना चाहिए। अनुष्ठान भी एक यज्ञ है। यक्ष में पुरोहित या ब्रह्मा न हो तो वह निष्फल होता है। इसी प्रकार अनुष्ठान का पुरोहित या ब्रह्मा नियुक्त करना आवश्यक है। यदि वरण किया हुआ ब्रह्मा नित्य उपस्थित न हो सके तो उसके चित्र की अथवा उसका प्रतिनिधि मानकर स्थापित किए हुए नारियल की पूजा करनी चाहिए। गायत्री तथा ब्रह्मा रूपी आध्यात्मिक माता पिताओं का पूजन करने के उपरान्त ब्रह्म संध्या के पांच कोष (आचमन, शिखा बन्धन, प्राणायाम, अघमर्षण, न्यास) करके जप आरम्भ कर देना चाहिए। जप के अन्त में आरती करनी चाहिए और बची हुई पूजा सामग्री को किसी पवित्र स्थान में तथा जल को सूर्य की ओर विसर्जित कर देना चाहिए। यदि प्रातः सायं दो बार में अनुष्ठान करना हो तो प्रातःकाल के लिए अधिक संख्या में और सायं काल के लिए उससे कम जप रखना चाहिए। दोनों ही बार पूजन संध्या के उपरान्त जप होना चाहिए।
कई ग्रन्थों में ऐसा उल्लेख है कि शापमोचन, कवच, कीलक, अर्गल, मुद्रा के साथ जप करना और जप से दसवां भाग हवन, हवन से दसवां भाग तर्पण, तर्पण से दसवां भाग ब्राह्मण भोज कराना चाहिए। यह नियम तंत्रोक्त रीति से किए हुए गायत्री पुरश्चरण के लिए हैं। इन पंक्तियों में वेदोक्त योग विधि से दक्षिण मार्गी साधना बताई जा रही हैं। इसमें अन्य विधियों की आवश्यकता तो नहीं है पर हवन और दान आवश्यक है। अनुष्ठान के अन्त में कम से कम 108 आहुतियों का हवन अवश्य होना चाहिए। अधिक अपनी श्रद्धा के ऊपर निर्भर है। जिसे ब्रह्मा माना है उससे विसर्जन के समय दान, दक्षिणा, वस्त्र, पात्र, अन्न आदि से सत्कार करना चाहिए और थोड़ा बहुत ब्राह्मण भोजन भी करना चाहिये। यज्ञ के प्रसाद के रूप में अपने मित्रों तथा सद् वृत्ति वालों में प्रसाद रूप से कुछ वितरण करना चाहिए। प्रसाद रूप में वितरण करने के लिए हमारी छै छै आने वाली, ‘गायत्री ही कामधेनु है’, ‘वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री’, ‘गायत्री की सर्वसुलभ साधनाएं’ सबसे उत्तम हैं। विशेषतया ‘गायत्री ही कामधेनु है’ का महत्व अधिक है क्यों कि उससे दूसरों को भी इस अमृत का पान करने की इच्छा होती है। इस प्रकार की इच्छा पैदा कर देना किसी मनुष्य का सबसे बड़ा उपकार है इसलिए वह सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म दान है। गायत्री के 24 अक्षर एवं 14 पद हैं। तदनुसार अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार माला के एक एक दाने पर एक एक पुस्तक के हिसाब से 108 पुस्तकें, अथवा गायत्री के चौबीस अक्षरों के आधार पर 24, या 14 पदों के आधार पर कम से कम 14 पुस्तकें तो इस अवसर पर अवश्य ही दान कर देनी चाहिए।
अश्विन और चैत्र की नव दुर्गाओं में गायत्री साधना के लिए बड़ा ही उपयुक्त अवसर है। उस समय छोटा बड़ा अनुष्ठान करना अपेक्षा कृत अधिक फलदायक होता है। जेष्ठ सुदी 10 (दशहरा) गायत्री और गंगा की जन्म जयन्ती है। उस दिन एक छोटा अनुष्ठान पूरा करना विशेष फलप्रद है।
जो व्यक्ति स्वयं अनुष्ठान न करने की स्थिति में नहीं हैं वे अनिष्ट निवारण, मनोरथ पूर्ति, सुख शान्ति की रक्षा, आत्मबल वृद्धि एवं पुण्य संचय के लिये किसी सत्पात्र ब्राह्मण को उसका पारिश्रमिक देकर अनुष्ठान करा सकते हैं। नित्य एक दो घण्टा जप के लिए किसी साधक को इसी आधार पर अपने लिए साधना करने के लिए नियुक्त कर देना भी उत्तम है।
सर्व शुभ गायत्री यज्ञ
गायत्री अनुष्ठान के अन्त में या किसी भी अन्य शुभ अवसर पर ‘‘गायत्री यज्ञ’’ करना चाहिए। कुण्ड खोद कर या वेदी बना कर दोनों की प्रकार हवन किया जा सकता है। निष्काम आत्मोन्नति के लिए कुण्ड खोद कर आर सकाम साधना में वेदी बना कर हवन करना चाहिए। कुण्ड या वेदी की लम्बाई चौड़ाई साधक के अंगुली से चौबीस चौबीस अंगुल होनी चाहिये। कुण्ड बनाना हो तो उसे चौबीस अंगुल गहरा इस प्रकार तिरछा खोदना चाहिए कि नीचे पहुंचते पहुंचते चार अंगुल लम्बा चार अंगुल चौड़ा चौकोर रह जावे। उसे भली प्रकार लीप कर, पोत कर, रोली, आटा, मेंहदी, हल्दी आदि रंगों से चौक पूरी तरह सुसज्जित बना देना चाहिये। कुण्ड या वेदी से चार अंगुल हट कर एक छोटी नाली दो अंगुल चौड़ी दो अंगुल गहरी खोद कर उसमें पानी भर देना चाहिए।
वेदी या कुण्ड के ईशान कोण में कलश स्थापित करना चाहिए। छोटी चौकी पर गायत्री की प्रतिमा प्रतिष्ठित करके उसका पूजन करना चाहिए। तदुपरान्त बन्धु-बान्धव, पत्नी, गुरुजन आदि मिल कर हवन करें। सामग्री कम हो तो एक व्यक्ति सामग्री की और दूसरी घी की आहुति डाले। एक को ही हवन करना हो तो घी, सामग्री मिला कर इकट्ठी कर ले। अधिक सामग्री और घी हो तो कई व्यक्ति उसे लेकर बैठ सकते हैं। मन्त्रोच्चारण वे सभी कर जो शुद्ध हो कर आये हों।
हवन के आरम्भ में ब्रह्म सन्ध्या करके गायत्री मन्त्र का उच्चारण करते हुए कपूर जला कर समिधाओं में अग्नि प्रज्वलित करे। सब लोग साथ साथ मन्त्र बोलें और अन्त में स्वाहा उच्चारण के साथ आहुति डाली जाय। आहुति के अन्त में चम्मच में से बचे हुए घृत की एक दो बूंद पास में रखे हुए जल पात्र में टपकाते जाना चाहिए। और ‘‘आदि शक्ति गायत्र्यै इदन्नमम’’ का उच्चारण करते जाना चाहिए। आहुतियां कम से कम 108 होनी चाहिए। अधिक चाहे जितनी हो सकती है। प्रति आहुति में कम से कम तीन मासे सामग्री और एक मासे घृत होना चाहिए। इस प्रकार छोटे से छोटे से हवन में 6 छटांक सामग्री और 2 छटांक घी होना चाहिए। आहुतियां समाप्त होने पर मधुर पकवानों, मिष्ठानों को अग्नि में चढ़ाना चाहिए। अन्त में एक नारियल की गिरी या गोला ले कर उसमें छेद करके यज्ञ शेष घृत भर देना चाहिए और खड़े होकर पूर्णाहुति के रूप में उसे अग्नि में समर्पित कर देना चाहिए। यदि कुछ सामग्री बची हो तो वह भी उसी समय चढ़ा देनी चाहिए।
इसके बाद सब लोग खड़े होकर यज्ञ की चार परिक्रमा करें और ‘इदन्नमम’ का पानी पर तैरता हुआ घृत उंगली से ले कर पलकों पर लगावें। हवन की भस्म मस्तक पर लगावें। कीर्तन या भजन गायन करें। उपस्थित लोगों को प्रसाद वितरण करें। प्रसाद रूप में देने के लिए ‘गायत्री ही कामधेनु है’ पुस्तक सर्वोत्तम ब्रह्म प्रसाद है।
कोई भी साधनाएं तीन उद्देश्यों से कही जाती हैं। (1) आत्म कल्याण के लिए सतोगुणी (2) समृद्धि वृद्धि के लिए रजोगुणी (3) बल वृद्धि या आपत्ति निवारण के लिए तमोगुणी। इन प्रयोजनों के आधार पर जो साधन सामग्रियां प्रयुक्त होती हैं वह भी इन तीन गुणों के आधार पर होनी चाहिए। इनका कुछ संक्षिप्त विवरण नीचे हैं— सतोगुण:— माला—तुलसी। आसन—कुश। पुष्प-श्वेत। पात्र—तांबा। वस्त्र—सूत (खादी)। मुख—पूर्व को। दीपक में घृत—गौ घृत। तिलक—चन्दन। हवन में समिधा—पीपल, बड़, गूलर। हवन सामग्री—श्वेत चन्दन, अगर छोटी इलायची, लौंग, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, सतावरि, खस, शीतल चीनी, आंवला, इन्द्र जौ, वंशलोचन, जावित्री, गिलोय, वचनेत्र—बाला, मुलहठी, कमल केशर, बड़ की जटाएं, नारियल, बादाम, दाख, जौ, मिश्री। तिथि—एकादशी।
रजोगुण:— माला—चन्दन, आसन—सूत। पुष्प—पीले। पात्र—कांसा। वस्त्र—रेशम। मुख—उत्तर को। दीपक में घृत—भैंस का घृत। तिलक—रोली। समिधा—आम ढाक, शीशम। हवन सामग्री—देवदारू, बड़ी इलायची, केशर, छार छबीला, पुनर्नवा, जीवन्ती, कचूर, तालीस पत्र, रास्ना, नागर मोथा, उन्नाव, तालमखाना, मोचरस, सोंफ, चित्रक, दालचीनी, पद्माख, छुहारा, किशमिश, चावल, खांड। तिथि—पूर्णमासी।
तमोगुण:— माला—रुद्राक्ष। आसन—ऊन। पुष्प—हल्के या गहरे लाल। वस्त्र—ऊन। मुख—पश्चिम को। दीपक में घृत—बकरी का। तिलक—भस्म का। समिधा—बेल, छोंकर, करील। हवन सामिग्री—रक्त चन्दन, तगर, असगन्ध, जायफल, कमलगट्टा, नाग केशर, पीपल बड़ी, कुटकी, चिरायता, अपामार्ग, काकड़ासिंगी, पोहकर मूल, कुलंजन, मूसली स्याह, मेथी के बीज, काकजंघा, भारंगी, अकरकरा, पिस्ता, अखरोट, बिरोंजी, तिल, उड़द, गुड़। तिथि-पंचमी।
गुणों के अनुसार साधना सामग्री उपयोग करने से साधक में उन्हीं गुणों की अभिवृद्धि होती है तदनुसार सफलता का मार्ग अधिक सुगम हो जाता है।
जिन्होंने नियमित रूप से अभी तक गायत्री की उपासना नहीं की है, जो उसका आरम्भ ही कर रहे हैं उन्हें सबसे पहले द्विजत्व का व्रत लेना चाहिये। गायत्री की आध्यात्मिक माता, किसी सुयोग्य आचार्य को अध्यात्मिक पिता, मानकर ऐसा संकल्प करना चाहिये कि मैं अब पशुवृत्तियों से मन हटा कर देव वृत्तियों को अपना लक्ष मानता हूं। अब मैं निरन्तर दैवी विचारों और दिव्य कर्मों में मन लगाऊंगा और पुराने बुरे स्वभावों को छोड़ने का प्रयत्न करता रहूंगा। यही द्विजत्व है। भोगवाद को जीवनोद्देश्य न मानकर आत्मोन्नति को लक्ष स्वीकार करना यही द्विजत्व का संकल्प है। अपने संकल्प की ओर धीरे धीरे कदम बढ़ाता हुआ द्विज एक न एक दिन पशुता से पूर्ण मुक्त होकर सर्वांश में देव बन जायेगा। द्विजत्व की प्रतिज्ञा के तत्व हैं (1) अज्ञान (2) अशक्ति (3) अभाव, इन तीनों का निवारण। ज्ञान, शक्ति तथा समृद्धि को अपने तथा दूसरों के लिए अधिकाधिक बढ़ाना है। यही तीन प्रतिज्ञाएं यज्ञोपवीत के तीन धागे हैं। इस उत्तरदायित्व को कंधे पर धारण करना ही द्विजत्व है।
विधि पूर्वक कर्म काण्ड के साथ यह दीक्षा ली जा सके तो ठीक, अन्यथा एक दिन उपवास रखकर एकान्त सेवन करते हुए यज्ञ प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि मेरी आज से आध्यात्मिक माता गायत्री, मेरा आत्म पिता अमुक आचार्य, मेरा कार्य क्रम यज्ञोपवीत है। गायत्री आचार्य और यज्ञोपवीत की मन ही मन या पूजा सामग्री के साथ पूजा करके अपना द्विजत्व ग्रहण करते हुए गायत्री की उपासना आरम्भ कर देनी चाहिए। इसके लिए शुक्ल पक्ष की पंचमी, एकादशी तथा पूर्णिमा शुभ हैं। उस दिन दूसरे से या अपने आप दीक्षा लेकर साधना आरम्भ कर देनी चाहिए। इस अवसर पर गुरु पूजन तथा धर्म कार्य के लिए कुछ दान पुण्य भी करना आवश्यक है। शास्त्र में उल्लेख है कि बिना दान का यज्ञ निष्फल होता है।
गायत्री साधना के लिए प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है। सूर्योदय से एक घण्टा पूर्व से लेकर एक घण्टा पश्चात् तक के दो घंटे उपासना के लिए सर्वोत्तम हैं। शरीर को शुद्ध करके साधना पर बैठना चाहिए। साधारणतः स्नान द्वारा ही शरीर की शुद्धि होती है पर किसी विवशता, ऋतु प्रतिकूलता, यात्रा या अस्वस्थता की दशा में हाथ, पांव, मुंह धोकर या गीले कपड़े से शरीर पोंछ कर भी काम चलाया जा सकता है। साधना के लिए एकान्त खुली हवा की ऐसी जगह ढूंढ़नी चाहिए जहां का वातावरण शांतिमय हो। कुश, खजूर, बेंत आदि वनस्पतियों के बने हुए आसन उत्तम है। माला तुलसी या चन्दन की लेनी चाहिए। पालती मार कर सीधे साधे ढंग से बैठना चाहिये। पद्मासन आदि कष्ट साध्य आसन लगाकर बैठने से शरीर और मन दोनों को कष्ट होता है। रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर बैठना चाहिए। प्रातःकाल की साधना पूर्व की ओर और सायंकाल की साधना के लिये पश्चिम की ओर मुंह करके बैठना चाहिये। सूर्य अस्त होने के पश्चात् एक घंटा रात जाने तक साधना की जा सकती है। सूर्यास्त से एक घण्टा बाद और सूर्यास्त से दो घण्टे पूर्व यह तीन घण्टे छोड़ कर रात्रि के अन्य भाग योग मार्गी गायत्री साधना में निषिद्ध हैं। रात्रि में तान्त्रिक प्रयोग किए जाते हैं।
मल-मूत्र त्याग के किसी अनिवार्य कार्य के लिए साधन के बीच में उठना पड़े तो शुद्ध जल से हाथ पांव धोकर तब बैठना चाहिए। एकान्त में जप करते समय माला को ढकने की जरूरत नहीं है पर जहां बहुत आदमियों की दृष्टि पड़ती हो वहां उसे कपड़े से ढक लेना चाहिये या गौमुखी में हाथ डाल लेना चाहिये। माला जपते समय सुमेरु (माला के मध्य का सबसे बड़ा दाना) उल्लंघन न करना चाहिए। एक माला पूरी करके उसे मस्तक तथा नेत्रों से लगा कर फिर पीछे की तरफ उलटा ही वापिस कर लेना चाहिये। सुमेरु का उल्लंघन नहीं किया जाता। इसलिये माला पूरी होने पर उसे हर बार उलट कर ही नया आरम्भ करना चाहिये। तर्जनी उंगली से माला का स्पर्श नहीं करना चाहिये। जहां माला न हो वहां उंगलियों के पोरों की सहायता से जप किया जा सकता है।
जप इस प्रकार करना चाहिये कि कण्ठ से ध्वनि होती रहे, होंठ हिलते रहें पर पास बैठा हुआ मनुष्य भी स्पष्ट रूप से मन्त्र को न सुन सके। सूतक, रोग, अशौच, चारपाई पर पड़े होने, रास्ता चलने आदि परिस्थितियों में होने की दशा में मन ही मन इस प्रकार जप करना चाहिए कि कण्ठ, होंठ, जिह्वा आदि का संचालन न हो। ऐसा मानसिक जप सोते जागते चाहे जिस दिशा में किया जा सकता है।
साधना विधि का निर्देश प्राप्त करने के लिए एक ही गुरू होना चाहिए। वह जो विधि बतावे उसी के आधार पर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक उपासना आरम्भ कर देनी चाहिए। अनेक लोग अनेक प्रकार से साधना करते हैं और ग्रन्थों में भी अनेक विधियां लिखी हैं जिनका आपस में सामंजस्य नहीं क्योंकि अधिकारी भेद से, प्रयोजन भेद से, देश काल भेद से अनेक प्रकार की विधियां प्रचलित हैं। कई व्यक्तियों की सलाह परस्पर विरोधी हो सकती है। ऐसी दशा में साधक भ्रम में पड़ सकता है अतएव किसी एक ही आधार पर अपना कार्य क्रम निर्धारित करना चाहिए। अगर गलत विधि बताई गई है तो उसमें पाप बताने वाले पर पड़ेगा वही उसका दण्ड भुगतेगा। जो साधक अपने मन से नहीं वरन् किसी के आदेश से कार्य कर रहा है उसे किसी प्रकार की हानि नहीं है। उसके लिए वह गलत साधना ही सच्ची साधना का फल देगी। मुद्रा, शाप मोचन, कवच, कीलक, अर्गल आदि क्रियाओं की आवश्यकता तांत्रिक पुरश्चरण में होती है। योग की दक्षिण मार्गी साधना में उनकी कुछ भी आवश्यकता नहीं है।
उपरोक्त नियमों को ध्यान में रखते हुये प्रातः या सायं काल स्वस्थ चित्त से साधना के लिये बैठना चाहिये। पास में जल का भरा पात्र रख लेना चाहिये। और आरम्भ में ब्रह्म संध्या करनी चाहिये। ब्रह्म संध्या की रीति यह है— आचमन—
(1) जल भरे हुए पात्र में से दाहिने हाथ की हथेली पर जल लेकर उसका तीन बार आचमन करे। आचमनों के समय गायत्री पढ़ें। तीन आचमनों का तात्पर्य गायत्री की ह्रीं—सत्व प्रधान, श्रीं—समृद्धि प्रधान और क्लीं—बल प्रधान शक्तियों का मातृ दुग्ध की तरह पान करना है। शिखा बन्धन—
(2) आचमन के पश्चात् शिखा को जल से गीला करके उसमें ऐसी गांठ लगानी चाहिये जो सिरा खींचने से खुल जाय। उसे आधी गांठ कहते हैं। गांठ लगाते समय गायत्री मन्त्र का उच्चारण करते जाना चाहिये। शिखा बन्धन का प्रयोजन ब्रह्म रंध्र में स्थित शतदल कमल चक्र की सूक्ष्म शक्तियों का जागरण करना है। प्राणायाम—
(3) ब्रह्म संध्या का तीसरा कोष प्राणायाम है। वह इस प्रकार करना चाहिये
(अ) स्वस्थ चित्त से बैठिये, मुख को बन्द कर लीजिए नेत्रों को बन्द या अधखुला रखिये। अब सांस को धीरे-धीरे नासिका द्वारा भीतर खींचना आरम्भ कीजिए और ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ इस मन्त्र का मन ही मन उच्चारण करते चलिए। और भावना कीजिए कि ‘विश्व व्यापी दुख नाशक, सुख स्वरूप, ब्रह्म की चैतन्य प्राण शक्ति को मैं नासिका द्वारा आकर्षित कर रहा हूं।’ इस भावना और इस मन्त्र भाग के साथ धीरे धीरे सांस खींचिए और जितनी अधिक वायु भीतर भर सकें भर लीजिए।
(ब) अब वायु का भीतर रोकिए और ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ इस भाग का जप कीजिए साथ ही भावना कीजिए कि ‘नासिका द्वारा खींचा हुआ वह प्राण श्रेष्ठ है। सूर्य के समान तेजस्वी है। इसका तेज मेरे अंग प्रत्यंग में रोम-रोम में भरा जा रहा है।’ इस भावना के साथ पूरक की अपेक्षा आधे समय तक वायु को भीतर रोक रखे। (स) अब नासिका द्वारा वायु को धीरे धीरे बाहर निकालना आरम्भ कीजिए और ‘भर्गो देवस्य धीमहि’ इस मन्त्र भाग को जपिए तथा भावना कीजिए कि ‘‘यह दिव्य प्राण मेरे पापों को नाश करता हुआ विदा हो रहा।’’ वायु को निकाल लेने में प्रायः उतना ही समय लगाना चाहिए जितना वायु खींचने में लगा था।
(द) जब भीतर की वायु बाहर निकल जावे तो जितनी देर वायु को भीतर रोक रखा था उतनी ही देर बाहर रोक रखें अर्थात् बिना सांस लिए रहें और ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ इस मन्त्र को जपते रहें। साथ ही भावना करें कि ‘‘भगवती वेदमाता आद्यशक्ति गायत्री हमारी सद्बुद्धि को जागृत कर रही हैं।’’
यह एक प्राणायाम हुआ। अब इसी प्रकार पुनः इन क्रियाओं की पुनरुक्ति करते हुए दूसरा प्राणायाम करें। संध्या में यह पांच प्राणायाम करने चाहिये। जिससे शरीर स्थित प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान नामक पांच प्राणों का व्यायाम, प्रस्फुरण और परिमार्जन हो जाता है।
अघमर्षण—
(4) अघमर्षण के लिए दाहिने हाथ की हथेली पर जल लेकर उसे दाहिने नथुने के समीप ले जाना चाहिए। समीप का अर्थ है छै अंगुल दूर। बाएं हाथ के अंगूठे से बांया नथुना बन्द कर लें और दाहिने नथुने से धीरे-धीरे सांस खींचना आरम्भ करें। सांस खींचते समय भावना करें कि ‘‘गायत्री माता का पुण्य प्रतीक यह जल अपनी दिव्य शक्तियों सहित पापों का संहार करने के लिए सांस के साथ मेरे अन्दर प्रवेश कर रहा है। और भीतर से पापों को, मलों को, विकारों को, संहार कर रहा है।’’
जब पूरी सांस खींच चुकें तो बांया नथुना खोल दें और दाहिना नथुना अंगूठे से बन्द कर दें और सांस बाहर निकालनी आरम्भ करें। दाहिनी हथेली पर रखे हुए जल को अब बांए नथुने के सामने करें और भावना करें कि ‘नष्ट हुए पापों की लाशों का समूह सांस के साथ बाहर निकल कर इस जल में गिर रहा है।’ जब सांस पूरी बाहर निकल जाय तो उस जल को बिना देखे घृणा पूर्वक बाईं ओर पटक देना चाहिए।
अघमर्षण क्रिया में जल को हथेली पर भरते समय ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ दाहिने नथुने से सांस खींचते समय ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ इतना मन्त्र भाग जपना चाहिए और बाएं नथुने से सांस छोड़ते समय ‘भर्गो देवस्य धीमहि’ और जल पटकते समय ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ इस मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए। वह क्रिया तीन बार करनी चाहिए जिससे काया के, वाणी के और मन के त्रिविध पापों का संहार हो सके।
न्यास—
(5) न्यास कहते हैं धारण करने को। अंग प्रत्यंगों में गायत्री की सतोगुणी शक्ति को धारण करने, स्थापित करने, भरने ओत-प्रोत करने के लिए न्यास किया जाता है। गायत्री की ब्रह्म संध्या में अंगूठा और अनामिका उंगली का प्रयोग प्रयोजनीय ठहराया गया है। अंगूठा और अनामिका उंगली को मिला कर विभिन्न अंगों का स्पर्श इस भावना से करना चाहिए कि मेरे यह अंग गायत्री शक्ति से पवित्र तथा बलवान हो रहे हैं। अंग स्पर्श के साथ निम्न प्रकार मन्त्रोच्चार करना चाहिए—
(1) ॐ भूर्भुवः स्वः—मूर्धायै। (2) तत्सवितुः—नेत्राभ्यां। (3) वरेण्यं—कर्णाभ्यां। (4) भर्गो—मुखाय। (5) देवस्य—कण्ठाय। (6) धीमहि—हृदयाय। (7) धियो यो नः—नाभ्यै। (8) प्रचोदयात्—हस्त पादाभ्यां।
यह पंच कर्म—आचमन, शिखा बन्धन, प्राणायाम, अघमर्षण, न्यास को पूरे करने के पश्चात् माता गायत्री और पिता आचार्य को ध्यान द्वारा मानसिक प्रणाम करना चाहिये यदि दोनों के चित्र हों तो उन्हें केवल प्रणाम करके अथवा धूप, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प, चन्दन आदि मांगलिक द्रव्यों से पूजन करके जप आरम्भ कर देना चाहिए। कम से कम 108 मन्त्रों की एक माला तो जपनी ही चाहिए इससे अधिक सुविधानुसार जितना हो सके उतना उत्तम है। जप काल में ध्यान मुद्रा रखते हुए नेत्र अधर खुले रखने चाहिए। मस्तिष्क के मध्य में दीपक की लौ के समान तेज स्वरूप दिव्य शक्ति गायत्री का ध्यान करना चाहिए। इस तेज की ज्योति के मध्य में कभी कभी भगवती की मुस्कुराती दिव्य मुखाकृति साधक को दिखाई पड़ती है।
जप पूरा हो जाने पर भगवती को प्रणाम करके उनसे विसर्जित होने की प्रार्थना करनी चाहिए और उठ कर उस समय सूर्य जिस दिशा में रहा हो उस दिशा में जल का अर्घ दे देना चाहिये। यह नित्य प्रति की सर्व सुलभ साधना है। इसमें किसी विशेष प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है पर जहां तक बन पड़े सात्विक आहार विहार रखना ही उचित है क्योंकि माता सतोगुणी बालकों से ही प्रसन्न रहती है।
सर्व सुलभ ध्यान
जप के उपरान्त अथवा किसी अन्य सुविधा के समय में नित्य गायत्री का ध्यान किया जाना चाहिए। एकान्त, कोलाहल रहित, शान्त वातावरण के स्थान में स्थिर चित्त होकर ध्यान के लिए बैठना चाहिए। शरीर शिथिल रहे। यदि जप काल में ध्यान किया जा रहा है तब तो पालती मार कर, मेरुदण्ड सीधा रखकर ही ध्यान करना ही उचित है। यदि अलग समय में करना हो तो आराम कुर्सी पर लेट कर या मसनद, दीवार, वृक्ष आदि का सहारा लेकर साधना करना चाहिए। शरीर बिलकुल शिथिल कर दिया जाय। इतना शिथिल मानो देह निर्जीव हो गया हो। इस स्थिति में नेत्र बन्द करके दोनों हाथों को गोदी में रख कर ऐसा ध्यान करना चाहिए कि— इस संसार में सर्वत्र केवल नील आकाश है, उसमें कहीं कोई वस्तु नहीं है। प्रलय काल में जैसी स्थिति होती है, आकाश के अतिरिक्त और कहीं कुछ नहीं रह जाता वैसी स्थिति का कल्पना चित्र मन में भली भांति अंकित करना चाहिए। जब यह कल्पना चित्र मानस लोक में भली भांति अंकित हो जाय तो सुदूर आकाश में एक छोटे ज्योति पिण्ड को सूक्ष्म नेत्रों से देखना चाहिए। सूर्य के समान प्रकाशवान एक छोटे नक्षत्र के रूप में गायत्री का ध्यान करना चाहिए। यह ज्योति पिण्ड अधिक समय तक ध्यान करने पर समीप आता है, बड़ा होता जाता है और उसका तेज अधिक प्रखर होता जाता है।
चन्द्रमा या सूर्य के मध्य भाग में ध्यान पूर्वक देखा जाय तो उसमें काले काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं। इसी प्रकार इस गायत्री तेज पिण्ड में भी ध्यान पूर्वक देखने से आरम्भ में भगवती गायत्री की धुंधली प्रतिमा दृष्टि गोचर होती है। धीरे धीरे ध्यान करने वाले को यह मूर्ति अधिक स्पष्ट, अधिक स्वच्छ और अधिक चैतन्य, हंसती, बोलती, चेष्टा करती, संकेत करती तथा भाव प्रकट करती हुई दिखाई पड़ती है। इस पुस्तक के आरम्भ में भगवती गायत्री का एक चित्र दिया हुआ है। उस चित्र को ध्यान आरम्भ करने से पूर्व कई बार प्रेम से, गौर से, भली भांति से अंग प्रत्यंगों का निरीक्षण करके उस मूर्ति को मनःक्षेत्र में इस प्रकार बिठाना चाहिए कि ज्योति-पिण्ड में ठीक वैसी ही प्रतिमा की झांकी होने लगे। थोड़े दिनों में यह तेजोमण्डल में आवेष्टित भगवती गायत्री की छवि अत्यन्त सुन्दर अत्यन्त हृदय ग्राही रूप से ध्यानावस्था में दृष्टिगोचर होने लगती है।
जैसे सूर्य की किरणें धूप में बैठे मनुष्य के ऊपर पड़ती हैं और वह किरणों की उष्णता को प्रत्यक्ष अनुभव करता है वैसे ही यह ज्योति पिण्ड जब समीप आने लगता है तो ऐसा अनुभव होता है मानों कोई दिव्य प्रकाश अपने मस्तक में, अन्तःकरण में और शरीर के रोम-रोम में प्रवेश करके अपना अधिकार जमा रहा है। जैसे अग्नि में पड़ने से लोहा भी धीरे धीरे गरम और लाल रंग का अग्निवर्ण हो जाता है वैसे ही जब गायत्री तेज को ध्यानावस्था में साधक अपने अन्दर धारण करता है तो वह भी सच्चिदानन्द स्वरूप, ऋषि कल्प हो कर ब्रह्म तेज से झिलमिलाने लगता है। उसे अपना सम्पूर्ण स्वरूप तप्त स्वर्ण की भांति रक्त वर्ण अनुभव होता है और अन्तःकरण में एक अलौकिक दिव्य तत्व का प्रकाश सूर्य के समान प्रकाशित हुआ दीखता है। इस तेज संस्थान में आत्मा के ऊपर चढ़े हुए अनेक कलुष कषाय जल बल कर भस्म हो जाते हैं और साधक अपने को ब्रह्म स्वरूप, निर्मल, निर्भय, निष्पाप, निरासक्त अनुभव करता है।
शक्ति का अकूत भण्डार अनुष्ठान
यदि धन अपने पास हो तो उसके बदले में कोई भी वस्तु खरीदी जा सकती है। यदि शारीरिक बल अपने पास हो तो उससे किसी भी प्रकार का काम पूरा किया जा सकता है। यदि बुद्धि बल अपने पास हो तो उससे कठिन से कठिन उलझनें सुलझाई जा सकती हैं। इसी प्रकार यदि आत्म बल अपने पास हो तो उससे जीवन को उन्नत बनाने, मनोकामनाएं पूरी करने, सामने उपस्थित कठिनाइयों को सरल बनाने एवं आपत्तियों से छूटने के कार्य सम्पन्न किए जा सकते हैं। गायत्री अनुष्ठान आत्म-बल संचय की एक विशेष प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया द्वारा जो आत्म बल संचय होता है वह दैवी वरदान की तरह आपत्तियों का निवारण और सम्पत्तियों का आयोजन करने में बड़ी भारी सहायता करता है।
अब कोई नया काम आरम्भ करना है, जब सांसारिक प्रयत्न असफल हो रहे हों, आपत्तियों के निवारण का मार्ग न दीखता हो, चारों ओर अन्धकार छाया हुआ हो, भविष्य चिन्ताजनक दिखाई दे रहा हो, परिस्थितियां दिन दिन बिगड़ती जा रही हों, सीधा करते उलटा परिणाम निकलता हो तो स्वभावतः मनुष्य के हाथ पैर फूल जाते हैं। ऐसे अवसरों पर अनुष्ठान की प्रक्रिया द्वारा गायत्री माता को पुकारना बहुधा सफल होते देखा गया है। बच्चा साधारण रीति से दिन भर मां, मां पुकारता रहता है। माता भी दिन भर लल्ला बेटा, कह कर उत्तर देती रहती है। यह लाड़ प्यार दिन भर चलता रहता है। पर जब कोई विशेष बल पूर्वक, विशेष स्वर से माता को पुकारता है। इस विशेष पुकार को सुनकर माता अपने अन्य कामों को छोड़ कर बालक के पास दौड़ जाती है और उसकी सहायता करती है। अनुष्ठान साधक की ऐसी ही पुकार है जिसमें विशेष बल एवं विशेष आकर्षण होता है। उस आकर्षण से गायत्री शक्ति विशेष रूप से साधक के समीप एकत्रित हो जाती है। और उस शक्ति को जिस कार्य में प्रयुक्त किया जाता है उसी में सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है।
अनुष्ठान किसी विशेष संख्या में मन्त्रों का जप, किसी विशेष अवधि में, किन्हीं विशेष नियमोपनियमों के साथ करने को कहते हैं। प्रायः इस प्रकार के अनुष्ठान किए जाते हैं— (1) चौबीस दिन में चौरासी हजार मन्त्र का अनुष्ठान (2) नौ दिन में चौबीस हजार का अनुष्ठान (3) चालीस दिन में सवा लाख का अनुष्ठान (4) सवा वर्ष (पन्द्रह मास में) चौबीस लाख का अनुष्ठान। 24 हजार का छोटा और 24 लक्ष से बड़ा अनुष्ठान नहीं होता। साधारणतः ‘ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्’ यही मन्त्र जपा जाता है। पर किन्हीं विशेष प्रयोजनों के लिए व्याहृतियों से पहले या पीछे ह्रीं, श्रीं, क्लीं, हुं, ऐं, उं, यं आदि बीज अक्षर भी लगाए जाते हैं। बीज अक्षरों के प्रयोग के लिए किसी अनुभवी की सलाह ले लेना आवश्यक है। अशिक्षित, बहुधन्धी, कार्य, व्यस्त, रोगी स्त्री पुरुष या बालक केवल ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ इस पंचाक्षरी मन्त्र से भी गायत्री का अनुष्ठान कर सकते हैं।
अनुष्ठान के दिनों में ब्रह्मचर्य से रहना आवश्यक है। बीच में किसी दिन स्वप्नदोष हो जाय तो उसके प्रायश्चित स्वरूप उस दिन एक माला अधिक जप लेनी चाहिए शिर के बाल नहीं काटने चाहिये। ठोड़ी की हजामत अपने हाथ ही बनानी चाहिए। चारपाई या पलंग का त्याग करके चटाई या तख्त पर सोना चाहिए। उनकी कठोरता कम करने के लिए ऊपर गद्दे बिछाये जा सकते हैं। आहार विहार सात्विक रहना चाहिए। मद्य, मांस तो पूर्ण रूप से त्याग देना उचित है। अन्य नशीली, बासी, बुरी, गरिष्ठ, चटपटी, तामसिक, उष्ण उत्तेजक वस्तुओं से बचने का यथा सम्भव प्रयत्न करना चाहिए। कुविचार, कुकर्म, विलासिता, अनीति आदि बुराइयों से वैसे तो सदा ही बचना चाहिए पर अनुष्ठान काल में इनका विशेष ध्यान रखना चाहिए। जनन या मृत्यु या सूतक हो जाने पर सूतक निवृत्ति का अनुष्ठान स्थिर रखना चाहिए। शुद्धि होने पर उसी संख्या से आरम्भ किया जा सकता है जहां से बन्द किया था। इस विशेष काल के प्रायश्चित के लिये एक हजार मन्त्र विशेष रूप से जपने चाहिए। अनुष्ठान काल में चाम के जूतों के स्थान पर रबड़ तले वाले कपड़े के जूते या लकड़ी की चट्टी प्रयोग करना उचित है। अपने शरीर और वस्त्रों का दूसरों से जहां तक हो सके कम ही स्पर्श होने देना चाहिए। उस अवधि में एक समय अन्नाहार दूसरे समय फल या दूध लेकर अर्द्ध उपवास का क्रम चल सके तो बहुत उत्तम है। इनके अतिरिक्त उन नियमों को भी पालन करना चाहिए जो दैनिक सर्व सुलभ साधनाओं के प्रकरण में लिखे गये हैं।
जितने दिन में जितने मन्त्र पूरे करने हों उनका हिसाब लगाकर यह देख लेना चाहिए कि प्रति दिन कितने मन्त्र जपने हैं। 108 दाने की माला होती है उससे यह हिसाब लग जाता है कि कितनी मालाएं नित्य जपनी हैं। मालाओं की गिनती याद रखने के लिए किसी स्लेट आदि पर पेन्सिल से रेखाएं खींचते जाना चाहिए या गंगा जल में खड़िया मिट्टी सान कर गोलियां बना लेनी चाहिए। एक माला जप लेने पर एक गोली इस डिब्बे से निकालकर उस डिब्बे में डाल दी। इस प्रकार जब सब गोली एक डिब्बे में से खाली हो जांय तब समझना चाहिए कि जप पूरा हो गया। इस क्रम से जप संख्या में भूल नहीं पड़ती।
अनुष्ठान के आरम्भ में पूजन करना चाहिए। शीशे में मढ़ी हुई गायत्री की तस्वीर या प्रतिमा को सामने रख कर धूप, दीप, नैवेद्य, चन्दन, अक्षत, पुष्प, जल आदि मांगलिक पदार्थों से पूजा करनी चाहिए। पूजा से पूर्व आह्वान मन्त्र पढ़ना चाहिए और प्रतिदिन जप समाप्त करते समय विसर्जन मन्त्र पढ़ना चाहिए। दोनों मन्त्र इस प्रकार हैं—
गायत्री आह्वान का मन्त्र—
गायत्री वरदा देवी त्र्यक्षरे ब्रह्म वाहिनी। गायत्री छन्दसां माता ब्रह्म योने नमोस्तुते॥ गायत्री विसर्जन मन्त्र— उत्तमे शिखरे देवि भूम्यां पर्वत मूर्धनि। ब्राह्मणेभ्योह्यनुज्ञानं गच्छ देवि यथासुखम्॥
अनुष्ठान का पथ प्रदर्शक एवं संरक्षक किसी आचार्य को ब्रह्मा रूप में वरण करना चाहिए। अनुष्ठान भी एक यज्ञ है। यक्ष में पुरोहित या ब्रह्मा न हो तो वह निष्फल होता है। इसी प्रकार अनुष्ठान का पुरोहित या ब्रह्मा नियुक्त करना आवश्यक है। यदि वरण किया हुआ ब्रह्मा नित्य उपस्थित न हो सके तो उसके चित्र की अथवा उसका प्रतिनिधि मानकर स्थापित किए हुए नारियल की पूजा करनी चाहिए। गायत्री तथा ब्रह्मा रूपी आध्यात्मिक माता पिताओं का पूजन करने के उपरान्त ब्रह्म संध्या के पांच कोष (आचमन, शिखा बन्धन, प्राणायाम, अघमर्षण, न्यास) करके जप आरम्भ कर देना चाहिए। जप के अन्त में आरती करनी चाहिए और बची हुई पूजा सामग्री को किसी पवित्र स्थान में तथा जल को सूर्य की ओर विसर्जित कर देना चाहिए। यदि प्रातः सायं दो बार में अनुष्ठान करना हो तो प्रातःकाल के लिए अधिक संख्या में और सायं काल के लिए उससे कम जप रखना चाहिए। दोनों ही बार पूजन संध्या के उपरान्त जप होना चाहिए।
कई ग्रन्थों में ऐसा उल्लेख है कि शापमोचन, कवच, कीलक, अर्गल, मुद्रा के साथ जप करना और जप से दसवां भाग हवन, हवन से दसवां भाग तर्पण, तर्पण से दसवां भाग ब्राह्मण भोज कराना चाहिए। यह नियम तंत्रोक्त रीति से किए हुए गायत्री पुरश्चरण के लिए हैं। इन पंक्तियों में वेदोक्त योग विधि से दक्षिण मार्गी साधना बताई जा रही हैं। इसमें अन्य विधियों की आवश्यकता तो नहीं है पर हवन और दान आवश्यक है। अनुष्ठान के अन्त में कम से कम 108 आहुतियों का हवन अवश्य होना चाहिए। अधिक अपनी श्रद्धा के ऊपर निर्भर है। जिसे ब्रह्मा माना है उससे विसर्जन के समय दान, दक्षिणा, वस्त्र, पात्र, अन्न आदि से सत्कार करना चाहिए और थोड़ा बहुत ब्राह्मण भोजन भी करना चाहिये। यज्ञ के प्रसाद के रूप में अपने मित्रों तथा सद् वृत्ति वालों में प्रसाद रूप से कुछ वितरण करना चाहिए। प्रसाद रूप में वितरण करने के लिए हमारी छै छै आने वाली, ‘गायत्री ही कामधेनु है’, ‘वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री’, ‘गायत्री की सर्वसुलभ साधनाएं’ सबसे उत्तम हैं। विशेषतया ‘गायत्री ही कामधेनु है’ का महत्व अधिक है क्यों कि उससे दूसरों को भी इस अमृत का पान करने की इच्छा होती है। इस प्रकार की इच्छा पैदा कर देना किसी मनुष्य का सबसे बड़ा उपकार है इसलिए वह सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म दान है। गायत्री के 24 अक्षर एवं 14 पद हैं। तदनुसार अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार माला के एक एक दाने पर एक एक पुस्तक के हिसाब से 108 पुस्तकें, अथवा गायत्री के चौबीस अक्षरों के आधार पर 24, या 14 पदों के आधार पर कम से कम 14 पुस्तकें तो इस अवसर पर अवश्य ही दान कर देनी चाहिए।
अश्विन और चैत्र की नव दुर्गाओं में गायत्री साधना के लिए बड़ा ही उपयुक्त अवसर है। उस समय छोटा बड़ा अनुष्ठान करना अपेक्षा कृत अधिक फलदायक होता है। जेष्ठ सुदी 10 (दशहरा) गायत्री और गंगा की जन्म जयन्ती है। उस दिन एक छोटा अनुष्ठान पूरा करना विशेष फलप्रद है।
जो व्यक्ति स्वयं अनुष्ठान न करने की स्थिति में नहीं हैं वे अनिष्ट निवारण, मनोरथ पूर्ति, सुख शान्ति की रक्षा, आत्मबल वृद्धि एवं पुण्य संचय के लिये किसी सत्पात्र ब्राह्मण को उसका पारिश्रमिक देकर अनुष्ठान करा सकते हैं। नित्य एक दो घण्टा जप के लिए किसी साधक को इसी आधार पर अपने लिए साधना करने के लिए नियुक्त कर देना भी उत्तम है।
सर्व शुभ गायत्री यज्ञ
गायत्री अनुष्ठान के अन्त में या किसी भी अन्य शुभ अवसर पर ‘‘गायत्री यज्ञ’’ करना चाहिए। कुण्ड खोद कर या वेदी बना कर दोनों की प्रकार हवन किया जा सकता है। निष्काम आत्मोन्नति के लिए कुण्ड खोद कर आर सकाम साधना में वेदी बना कर हवन करना चाहिए। कुण्ड या वेदी की लम्बाई चौड़ाई साधक के अंगुली से चौबीस चौबीस अंगुल होनी चाहिये। कुण्ड बनाना हो तो उसे चौबीस अंगुल गहरा इस प्रकार तिरछा खोदना चाहिए कि नीचे पहुंचते पहुंचते चार अंगुल लम्बा चार अंगुल चौड़ा चौकोर रह जावे। उसे भली प्रकार लीप कर, पोत कर, रोली, आटा, मेंहदी, हल्दी आदि रंगों से चौक पूरी तरह सुसज्जित बना देना चाहिये। कुण्ड या वेदी से चार अंगुल हट कर एक छोटी नाली दो अंगुल चौड़ी दो अंगुल गहरी खोद कर उसमें पानी भर देना चाहिए।
वेदी या कुण्ड के ईशान कोण में कलश स्थापित करना चाहिए। छोटी चौकी पर गायत्री की प्रतिमा प्रतिष्ठित करके उसका पूजन करना चाहिए। तदुपरान्त बन्धु-बान्धव, पत्नी, गुरुजन आदि मिल कर हवन करें। सामग्री कम हो तो एक व्यक्ति सामग्री की और दूसरी घी की आहुति डाले। एक को ही हवन करना हो तो घी, सामग्री मिला कर इकट्ठी कर ले। अधिक सामग्री और घी हो तो कई व्यक्ति उसे लेकर बैठ सकते हैं। मन्त्रोच्चारण वे सभी कर जो शुद्ध हो कर आये हों।
हवन के आरम्भ में ब्रह्म सन्ध्या करके गायत्री मन्त्र का उच्चारण करते हुए कपूर जला कर समिधाओं में अग्नि प्रज्वलित करे। सब लोग साथ साथ मन्त्र बोलें और अन्त में स्वाहा उच्चारण के साथ आहुति डाली जाय। आहुति के अन्त में चम्मच में से बचे हुए घृत की एक दो बूंद पास में रखे हुए जल पात्र में टपकाते जाना चाहिए। और ‘‘आदि शक्ति गायत्र्यै इदन्नमम’’ का उच्चारण करते जाना चाहिए। आहुतियां कम से कम 108 होनी चाहिए। अधिक चाहे जितनी हो सकती है। प्रति आहुति में कम से कम तीन मासे सामग्री और एक मासे घृत होना चाहिए। इस प्रकार छोटे से छोटे से हवन में 6 छटांक सामग्री और 2 छटांक घी होना चाहिए। आहुतियां समाप्त होने पर मधुर पकवानों, मिष्ठानों को अग्नि में चढ़ाना चाहिए। अन्त में एक नारियल की गिरी या गोला ले कर उसमें छेद करके यज्ञ शेष घृत भर देना चाहिए और खड़े होकर पूर्णाहुति के रूप में उसे अग्नि में समर्पित कर देना चाहिए। यदि कुछ सामग्री बची हो तो वह भी उसी समय चढ़ा देनी चाहिए।
इसके बाद सब लोग खड़े होकर यज्ञ की चार परिक्रमा करें और ‘इदन्नमम’ का पानी पर तैरता हुआ घृत उंगली से ले कर पलकों पर लगावें। हवन की भस्म मस्तक पर लगावें। कीर्तन या भजन गायन करें। उपस्थित लोगों को प्रसाद वितरण करें। प्रसाद रूप में देने के लिए ‘गायत्री ही कामधेनु है’ पुस्तक सर्वोत्तम ब्रह्म प्रसाद है।
कोई भी साधनाएं तीन उद्देश्यों से कही जाती हैं। (1) आत्म कल्याण के लिए सतोगुणी (2) समृद्धि वृद्धि के लिए रजोगुणी (3) बल वृद्धि या आपत्ति निवारण के लिए तमोगुणी। इन प्रयोजनों के आधार पर जो साधन सामग्रियां प्रयुक्त होती हैं वह भी इन तीन गुणों के आधार पर होनी चाहिए। इनका कुछ संक्षिप्त विवरण नीचे हैं— सतोगुण:— माला—तुलसी। आसन—कुश। पुष्प-श्वेत। पात्र—तांबा। वस्त्र—सूत (खादी)। मुख—पूर्व को। दीपक में घृत—गौ घृत। तिलक—चन्दन। हवन में समिधा—पीपल, बड़, गूलर। हवन सामग्री—श्वेत चन्दन, अगर छोटी इलायची, लौंग, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, सतावरि, खस, शीतल चीनी, आंवला, इन्द्र जौ, वंशलोचन, जावित्री, गिलोय, वचनेत्र—बाला, मुलहठी, कमल केशर, बड़ की जटाएं, नारियल, बादाम, दाख, जौ, मिश्री। तिथि—एकादशी।
रजोगुण:— माला—चन्दन, आसन—सूत। पुष्प—पीले। पात्र—कांसा। वस्त्र—रेशम। मुख—उत्तर को। दीपक में घृत—भैंस का घृत। तिलक—रोली। समिधा—आम ढाक, शीशम। हवन सामग्री—देवदारू, बड़ी इलायची, केशर, छार छबीला, पुनर्नवा, जीवन्ती, कचूर, तालीस पत्र, रास्ना, नागर मोथा, उन्नाव, तालमखाना, मोचरस, सोंफ, चित्रक, दालचीनी, पद्माख, छुहारा, किशमिश, चावल, खांड। तिथि—पूर्णमासी।
तमोगुण:— माला—रुद्राक्ष। आसन—ऊन। पुष्प—हल्के या गहरे लाल। वस्त्र—ऊन। मुख—पश्चिम को। दीपक में घृत—बकरी का। तिलक—भस्म का। समिधा—बेल, छोंकर, करील। हवन सामिग्री—रक्त चन्दन, तगर, असगन्ध, जायफल, कमलगट्टा, नाग केशर, पीपल बड़ी, कुटकी, चिरायता, अपामार्ग, काकड़ासिंगी, पोहकर मूल, कुलंजन, मूसली स्याह, मेथी के बीज, काकजंघा, भारंगी, अकरकरा, पिस्ता, अखरोट, बिरोंजी, तिल, उड़द, गुड़। तिथि-पंचमी।
गुणों के अनुसार साधना सामग्री उपयोग करने से साधक में उन्हीं गुणों की अभिवृद्धि होती है तदनुसार सफलता का मार्ग अधिक सुगम हो जाता है।

