गायत्री की कुछ सिद्धियां
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अष्ट सिद्धियां, नव निद्धियां प्रसिद्ध हैं। उनके अतिरिक्त भी अगणित छोटी बड़ी ऋद्धि सिद्धियां होती हैं, वे साधना के परिपाक होने के साथ उठती, प्रकट होती और बढ़ती हैं। किसी विशेष सिद्धि के प्राप्त की लिए चाहे भले ही प्रयत्न न किया जाय पर युवावस्था आने पर जैसे यौवन के चिन्ह अपने आप प्रस्फुटित हो आते हैं उसी प्रकार साधना के परिपाक के साथ साथ, सिद्धियां अपने आप आती जाती हैं। गायत्री का साधक धीरे धीरे सिद्धावस्था की ओर अग्रसर होता जाता है उसमें अनेकों अलौकिक शक्तियां प्रस्फुटित होती दिखाई पड़ती हैं। ऐसा देखा गया है कि जो लोग श्रद्धा और निष्ठा पूर्वक गायत्री साधना में दीर्घकाल तक तल्लीन रहे हैं उनमें यह विशेषताएं विशेष रूप से परिलक्षित होती हैं—
(1) उनका व्यक्तित्व आकर्षक, नेत्रों में चमक, वाणी में बल, चेहरे पर प्रतिभा, गम्भीरता तथा स्थिरता होती है। जिससे दूसरों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। जो व्यक्ति उसके सम्पर्क में आता है वे उससे काफी प्रभावित हो जाते हैं तथा उसकी इच्छानुसार आचरण करते हैं।
(2) साधक को अपने अन्दर एक दैवी तेज की उपस्थिति प्रतीत होती है। वह अनुभव करता है कि उसने अन्तःकरण में कोई नई शक्ति काम कर रही है। (3) बुरे कर्मों से उसकी रुचि हटती जाती है और भले कर्मों में मन लगता है। कोई बुराई बन पड़ती है तो उसके लिए बड़ा खेद और पश्चाताप होता है। सुख के समय वैभव में अधिक आनन्द न होगा और दुख, कठिनाई तथा विपत्ति में धैर्य खो कर किंकर्तव्य विमूढ़ न होना उसकी विशेषता होती है।
(4) भविष्य में जो घटनाएं घटित होने वाली हैं उसका उसके मन में पहले से ही आभास आने लगता है। आरम्भ में कुछ हल्का सा ही अन्दाज होता है पर धीरे धीरे उसे भविष्य का ज्ञान बिलकुल सही होने लगता है।
(5) उसके शाप और आशीर्वाद सफल होते हैं। यदि वह अन्तरात्मा से दुखी हो कर किसी को शाप देता है तो उस व्यक्ति पर भारी विपत्तियां आती हैं और प्रसन्न होकर जिसे वह सच्चे अन्तःकरण से आशीर्वाद देता है उसका मंगल होता है। उसके आशीर्वाद विफल नहीं होते।
(6) वह दूसरों के मनोभावों को चेहरा देखते ही पहचान लेता है। कोई व्यक्ति कितना ही छिपावे, उसके सामने वह भाव छिपता नहीं। वह किसी के भी गुण दोषों विचारों तथा आचरणों को पारदर्शी की तरह अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देख सकता है।
(7) वह अपने विचारों को दूसरे के हृदय में प्रवेश कर सकता है। दूर रहने वाले मनुष्यों तक बिना तार या पत्र की सहायता से अपना सन्देश पहुंचा सकता है। (8) जहां वह रहता है उसके आस पास का वातावरण बड़ा शान्त एवं सात्विक रहता है। उसके पास बैठने वालों को, जब तक वे समीप रहते हैं अपने अन्दर एक अद्भुत शान्ति, सात्विकता तथा पवित्रता अनुभव होती है।
(9) वह अपनी तपस्या, आयु या शक्ति का एक भाग किसी को दे सकता है और उसके द्वारा दूसरा व्यक्ति बिना प्रयास या स्वल्प प्रयास में ही अधिक लाभान्वित हो सकता है। ऐसे व्यक्ति दूसरों पर ‘शक्तिपात’ कर सकते हैं।
(10) शरीर में हलकापन, मन में उत्साह, त्वचा पर चिकनाई, नेत्रों में चमक, स्वभाव में गम्भीरता, तामसिक आहार विहार से घृणा, शरीर में एक विशेष प्रकार की गन्ध आना आदि लक्षण प्रकट होते हैं।
(11) उसे स्वप्न में, जागृति में, ध्यानावस्था में रंग-बिरंगे प्रकाश पुंज, दिव्य ध्वनियां, दिव्य प्रकाश एवं दिव्य वाणियां सुनाई पड़ती हैं। कोई अलौकिक शक्ति उसके साथ बार बार छेड़खानी, खिलवाड़ करती हुई सी दिखाई पड़ती है। उसे अनेकों प्रकार के ऐसे दिव्य अनुभव होते हैं जो बिना अलौकिक शक्ति के प्रभाव के साधारणतः नहीं होते। (12) गायत्री साधकों की मनोभूमि साफ होती जाती है। उसमें अनेक गुप्त बातों के रहस्य अपने आप स्पष्ट होने लगते हैं। इसी तथ्य को गायत्री दर्शन या वातावरण भी कह सकते हैं। एक प्रकार हर एक साधक माता के समीप पहुंच सकता है और उससे अपनी आत्मिक स्थिति के अनुरूप, स्पष्ट अस्पष्ट उत्तर प्राप्त कर सकता है। वह तरीका यह है कि एकान्त स्थान में शान्त चित्त होकर आराम से, शरीर को ढीला करके बैठें। चित्त को चिन्ता से रहित रखें। शरीर और वस्त्र शुद्ध हों। नेत्र बन्द करके प्रकाशित ज्योति का हंसवाहिनी के रूप में हृदय स्थान पर गायत्री शक्ति का ध्यान करें। और मन ही मन अपने प्रश्न को भगवती के सम्मुख बार बार दोहराये। यह ध्यान दस मिनट करने के उपरान्त तीन लम्बे श्वांस इस प्रकार खींचें मानों अखिल वायुमण्डल में व्याप्त महाशक्ति सांस द्वारा प्रवेश करके अन्तःकरण के कण कण में व्याप्त हो गई है। अब ध्यान बन्द कर दीजिए। मन को सब प्रकार के विचारों से शून्य कर दीजिए। अपनी ओर से कोई भी विचार न उठावें। मन और हृदय सर्वथा विचार शून्य हो जाना चाहिए। इस शून्यावस्था में स्तब्धता को भंग करती हुई अन्तःकरण में स्फुरणा होती है। जिसमें अनायास ही कोई अचिन्त्य भाव उपज पड़ता है। यकायक कोई विचार अन्तरात्मा में इस प्रकार उद्भूत होता है मानों किसी अज्ञात शक्ति ने यह उत्तर सुझाया हो। पवित्र हृदय जब उपरोक्त साधना द्वारा और भी अधिक दिव्य पवित्रता से परिपूर्ण हो जाता है तो सूक्ष्म दैवी शक्ति जो व्यष्टि अन्तरात्मा और समष्टि परमात्मा में समान रूप से व्याप्त है उस पवित्र हृदय पटल पर अपना कार्य करना आरम्भ कर देती है और कई ऐसे प्रश्नों, सन्देहों और शंकाओं का उत्तर मिल जाता है जो पहले बहुत विवादास्पद, सन्देह युक्त एवं रहस्यमय बने हुए थे। इस प्रक्रिया से भगवती वेद-माता गायत्री साधक से वार्तालाप करती हैं और उसकी अनेकों जिज्ञासाओं का समाधान करती हैं। यह क्रम यदि व्यवस्था पूर्वक आगे बढ़ता रहे तो आगे चल कर उस शरीर रहित दिव्य माता से उसी प्रकार वार्तालाप करना सम्भव हो सकता है जैसा कि जन्म देने वाली नर तन धारी माता से बातें करना सम्भव और सुगम होता है।
जिस समय सिद्धियों का उत्पादन एवं विकास हो रहा हो वह समय बड़ा ही नाजुक और बड़ी ही सावधानी का है। जब किशोर अवस्था का अन्त और नवयौवन का आरम्भ होता है उस समय वीर्य का शरीर में नवीन उद्भव होता है। इस उद्भव काल में मन बड़ा उत्साहित, काम क्रीड़ा का इच्छुक एवं चंचल रहता है, यदि इस मनोदशा पर नियन्त्रण न किया जाय तो कच्चे वीर्य का अपव्यय होने लगता है और वह नवयुवक थोड़े ही समय में शक्तिहीन, वीर्य हीन, यौवन हीन हो कर सदा के लिए निकम्मा बन जाता है। साधना में भी सिद्धि का प्रारम्भ ऐसी ही अवस्था है जब साधक अपने अन्दर एक नवीन आत्मिक चेतना अनुभव करता है और उत्साहित होकर प्रदर्शनों द्वारा दूसरों पर अपनी महत्ता की छाप बिठाना चाहता है। यह क्रम यदि चल पड़े तो वह कच्चा वीर्य—प्रारम्भिक सिद्धि तत्व—स्वल्प काल में ही अपव्यय हो कर समाप्त हो जाता है साधक को सदा के लिए छूंछ एवं निकम्मा हो जाना पड़ता है।
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए हम इस पुस्तक के पाठकों और अनुयायियों को सावधान करते हैं, कड़े शब्दों में आदेश देते हैं कि वे अपनी सिद्धियों को गुप्त रखें, किसी पर प्रकट न करें, किसी के सामने प्रदर्शन न करें। उनका दुरुपयोग न करें और साथ ही जो दैवी चमत्कार दृष्टिगोचर हों उन्हें विश्वस्त अभिन्न हृदय मित्रों के अतिरिक्त और हर किसी से न कहें।
तांत्रिक साधनाएं गोपनीय हैं।
गायत्री द्वारा जैसे योगसम्मत वेदोक्त दक्षिणमार्गी साधनाएं होती हैं वैसे ही उससे तन्त्रोक्त वाममार्गी सिद्धियां भी प्राप्त की जा सकती हैं। तन्त्र एक उत्तेजनात्मक उग्र प्रणाली है। उससे आंधी तूफान की तरह भयंकर कार्य कर डालने की शक्ति पैदा होती है। बड़े आकर्षण प्रलोभन सामने आते हैं परन्तु यह ध्यान रखने की बात है कि साधना में थोड़ी सी भूल हो जाने पर भयंकर खतरा भी है। तंत्र भ्रष्ट साधक बीमारी, पागलपन, अंग-भंग या किसी प्राणघातक संकट में फंस सकता है। यदि सिद्धि मिली भी तो तंत्र की तमोगुणी प्रधान शक्तियां आत्मा को कलुषित करके अधःपतन की ओर ही ले जाती हैं।
हमें इस दिशा में बड़े कटु अनुभव हैं। कई बार मृत्यु मुख में से वापिस लौट कर नया जीवन पाया है। ऐसे जोखिम भरे मार्ग में हम दूसरों को डालने की जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेते। इसलिए वाममार्गी तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त करने के इच्छुकों को सदा हमारी यही सलाह रहती है कि वे आकर्षण, प्रलोभन, चमत्कार, आतंक, जमाने की क्षमता, प्रशंसा एवं लोगों में पूजने के लोभ को त्याग कर तंत्र से विमुख ही रहें। यह मार्ग कुछ विशेष व्यक्तियों के लिए ही उपयुक्त हो सकता है पर सर्वसाधारण के लिए तो सर्वथा अनुपयुक्त ही है। गायत्री तंत्र के शास्त्रीय वर्णन ‘‘गायत्री महाविज्ञान’’ के द्वितीय खण्ड में किया जा चुका है पर तत्सम्बन्धी व्यावहारिक साधना विधि गोपनीय ही रखी गई है। लोकहित की दृष्टि से यह दुराव करना पड़ा है। इसके लिए विज्ञ पाठकों से हम करबद्ध क्षमा प्रार्थी हैं।
न कुछ से, कुछ अच्छा। जो सज्जन नियमित साधना नहीं कर सकते, किसी विधि विधान का नियमित रूप से पालन करना उनसे नहीं बन पड़ता। उनसे हमारी प्रार्थना है कि सर्वथा साधना विमुख होने की अपेक्षा वे मन ही मन (बिना होंठ और जिह्वा हिलाए) उंगली के पोरुओं पर संख्या की गणना करते हुए जितना हो सके गायत्री का जप कर लिया करें। इसके लिए किसी स्नान, माला, आसन, आदि की आवश्यकता नहीं है। जब अवसर मिले तभी तप आरम्भ कर दें और साथ ही माता के ज्योतिर्मान स्वरूप का हृदय में या मस्तिष्क के मध्य भाग में ध्यान करते रहें। इससे भी उन्हें बहुत शान्ति मिलेगी और दिन-दिन इस मार्ग में उनकी श्रद्धा बढ़ेगी।
नित्य पाठ
नित्य पाठ के लिए ‘‘वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री’’ बड़ी ही महत्वपूर्ण पुस्तक है। उसमें गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री अष्टक, गायत्री स्तवन, गायत्री चालीसा और गायत्री की आरती संकलित हैं। आधे घंटे में इस सब का पाठ हो सकता है। जिन्हें इतना भी अवकाश न हो वे केवल गायत्री-गीता या गायत्री-चालीसा का पाठ करके भी काम चला सकते हैं। इस नित्य पाठ का भी बड़ा महात्म्य है। नित्य की साधना में जप, ध्यान के अतिरिक्त पाठ करना भी आवश्यक है।
सर्व सुलभ प्रारम्भ
नौ दिन में 24 हजार का आरम्भिक अनुष्ठान बहुत ही सुगम है। प्रतिदिन 2667 मन्त्र जपने होते हैं। इनकी 25 मालाएं होती हैं। यह ढाई घण्टे में जपी जा सकती हैं। नौ दिन तक प्रातःकाल ढाई घण्टा समय निकाल लेना कुछ कठिन काम नहीं है। एक समय में इतना समय न मिल सके तो प्रातः डेढ़ घंटा और सायं एक घंटा निकाला जा सकता है। आरम्भ में नौ दिन का एक छोटा अनुष्ठान करके फिर नियमित गायत्री उपासना कर देना गायत्री साधना का सर्व सुलभ मार्ग है।
(1) उनका व्यक्तित्व आकर्षक, नेत्रों में चमक, वाणी में बल, चेहरे पर प्रतिभा, गम्भीरता तथा स्थिरता होती है। जिससे दूसरों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। जो व्यक्ति उसके सम्पर्क में आता है वे उससे काफी प्रभावित हो जाते हैं तथा उसकी इच्छानुसार आचरण करते हैं।
(2) साधक को अपने अन्दर एक दैवी तेज की उपस्थिति प्रतीत होती है। वह अनुभव करता है कि उसने अन्तःकरण में कोई नई शक्ति काम कर रही है। (3) बुरे कर्मों से उसकी रुचि हटती जाती है और भले कर्मों में मन लगता है। कोई बुराई बन पड़ती है तो उसके लिए बड़ा खेद और पश्चाताप होता है। सुख के समय वैभव में अधिक आनन्द न होगा और दुख, कठिनाई तथा विपत्ति में धैर्य खो कर किंकर्तव्य विमूढ़ न होना उसकी विशेषता होती है।
(4) भविष्य में जो घटनाएं घटित होने वाली हैं उसका उसके मन में पहले से ही आभास आने लगता है। आरम्भ में कुछ हल्का सा ही अन्दाज होता है पर धीरे धीरे उसे भविष्य का ज्ञान बिलकुल सही होने लगता है।
(5) उसके शाप और आशीर्वाद सफल होते हैं। यदि वह अन्तरात्मा से दुखी हो कर किसी को शाप देता है तो उस व्यक्ति पर भारी विपत्तियां आती हैं और प्रसन्न होकर जिसे वह सच्चे अन्तःकरण से आशीर्वाद देता है उसका मंगल होता है। उसके आशीर्वाद विफल नहीं होते।
(6) वह दूसरों के मनोभावों को चेहरा देखते ही पहचान लेता है। कोई व्यक्ति कितना ही छिपावे, उसके सामने वह भाव छिपता नहीं। वह किसी के भी गुण दोषों विचारों तथा आचरणों को पारदर्शी की तरह अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देख सकता है।
(7) वह अपने विचारों को दूसरे के हृदय में प्रवेश कर सकता है। दूर रहने वाले मनुष्यों तक बिना तार या पत्र की सहायता से अपना सन्देश पहुंचा सकता है। (8) जहां वह रहता है उसके आस पास का वातावरण बड़ा शान्त एवं सात्विक रहता है। उसके पास बैठने वालों को, जब तक वे समीप रहते हैं अपने अन्दर एक अद्भुत शान्ति, सात्विकता तथा पवित्रता अनुभव होती है।
(9) वह अपनी तपस्या, आयु या शक्ति का एक भाग किसी को दे सकता है और उसके द्वारा दूसरा व्यक्ति बिना प्रयास या स्वल्प प्रयास में ही अधिक लाभान्वित हो सकता है। ऐसे व्यक्ति दूसरों पर ‘शक्तिपात’ कर सकते हैं।
(10) शरीर में हलकापन, मन में उत्साह, त्वचा पर चिकनाई, नेत्रों में चमक, स्वभाव में गम्भीरता, तामसिक आहार विहार से घृणा, शरीर में एक विशेष प्रकार की गन्ध आना आदि लक्षण प्रकट होते हैं।
(11) उसे स्वप्न में, जागृति में, ध्यानावस्था में रंग-बिरंगे प्रकाश पुंज, दिव्य ध्वनियां, दिव्य प्रकाश एवं दिव्य वाणियां सुनाई पड़ती हैं। कोई अलौकिक शक्ति उसके साथ बार बार छेड़खानी, खिलवाड़ करती हुई सी दिखाई पड़ती है। उसे अनेकों प्रकार के ऐसे दिव्य अनुभव होते हैं जो बिना अलौकिक शक्ति के प्रभाव के साधारणतः नहीं होते। (12) गायत्री साधकों की मनोभूमि साफ होती जाती है। उसमें अनेक गुप्त बातों के रहस्य अपने आप स्पष्ट होने लगते हैं। इसी तथ्य को गायत्री दर्शन या वातावरण भी कह सकते हैं। एक प्रकार हर एक साधक माता के समीप पहुंच सकता है और उससे अपनी आत्मिक स्थिति के अनुरूप, स्पष्ट अस्पष्ट उत्तर प्राप्त कर सकता है। वह तरीका यह है कि एकान्त स्थान में शान्त चित्त होकर आराम से, शरीर को ढीला करके बैठें। चित्त को चिन्ता से रहित रखें। शरीर और वस्त्र शुद्ध हों। नेत्र बन्द करके प्रकाशित ज्योति का हंसवाहिनी के रूप में हृदय स्थान पर गायत्री शक्ति का ध्यान करें। और मन ही मन अपने प्रश्न को भगवती के सम्मुख बार बार दोहराये। यह ध्यान दस मिनट करने के उपरान्त तीन लम्बे श्वांस इस प्रकार खींचें मानों अखिल वायुमण्डल में व्याप्त महाशक्ति सांस द्वारा प्रवेश करके अन्तःकरण के कण कण में व्याप्त हो गई है। अब ध्यान बन्द कर दीजिए। मन को सब प्रकार के विचारों से शून्य कर दीजिए। अपनी ओर से कोई भी विचार न उठावें। मन और हृदय सर्वथा विचार शून्य हो जाना चाहिए। इस शून्यावस्था में स्तब्धता को भंग करती हुई अन्तःकरण में स्फुरणा होती है। जिसमें अनायास ही कोई अचिन्त्य भाव उपज पड़ता है। यकायक कोई विचार अन्तरात्मा में इस प्रकार उद्भूत होता है मानों किसी अज्ञात शक्ति ने यह उत्तर सुझाया हो। पवित्र हृदय जब उपरोक्त साधना द्वारा और भी अधिक दिव्य पवित्रता से परिपूर्ण हो जाता है तो सूक्ष्म दैवी शक्ति जो व्यष्टि अन्तरात्मा और समष्टि परमात्मा में समान रूप से व्याप्त है उस पवित्र हृदय पटल पर अपना कार्य करना आरम्भ कर देती है और कई ऐसे प्रश्नों, सन्देहों और शंकाओं का उत्तर मिल जाता है जो पहले बहुत विवादास्पद, सन्देह युक्त एवं रहस्यमय बने हुए थे। इस प्रक्रिया से भगवती वेद-माता गायत्री साधक से वार्तालाप करती हैं और उसकी अनेकों जिज्ञासाओं का समाधान करती हैं। यह क्रम यदि व्यवस्था पूर्वक आगे बढ़ता रहे तो आगे चल कर उस शरीर रहित दिव्य माता से उसी प्रकार वार्तालाप करना सम्भव हो सकता है जैसा कि जन्म देने वाली नर तन धारी माता से बातें करना सम्भव और सुगम होता है।
जिस समय सिद्धियों का उत्पादन एवं विकास हो रहा हो वह समय बड़ा ही नाजुक और बड़ी ही सावधानी का है। जब किशोर अवस्था का अन्त और नवयौवन का आरम्भ होता है उस समय वीर्य का शरीर में नवीन उद्भव होता है। इस उद्भव काल में मन बड़ा उत्साहित, काम क्रीड़ा का इच्छुक एवं चंचल रहता है, यदि इस मनोदशा पर नियन्त्रण न किया जाय तो कच्चे वीर्य का अपव्यय होने लगता है और वह नवयुवक थोड़े ही समय में शक्तिहीन, वीर्य हीन, यौवन हीन हो कर सदा के लिए निकम्मा बन जाता है। साधना में भी सिद्धि का प्रारम्भ ऐसी ही अवस्था है जब साधक अपने अन्दर एक नवीन आत्मिक चेतना अनुभव करता है और उत्साहित होकर प्रदर्शनों द्वारा दूसरों पर अपनी महत्ता की छाप बिठाना चाहता है। यह क्रम यदि चल पड़े तो वह कच्चा वीर्य—प्रारम्भिक सिद्धि तत्व—स्वल्प काल में ही अपव्यय हो कर समाप्त हो जाता है साधक को सदा के लिए छूंछ एवं निकम्मा हो जाना पड़ता है।
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए हम इस पुस्तक के पाठकों और अनुयायियों को सावधान करते हैं, कड़े शब्दों में आदेश देते हैं कि वे अपनी सिद्धियों को गुप्त रखें, किसी पर प्रकट न करें, किसी के सामने प्रदर्शन न करें। उनका दुरुपयोग न करें और साथ ही जो दैवी चमत्कार दृष्टिगोचर हों उन्हें विश्वस्त अभिन्न हृदय मित्रों के अतिरिक्त और हर किसी से न कहें।
तांत्रिक साधनाएं गोपनीय हैं।
गायत्री द्वारा जैसे योगसम्मत वेदोक्त दक्षिणमार्गी साधनाएं होती हैं वैसे ही उससे तन्त्रोक्त वाममार्गी सिद्धियां भी प्राप्त की जा सकती हैं। तन्त्र एक उत्तेजनात्मक उग्र प्रणाली है। उससे आंधी तूफान की तरह भयंकर कार्य कर डालने की शक्ति पैदा होती है। बड़े आकर्षण प्रलोभन सामने आते हैं परन्तु यह ध्यान रखने की बात है कि साधना में थोड़ी सी भूल हो जाने पर भयंकर खतरा भी है। तंत्र भ्रष्ट साधक बीमारी, पागलपन, अंग-भंग या किसी प्राणघातक संकट में फंस सकता है। यदि सिद्धि मिली भी तो तंत्र की तमोगुणी प्रधान शक्तियां आत्मा को कलुषित करके अधःपतन की ओर ही ले जाती हैं।
हमें इस दिशा में बड़े कटु अनुभव हैं। कई बार मृत्यु मुख में से वापिस लौट कर नया जीवन पाया है। ऐसे जोखिम भरे मार्ग में हम दूसरों को डालने की जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेते। इसलिए वाममार्गी तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त करने के इच्छुकों को सदा हमारी यही सलाह रहती है कि वे आकर्षण, प्रलोभन, चमत्कार, आतंक, जमाने की क्षमता, प्रशंसा एवं लोगों में पूजने के लोभ को त्याग कर तंत्र से विमुख ही रहें। यह मार्ग कुछ विशेष व्यक्तियों के लिए ही उपयुक्त हो सकता है पर सर्वसाधारण के लिए तो सर्वथा अनुपयुक्त ही है। गायत्री तंत्र के शास्त्रीय वर्णन ‘‘गायत्री महाविज्ञान’’ के द्वितीय खण्ड में किया जा चुका है पर तत्सम्बन्धी व्यावहारिक साधना विधि गोपनीय ही रखी गई है। लोकहित की दृष्टि से यह दुराव करना पड़ा है। इसके लिए विज्ञ पाठकों से हम करबद्ध क्षमा प्रार्थी हैं।
न कुछ से, कुछ अच्छा। जो सज्जन नियमित साधना नहीं कर सकते, किसी विधि विधान का नियमित रूप से पालन करना उनसे नहीं बन पड़ता। उनसे हमारी प्रार्थना है कि सर्वथा साधना विमुख होने की अपेक्षा वे मन ही मन (बिना होंठ और जिह्वा हिलाए) उंगली के पोरुओं पर संख्या की गणना करते हुए जितना हो सके गायत्री का जप कर लिया करें। इसके लिए किसी स्नान, माला, आसन, आदि की आवश्यकता नहीं है। जब अवसर मिले तभी तप आरम्भ कर दें और साथ ही माता के ज्योतिर्मान स्वरूप का हृदय में या मस्तिष्क के मध्य भाग में ध्यान करते रहें। इससे भी उन्हें बहुत शान्ति मिलेगी और दिन-दिन इस मार्ग में उनकी श्रद्धा बढ़ेगी।
नित्य पाठ
नित्य पाठ के लिए ‘‘वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री’’ बड़ी ही महत्वपूर्ण पुस्तक है। उसमें गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री अष्टक, गायत्री स्तवन, गायत्री चालीसा और गायत्री की आरती संकलित हैं। आधे घंटे में इस सब का पाठ हो सकता है। जिन्हें इतना भी अवकाश न हो वे केवल गायत्री-गीता या गायत्री-चालीसा का पाठ करके भी काम चला सकते हैं। इस नित्य पाठ का भी बड़ा महात्म्य है। नित्य की साधना में जप, ध्यान के अतिरिक्त पाठ करना भी आवश्यक है।
सर्व सुलभ प्रारम्भ
नौ दिन में 24 हजार का आरम्भिक अनुष्ठान बहुत ही सुगम है। प्रतिदिन 2667 मन्त्र जपने होते हैं। इनकी 25 मालाएं होती हैं। यह ढाई घण्टे में जपी जा सकती हैं। नौ दिन तक प्रातःकाल ढाई घण्टा समय निकाल लेना कुछ कठिन काम नहीं है। एक समय में इतना समय न मिल सके तो प्रातः डेढ़ घंटा और सायं एक घंटा निकाला जा सकता है। आरम्भ में नौ दिन का एक छोटा अनुष्ठान करके फिर नियमित गायत्री उपासना कर देना गायत्री साधना का सर्व सुलभ मार्ग है।

