महाप्रज्ञा का चौबीस शक्तियों का संक्षिप्त परिचय
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(१) आद्यशक्ति- अर्थात सृष्टि की मूल चेतना। आदिदेव ॐकार के रूप में इसे ही प्रथम और सर्वोपरि पूज्य माना गया है । पुरुषवाचक संबोधन में इसे परब्रह्म भी कहते हैं । यहाँ एक मुख्य मंदिर है, जिसे ज्ञान मंदिर के रूप में विनिर्मित किया गया है । समग्र गायत्री महाविद्या के मर्म को इस एक में भी समझा जा सकता है ।
(२) ब्राह्मी- अर्थात महाविद्या, सद्ज्ञान, सद्विचार । सृजनात्मक सतवृत्तियों के प्रसुप्त बीजों को जगाने- उगाने वाली महाशक्ति ।
(३) वैष्णवी- व्यवस्था बुद्धि का पर्याय। संसार की सुव्यवस्था करने वाली, परिपोषण करने वाली विश्वंभर शक्ति ।
(४) शांभवी- अवांछनीयता का निवारण करने वाली परिवर्तनकारी शक्ति, सृष्टि- संतुलन हेतु अनिवार्य प्रलयंकर शक्ति, जो अपने प्रभाव से व्यक्ति के जीवन में गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार करती है ।
(५) वेदमाता- ज्ञान की समस्त ज्ञात-अविज्ञात धाराओं की गंगोत्री, ज्ञान की जननी वेदगर्भा- वेदविद्या की कुंजी ।
(६) देवमाता- देवत्व को जन्म देनेवाली देवोपम स्तर की मनःस्थिति बनाने वाली देवी ।
(७) विश्वमाता- सार्वभौम संस्कृति के संविधान का निरूपण करने वाली, वसुधैव कुटुम्बकम् के दर्शन को सार्थक करने वाली शक्ति ।
(८) ऋतंभरा- सत्य- असत्य, औचित्य- अनौचित्य में ऋत का वरण करने में साधक को सहायता देने वाली शक्ति ।
(१) मंदाकिनी- अर्थात गंगा के समान पवित्र, वाह्याभ्यंतर को शुद्ध करने वाली देवी ।
(१) अजपा- निश्चल स्थिति- अविचल निष्ठा की सिद्धि देने वाली ।
(११) ऋद्धि- आत्मिक विभूतियों से व्यक्ति को असाधारण बना देने वाली शक्ति ।
(१२) सिद्धि- वैभव की अधिष्ठात्री, मनुष्य को प्रामाणिक, समृद्ध- संपन्न बनाने वाली देवी ।
(१३) सावित्री- अचेतन की रहस्यमयी परतों का अनावरण करने वाली पंचमुखी सावित्री शक्ति ।
(१४) सरस्वती- बुद्धि को प्रखर और परिष्कृत करने वाली सद्विचारणा की देवी ।
(१५) लक्ष्मी- अर्थात सर्वतोमुखी संपन्नताप्रदायक शक्ति, जो साधक में ''श्री'' तत्त्व बढ़ाने वाले गुणों का विकास करती है ।
(१६) महाकाली- असुरता का संहार करने वाली, मृत्यु की प्रतीक, प्रचंडता- प्रखरता की पर्याय रौद्रशक्ति ।
(१७) कुण्डलिनी- जीवन की सामान्य ऊर्जा को असामान्य में परिष्कृत कर चमत्कारी सफलताएँ प्रदान करने वाली तंत्रविद्या की अधिष्ठात्री देवी ।
(१८) प्राणाग्नि- साधक को प्राणवान बनाने वाली, जीवनी शक्ति बढ़ाकर अंत: सामर्थ्य बढ़ाने वाली शक्ति ।
(११) भुवनेश्बरी- नियम के परिपालन की कसौटी पर विश्व- वैभव को अधिष्ठाता बना देने वाली शक्ति ।
(२०) भवानी- संगठन कौशल का धनी बनाने वाली, व्यक्ति को युग- नेतृत्व सौंपने वाली देवी विभूति ।
(२१) अन्नपूर्णा- वह चेतनाशक्ति जिसकी कृपा से साधक को अभाव नहीं सताने पाते । अर्थ- सन्तुलन हेतु सद्बुद्धि देने वाली शक्ति ।
(२२) महामाया- भ्रांतियों का निवारण करने वाली, भव- बंधनों से मुक्ति दिलाने वाली ।
(२३) पयस्विनी- भूलोक की कामधेनु जिसकी कृपा से साधक में ब्रह्मतेज बढ़ता है, कोई अभाव नहीं रहता ।
(२४) त्रिपुरा- ओजस्, तेजस् और वर्चस् बढ़ाने वाली, पापों से उबारकर महान बनाने वाली सामर्थ्य देने वाली देवी ।

