अनेक प्रयोजनों में सफलता
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गायत्री सर्वोपरि मन्त्र है। भारतीय धर्म में इससे बड़ा और कोई मन्त्र नहीं है। जो काम अन्य किसी भी मन्त्र से हो सकते हैं वे सभी गायत्री मंत्र से भी हो सकते हैं। दीर्घ कालीन गायत्री उपासना से साधक में आत्म-बल पर्याप्त मात्रा में संचित हो जाता है। उस बल को विविध कार्यों में प्रयुक्त करके उससे अनेक लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं। स्मरण रखना चाहिए कि अपने पास जितनी बड़ी साधना की पूंजी होगी उसी अनुपात से लाभ होगा। कुछ विशेष प्रयोजनों के लिए विशेष प्रयोग नीचे दिए जाते हैं:—
(1) रोग निवारण— स्वयं रोगी होने पर जिस स्थिति में भी रहना पड़े उसी में मन ही मन गायत्री का जप करना चाहिये। एक मन्त्र समाप्त होने और दूसरा आरम्भ होने के बीच में एक ‘बीज मन्त्र’ का सम्पुट भी लगाते चलना चाहिये। सर्दी प्रधान (कफ) रोगों में ‘ऐं’ बीज मन्त्र, गर्मी प्रधान ‘पित्त’ रोगों में 'ऐं’ अपच एवं विष प्रधान (बात) रोगों में ‘हुं’ बीज मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए। निरोग होने के कारण वृषभ वाहिनी हरितवस्त्र गायत्री का ध्यान करना चाहिए।
दूसरों को निरोग करने के लिए भी इन्हीं बीज मन्त्रों का और इसी ध्यान का प्रयोग करना चाहिए। रोगी के पीड़ित अंगों पर उपरोक्त ध्यान और जप करते हुए हाथ फिराना, जल अभिमन्त्रित करके रोगी पर मार्जन देना एवं छिड़कना चाहिए। इन्हीं स्थितियों में तुलसी पत्र और काली मिर्च गंगा जल में पीस कर दवा के रूप में देना, यह सब उपचार ऐसे हैं जो किसी भी रोग के रोगी पर किये जांय उसे लाभ पहुंचाये बिना न रहेंगे।
(2) विष निवारण—पीपल वृक्ष की समिधाओं से विधिवत् हवन करके उसकी भस्म को सुरक्षित कर लेना चाहिए। अपनी नासिका का जो स्वर चल रहा है उसी हाथ पर थोड़ी सी भस्म रख कर दूसरे हाथ से उसे अभिमन्त्रित करता चले और बीच में ‘हुं’ बीज मन्त्र का सम्पुट लगावे तथा रक्त वर्ण, अश्वारूढ़ा गायत्री का ध्यान करता हुआ उस भस्म को विषैले कीड़े के काटे हुए स्थान पर दो चार मिनट मसले। पीड़ा को जादू की तरह आराम होता है।
सर्प के काटे हुए स्थान पर रक्त चन्दन से किए हुए हवन की भस्म मलनी चाहिए और अभिमन्त्रित करके घृत पिलाना चाहिये। पीली सरसों अभिमन्त्रित करके उसे पीस कर दसों इन्द्रियों के द्वारा पर थोड़ा लगा देना चाहिए। ऐसा करने से सर्प विष दूर हो जाता है।
(3) बुद्धि वृद्धि— गायत्री प्रधानतः बुद्धि को शुद्ध प्रखर और समुन्नत करने वाला मन्त्र है। मन्द बुद्धि, स्मरण शक्ति की कमी वाले लोग इससे विशेष रूप से लाभ उठा सकते हैं। जो बालक परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं पाठ ठीक प्रकार याद नहीं कर पाते उनके लिए निम्न उपासना बड़ी उपयोगी है।
सूर्योदय के समय की प्रथम किरणें पानी से भीगे मस्तक पर पड़ने दें। पूर्व की ओर मुख करके अधखुले नेत्रों से सूर्य का दर्शन करते हुये आरम्भ कर तीन चार ॐ का उच्चारण करते हुए गायत्री का जप करें। कम से कम एक माला (108 मन्त्र) अवश्य जपने चाहिये। पीछे दोनों हाथों का हथेली का भाग सूर्य की ओर इस प्रकार करें मानों आग पर ताप रहे हैं। इस स्थिति में बारह मन्त्र जप कर हथेलियों को आपस में रगड़ना चाहिये और उन उष्ण हाथों को मुख, नेत्र, नासिका, ग्रीवा, कर्ण, मस्तक आदि समस्त शिरो भागों पर फिराना चाहिए।
(4) राजकीय सफलता— किसी सरकारी कार्य मुकदमा, राज्य स्वीकृति, नियुक्ति आदि में सफलता प्राप्त करने के लिए गायत्री का उपयोग किया जा सकता है। जिस समय अधिकारी के सम्मुख उपस्थित होना हो अथवा कोई आवेदन पत्र लिखना हो उस समय यह देखना चाहिए कि कौन सा स्वर चल रहा है। यदि दाहिना स्वर चल रहा हो तो पीत वर्ण ज्योति का मस्तिष्क में ध्यान करना चाहिए और यदि बांया स्वर चल रहा हो तो हरे रंग के प्रकाश का ध्यान करना चाहिए। मन्त्र में सप्त व्याहृतियां लगाते हुए (ॐ भूः भुवः स्वः तपः जनः महः सत्यम्) बारह मंत्रों का मन ही मन जप करना चाहिए। दृष्टि उस हाथ के अंगूठे के नाखून पर रखनी चाहिए जिसका स्वर चल रहा हो। भगवती की मानसिक आराधना प्रार्थना करते हुए राजद्वार में प्रवेश करने से सफलता मिलती है।
(5) दरिद्रता का नाश— दरिद्रता नाश के लिए गायत्री की ‘श्रीं’ शक्ति की उपासना करनी चाहिए। मन्त्र के अन्त में ‘श्रीं’ बीज का सम्पुट लगाना चाहिए। साधना काल के लिए पीत वस्त्र, पीले पुष्प, पीला यज्ञोपवीत, पीला तिलक, पीला आसन उपयोग करना चाहिए। शरीर पर शुक्रवार को हल्दी मिले हुए तेल की मालिश करनी चाहिए और रविवार को उपवास करना चाहिए। पीताम्बर धारी, हाथी पर चढ़ी हुई गायत्री का ध्यान करना चाहिए। पीत वर्ण लक्ष्मी का प्रतीक है, भोजन में भी पीली चीजें प्रधान रूप से लेनी चाहिए। इस प्रकार की साधना से धन की वृद्धि और दरिद्रता का नाश होता है।
(6) सुसन्तति की प्राप्ति— जिनके सन्तान नहीं होती है, हो कर मर जाती हैं, रोगी रहती हैं; गर्भपात हो जाते हैं, केवल कन्याएं होती हैं तो इन कारणों से माता पिता को दुख रहना स्वाभाविक है। इस प्रकार के दुखों से भगवती की कृपा द्वारा छुटकारा मिल सकता है। इस प्रकार की साधना में स्त्री पुरुष दोनों ही सम्मिलित हो सकें तो बड़ा अच्छा, एक पक्ष के द्वारा ही पूरा भार कन्धे पर लिए जाने से आंशिक सफलता ही मिलती है। प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर पूर्वाभिमुख हो कर साधना पर बैठे। नेत्र बन्द कर के श्वेत वस्त्राभूषण अलंकृत किशोर आयु वाली, कमल पुष्प हाथ में लिए हुए गायत्री का ध्यान करें। ‘यं’ बीज के तीन सम्पुट लगा कर गायत्री का जप चन्दन की माला पर करें।
नासिका से सांस खींचते हुए पेडू तक ले जानी चाहिए। पेडू को जितना वायु से भरा जा सके भरना चाहिए। फिर सांस रोककर ‘यं’ बीज सम्पुटित गायत्री का कम से कम एक अधिक से अधिक तीन बार जप करना चाहिए। फिर धीरे धीरे सांस को निकाल देना चाहिए। इस प्रकार पेडू में गायत्री शक्ति का आकर्षण और धारण करने वाला यह प्राणायाम इस बार करना चाहिए। तदनन्तर अपने वीर्य-कोष या गर्भाशय में शुभ्र वर्ण ज्योति का ध्यान करना चाहिए। यह साधन स्वस्थ, सुन्दर, तेजस्वी, गुणवान, बुद्धिमान, सन्तान उत्पन्न करने के लिये है।
इस साधना के दिनों में प्रत्येक रविवार का चावल, दूध, दही आदि केवल श्वेत वस्तुओं का ही भोजन करना चाहिए।
(7) शत्रुता का संहार— द्वेष, कलह, मुकदमाबाजी, मनमुटाव को दूर करने और अत्याचारी, अन्यायी, अकारण आक्रमण करने वाली मनोवृत्ति का संहार करने, आत्मा तथा समाज में शान्ति रखने के लिए आवश्यक होता है। इसके लिए चार क्लीं बीज मन्त्रों के सम्पुट समेत रक्त चन्दन की माला से पश्चिमाभिमुख होकर गायत्री का जप करना चाहिए। जप काल में शिर पर यज्ञ भस्म का तिलक लगाना तथा ऊन का आसन बिछाना चाहिए। लाल वस्त्र पहने, सिंहारुढ़, खड्गहस्ता, विकराल बदना दुर्गा वेषधारी गायत्री का ध्यान करना चाहिए।
जिन व्यक्तियों का द्वेष दुर्भाव निवारण करना हो उन का नाम पीपल के पत्ते पर रक्त चन्दन की स्याही और अनार की कलम द्वारा लिखना चाहिए। इस पत्ते को उल्टा रख कर प्रत्येक मन्त्र के बाद जल पात्र में से एक छोटी चमची भर के जल लेकर उस पत्ते पर डालना चाहिए। इस प्रकार 108 मन्त्र नित्य जपना चाहिए। इससे शत्रु के स्वभाव का परिवर्तन होता है और उसकी द्वेष वाली सामर्थ्य घट जाती है।
(8) भूत बाधा की शान्ति— इसके लिए गायत्री हवन सर्व श्रेष्ठ है। सतोगुणी हवन सामग्री से विधि पूर्वक यज्ञ करना चाहिए और रोगी को उसके निकट बिठा लेना चाहिए। हवन की अग्नि में तपाया हुआ जल रोगी को पिलाना चाहिए। बुझी हुई यज्ञ भस्म सुरक्षित रख लेनी चाहिए। किसी रोगी को अचानक भूत बाधा हो तो उस यज्ञ भस्म को उसके हृदय, ग्रीवा, मस्तक, नेत्र, कर्ण, मुख, नासिका आदि पर लगाना चाहिए।
(9) दूसरों को प्रभावित करना— जो व्यक्ति अपने प्रतिकूल हैं उन्हें अनुकूल बनाने के लिए, अपेक्षा करने वालों में प्रेम उत्पन्न करने के लिये गायत्री द्वारा आकर्षण क्रिया की जानी चाहिए।
गायत्री का जप तीन प्रणव लगा कर जपना चाहिए और ऐसा ध्यान करना चाहिए कि अपनी त्रिकुटी (मस्तिष्क का मध्य भाग) में से एक नील वर्ण विद्युत तेज रस्सी जैसी शक्ति निकल कर उस व्यक्ति तक पहुंचती है जिसे आपको आकर्षित करना है। और उसके चारों ओर अनेक लपेट मार कर लिपट जाती है। इस प्रकार लिपटा हुआ वह व्यक्ति अर्द्धतन्द्रित अवस्था में धीरे धीरे खिंचता चला आता है और अनुकूलता की प्रसन्न मुद्रा उसके चेहरे पर छाई हुई है। आकर्षण के लिए यह ध्यान बड़ा प्रभावशाली है। किसी के मन में, मस्तिष्क में, उसके अनुचित विचार हटा कर अपने उचित विचार भरने हों, तो ऐसा करना चाहिए कि शान्त चित्त हो कर उस व्यक्ति को अखिल नील आकाश में अकेला सोता हुआ ध्यान करें और भावना करें कि उसके कुविचारों को आप हटा कर उसके मन में सद्विचार भर रहे हैं। इस ध्यान साधना के समय अपना शरीर भी बिलकुल शिथिल और नील वस्त्र से ढका हुआ होना चाहिए।
(10) रक्षा कवच— किसी शुभ दिन उपवास रखकर केशर, कस्तूरी, जायफल, जावित्री, गोरोचन इन पांच चीजों के मिश्रण की स्याही बना कर अनार की लकड़ी से पांच प्रणव संयुक्त गायत्री मन्त्र बिना पालिश किए हुए कागज या भोजपत्र पर लिखना चाहिए। यह कवच चांदी के ताबीज में बन्द करके जिस किसी को धारण कराया जाय उसकी सब प्रकार से रक्षा करता है। रोग, अकाल मृत्यु, शत्रु, चोर, हानि, बुरे दिन, कलह, भय, राजदण्ड, भूत-प्रेत, अभिचार आदि से यह कवच रक्षा करता है।
(11) प्रसूति कष्ट निवारण— कांसे की थाली में उपरोक्त प्रकार से गायत्री मन्त्र लिखकर उसे प्रसवकष्ट से पीड़ित प्रसूता को दिखाया जाय और फिर पानी से धोकर उसे पिला दिया जाय तो कष्ट दूर होकर, सुख पूर्वक शीघ्र प्रसव हो जाता है।
(12) बुरे मुहूर्त और शकुनों का परिहार— कभी कभी ऐसे अवसर आते हैं कि कोई कार्य करना या कहीं जाना है पर उस समय कोई शकुन या मुहूर्त ऐसे उपस्थित हो रहे हैं जिनके कारण आगे कदम बढ़ाते हुए झिझक होती है ऐसे अवसरों पर गायत्री की एक माला जपने के पश्चात कार्य आरम्भ किया जा सकता है। दूसरे सारे अनिष्टों और शंकाओं का समाधान हो जाता है और किसी अनिष्ट की सम्भावना नहीं रहती।
(13) बुरे स्वप्नों के फल का नाश— कई बार ऐसे भयंकर स्वप्न दिखाई पड़ते हैं जिनसे स्वप्न काल में भी बड़ा त्रास और दुख मिलता है एवं जागने पर भी उनका स्मरण करके दिल धड़कता है। ऐसे स्वप्न किसी अनिष्ट की आशंका का संकेत करते हैं। जब ऐसे स्वप्न हों तो एक सप्ताह तक प्रति दिन दस दस मालाएं गायत्री का जप करना चाहिए और गायत्री का पूजन करना या कराना चाहिए। गायत्री सहस्र नाम या गायत्री चालीसा का पाठ भी दुःस्वप्नों के प्रभाव को नष्ट करने वाला है। इसके अतिरिक्त भी अनेकों प्रकार से गायत्री द्वारा अपना तथा दूसरों को आत्मिक एवं सांसारिक हित साधन किया जा सकता है।
दूसरों को निरोग करने के लिए भी इन्हीं बीज मन्त्रों का और इसी ध्यान का प्रयोग करना चाहिए। रोगी के पीड़ित अंगों पर उपरोक्त ध्यान और जप करते हुए हाथ फिराना, जल अभिमन्त्रित करके रोगी पर मार्जन देना एवं छिड़कना चाहिए। इन्हीं स्थितियों में तुलसी पत्र और काली मिर्च गंगा जल में पीस कर दवा के रूप में देना, यह सब उपचार ऐसे हैं जो किसी भी रोग के रोगी पर किये जांय उसे लाभ पहुंचाये बिना न रहेंगे।
(2) विष निवारण—पीपल वृक्ष की समिधाओं से विधिवत् हवन करके उसकी भस्म को सुरक्षित कर लेना चाहिए। अपनी नासिका का जो स्वर चल रहा है उसी हाथ पर थोड़ी सी भस्म रख कर दूसरे हाथ से उसे अभिमन्त्रित करता चले और बीच में ‘हुं’ बीज मन्त्र का सम्पुट लगावे तथा रक्त वर्ण, अश्वारूढ़ा गायत्री का ध्यान करता हुआ उस भस्म को विषैले कीड़े के काटे हुए स्थान पर दो चार मिनट मसले। पीड़ा को जादू की तरह आराम होता है।
सर्प के काटे हुए स्थान पर रक्त चन्दन से किए हुए हवन की भस्म मलनी चाहिए और अभिमन्त्रित करके घृत पिलाना चाहिये। पीली सरसों अभिमन्त्रित करके उसे पीस कर दसों इन्द्रियों के द्वारा पर थोड़ा लगा देना चाहिए। ऐसा करने से सर्प विष दूर हो जाता है।
(3) बुद्धि वृद्धि— गायत्री प्रधानतः बुद्धि को शुद्ध प्रखर और समुन्नत करने वाला मन्त्र है। मन्द बुद्धि, स्मरण शक्ति की कमी वाले लोग इससे विशेष रूप से लाभ उठा सकते हैं। जो बालक परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं पाठ ठीक प्रकार याद नहीं कर पाते उनके लिए निम्न उपासना बड़ी उपयोगी है।
सूर्योदय के समय की प्रथम किरणें पानी से भीगे मस्तक पर पड़ने दें। पूर्व की ओर मुख करके अधखुले नेत्रों से सूर्य का दर्शन करते हुये आरम्भ कर तीन चार ॐ का उच्चारण करते हुए गायत्री का जप करें। कम से कम एक माला (108 मन्त्र) अवश्य जपने चाहिये। पीछे दोनों हाथों का हथेली का भाग सूर्य की ओर इस प्रकार करें मानों आग पर ताप रहे हैं। इस स्थिति में बारह मन्त्र जप कर हथेलियों को आपस में रगड़ना चाहिये और उन उष्ण हाथों को मुख, नेत्र, नासिका, ग्रीवा, कर्ण, मस्तक आदि समस्त शिरो भागों पर फिराना चाहिए।
(4) राजकीय सफलता— किसी सरकारी कार्य मुकदमा, राज्य स्वीकृति, नियुक्ति आदि में सफलता प्राप्त करने के लिए गायत्री का उपयोग किया जा सकता है। जिस समय अधिकारी के सम्मुख उपस्थित होना हो अथवा कोई आवेदन पत्र लिखना हो उस समय यह देखना चाहिए कि कौन सा स्वर चल रहा है। यदि दाहिना स्वर चल रहा हो तो पीत वर्ण ज्योति का मस्तिष्क में ध्यान करना चाहिए और यदि बांया स्वर चल रहा हो तो हरे रंग के प्रकाश का ध्यान करना चाहिए। मन्त्र में सप्त व्याहृतियां लगाते हुए (ॐ भूः भुवः स्वः तपः जनः महः सत्यम्) बारह मंत्रों का मन ही मन जप करना चाहिए। दृष्टि उस हाथ के अंगूठे के नाखून पर रखनी चाहिए जिसका स्वर चल रहा हो। भगवती की मानसिक आराधना प्रार्थना करते हुए राजद्वार में प्रवेश करने से सफलता मिलती है।
(5) दरिद्रता का नाश— दरिद्रता नाश के लिए गायत्री की ‘श्रीं’ शक्ति की उपासना करनी चाहिए। मन्त्र के अन्त में ‘श्रीं’ बीज का सम्पुट लगाना चाहिए। साधना काल के लिए पीत वस्त्र, पीले पुष्प, पीला यज्ञोपवीत, पीला तिलक, पीला आसन उपयोग करना चाहिए। शरीर पर शुक्रवार को हल्दी मिले हुए तेल की मालिश करनी चाहिए और रविवार को उपवास करना चाहिए। पीताम्बर धारी, हाथी पर चढ़ी हुई गायत्री का ध्यान करना चाहिए। पीत वर्ण लक्ष्मी का प्रतीक है, भोजन में भी पीली चीजें प्रधान रूप से लेनी चाहिए। इस प्रकार की साधना से धन की वृद्धि और दरिद्रता का नाश होता है।
(6) सुसन्तति की प्राप्ति— जिनके सन्तान नहीं होती है, हो कर मर जाती हैं, रोगी रहती हैं; गर्भपात हो जाते हैं, केवल कन्याएं होती हैं तो इन कारणों से माता पिता को दुख रहना स्वाभाविक है। इस प्रकार के दुखों से भगवती की कृपा द्वारा छुटकारा मिल सकता है। इस प्रकार की साधना में स्त्री पुरुष दोनों ही सम्मिलित हो सकें तो बड़ा अच्छा, एक पक्ष के द्वारा ही पूरा भार कन्धे पर लिए जाने से आंशिक सफलता ही मिलती है। प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर पूर्वाभिमुख हो कर साधना पर बैठे। नेत्र बन्द कर के श्वेत वस्त्राभूषण अलंकृत किशोर आयु वाली, कमल पुष्प हाथ में लिए हुए गायत्री का ध्यान करें। ‘यं’ बीज के तीन सम्पुट लगा कर गायत्री का जप चन्दन की माला पर करें।
नासिका से सांस खींचते हुए पेडू तक ले जानी चाहिए। पेडू को जितना वायु से भरा जा सके भरना चाहिए। फिर सांस रोककर ‘यं’ बीज सम्पुटित गायत्री का कम से कम एक अधिक से अधिक तीन बार जप करना चाहिए। फिर धीरे धीरे सांस को निकाल देना चाहिए। इस प्रकार पेडू में गायत्री शक्ति का आकर्षण और धारण करने वाला यह प्राणायाम इस बार करना चाहिए। तदनन्तर अपने वीर्य-कोष या गर्भाशय में शुभ्र वर्ण ज्योति का ध्यान करना चाहिए। यह साधन स्वस्थ, सुन्दर, तेजस्वी, गुणवान, बुद्धिमान, सन्तान उत्पन्न करने के लिये है।
इस साधना के दिनों में प्रत्येक रविवार का चावल, दूध, दही आदि केवल श्वेत वस्तुओं का ही भोजन करना चाहिए।
(7) शत्रुता का संहार— द्वेष, कलह, मुकदमाबाजी, मनमुटाव को दूर करने और अत्याचारी, अन्यायी, अकारण आक्रमण करने वाली मनोवृत्ति का संहार करने, आत्मा तथा समाज में शान्ति रखने के लिए आवश्यक होता है। इसके लिए चार क्लीं बीज मन्त्रों के सम्पुट समेत रक्त चन्दन की माला से पश्चिमाभिमुख होकर गायत्री का जप करना चाहिए। जप काल में शिर पर यज्ञ भस्म का तिलक लगाना तथा ऊन का आसन बिछाना चाहिए। लाल वस्त्र पहने, सिंहारुढ़, खड्गहस्ता, विकराल बदना दुर्गा वेषधारी गायत्री का ध्यान करना चाहिए।
जिन व्यक्तियों का द्वेष दुर्भाव निवारण करना हो उन का नाम पीपल के पत्ते पर रक्त चन्दन की स्याही और अनार की कलम द्वारा लिखना चाहिए। इस पत्ते को उल्टा रख कर प्रत्येक मन्त्र के बाद जल पात्र में से एक छोटी चमची भर के जल लेकर उस पत्ते पर डालना चाहिए। इस प्रकार 108 मन्त्र नित्य जपना चाहिए। इससे शत्रु के स्वभाव का परिवर्तन होता है और उसकी द्वेष वाली सामर्थ्य घट जाती है।
(8) भूत बाधा की शान्ति— इसके लिए गायत्री हवन सर्व श्रेष्ठ है। सतोगुणी हवन सामग्री से विधि पूर्वक यज्ञ करना चाहिए और रोगी को उसके निकट बिठा लेना चाहिए। हवन की अग्नि में तपाया हुआ जल रोगी को पिलाना चाहिए। बुझी हुई यज्ञ भस्म सुरक्षित रख लेनी चाहिए। किसी रोगी को अचानक भूत बाधा हो तो उस यज्ञ भस्म को उसके हृदय, ग्रीवा, मस्तक, नेत्र, कर्ण, मुख, नासिका आदि पर लगाना चाहिए।
(9) दूसरों को प्रभावित करना— जो व्यक्ति अपने प्रतिकूल हैं उन्हें अनुकूल बनाने के लिए, अपेक्षा करने वालों में प्रेम उत्पन्न करने के लिये गायत्री द्वारा आकर्षण क्रिया की जानी चाहिए।
गायत्री का जप तीन प्रणव लगा कर जपना चाहिए और ऐसा ध्यान करना चाहिए कि अपनी त्रिकुटी (मस्तिष्क का मध्य भाग) में से एक नील वर्ण विद्युत तेज रस्सी जैसी शक्ति निकल कर उस व्यक्ति तक पहुंचती है जिसे आपको आकर्षित करना है। और उसके चारों ओर अनेक लपेट मार कर लिपट जाती है। इस प्रकार लिपटा हुआ वह व्यक्ति अर्द्धतन्द्रित अवस्था में धीरे धीरे खिंचता चला आता है और अनुकूलता की प्रसन्न मुद्रा उसके चेहरे पर छाई हुई है। आकर्षण के लिए यह ध्यान बड़ा प्रभावशाली है। किसी के मन में, मस्तिष्क में, उसके अनुचित विचार हटा कर अपने उचित विचार भरने हों, तो ऐसा करना चाहिए कि शान्त चित्त हो कर उस व्यक्ति को अखिल नील आकाश में अकेला सोता हुआ ध्यान करें और भावना करें कि उसके कुविचारों को आप हटा कर उसके मन में सद्विचार भर रहे हैं। इस ध्यान साधना के समय अपना शरीर भी बिलकुल शिथिल और नील वस्त्र से ढका हुआ होना चाहिए।
(10) रक्षा कवच— किसी शुभ दिन उपवास रखकर केशर, कस्तूरी, जायफल, जावित्री, गोरोचन इन पांच चीजों के मिश्रण की स्याही बना कर अनार की लकड़ी से पांच प्रणव संयुक्त गायत्री मन्त्र बिना पालिश किए हुए कागज या भोजपत्र पर लिखना चाहिए। यह कवच चांदी के ताबीज में बन्द करके जिस किसी को धारण कराया जाय उसकी सब प्रकार से रक्षा करता है। रोग, अकाल मृत्यु, शत्रु, चोर, हानि, बुरे दिन, कलह, भय, राजदण्ड, भूत-प्रेत, अभिचार आदि से यह कवच रक्षा करता है।
(11) प्रसूति कष्ट निवारण— कांसे की थाली में उपरोक्त प्रकार से गायत्री मन्त्र लिखकर उसे प्रसवकष्ट से पीड़ित प्रसूता को दिखाया जाय और फिर पानी से धोकर उसे पिला दिया जाय तो कष्ट दूर होकर, सुख पूर्वक शीघ्र प्रसव हो जाता है।
(12) बुरे मुहूर्त और शकुनों का परिहार— कभी कभी ऐसे अवसर आते हैं कि कोई कार्य करना या कहीं जाना है पर उस समय कोई शकुन या मुहूर्त ऐसे उपस्थित हो रहे हैं जिनके कारण आगे कदम बढ़ाते हुए झिझक होती है ऐसे अवसरों पर गायत्री की एक माला जपने के पश्चात कार्य आरम्भ किया जा सकता है। दूसरे सारे अनिष्टों और शंकाओं का समाधान हो जाता है और किसी अनिष्ट की सम्भावना नहीं रहती।
(13) बुरे स्वप्नों के फल का नाश— कई बार ऐसे भयंकर स्वप्न दिखाई पड़ते हैं जिनसे स्वप्न काल में भी बड़ा त्रास और दुख मिलता है एवं जागने पर भी उनका स्मरण करके दिल धड़कता है। ऐसे स्वप्न किसी अनिष्ट की आशंका का संकेत करते हैं। जब ऐसे स्वप्न हों तो एक सप्ताह तक प्रति दिन दस दस मालाएं गायत्री का जप करना चाहिए और गायत्री का पूजन करना या कराना चाहिए। गायत्री सहस्र नाम या गायत्री चालीसा का पाठ भी दुःस्वप्नों के प्रभाव को नष्ट करने वाला है। इसके अतिरिक्त भी अनेकों प्रकार से गायत्री द्वारा अपना तथा दूसरों को आत्मिक एवं सांसारिक हित साधन किया जा सकता है।

