शांतिकुंज हरिद्वार
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शांतिकुंज, सप्तसरोवर क्षेत्र में हरिद्वार- ऋषिकेश मार्ग पर सड़क के किनारे स्टेशन से छह किलोमीटर दूरी पर स्थित एक विशाल दर्शनीय गायत्री तीर्थ है ।
हिमालय की छाया एवं गंगा की गोद में विनिर्मित यह आश्रम युगऋषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी शर्मा की प्रचंड तप साधना के संस्कारों से अनुप्राणित है । यहाँ पूज्य गुरुदेव सन् ११७१ से महाप्रयाण १११० तक तथा वंदनीया माताजी १११४ तक रहे।
भारतीय संस्कृति के तत्त्वदर्शन, गायत्री एवं यज्ञ के तत्त्वज्ञान को जन- जन तक पहुँचाने वाला जाग्रत तीर्थ लाखों गायत्री साधकों का गुरुद्वार है । यहाँ पर गायत्री माता का एक भव्य मंदिर तथा सप्तऋषियों की प्रतिमाओं की स्थापना है ।
गायत्री साधक यहाँ आकर पूजा- उपासना का तत्त्वदर्शन समझते और जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ चलने के लिए अग्रसरित होते हैं । परमपूज्य गुरुदेव आचार्य पं० श्रीराम शर्मा द्वारा प्रज्वलित किया गया अखण्ड दीप सन् ११२६ से अहर्निश अपनी ऊर्जा विकीर्ण कर रहा है, जो इस विशाल गायत्री परिवार की सम्पूर्ण उपलब्धियों का मूल स्रोत है ।इसके सान्निध्य में २४०० करोड़ से अधिक गायत्री जप संपन्न हो चुके हैं ।
यहाँ हिमालय की एक दिव्य विराट प्रतिमा स्थापित की गई है, जिसमें सभी तीर्थों का दिग्दर्शन साधकों को वहाँ के इतिहास की पृष्ठभूमि के साथ मल्टीमीडिया प्रोजेक्शन पर किया जाता है । प्राय: साठ फुट चौड़ी, पंद्रह फुट ऊँची प्रतिमा के समक्ष बैठकर ध्यान करने का अपना अलग ही आनंद है । समीप स्थित देव संस्कृति दिग्दर्शन में मिशन के वर्तमान स्वरूप व भावी योजनाओं का चित्रण किया गया है । आश्रम की यज्ञशालाओं में नित्य नियमित लगभग एक हजार साधक गायत्री यज्ञ संपन्न करते हैं । सभी प्रकार के संस्कार जो भारतीय संस्कृति के अंतर्गत आते हैं, यथा अन्नप्राशन, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत, विवाह, वानप्रस्थ तथा श्राद्धकर्म- यहाँ निःशुल्क संपन्न कराए जाते हैं । शांतिकुंज को एक आध्यात्मिक सेनिटोरियम के रूप में विकसित किया गया है, जहाँ शरीर, मन व अन्त: करण को स्वस्थ- समुन्नत बनाने का व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया जाता है ।
यहाँ एक भटके हुए देवता का मंदिर भी है । गायत्री साधक यहाँ के साधना प्रधान नियमित चलने वाले सत्रों में भाग लेकर नवीन प्रेरणाएँ तथा दिव्य प्राण ऊर्जा के अनुदान पाकर तथा सन् ११८५ में स्थापित प्रखर प्रज्ञा (पूज्यवर का प्रतीक स्मारक) एवं सजल श्रद्धा (माताजी का प्रतीक स्मारक) के दर्शन- प्रणाम को अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति में सहायक पाते हैं । शांतिकुंज के कण- कण में इनकी प्राण चेतना व्याप्त है, लेकिन अखण्ड दीप की लौ एवं सजल श्रद्धा- प्रखर प्रज्ञा में वह घनीभूत हुई है ।
सौर ऊर्जा की उपलब्धियों पर आधारित तथा पवन ऊर्जा से संचालित उपकरण यहाँ स्थापित हैं, जिनसे वैकल्पिक ऊर्जा का ग्रामीण क्षेत्र के परिजनों को शिक्षण दिया जाता है ।
शांतिकुंज के दिव्य जड़ी- बूटी उद्यान में ३०० से भी अधिक प्रकार की दुर्लभ- सर्वोपयोगी वनौषधियाँ लगाई गई हैं । विश्वभर से वैज्ञानिक यहाँ आते व यहाँ का वनौषधि उद्यान देखकर जाते हैं । एक प्रयोगशाला में समय- समय पर इन जड़ी- बूटियों की जाँच- पड़ताल होती रहती है व साधना सत्र में भाग ले रहे साधकों को निर्धारणानुसार कल्क सेवन कराया जाता है ।
शांतिकुंज द्वारा आयुर्वेद का पुनर्जीवन कर पचास से अधिक वनौषधियों के चूर्ण व क्वाथ को जन- जन तक कम मूल्य पर पहुँचाया गया है । सभी आगंतुकों की शारीरिक, मानसिक जाँच- पड़ताल निष्णात चिकित्सकों द्वारा यहाँ निःशुल्क की जाती है एवं आहार, साधना तथा वनौषधि संबंधी परामर्श दिया जाता है ।
गायत्री महाविद्या की शब्दशक्ति एवं यज्ञ ऊर्जा पर वैज्ञानिक अनुसंधान हेतु एक आधुनिकतम ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की यहाँ स्थापना की गई है । गायत्री एवं यज्ञ विज्ञान पर चिरपुरातन से लेकर अब तक लिखा साहित्य इस संस्थान में संकलित किया गया है तथा बहुमूल्य प्रयोगशाला में मंत्र विद्या एवं यज्ञ प्रक्रिया के परीक्षण नियमित रूप से होते रहते हैं । यहाँ का पत्राचार विद्यालय भारत व विश्वभर में बैठे जिज्ञासुओं- प्रज्ञा परिजनों को दैनंदिन जीवन की उलझनों को सुलझाने का मार्गदर्शन देता है ।
शांतिकुंज के प्रयत्नों से देशभर में तीन हजार से अधिक भव्य प्रज्ञा मंदिर बने हैं । इनके माध्यम से जन- जन में आस्था, विस्तार तथा नैतिक पुनरुत्थान के कार्यक्रम दस लाख लोकसेवी कार्यकर्त्ताओं के माध्यम से चलाते हैं ।
अध्यात्म के गूढ़ विवेचनों की सरल व्याख्या कर उन्हें जीवन में कैसे उतारा जाय ? अपने चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार में उत्कृष्टता लाकर व्यक्तित्व को कैसे प्रभावकारी बनाया जाय ? इसका सतत प्रशिक्षण यहाँ के नौ दिवसीय संजीवनी साधना सत्रों में चलता है, जो यहाँ वर्ष भर संपादित होते रहते हैं । ये सत्र १ से १, ११ से ११, २१ से २१ की तारीखों में प्रति माह चलते हैं । लोकसेवियों का सर्वांगपूर्ण शिक्षण करके धर्मतंत्र से लोकमानस का परिष्कार यहाँ का एक विशिष्ट कार्यक्रम है । एक मास के युग शिल्पी सत्रों में प्राय: पाँच सौ से अधिक भावनाशील कार्यकर्त्ता नैतिक, बौद्धिक तथा सामाजिक क्रांति का परिपूर्ण शिक्षण लेने प्रतिमास आते हैं । शिक्षण, निवास एवं भोजन की व्यवस्था निःशुल्क है ।
पाँच दिवसीय मौन अंत: ऊर्जा जागरण सत्र यहाँ की विशेषता है । इसमें ६० साधक प्रति सत्र उच्चस्तरीय साधना करते हैं । ये आश्विन से चैत्र नवरात्र तक चलते हैं ।
केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों के विभिन्न पदाधिकारियों को यहाँ नैतिक, बौद्धिक तथा व्यक्तित्व परिष्कार का शिक्षण पाँच दिवसीय सत्रों में दिया जाता है । अब तक अस्सी हजार से अधिक अधिकारीगण इन मूल्यपरक शिक्षणों से लाभ पा चुके हैं ।
जन- जन में सुसंस्कारिता संवर्द्धन तथा आस्था संवर्द्धन हेतु शांतिकुंज से प्रज्ञा टोलियाँ देश- विदेश में भेजी जाती हैं । एक हजार से अधिक वानप्रस्थी परिव्राजक पूरे देश का सतत भ्रमण करते रहते हैं । स्थान-स्थान पर साधना सत्र आयोजित कर ये कार्यकर्त्ता शांतिकुंज की दैवी चेतना का विस्तार जन- जन तक करते हैं ।
गरीबी उन्मूलन की आर्थिक क्रांति के अंतर्गत औसत भारतीय स्तर की आजीविका उपार्जन हेतु यहाँ एक स्वावलंबन विद्यालय विनिर्मित है, जिसमें छोटे कुटीर उद्योगों से उपार्जन का निःशुल्क शिक्षण दिया जाता है ।
बंदी जीवन में सुधार के लिए गायत्री परिवार द्वारा देशभर में कारागारों में कैदियों के जीवन में सुधार के लिए विभिन्न कार्यक्रम आदोलन के रूप में चलाए जा रहे हैं ।
देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के क्रम में शांतिकुंज द्वारा देश- विदेश में २७ अश्वमेध महायज्ञ, एक वाजपेय यज्ञ एवं दो विराट् महापूर्णाहुति कार्यक्रम आँवलखेड़ा व हरिद्वार में संपन्न किए गए हैं । न केवल पर्यावरण अपितु अन्य वैज्ञानिक प्रयोगों में भी इन यज्ञों को बहुत महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है । इनवायरनमेंटल एण्ड टेक्निकल कंसेल्टेण्ट्स के निदेशक ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहायता से इन अश्वमेध यज्ञों के पर्यावरण पर प्रभाव का अनुसंधान करके बताया कि प्रदूषण इनसे कम होता है । अब यज्ञोपैथी के प्रयोगों को विश्वविद्यालय में एक आधुनिक रूप दिया जा रहा है ।
समूचे राष्ट्र की कुण्डलिनी जागरण के लिए परम पूज्य गुरुदेव ने युग संधि महापुरश्चरण की घोषणा की थी, इसके अंतर्गत लगभग चौबीस लाख साधकों ने प्रतिदिन लगभग २४० करोड़ गायत्री मंत्र का महानुष्ठान किया । इसकी प्रथम पूर्णाहुति ३ से ७ नवम्बर ९५ में पूज्य गुरुदेव की जन्मस्थली आँवलखेड़ा आगरा में की गई । इसमें प्राय: ५० लाख परिजनों ने भाग लिया । दूसरी पूर्णाहुति सन् २००० में सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ के रूप में शांतिकुंज में ६ से ११ नवम्बर की तारीखों में संपन्न हुई । इसके पूर्व नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में ८ अक्टूबर २००० को विराट विभूति ज्ञान यज्ञ भी संपन्न हुआ ।
लगभग एक हजार उच्च शिक्षित कार्यकर्त्ता शांतिकुंज में स्थायी रूप में सपरिवार निवास करते हैं । निर्वाह हेतु वे औसत भारतीय स्तर का भत्ता मात्र संस्था से लेते हैं ।
इस प्रकार शांतिकुंज एक ऐसी स्थापना है, जिसे सच्चे अर्थों में युग तीर्थ कहा जा सकता है । यहाँ आने वाला व्यक्ति कृतकृत्य होकर जाता है एवं नैसर्गिक सौंदर्य तथा आध्यात्मिक ऊर्जा से अनुप्राणित वातावरण में बार- बार आने के लिए लालायित रहता है । इस संस्था के दर्शनार्थ सहर्ष आमंत्रण है ।
जनसाधारण में उमंग व प्रेरणा भरने के लिए यहाँ के आधुनिकतम वीडियो स्टूडियो में नाटक, गीत, एक्शनसांग व छोटी- मोटी टेली फिल्में तैयार कर जन-जन तक प्रज्ञा वाहनों के माध्यम से बड़े परदे पर दिखाने के लिए पहुँचाई जाती हैं ।
नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक क्रांति का उद्देश्य लेकर प्रतिवर्ष टोलियाँ देशभर में भेजी जाती हैं, जो संगीत, प्रवचन, यज्ञ, कर्मकाण्ड के माध्यम से कार्य करती हैं । ये ११८२ से निरंतर चल रही हैं ।
हिमालय की छाया एवं गंगा की गोद में विनिर्मित यह आश्रम युगऋषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी शर्मा की प्रचंड तप साधना के संस्कारों से अनुप्राणित है । यहाँ पूज्य गुरुदेव सन् ११७१ से महाप्रयाण १११० तक तथा वंदनीया माताजी १११४ तक रहे।
भारतीय संस्कृति के तत्त्वदर्शन, गायत्री एवं यज्ञ के तत्त्वज्ञान को जन- जन तक पहुँचाने वाला जाग्रत तीर्थ लाखों गायत्री साधकों का गुरुद्वार है । यहाँ पर गायत्री माता का एक भव्य मंदिर तथा सप्तऋषियों की प्रतिमाओं की स्थापना है ।
गायत्री साधक यहाँ आकर पूजा- उपासना का तत्त्वदर्शन समझते और जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ चलने के लिए अग्रसरित होते हैं । परमपूज्य गुरुदेव आचार्य पं० श्रीराम शर्मा द्वारा प्रज्वलित किया गया अखण्ड दीप सन् ११२६ से अहर्निश अपनी ऊर्जा विकीर्ण कर रहा है, जो इस विशाल गायत्री परिवार की सम्पूर्ण उपलब्धियों का मूल स्रोत है ।इसके सान्निध्य में २४०० करोड़ से अधिक गायत्री जप संपन्न हो चुके हैं ।
यहाँ हिमालय की एक दिव्य विराट प्रतिमा स्थापित की गई है, जिसमें सभी तीर्थों का दिग्दर्शन साधकों को वहाँ के इतिहास की पृष्ठभूमि के साथ मल्टीमीडिया प्रोजेक्शन पर किया जाता है । प्राय: साठ फुट चौड़ी, पंद्रह फुट ऊँची प्रतिमा के समक्ष बैठकर ध्यान करने का अपना अलग ही आनंद है । समीप स्थित देव संस्कृति दिग्दर्शन में मिशन के वर्तमान स्वरूप व भावी योजनाओं का चित्रण किया गया है । आश्रम की यज्ञशालाओं में नित्य नियमित लगभग एक हजार साधक गायत्री यज्ञ संपन्न करते हैं । सभी प्रकार के संस्कार जो भारतीय संस्कृति के अंतर्गत आते हैं, यथा अन्नप्राशन, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत, विवाह, वानप्रस्थ तथा श्राद्धकर्म- यहाँ निःशुल्क संपन्न कराए जाते हैं । शांतिकुंज को एक आध्यात्मिक सेनिटोरियम के रूप में विकसित किया गया है, जहाँ शरीर, मन व अन्त: करण को स्वस्थ- समुन्नत बनाने का व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया जाता है ।
यहाँ एक भटके हुए देवता का मंदिर भी है । गायत्री साधक यहाँ के साधना प्रधान नियमित चलने वाले सत्रों में भाग लेकर नवीन प्रेरणाएँ तथा दिव्य प्राण ऊर्जा के अनुदान पाकर तथा सन् ११८५ में स्थापित प्रखर प्रज्ञा (पूज्यवर का प्रतीक स्मारक) एवं सजल श्रद्धा (माताजी का प्रतीक स्मारक) के दर्शन- प्रणाम को अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति में सहायक पाते हैं । शांतिकुंज के कण- कण में इनकी प्राण चेतना व्याप्त है, लेकिन अखण्ड दीप की लौ एवं सजल श्रद्धा- प्रखर प्रज्ञा में वह घनीभूत हुई है ।
सौर ऊर्जा की उपलब्धियों पर आधारित तथा पवन ऊर्जा से संचालित उपकरण यहाँ स्थापित हैं, जिनसे वैकल्पिक ऊर्जा का ग्रामीण क्षेत्र के परिजनों को शिक्षण दिया जाता है ।
शांतिकुंज के दिव्य जड़ी- बूटी उद्यान में ३०० से भी अधिक प्रकार की दुर्लभ- सर्वोपयोगी वनौषधियाँ लगाई गई हैं । विश्वभर से वैज्ञानिक यहाँ आते व यहाँ का वनौषधि उद्यान देखकर जाते हैं । एक प्रयोगशाला में समय- समय पर इन जड़ी- बूटियों की जाँच- पड़ताल होती रहती है व साधना सत्र में भाग ले रहे साधकों को निर्धारणानुसार कल्क सेवन कराया जाता है ।
शांतिकुंज द्वारा आयुर्वेद का पुनर्जीवन कर पचास से अधिक वनौषधियों के चूर्ण व क्वाथ को जन- जन तक कम मूल्य पर पहुँचाया गया है । सभी आगंतुकों की शारीरिक, मानसिक जाँच- पड़ताल निष्णात चिकित्सकों द्वारा यहाँ निःशुल्क की जाती है एवं आहार, साधना तथा वनौषधि संबंधी परामर्श दिया जाता है ।
गायत्री महाविद्या की शब्दशक्ति एवं यज्ञ ऊर्जा पर वैज्ञानिक अनुसंधान हेतु एक आधुनिकतम ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की यहाँ स्थापना की गई है । गायत्री एवं यज्ञ विज्ञान पर चिरपुरातन से लेकर अब तक लिखा साहित्य इस संस्थान में संकलित किया गया है तथा बहुमूल्य प्रयोगशाला में मंत्र विद्या एवं यज्ञ प्रक्रिया के परीक्षण नियमित रूप से होते रहते हैं । यहाँ का पत्राचार विद्यालय भारत व विश्वभर में बैठे जिज्ञासुओं- प्रज्ञा परिजनों को दैनंदिन जीवन की उलझनों को सुलझाने का मार्गदर्शन देता है ।
शांतिकुंज के प्रयत्नों से देशभर में तीन हजार से अधिक भव्य प्रज्ञा मंदिर बने हैं । इनके माध्यम से जन- जन में आस्था, विस्तार तथा नैतिक पुनरुत्थान के कार्यक्रम दस लाख लोकसेवी कार्यकर्त्ताओं के माध्यम से चलाते हैं ।
अध्यात्म के गूढ़ विवेचनों की सरल व्याख्या कर उन्हें जीवन में कैसे उतारा जाय ? अपने चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार में उत्कृष्टता लाकर व्यक्तित्व को कैसे प्रभावकारी बनाया जाय ? इसका सतत प्रशिक्षण यहाँ के नौ दिवसीय संजीवनी साधना सत्रों में चलता है, जो यहाँ वर्ष भर संपादित होते रहते हैं । ये सत्र १ से १, ११ से ११, २१ से २१ की तारीखों में प्रति माह चलते हैं । लोकसेवियों का सर्वांगपूर्ण शिक्षण करके धर्मतंत्र से लोकमानस का परिष्कार यहाँ का एक विशिष्ट कार्यक्रम है । एक मास के युग शिल्पी सत्रों में प्राय: पाँच सौ से अधिक भावनाशील कार्यकर्त्ता नैतिक, बौद्धिक तथा सामाजिक क्रांति का परिपूर्ण शिक्षण लेने प्रतिमास आते हैं । शिक्षण, निवास एवं भोजन की व्यवस्था निःशुल्क है ।
पाँच दिवसीय मौन अंत: ऊर्जा जागरण सत्र यहाँ की विशेषता है । इसमें ६० साधक प्रति सत्र उच्चस्तरीय साधना करते हैं । ये आश्विन से चैत्र नवरात्र तक चलते हैं ।
केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों के विभिन्न पदाधिकारियों को यहाँ नैतिक, बौद्धिक तथा व्यक्तित्व परिष्कार का शिक्षण पाँच दिवसीय सत्रों में दिया जाता है । अब तक अस्सी हजार से अधिक अधिकारीगण इन मूल्यपरक शिक्षणों से लाभ पा चुके हैं ।
जन- जन में सुसंस्कारिता संवर्द्धन तथा आस्था संवर्द्धन हेतु शांतिकुंज से प्रज्ञा टोलियाँ देश- विदेश में भेजी जाती हैं । एक हजार से अधिक वानप्रस्थी परिव्राजक पूरे देश का सतत भ्रमण करते रहते हैं । स्थान-स्थान पर साधना सत्र आयोजित कर ये कार्यकर्त्ता शांतिकुंज की दैवी चेतना का विस्तार जन- जन तक करते हैं ।
गरीबी उन्मूलन की आर्थिक क्रांति के अंतर्गत औसत भारतीय स्तर की आजीविका उपार्जन हेतु यहाँ एक स्वावलंबन विद्यालय विनिर्मित है, जिसमें छोटे कुटीर उद्योगों से उपार्जन का निःशुल्क शिक्षण दिया जाता है ।
बंदी जीवन में सुधार के लिए गायत्री परिवार द्वारा देशभर में कारागारों में कैदियों के जीवन में सुधार के लिए विभिन्न कार्यक्रम आदोलन के रूप में चलाए जा रहे हैं ।
देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के क्रम में शांतिकुंज द्वारा देश- विदेश में २७ अश्वमेध महायज्ञ, एक वाजपेय यज्ञ एवं दो विराट् महापूर्णाहुति कार्यक्रम आँवलखेड़ा व हरिद्वार में संपन्न किए गए हैं । न केवल पर्यावरण अपितु अन्य वैज्ञानिक प्रयोगों में भी इन यज्ञों को बहुत महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है । इनवायरनमेंटल एण्ड टेक्निकल कंसेल्टेण्ट्स के निदेशक ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहायता से इन अश्वमेध यज्ञों के पर्यावरण पर प्रभाव का अनुसंधान करके बताया कि प्रदूषण इनसे कम होता है । अब यज्ञोपैथी के प्रयोगों को विश्वविद्यालय में एक आधुनिक रूप दिया जा रहा है ।
समूचे राष्ट्र की कुण्डलिनी जागरण के लिए परम पूज्य गुरुदेव ने युग संधि महापुरश्चरण की घोषणा की थी, इसके अंतर्गत लगभग चौबीस लाख साधकों ने प्रतिदिन लगभग २४० करोड़ गायत्री मंत्र का महानुष्ठान किया । इसकी प्रथम पूर्णाहुति ३ से ७ नवम्बर ९५ में पूज्य गुरुदेव की जन्मस्थली आँवलखेड़ा आगरा में की गई । इसमें प्राय: ५० लाख परिजनों ने भाग लिया । दूसरी पूर्णाहुति सन् २००० में सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ के रूप में शांतिकुंज में ६ से ११ नवम्बर की तारीखों में संपन्न हुई । इसके पूर्व नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में ८ अक्टूबर २००० को विराट विभूति ज्ञान यज्ञ भी संपन्न हुआ ।
लगभग एक हजार उच्च शिक्षित कार्यकर्त्ता शांतिकुंज में स्थायी रूप में सपरिवार निवास करते हैं । निर्वाह हेतु वे औसत भारतीय स्तर का भत्ता मात्र संस्था से लेते हैं ।
इस प्रकार शांतिकुंज एक ऐसी स्थापना है, जिसे सच्चे अर्थों में युग तीर्थ कहा जा सकता है । यहाँ आने वाला व्यक्ति कृतकृत्य होकर जाता है एवं नैसर्गिक सौंदर्य तथा आध्यात्मिक ऊर्जा से अनुप्राणित वातावरण में बार- बार आने के लिए लालायित रहता है । इस संस्था के दर्शनार्थ सहर्ष आमंत्रण है ।
जनसाधारण में उमंग व प्रेरणा भरने के लिए यहाँ के आधुनिकतम वीडियो स्टूडियो में नाटक, गीत, एक्शनसांग व छोटी- मोटी टेली फिल्में तैयार कर जन-जन तक प्रज्ञा वाहनों के माध्यम से बड़े परदे पर दिखाने के लिए पहुँचाई जाती हैं ।
नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक क्रांति का उद्देश्य लेकर प्रतिवर्ष टोलियाँ देशभर में भेजी जाती हैं, जो संगीत, प्रवचन, यज्ञ, कर्मकाण्ड के माध्यम से कार्य करती हैं । ये ११८२ से निरंतर चल रही हैं ।

