परिचर्या एवं उसके मूलभूत तत्व
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परिचर्या वह क्रिया है, जिसमें रोगी की देख-भाल ऐसे की जाती है कि चिकित्सक के उपचार का अधिकाधिक लाभ उसे मिल सके और वह शरीर, मन दोनों स्तरों से शीघ्रातिशीघ्र स्वास्थ लाभ करे। सामान्यतः गंभीर रूप से बीमार रोगियों को इस प्रकार की सेवा-सहायता अस्पताल में कुशल नर्सों द्वारा उपलब्ध होती है। किन्तु जब मर्ज सामान्य हो, तो इस प्रकार का उपचार रोगग्रस्तों को घर रख कर भी प्रदान किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि परिचारक परिचर्या के सारे नियमों से पूर्णतः भिज्ञ हो। प्रस्तुत पुस्तक का मूल उद्देश्य परिचर्या के आधारभूत नियमों का जिज्ञासुओं को दिग्दर्शन कराना है।
परिचारक के गुण— एक योग्य परिचारक में निम्नलिखित गुण होने चाहिए—
(1) परिचारक को शिष्ट, सौम्य और शालीन होना चाहिए।
(2) उसे आत्मानुशासित, धैर्य तथा क्षमाशील होना चाहिए, ताकि रोगी के सद्-असद् व्यवहार को भली-भांति सह सके।
(3) परिचारक कर्त्तव्यपरायण, सेवाभावी, ईमानदार व आज्ञाकारी होना चाहिए।
(4) आत्मविश्वास का धनी व प्रत्युत्पन्नमति सम्पन्न होना चाहिए, जिससे कि आकस्मिक दुर्घटना में अविलम्ब उपयुक्त कदम उठा कर रोगी को आवश्यक सेवा प्रदान कर सके।
(5) परिचारक को आलस्य-प्रमाद से रहित तथा परिचर्या संबंधी किसी भी प्रकार के कार्य को करने में हर क्षण प्रस्तुत व तत्पर होना चाहिए।
(6) उसमें रोगी के दुःख को समझ सकने की क्षमता होनी चाहिए, ताकि उसे धैर्य बंधा कर उसमें नवीन आशा का संचार कर सके।
(7) बीमार की अवस्था में आये परिवर्तन को पढ़ सकने की क्षमता होनी चाहिए, ताकि वह सामयिक आवश्यकता के अनुकूल अपनी परिचर्या में परिवर्तन कर सके।
(8) परिचारक में हर किसी से तत्काल घुलने-मिलने की क्षमता होनी चाहिए।
परिचारक के कर्तव्य— परिचारक के तीन मुख्य कर्तव्य हैं, जिनकी ओर उसी भली-भांति ध्यान देना चाहिए।
(1) रोगी के प्रति कर्त्तव्य, (2) डॉक्टर के प्रति कर्त्तव्य, (3) स्वयं के प्रति कर्त्तव्य।
(1) रोगी के प्रति कर्तव्य - परिचारक के क्रिया-कृत्य व व्यवहार रोगी के प्रति ऐसे भ्रातृत्वपूर्ण होने चाहिए कि वह उसे अपने ही परिवार का एक सदस्य समझे, जिससे परिचारक उस पर अपना सम्पूर्ण स्नेह-सौजन्य उड़ेलकर उसका विश्वास अर्जित कर सके।
चिकित्सा जगत में विश्वास का महत्वपूर्ण स्थान है। रोगी की सेवा में उपस्थित व्यक्ति यदि रोगग्रस्त का विश्वास प्राप्त करने में सफल होता है, तो उसकी सामान्य सी परिचर्या भी बीमार के लिए चमत्कार उपस्थित कर सकती है।
परिचर्या में प्रस्तुत व्यक्ति को सदा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह रोगी अथवा उसके रोग संबंधी कोई भी ऐसी बात दूसरों के समक्ष प्रकट न करे, जिससे उसे ठेस पहुंचे।
नर्सिंग के दौरान परिचारक ही बीमार का डॉक्टर होता है, अस्तु रोगग्रस्त को जल्दी-से-जल्दी रोग-निवृत्त करने संबंधी सारा दायित्व उसी पर है। इसके लिए उसे कुछ मुख्य बातों पर ध्यान देना चाहिए।
(अ) विश्राम - स्वास्थ्य लाभ एवं स्वास्थ्य-रक्षा के लिए विश्राम एक आवश्यक शर्त है। व्याधि शारीरिक हो अथवा मानसिक हर स्थिति में इसकी महत्ता सर्वविदित है, अतः परिचारक को चाहिए कि वह रोगी को अनावश्यक चिन्ताओं से मुक्त रखे व उसके घर-परिवार के सगे संबंधियों को बार-बार उससे मिलने एवं अनावश्यक बातचीत करने से रोकें और बीमार को पूरी नींद सोने दें। नींद से ही शरीर-मन को पूर्ण विश्राम मिलता है, किन्तु व्याधि की स्थिति में रोग ग्रस्तों को प्रायः कम ही नींद आती है, ऐसी दशा में परिचारक निम्न उपचारों द्वारा रोगी को सोने में सहायता कर सकता है—
(1) बीमार के शरीर-तापमान पर ध्यान रखा जाय। तापमान अधिक हो तो मुंह एवं हाथों पर स्पंज करना अथवा ठंडे जल की पट्टी लगाना चाहिए। तापमान कम हो, तो गरम पानी की बोतल द्वारा पैरों से गर्मी शरीर में पहुंचाई जा सकती है।
(2) कमरा शोरगुल मुक्त व हवादार हो।
(3) पीने के लिए गर्म दूध देना चाहिए।
(4) यदि किसी प्रकार की तकलीफ अथवा पीड़ा हो रही हो तो शारीरिक स्थिति में परिवर्तन करना चाहिए।
इनके विफल होने पर ही दवा का आश्रय लेना उपयुक्त है, जिसमें चिकित्सक का परामर्श आवश्यक है।
(अ) स्वच्छता - नर्सिंग के दौरान रोगी के वस्त्र एवं शरीर की साफ-सफाई अत्यावश्यक है। बालों, नाखून और त्वचा की स्वच्छता पर ध्यान दिया जाना चाहिए और यदि संभव हो तो प्रतिदिन स्नान कराना चाहिए।
(इ) आहार - स्वस्थता की प्राप्ति में भोजन का महत्वपूर्ण स्थान है, यद्यपि आहार निर्धारण चिकित्सक करता है; किन्तु इसके बाद की भूमिका परिचारक की होती है कि वह उसे भोजन के लिए राजी करे, पर ऐसा करते वक्त रोगी को यह न महसूस होना चाहिए कि उसके साथ जबरदस्ती हो रही है। भोजन ठोस-तरल दोनों हों।
(ई) मल त्याग - प्रतिदिन रोगी की नित्य-नैमित्तिक क्रिया की व्यवस्था होनी चाहिए। पाखाना बिना कठिनाई के अधिक सरलता से हो, इसके लिए बीमार को अधिक तरह भोजन दिया जाना चाहिए।
(उ) मनोरंजन - व्याधि का जोर कर होने एवं रोगी की शिकायतें घटने पर रोगी को ऊब से बचाने के लिए उसे किसी-न-किसी प्रकार व्यस्त रखा जाना चाहिए। इसके लिए हल्के-फुल्के मनोरंजन, पत्र-पत्रिकाओं का पठन एवं छोटे-मोटे खेलों का अवलम्बन लिया जा सकता है।
(2) डॉक्टर के प्रति कर्त्तव्य— आवश्यकतानुसार रोगी के बारे में चिकित्सक की भी सलाह ली जा सकती है। इसके लिए डॉक्टर को रोगी की स्थिति की जानकारी देना आवश्यक है, अतः परिचारक को रोगी संबंधी निम्न विषयों को प्रतिदिन नोट करना चाहिए।
(1) भूख तथा आहार। (2) नींद की मात्रा। (3) मूत्र का परिमाण तथा रंग। (4) मल की प्रकृति तथा परिमाण व बनावट। (5) इसके अतिरिक्त अन्य प्रकार की जानकारियां, शिकायतें असामान्यता तथा कोई दवा जो दी गई हो।
(6) स्वयं के प्रति कर्त्तव्य— रोगग्रस्त के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली सभी बातें परिचारक पर भी लागू होती हैं, अस्तु उसे उन पर ध्यान देना चाहिए।
(अ) स्वच्छता— शरीर व वस्त्र की स्वच्छता जितना रोगी के लिए आवश्यक है, उतना ही परिचारक के लिए भी। मौसम अनुकूल हो, तो परिचारक को प्रतिदिन कर्म पानी से ही स्नान करना चाहिए। परिचर्या से पूर्व एवं परिचर्या के उपरांत हाथों को अच्छी प्रकार धो कर साफ कर लेना चाहिए। नाखून छोटे व स्वच्छ हों। धूम्रपान एवं अन्य प्रकार के नशा-सेवन से सदा बचना चाहिए। मुंह तथा दांतों की सफाई भली प्रकार करनी चाहिए, ताकि वे दुर्गंध रहित हों। वस्त्र हल्के व साफ हों। मोजों की सफाई भी प्रतिदिन आवश्यक है।
(आ) आहार— परिचारक को भोजन संतुलित पौष्टिक व ताजा लेना चाहिए। स्वच्छता का इसमें भी ध्यान रखना चाहिए।
रोगी का कमरा - रोगी का कमरा स्वच्छ, हवादार, शोरगुल रहित व प्रकाशयुक्त होना चाहिए। अनावश्यक वस्तुएं उसके कमरे में रखना ठीक नहीं।
इसके अतिरिक्त निम्न बातों पर ध्यान रखना चाहिए—
स्थिति - घर के उस भाग में रोगी को रखना चाहिए, जहां से स्नानगृह एवं शौचालय नजदीक हों। साथ ही घर का वह भाग बिल्कुल शांत हो।
सामग्री - बीमार का बिस्तर मुलायम, गरम व गद्देदार हो। दवा आदि आवश्यक वस्तु रखने के लिए रोगी की चारपाई के बगल में एक छोटा स्टूल हो। इसके अतिरिक्त एक टेबल तथा दो तीन कुर्सियां कमरे में होनी चाहिए। हाथ धोने की सामग्री, स्वच्छ तौलिया, तथा रद्दी की एक टोकरी भी अवश्य हो।
वायु का निष्कासन तथा कमरे का तापमान— स्वच्छ वायु स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती है, अस्तु रोगी के कमरे में ताजी हवा के आवागमन की उपयुक्त व्यवस्था होना चाहिए। कमरे-के खिड़की वेण्टिलेटर सदा खेले होने चाहिए, ताकि अशुद्ध वायु बाहर जाती रह सके और शुद्ध हवा का प्रवेश होता रहे। यदि मौसम ठंड का हो, तो कमरे को गर्म भी किया जा सकता है। इसके लिए अंगीठी अथवा बिजली के यन्त्रों को प्रयोग में लाया जा सकता है।
(1) खिड़की द्वारा वायु का अन्तर्गमन— खिड़की यदि चौखटेदार हो, तो यह वायु आवागमन का सबसे बढ़िया मार्ग है, किन्तु यदि कमरे में हवा झटके से, तेज गति से आ रही हो, तो उसके निम्नार्द्ध मार्ग को किसी पटरे द्वारा अवरुद्ध किया जा सकता है। ऐसा करने से हवा दोनों चौखटों के मध्य से ऊपर की ओर होती हुई कमरे में प्रवेश करती है।
कब्जों वाली खिड़की की स्थिति में हवा की तीव्र गति को मन्द करने के लिए उन पर पर्दे लटकाये जा सकते हैं।
रोगी के उपचार के वक्त खिड़कियां बन्द रखनी चाहिए और उसके उपरान्त ही खोलनी चाहिए।
(2) कमरे का तपन— कमरे का तापमान सदा एक-सा रहना ही उत्तम है। प्रायः 60 डिग्री फै. मध्यम तापक्रम है, किन्तु बाल-वृद्ध एवं फेफड़े के रोगियों के लिए 65 डिग्री फै. तापमान उचित है। तापमान देखने के लिए कमरे की छत अथवा दीवार से रोगी के बगल में थर्मामीटर लटकाया जा सकता है।
शीत के दिनों में वायु की खुश्कता रोकने के लिए कमरे में अंगीठी के सामने एक थाल में जल रखना चाहिए।
प्रकाश - कमरे में बिस्तर की स्थिति ऐसी हो कि मरीज पर सूर्य का प्रकाश पड़ सके। इसके अतिरिक्त रात में एवं दिन के अन्य भाग में कमरे को प्रकाशित करने के लिए बिजली की रोशनी सर्वोत्तम है।
कमरे की सफाई - मरीज का कमरा सदा स्वच्छ हो, इस बात का ध्यान रखना चाहिए। मेज-कुर्सियों व फर्श-सतह की सफाई प्रतिदिन होना अनिवार्य है। झाड़-पोंछ अथवा झाड़ कमरे में इस प्रकार लगानी चाहिए कि धूल नहीं उड़े।
बिछौना व चारपाई - चारपाई मध्यम आकार-प्रकार व ऊंचाई की हो, जो मरीज एवं परिचारक दोनों के लिए सुविधाजनक रहे। ऊंचाई छोटी हो, तो लकड़ी के कुन्दों पर रख कर वांछित बनाई जा सकती है। चारपाई को दीवार से फासले पर रखने से परिचर्या में असुविधा नहीं होती।
बिस्तर मुलायम गद्देदार हो, जिससे रोगी को कोई तकलीफ न हो। इसकी स्वच्छता पर भी उपयुक्त ध्यान देना चाहिए। उत्तम हो बिछावन के ऊपर की पतली चादर नित्य बदली जाय।
परिचर्या जब किसी आपरेशन के बाद की जा रही हो अथवा रोगी मूर्छित या असंयत (Incontinent Patient) हो, तो शरीर के मल-उत्सर्जन अंगों से मरीज का नियन्त्रण हट जाता है। ऐसी स्थिति में बिस्तर खराब हो सकता है। इससे बचने के लिए सूती चादर के ऊपर बरसाती कपड़े से बनी एक लम्बी चादर बिछा देनी चाहिए। इसके ऊपर सूती तौलिए जैसे सोख्ता वस्तु के बने कपड़े की ड्रा-शीट बिछानी चाहिए। ड्रा-शीट उपलब्ध न हो तो उसकी जगह सामान्य चादर कई तहों में मोड़ कर प्रयोग करना उत्तम है। यदि बरसाती कपड़ा भी उपलब्ध न हो तो उसके स्थान पर समाचार पत्रों को अनेक तहों में इस्तेमाल किया जा सकता है। गीला होने अथवा सिलवटें पड़ने पर इन्हें बदल देना चाहिए।
बिस्तर को अधिक आरामदेह बनाने की दृष्टि से उसमें आवश्यकतानुसार तकिये सम्मिलित होने चाहिए। इन्हें भी दाग-धब्बों से बचाने के लिए बरसाती के कवर प्रयुक्त किये जा सकते हैं।
बरसातियों की साफ-सफाई— प्रयोग में लाये गये बरसाती की सफाई के लिए उसे समतल जमीन में बिछाकर गरम पानी व साबुन के सहारे रगड़ रगड़ कर उसकी धुलाई करनी चाहिए। धोने के पश्चात् अखबारी कागज अथवा किसी कपड़े से पानी को सुखा लिया जाता है, तदुपरांत किसी छायादार स्थान में लटकाकर उसे पूरी तरह सुखाना अपरिहार्य है। सूख जाने पर फ्रैंच चॉक पाउडर लगाकर किसी लकड़ी में रोल बना कर ठंडे स्थान में रख देना चाहिए। इसे तह कर कभी न रखें।
रबड़ की वस्तुओं की सफाई भी ऐसे ही करनी चाहिए। चिकनाई व तेल रबड़ को नुकसान पहुंचाते हैं, इन्हें तुरन्त धो देना चाहिए।
वस्त्रों की देखभाल— रोगी द्वारा प्रयुक्त वस्त्रों के संबंध में ये आवश्यक बातें ध्यान में रखनी चाहिए—
(1) धब्बों को छुड़ाकर ही उन्हें धोबी के यहां धुलाने के लिए भेजना चाहिए। (2) गंदे वस्त्रों को एक टोकरी में ढक कर ले जाय। (3) गंदे कपड़ों को तुरन्त बदल देना चाहिए।
धब्बों को हटाना - (1) यदि धब्बा स्याही का हो, तो उस भाग को पानी में भिगो कर उस पर टॉल्कम पाउडर डालकर एक-दो घंटे छोड़ दें, फिर साबुन से धो डालें।
(2) रक्त के धब्बे को तुरन्त ठंडे पानी में डालें। छूट जाने पर गरम साबुन के पानी से धो दें।
(3) दाग यदि चाय, कॉफी, कोको आदि के हों तो उन्हें ठंडे पानी में भिगो कर, उन पर उबलता पानी डालें।
रोगी के स्वास्थ्य होने के बाद बिछौनों की धुलाई— जब रोगी स्वस्थ हो जाय तो उसके द्वारा प्रयुक्त सभी वस्तुओं व वस्त्रों को प्रयोग में लाने से पूर्व भली-भांति धुलाई-सफाई कर लेनी चाहिए। तकियों एवं कम्बलों को ब्रुश आदि से साफ कर धूप-हवा दिखायी जाय। स्वच्छता संबंधी यह सावधानी तब और भी जरूरी हो जाती है, जब मरीज किसी संक्रामक रोग का रोगी हो।
बिस्तर लगाना— बिस्तर लगाना-हटाना स्वयं में एक कला है, अतः परिचारक को चाहिए कि इसका पूर्ण अभ्यास कर दक्षता प्राप्त करे, ताकि बिस्तर हटाते अथवा लगाते समय मरीज को कोई तकलीफ न पहुंचे और समय भी कम लगे।
सामान्यतः बिस्तर लगाते वक्त निम्न बातों का ध्यान रखा जाता है—
(1) बिस्तर में प्रयुक्त होने वाले सभी वस्त्रों को बिस्तर की बगल वाली कुर्सी पर क्रम से रखें।
(2) चारपाई पर सबसे नीचे गद्दे को रखें। उसके ऊपर कंबल या बरसाती, जो भी उपलब्ध हो, बिछाये। फिर चादर, तत्पश्चात् बरसाती का एक अन्य छोटा टुकड़ा। इसके ऊपर ड्रा-शीट बिछा कर बरसाती को पूर्णतः ढक दें। यदि चारपाई के स्थान पर अस्पताल जैसा पलंग हो तो चादरों एवं कम्बल के अनावश्यक लटकते हुए निचले भाग को मोड़ कर बिस्तर से दबा दें। फिर तकिया रख दें।
यदि बीमार बिस्तर पर लेट रहा हो, और बिस्तर को ठीक करना हो, तो निम्न विधि अपनाई जा सकती है।
(क) यदि रोगी करवट बदलने की स्थिति में हो, तो—
(1) रोगी को कम्बल से ढका रहने दें और कम्बल के नीचे की छोटी चादर हटा दें।
(2) ड्रा-शीट हटा लेने के बाद मरीज को चादर के लम्बे सिरे से दूर घुमाया जाता है।
(3) जिस ओर रोगी को सरकाना हो उस ओर से परिचारक अपने एक हाथ को बीमार के कन्धे के पीछे तथा दूसरा नितम्बों के नीचे रख कर उसे अपनी ओर खींचता है। एक अन्य सहयोगी रोगी के सिर को सहारा देता है और इस बात का ध्यान रखता है, कि वह सदा कम्बल से ढका रहे।
(4) इस स्थिति में रोगी को सहारा देकर सहायक परिचारक बिस्तर के सारे वस्त्रों को झाड़ कर सिलवट निकाल दें।
(5) अब रोगी को सहारा देकर उसे पीठ के बल घुमा कर दूसरी ओर कर दें और पूर्व बताई विधि के अनुसार वस्त्रों को झाड़ कर सिलवट निकाल दें।
(ख) यदि रोगी को घुमाना सम्भव नहीं हो तो बिछौने दो तरीकों से ठीक किये जा सकते हैं—
(1) रोगग्रस्त को परिचारक और उसका सहयोगी मिलकर उठाते हैं तथा एक अन्य सहायक ड्रा-शीट, बरसाती एवं बड़ी चादर खींच कर उसकी सिलवटें सही कर देता है।
(2) परिचारक व सहयोगी मिलकर रोगी को उठा कर बिस्तर की एक ओर कर लेते हैं। इस स्थिति में एक मरीज को सम्भाले रहता है तथा दूसरा पूर्व रीति से बिस्तर ठीक कर देता है। तत्पश्चात् रोगी को दूसरी ओर करके बिस्तर के शेष आधे भाग को भी सही कर लिया जाता है।
बिस्तर ठीक हो जाने के उपरान्त रोगी को बिस्तर के मध्य पुनः लिटा दिया जाता है।
टूटी हड्डी के लिए बिस्तर— यदि किसी व्यक्ति की रीढ़, कूल्हे अथवा निचले अंगों का अस्थि-भंग हो गया हो, तो ऐसे मरीज को सामान्य प्रकार के बिस्तर में नहीं लिटाया जा सकता। इसमें लिटाने से उसकी तकलीफ बढ़ सकती है अतः इनके लिये ऐसे बिस्तर की जरूरत पड़ती है जो बीच से न लचके। इसके लिए फ्रैक्चर बोर्ड (टूटी हड्डी के लिए तख्ते) का प्रयोग किया जा सकता है। इन्हें गद्दों के ऊपर एक-एक इंच के फासले पर सिर से पैर तक रख दिया जाता है। बिस्तर साधारण तरीके से लगाया जाता है।
विशेष यन्त्र— रोगी को और अधिक आराम पहुंचाने के लिए बिस्तर के साथ अन्य अनेक प्रकार के सहायक यन्त्र-उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।
(1) गरम पानी की बोतल - बीमार को गरमी पहुंचाने के लिए होती है। यह रबर, पत्थर अथवा एल्युमिनियम की बनी होती है।
(2) बिजली की गद्दी तथा कम्बल - यह भी शरीर को गरमी प्रदान करने का यन्त्र है। इसके प्रयोग में विशेष सावधानी रखनी चाहिए, अन्यथा बिजली के झटके लग सकते हैं।
(3) हवादार गोल गद्दी - नितम्बों को राहत पहुंचाने के लिए होती है।
(4) टेक अथवा बैक् रेस्ट - पीठ को सहारा देने का लकड़ी का उपकरण।
(5) बैड केडल्स - पीड़ित अंगों का दर्द कम्बल अथवा चादर के भार या रगड़ से न उभरे, इसलिए इसका प्रयोग किया जाता है। कम्बल या चादर इसके ऊपर रखे जाते हैं।
बिस्तर स्नान (Bed Bathing)— जब कोई रोगी इतना अशक्त हो कि वह खुद चल कर स्नानगृह नहीं जा सके तब यह स्नान कराया जाता है।, स्नान नित्य कराया जाना उत्तम है; किंतु किन्हीं कारणों से जब यह संभव न हो सके, तो सप्ताह में कम-से-कम दो बार तो कराया ही जाना चाहिए। स्नान सायंकाल हो तो अच्छा है, क्योंकि इससे मरीज को रात में नींद अच्छी आती है।
स्नान के लिये अभीष्ट वस्तुयें— दो स्नान कम्बल, एक प्याला गर्म पानी, पानी का तापमान देखने के लिए एक थर्मामीटर, एक जग गर्म पानी, एक बाल्टी।
कम्बल स्नान में प्रयुक्त होने वाली वस्तुयें— नहाने का साबुन, फलालैन के दो टुकड़े, प्याले में रूई के कुछ टुकड़े, दो गरम तौलिए, नाखून-ब्रुश, कैंची, डस्टिंग पाउडर, सर्जिकल स्पिरिट, कंघी। टूथ मग, प्याला, दन्त ब्रुश तथा दन्त मंजन। इसके अतिरिक्त रोगी को पहनाने के कपड़े तथा गंदे कपड़े रखने का एक ढक्कनदार पात्र एवं गरम पानी की बोतल।
स्नान प्रक्रिया— (1) आवश्यक सामग्री को बिस्तर के नजदीक रखें व स्वच्छ वस्त्रों को गरम कर लें।
(2) स्नान प्रारम्भ करने से पूर्व खिड़कियां बन्द कर दें। कमरा गरम हो, इस बात का ध्यान रखें। रोगी को शय्या पात्र लेने को कहें।
(3) रोगी को कम्बल से ढका रहने दें। एक स्नान कम्बल को निकाल दें, दूसरे को बिस्तर पर बिछा रहने दें, ताकि बिस्तर भीगे नहीं।
(4) रोगी के शरीर से कपड़ा उतार दें।
(5) आरम्भ में मरीज का चेहरा व गर्दन धोयें। यदि रोगी साबुन पसन्द न करे, तो फलालैन के भीगे टुकड़े से शिरोभाग को भली-भांति स्पंज कर दें। फिर सूखे तौलिये से अच्छी तरह पोंछ दें।
(6) अब बाजुओं को धोयें। कांख को भी देख लें। नाखून गंदे व बड़े हों तो उन्हें साफ कर काट दें।
(7) इसके बाद कम्बल को छाती तक पलट कर पूरी छाती धो दें। पोंछ कर सुखाने के बाद हल्का पाउडर लगा दें।
(8) छाती को कम्बल से ढक दें। पेट से कम्बल हटा कर उसे धोयें। नाभि पर विशेष ध्यान दें। पोंछने के बाद कम्बल से ढक दें।
(9) जांघों को यदि रोगी स्वयं साफ करना चाहे, तो पानी से गीला फलालैन का टुकड़ा व तौलिया दे दें।
(10) प्याले का पानी ठंडा हो गया हो तो दूसरा पानी लेकर पैरों को धोयें। एड़ी, घुटनों पर विशेष ध्यान दें। नाखून साफ कर काट दें।
(11) तत्पश्चात् रोगी को घुमा कर पेट के बल लिटा दें और पीठ से लेकर नितम्बों तक धो डालें। फिर तौलिये से सुखा लें। ऊपर-नीचे के दोनों स्नान कम्बलों को निकाल लें तथा रोगग्रस्त को बिस्तर के कम्बल से ढंक दें, किन्तु इससे पूर्व उसे वस्त्र पहना दें।
(12) बालों पर कंघी कर दें व बिस्तर को पूर्ववत् लगा लें।
(13) रोगी के पुराने खुले वस्त्रों को कमरे से हटा दें और कमरे की खिड़कियां खोल दें।
(14) स्नान में प्रयुक्त जल का तापमान निम्न होना चाहिए।
ठंडा स्नान के लिए — 60 — से 80 डिग्री फै.
कुनकुना स्नान के लिए — 85 — से 95 डिग्री फै.
गरम स्नान के लिए — 98 — से 100 डिग्री फै.
ऊष्ण स्नान के लिए — 100 — से 108 डिग्री फै.
बिस्तर घाव (Bed Sore) — बिस्तर घाव, शरीर की हड्डियों के उभार पर बिस्तर के दबाव से अथवा दो अंगों की त्वचा में परस्पर रगड़ से उत्पन्न होते हैं। अच्छी परिचर्या द्वारा इनका बनना रोका जा सकता है।
इसका प्रथम लक्षण है उस स्थान का लाल हो जाता तथा रोगी को वहां गरमी व बेचैनी महसूस होना। यदि इस स्थिति में तुरन्त उस स्थान पर ध्यान न दिया जाये, तो वहां सुन्न-सा पड़ जाता है और एक सूखा घाव बन जाता है। इसके बनने के अन्य कारण हैं—चमड़ी का गीलापन एवं असावधानी जन्य चमड़ी को पहुंची चोट।
कुछ विशेष रोगियों में इसकी प्रकृति शीघ्र बनने की होती है, यथा—
(1) वैसे रोगी जिनका मलमूत्र-त्याग पर से नियंत्रण समाप्त हो चुका हो, और पेशाब पाखना स्वतः निकल आता हो। (2) पक्षाघात के रोगी। (3) असामान्य रूप से पतले व मोटे रोगी। (4) बूढ़े रोगी। (5) जलीय शोथ के रोगी। (6) क्षतिग्रस्त रीढ़ के रोगी।

