महिलाओं के लिए विशेष साधनाएं
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स्त्रियां भी पुरुषों की भांति गायत्री साधनाएं कर सकती हैं। जो साधनाएं इस पुस्तक में भी दी हुई हैं वे सभी उनके अधिकार क्षेत्र में हैं। परन्तु देखा गया है कि सधवा स्त्रियां जिन्हें घर के कार्य में विशेष रूप से व्यस्त रहना पड़ता है। अथवा जिनके छोटे छोटे बच्चे हैं और वे उनके मल मूत्र के अधिक सम्पर्क में रहने के कारण उतनी स्वच्छता नहीं रख सकतीं उनके लिए देर से पूरी हो सकने वाली साधनाएं कठिन हैं। वे संक्षिप्त साधनाओं से काम चलावें। जो पूरा गायत्री मन्त्र याद नहीं कर सकतीं वे संक्षिप्त में गायत्री-पंचाक्षरी मन्त्र (ॐ भूर्भुवः स्वः) से काम चला सकती हैं। रजस्वला होने के दिनों में उन्हें विधि पूर्वक साधना बन्द रखनी चाहिए। इन दिनों में केवल मानसिक जप और ध्यान से काम चलाया जा सकता है। कोई अनुष्ठान चल रहा हो तो उन दिनों उसे रोक कर रजः स्नान के पश्चात् पुनः चालू किया जा सकता है।
विविध प्रयोजनों के लिए कुछ साधनाएं नीचे दी जाती हैं:—
(1) मनो निग्रह और ब्रह्म प्राप्ति के लिए— विधवा बहिनें, आत्म संयम, सदाचार विवेक, ब्रह्मचर्य पालन, इन्द्रिय निग्रह एवं मन को वश में करने के लिए गायत्री साधना को ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रयोग कर सकती हैं। जिस दिन से यह साधना आरम्भ की जाती है उसी दिन से मन में शान्ति, स्थिरता, सद् बुद्धि और आत्म संयम की भावना पैदा होती है। मन पर अपना अधिकार होता है। चित्त की चंचलता नष्ट होती है। विचारों में सतोगुण बढ़ जाता है। इच्छाएं, रुचियां, क्रियाएं, भावनाएं सभी सतोगुणी, शुद्ध और पवित्र रहने लगती हैं। ईश्वर प्राप्ति, धर्म रक्षा, तपश्चर्या, आत्म-कल्याण और ईश्वर की आराधना में मन विशेष रूप से लगता है। धीरे धीरे उसकी साध्वी, तपस्विनी, ईश्वर परायण एवं ब्रह्मवादिनी जैसी स्थिति हो जाती है। गायत्री के वेष में भगवान का उसको साक्षात्कार होने लगता है और ऐसी आत्म-शान्ति मिलती है जिसकी तुलना में सधवा रहने का सुख उसे नितान्त तुच्छ दिखाई पड़ता है।
पुरुषों के लिए जो दैनिक नित्य साधना के नियम हैं वे ही स्त्रियों के लिए हैं। गायत्री सन्ध्या में वे शिखा बन्धन के स्थान पर शिखा स्पर्श कर लें। क्योंकि उनके बाल प्रायः बंधे रहते हैं। यदि खुले होवें तो जल्दी में उनका बंधना कठिन है। इसलिए स्पर्श ही उनके लिए पर्याप्त है।
(2) कुमारियों के लिए साधनाएं— गायत्री का चित्र, प्रतिमा अथवा मूर्ति को किसी छोटे आसन या चौकी पर स्थापित करके उसकी पूजा वैसे ही करनी चाहिए जैसे अन्य देव प्रतिमाओंकी की जाती हैं। प्रतिमा के आगे एक छोटी तस्तरी रख लेनी चाहिए और उसी में चन्दन, धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प, जल, भोग आदि पूजा सामग्री चढ़ानी चाहिए आरती करनी चाहिए। मूर्ति के मस्तक पर चन्दन लगाया जा सकता है पर यदि चित्र है तो उसको चन्दन आदि नहीं लगाना चाहिए जिससे उसमें मैलापन न आवे। नेत्र बन्द करके ध्यान करना चाहिए और मन ही मन कम से कम 24 मन्त्र गायत्री के जपने चाहिए। इस प्रकार की गायत्री साधना कन्याओं को उनके लिए अनुकूल वर, अच्छा घर तथा अचल सौभाग्य प्रदान करने में सहायक होती है।
(3) सधवाओं के लिए साधना— प्रातःकाल से लेकर मध्याह्न काल तक उपासना कर लेनी चाहिए। जब तक साधना न की जाय भोजन न करना चाहिए। हां जल पिया जा सकता है। शुद्ध शरीर, शुद्ध मन और शुद्ध वस्त्र से पूर्व की ओर मुंह करके बैठना चाहिए। केशर डालकर चन्दन अपने हाथ से घिसें और मस्तक, हृदय तथा कण्ठ पर तिलक छाप के रूप में लगावें। तिलक छोटा से छोटा भी लगाया जा सकता है, गायत्री की मूर्ति या चित्र की स्थापना करके उसकी विधिवत पूजा करें। पीले रंग का पूजा के सब कार्यों में प्रयोग करें। प्रतिमा का आवरण पीले वस्त्रों का रखें। पीले पुष्प, पीले चावल, बेसन-लड्डू आदि पीले खाद्य पदार्थों का भोग, केशर मिले चन्दन का तिलक, आरती के लिए पीला गौ घृत, गौ घृत न मिले तो उसमें केशर मिलाकर पीला कर लेना, चन्दन की चूर, धूप इस प्रकार पूजा में रंग का अधिक प्रयोग करना चाहिए। नेत्र बन्द करके पीत वर्ण आकाश में, पीले सिंह पर सवार, पीत वस्त्र पहने गायत्री का ध्यान करना चाहिए। पूजा के समय सब वस्त्र पीले न हो सकें तो कम से कम एक वस्त्र पीला अवश्य होना चाहिए। इस प्रकार पीत-वर्ण गायत्री का ध्यान करते हुए कम से कम 24 मन्त्र गायत्री के जपने चाहिए। जब अवसर मिले तभी मन ही मन भगवती का ध्यान करती रहें। महीने की हर पूर्णमासी को व्रत रखना चाहिए। अपने नित्य आहार में एक चीज पीले रंग की अवश्य ले लें। शरीर पर हल्दी का कभी कभी उबटन कर लेना अच्छा है। यह पीत वर्ण साधना दाम्पत्ति जीवन को सुखी बनाने के लिए परम उत्तम है। इस साधना से घर में सुख शान्ति की वृद्धि होती है और रोग, कष्ट, क्लेश मिटते हैं। (4) सन्तान सुख देने वाली उपासना— जो महिलाएं गर्भवती हैं वे प्रातः सूर्योदय से पूर्व या रात्रि को सूर्य अस्त के पश्चात अपने गर्भ में गायत्री से सूर्य सदृश्य प्रचंडतेज का ध्यान किया करें और मन ही मन गायत्री जपें तो उनका बालक तेजस्वी, बुद्धिमान, चतुर, दीर्घजीवी तथा यशस्वी होता है।
प्रातःकाल कटि प्रदेश में भीगे वस्त्र रख कर स्वच्छ चित्त से ध्यानावस्थित होना चाहिए और अपने योनि मार्ग में हो कर गर्भाशय तक पहुंचता हुआ गायत्री का प्रकाश सूर्य किरणों जैसा ध्यान करना चाहिए। नेत्र बन्द करें। कटि प्रदेश में तेज पुंज भरा हुआ अनुभव हो। मन ही मन जप चलता रहे। यह साधना शीघ्र गर्भ स्थापित कराने वाली है। कुन्ती ने इसी साधना के बल से कुमारी अवस्था में ही गायत्री के दक्षिण भाग (सूर्य भगवान) को आकर्षित करके कुमारी अवस्था में ही कर्ण को जन्म दिया था। यह साधना कुमारी कन्याओं को नहीं करनी चाहिए। साधना से उठ कर सूर्य को जल चढ़ाना चाहिए और अर्घ से बचा हुआ एक चुल्लू जल स्वयं पीना चाहिए। इस प्रयोग से बन्ध्याएं भी गर्भ धारण करती हैं, जिनके बच्चे मर जाते हैं या गर्भपात हो जाता है उनका यह कष्ट मिट कर सन्तोष दायिनी सन्तान होती है।
रोगी, कुबुद्धि, आलसी, चिड़चिड़े बालकों को गोदी में ले कर माताएं हंसवाहिनी, गुलाबी कमल पुष्पों से लदी हुई, शंख, चक्र हाथ में लिए गायत्री का ध्यान करें और मन ही मन जप करें। माता के जप का प्रभाव गोदी में लगे बालक पर होता है और उसके शरीर तथा मस्तिष्क में आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ता है। छोटा बच्चा हो तो इस साधना के समय दूध पिलाती रहे। बड़ा बच्चा हो तो उसके शिर और शरीर पर हाथ फिराती रहे। बच्चों की शुभ कामना के लिए गुरुवार का व्रत उपयोगी है। साधना से उठ कर जल का अर्घ सूर्य को चढ़ावें और पीछे से बचा हुआ थोड़ा सा जल बच्चों पर मार्जन की तरह छिड़क दें।
(5) किसी विशेष आवश्यकता के लिए— अपने परिवार पर, परिजनों पर, प्रियजनों पर आई हुई किसी आपत्ति के निवारण के लिए अथवा किसी आवश्यक कार्य में आई हुई किसी बड़ी रुकावट एवं कठिनाई को हटाने के लिए गायत्री साधना के समान दैवी सहायता के माध्यम कठिनाई से मिलेंगे। कोई विशेष कामना मन में हो और उसके पूर्ण होने में भारी बाधाएं दिखाई पड़ रही हो तो सच्चे हृदय से वेदमाता गायत्री को पुकारना चाहिए। माता जैसे अपने प्रिय बालक की पुकार सुन कर दौड़ी आती है वैसे ही गायत्री की उपासिकाएं भी माता की अमित करुणा का प्रत्यक्ष परिचय प्राप्त करती हैं।
नौ दिन का लघु अनुष्ठान, चालीस दिन का पूर्ण अनुष्ठान इसी पुस्तक में अन्यत्र वर्णित है। तात्कालिक आवश्यकता के लिए उनका उपयोग करना या कराना चाहिए। नित्य की साधना में गायत्री चालीसा का पाठ महिलाओं के लिए बड़ा हितकर है।
(1) मनो निग्रह और ब्रह्म प्राप्ति के लिए— विधवा बहिनें, आत्म संयम, सदाचार विवेक, ब्रह्मचर्य पालन, इन्द्रिय निग्रह एवं मन को वश में करने के लिए गायत्री साधना को ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रयोग कर सकती हैं। जिस दिन से यह साधना आरम्भ की जाती है उसी दिन से मन में शान्ति, स्थिरता, सद् बुद्धि और आत्म संयम की भावना पैदा होती है। मन पर अपना अधिकार होता है। चित्त की चंचलता नष्ट होती है। विचारों में सतोगुण बढ़ जाता है। इच्छाएं, रुचियां, क्रियाएं, भावनाएं सभी सतोगुणी, शुद्ध और पवित्र रहने लगती हैं। ईश्वर प्राप्ति, धर्म रक्षा, तपश्चर्या, आत्म-कल्याण और ईश्वर की आराधना में मन विशेष रूप से लगता है। धीरे धीरे उसकी साध्वी, तपस्विनी, ईश्वर परायण एवं ब्रह्मवादिनी जैसी स्थिति हो जाती है। गायत्री के वेष में भगवान का उसको साक्षात्कार होने लगता है और ऐसी आत्म-शान्ति मिलती है जिसकी तुलना में सधवा रहने का सुख उसे नितान्त तुच्छ दिखाई पड़ता है।
पुरुषों के लिए जो दैनिक नित्य साधना के नियम हैं वे ही स्त्रियों के लिए हैं। गायत्री सन्ध्या में वे शिखा बन्धन के स्थान पर शिखा स्पर्श कर लें। क्योंकि उनके बाल प्रायः बंधे रहते हैं। यदि खुले होवें तो जल्दी में उनका बंधना कठिन है। इसलिए स्पर्श ही उनके लिए पर्याप्त है।
(2) कुमारियों के लिए साधनाएं— गायत्री का चित्र, प्रतिमा अथवा मूर्ति को किसी छोटे आसन या चौकी पर स्थापित करके उसकी पूजा वैसे ही करनी चाहिए जैसे अन्य देव प्रतिमाओंकी की जाती हैं। प्रतिमा के आगे एक छोटी तस्तरी रख लेनी चाहिए और उसी में चन्दन, धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प, जल, भोग आदि पूजा सामग्री चढ़ानी चाहिए आरती करनी चाहिए। मूर्ति के मस्तक पर चन्दन लगाया जा सकता है पर यदि चित्र है तो उसको चन्दन आदि नहीं लगाना चाहिए जिससे उसमें मैलापन न आवे। नेत्र बन्द करके ध्यान करना चाहिए और मन ही मन कम से कम 24 मन्त्र गायत्री के जपने चाहिए। इस प्रकार की गायत्री साधना कन्याओं को उनके लिए अनुकूल वर, अच्छा घर तथा अचल सौभाग्य प्रदान करने में सहायक होती है।
(3) सधवाओं के लिए साधना— प्रातःकाल से लेकर मध्याह्न काल तक उपासना कर लेनी चाहिए। जब तक साधना न की जाय भोजन न करना चाहिए। हां जल पिया जा सकता है। शुद्ध शरीर, शुद्ध मन और शुद्ध वस्त्र से पूर्व की ओर मुंह करके बैठना चाहिए। केशर डालकर चन्दन अपने हाथ से घिसें और मस्तक, हृदय तथा कण्ठ पर तिलक छाप के रूप में लगावें। तिलक छोटा से छोटा भी लगाया जा सकता है, गायत्री की मूर्ति या चित्र की स्थापना करके उसकी विधिवत पूजा करें। पीले रंग का पूजा के सब कार्यों में प्रयोग करें। प्रतिमा का आवरण पीले वस्त्रों का रखें। पीले पुष्प, पीले चावल, बेसन-लड्डू आदि पीले खाद्य पदार्थों का भोग, केशर मिले चन्दन का तिलक, आरती के लिए पीला गौ घृत, गौ घृत न मिले तो उसमें केशर मिलाकर पीला कर लेना, चन्दन की चूर, धूप इस प्रकार पूजा में रंग का अधिक प्रयोग करना चाहिए। नेत्र बन्द करके पीत वर्ण आकाश में, पीले सिंह पर सवार, पीत वस्त्र पहने गायत्री का ध्यान करना चाहिए। पूजा के समय सब वस्त्र पीले न हो सकें तो कम से कम एक वस्त्र पीला अवश्य होना चाहिए। इस प्रकार पीत-वर्ण गायत्री का ध्यान करते हुए कम से कम 24 मन्त्र गायत्री के जपने चाहिए। जब अवसर मिले तभी मन ही मन भगवती का ध्यान करती रहें। महीने की हर पूर्णमासी को व्रत रखना चाहिए। अपने नित्य आहार में एक चीज पीले रंग की अवश्य ले लें। शरीर पर हल्दी का कभी कभी उबटन कर लेना अच्छा है। यह पीत वर्ण साधना दाम्पत्ति जीवन को सुखी बनाने के लिए परम उत्तम है। इस साधना से घर में सुख शान्ति की वृद्धि होती है और रोग, कष्ट, क्लेश मिटते हैं। (4) सन्तान सुख देने वाली उपासना— जो महिलाएं गर्भवती हैं वे प्रातः सूर्योदय से पूर्व या रात्रि को सूर्य अस्त के पश्चात अपने गर्भ में गायत्री से सूर्य सदृश्य प्रचंडतेज का ध्यान किया करें और मन ही मन गायत्री जपें तो उनका बालक तेजस्वी, बुद्धिमान, चतुर, दीर्घजीवी तथा यशस्वी होता है।
प्रातःकाल कटि प्रदेश में भीगे वस्त्र रख कर स्वच्छ चित्त से ध्यानावस्थित होना चाहिए और अपने योनि मार्ग में हो कर गर्भाशय तक पहुंचता हुआ गायत्री का प्रकाश सूर्य किरणों जैसा ध्यान करना चाहिए। नेत्र बन्द करें। कटि प्रदेश में तेज पुंज भरा हुआ अनुभव हो। मन ही मन जप चलता रहे। यह साधना शीघ्र गर्भ स्थापित कराने वाली है। कुन्ती ने इसी साधना के बल से कुमारी अवस्था में ही गायत्री के दक्षिण भाग (सूर्य भगवान) को आकर्षित करके कुमारी अवस्था में ही कर्ण को जन्म दिया था। यह साधना कुमारी कन्याओं को नहीं करनी चाहिए। साधना से उठ कर सूर्य को जल चढ़ाना चाहिए और अर्घ से बचा हुआ एक चुल्लू जल स्वयं पीना चाहिए। इस प्रयोग से बन्ध्याएं भी गर्भ धारण करती हैं, जिनके बच्चे मर जाते हैं या गर्भपात हो जाता है उनका यह कष्ट मिट कर सन्तोष दायिनी सन्तान होती है।
रोगी, कुबुद्धि, आलसी, चिड़चिड़े बालकों को गोदी में ले कर माताएं हंसवाहिनी, गुलाबी कमल पुष्पों से लदी हुई, शंख, चक्र हाथ में लिए गायत्री का ध्यान करें और मन ही मन जप करें। माता के जप का प्रभाव गोदी में लगे बालक पर होता है और उसके शरीर तथा मस्तिष्क में आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ता है। छोटा बच्चा हो तो इस साधना के समय दूध पिलाती रहे। बड़ा बच्चा हो तो उसके शिर और शरीर पर हाथ फिराती रहे। बच्चों की शुभ कामना के लिए गुरुवार का व्रत उपयोगी है। साधना से उठ कर जल का अर्घ सूर्य को चढ़ावें और पीछे से बचा हुआ थोड़ा सा जल बच्चों पर मार्जन की तरह छिड़क दें।
(5) किसी विशेष आवश्यकता के लिए— अपने परिवार पर, परिजनों पर, प्रियजनों पर आई हुई किसी आपत्ति के निवारण के लिए अथवा किसी आवश्यक कार्य में आई हुई किसी बड़ी रुकावट एवं कठिनाई को हटाने के लिए गायत्री साधना के समान दैवी सहायता के माध्यम कठिनाई से मिलेंगे। कोई विशेष कामना मन में हो और उसके पूर्ण होने में भारी बाधाएं दिखाई पड़ रही हो तो सच्चे हृदय से वेदमाता गायत्री को पुकारना चाहिए। माता जैसे अपने प्रिय बालक की पुकार सुन कर दौड़ी आती है वैसे ही गायत्री की उपासिकाएं भी माता की अमित करुणा का प्रत्यक्ष परिचय प्राप्त करती हैं।
नौ दिन का लघु अनुष्ठान, चालीस दिन का पूर्ण अनुष्ठान इसी पुस्तक में अन्यत्र वर्णित है। तात्कालिक आवश्यकता के लिए उनका उपयोग करना या कराना चाहिए। नित्य की साधना में गायत्री चालीसा का पाठ महिलाओं के लिए बड़ा हितकर है।

