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हमारे प्रमुख संस्थान

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हमारे प्रमुख संस्थान



युगद्रष्टा के स्तर की अवतारी सत्ता के रूप में परमपूज्य गुरुदेव ने अपने अस्सी वर्ष के जीवनकाल (११११ - १११०) में जितना भी कुछ किया, उसकी मिसाल कहीं देखने को नहीं मिलती । करोड़ों व्यक्तियों के मनों का निर्माण, उनके सोचने के तरीके में बदलाव एवं युग निर्माण की पृष्ठभूमि बनाकर रख देने का कार्य इन्हीं के स्तर की सत्ता कर सकती थी, जो लाखों वर्षों में कभी- कभी धरती पर आती है । उनके द्वारा की गयी स्थापनाओं का जब प्रसंग आता है, तब ईंट- गारे-चूने-सीमेन्ट से बने भवनों से पहले उनकी स्नेह- संवेदना से सिक्त हुए ममत्व में स्नान कर उनके अपने हो गए लाखों व्यक्ति दिखाई पड़ते हैं, जिन्होंने उनके एक इशारे पर अपना सब कुछ उनको अर्पित कर दिया । परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी दिव्य दृष्टि से यह सब पूर्व में ही देख लिया था कि कोई भी भव्य निर्माण, आश्रम या तंत्र बनाने से पूर्व राष्ट्र को सांस्कृतिक, भौतिक, आध्यात्मिक आजादी दिलाने वाले अगणित व्यक्ति तैयार करने पड़ेंगे । आचार्यश्री ने पहले स्वयं को तपाया, तदुपरांत वैचारिक क्रांति के निर्माण का आधारभूत तंत्र स्वयं व परमवंदनीय माताजी के रूप में खड़ा किया । इसे प्रारंभिक भूमिका को समझने के बाद ही परमपूज्य गुरुदेव की छह मूल स्थापनाओं एवं बाद में देश- विदेश के कोने- कोने में बनी भव्य इमारतों के रूप में शक्तिपीठों, प्रज्ञासंस्थानों, भारत व विश्वभर में घर- घर में स्थापित एक लाख से भी अधिक स्वाध्याय मण्डलों, गायत्री परिवार की शाखाओं, प्रज्ञापीठों, चरणपीठों का महत्त्व समझा जा सकता है, नहीं तो जैसे अन्यान्य आश्रम- संस्थान बनते हैं, वैसे इनका भी वर्णन किया जा सकता था । उनमें यदि प्राण फूँके गए हों, प्राणवान व्यक्ति वहाँ रहते हों? वे उस शक्ति के महा- अवसान के बाद भी वे सतत प्रगति की दिशा में चल रहे हों, तो माना जाना चाहिए कि प्रारंभिक पुरुषार्थ जो किया गया, वह औचित्य पूर्ण था ।