बिस्तर घाव की रोक-थाम
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(1) दबाव घटाना— इसकी अनेक विधियां हैं—
(अ) रोगी को एक अवस्था में अधिक देर तक नहीं रखना चाहिए। दो-चार घण्टे बात उसकी स्थिति बदलती रहनी चाहिए जिससे दबाव किसी एक अंग अथवा एक भाग पर अधिक न पड़े।
(आ) उभरी हुई हड्डियों के नीचे की त्वचा की रक्षा के लिए उसके नीचे रबड़ के हवा भले छल्ले, गोल गद्दी अथवा सारबो पैड रखना चाहिए। गोल गद्दी, ऊन अथवा रुई का गोल छल्ला बना कर उसे गोल पट्टी से चारों ओर ढक कर बनाया जा सकता है।
(इ) चिकित्सक की अनुमति हो, तो रोगी को चलाते-फिराते रहना चाहिए।
(2) रक्त संचरण तेज करना— शरीर के जिन भागों अथवा अंगों पर दबाव पड़ रहा हो उन्हें प्रतिदिन धोना व मालिश करना चाहिए।
(3) शरीर का गीलापन रोकना— (अ) शरीर के दो अंगों की त्वचा जहां परस्पर सड़ी रहती हो, उसका विशेष ध्यान रखना चाहिए। वहां त्वचा सादा सूखी होनी चाहिए। पसीना आये, तो स्वच्छ सूखे वस्त्र से सुखाते पोंछते रहना आवश्यक है।
(आ) मरीज के वस्त्र गीले न रहें, उन्हें तुरंत बदल देना चाहिए।
(इ) रोगी की परिचर्या के वक्त बिस्तर पानी से न भीगे, इस बात का ध्यान रहे।
(4) घर्षण-विमुक्त रखना— (अ) नंगों और बिस्तर के बीच घर्षण कम करने के लिए आवश्यक है, कि बिस्तर सिलवट मुक्त हो, अतः इसकी देखभाल करते रहना चाहिए।
(आ) आवश्यकानुसार बेड-क्रैडल का प्रयोग करते रहा जाय। इससे अंग बिस्तर के भर एवं रगड़ से बचते हैं।
(इ) बिस्तर में कोई ऐसा वस्त्र न हो, जिसकी सतह खुरदरी हो अथवा जिसके प्रयोग से मरीज को कष्ट पहुंचता हो।
(5) चोट से बचाना— (अ) परिचर्या के दौरान परिचारक को अपने हाथों का संचालन बड़ी सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
(आ) शय्या पात्र (बेड पैन) लगाते-हटाते समय भी विशेष सावधानी की आवश्यकता है, अन्यथा रोगी को चोट लग सकती है।
(इ) गद्दियों को अंगों से अधिक कस कर नहीं बांधना चाहिए।
बिस्तर घाव से बचाव के दैनिक उपचार— इसमें प्रयुक्त होने वाली आवश्यक वस्तुएं- गरम पानी युक्त बड़ा प्याला, एक प्याले में रुई के फोहे, रूई के गंदे टुकड़ों को रखने का एक खाली प्याला। साबुन, फलालैन, तौलिया। स्पिरिट, डस्टिंग पाउडर। इसके अतिरिक्त त्वचा की सुरक्षा के लिए मरहम एवं अन्य दवाइयां, यथा-मिथिलेटेड तथा जैतून तेल का मिश्रण या जिंक और अरण्ड तेल का मरहम; एवं टिंक्चर बेन्जोईन कम्पाउण्ड।
प्रक्रिया— 1. खिड़की आदि बन्द कर बिस्तर के अगल-बगल परदा लगा दें।
2. जिस अंग का उपचार करना हो, कम्बल से बाहर उसी को निकालें, शेष को ढंका रहने दें।
3. उपचार वाले अंग के नीचे तौलिया रख कर उसे धो व पोंछ कर सुखा लें।
4. परिचारक अपने हाथ साबुन लगा कर परिचर्या वाले भग पर कोमलतापूर्वक मले और उस भाग का रक्त-संचार तेज करे।
5. अब अंग को धो-पोंछ कर सुखा लें। त्वचा कड़ी करने के लिए मिथिलेटेड स्पिरिट का इस्तेमाल किया जा सकता है।
6. तत्पश्चात् उस पर पाउडर का छिड़काव करें।
7. नीचे की तौलिया निकाल लें और रोगी को आराम की स्थिति में कर दें।
8. परदे हटा कर खिड़की खोल दें।
9. रोगी के मलमूत्र यदि स्वतः निकल आते हों, तो इस स्थिति में गुदा-द्वार के आस-पास की त्वचा पहले साफ करना चाहिए। फिर धो-पोंछ कर सुखाने के पश्चात् जिंक एवं अरण्ड मरहम को लगाना चाहिए।
जब रोगियों में बिस्तर घाव की अधिक सम्भावना हो, तो इस क्रिया की आवृत्ति दो-दो, चार-चार घण्टे बाद भी की जा सकती है।
बिस्तर घाव होने की स्थिति में चिकित्सक को तुरन्त इसकी सूचना देनी चाहिए और उसके निर्देशानुसार ही आगे की क्रिया करनी चाहिए।
मुख की देखभाल— मुंह के बराबर संचालन होने एवं अन्दर लार के प्रवाहित होते रहने से मुख स्वस्थ बना रहता है। बीमारी के दौरान यह क्रिया या तो मन्द पड़ जाती है या बन्द हो जाती है, फलतः मुंह व होठ सूखने लगते हैं एवं अन्दर एवं श्वेत परत जम जाती है। ऐसी स्थिति में रोगी बेचैनी अनुभव करने लगता है, अस्तु, एक मुख तश्तरी तैयार करके उसके बिस्तर के नजदीक रख देनी चाहिए, ताकि आवश्यकता पड़ने पर वह स्वयं भी इसका प्रयोग कर सके।
उपयोगी सामग्री— लोशन के लिए तीन छोटे जार (गैलीपोट्स) एक प्याले में रुई के टुकड़े।
प्रयुक्त रुई को रखने का एक अलग पात्र। एक बड़ा प्याला, जिसमें लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़े व जीभ को दबाने के लिए धातु व लकड़ी के बने यन्त्र तथा चिमटी हों। तश्तरी ढकने के लिए एक ढक्कन।
लोशन— यह अनेक प्रकार के होते हैं, परन्तु लाभकारी निम्न हैं—
(अ) सफाई के लिये - (1) 1 भाग हाइड्रोजन पराक्साइड 7 भाग पानी में घोलें। (2) सोडा बाईकार्ब घोल का एक एक चम्मच एक पाइंट पानी में। (आ) धोने के लिए : ग्लीसरीन ऑफ थाईमल कम्पाउण्ड एवं लिस्ट्रीन। (इ) स्निग्धता तथा चिकनाहट के लिए : ग्लीसरीन और नींबू का रस मिला कर उत्तम लोशन तैयार किया जा सकता है।
सफाई प्रक्रिया— 1. अपने हाथ साबुन से भली भांति साफ कर लें तत्पश्चात् एक तौलिया रोगी की ठोड़ी के नीचे रखें।
2. थोड़ी रुई लकड़ी के शीर्ष पर लपेट कर उससे मुंह की सफाई करें। पहले गालों के भीतर, फिर मसूड़े, दांत, तालू, होंठ और अन्त में जीभ। जीभ दबाने का कोई यन्त्र उपलब्ध न हो तो चम्मच के हत्थे से जीभ दबा लें और एक किनारे से दूसरे किनारे की ओर धीरे-धीरे पोंछे।
3. इस प्रक्रिया में जितनी बार आवश्यक हो रुई बदल लें। गंदी रुई चिमटी के सहारे निकालें और उसकी जगह साफ रुई का टुकड़ा चिमटी के सहारे लगा दें। रुई लगाने में हाथ का कम-से-कम स्पर्श हो, इस बात का ध्यान रहे।
4. सूखी रुई से सफाई के बाद इस क्रिया की पुनरावृत्ति लोशन में डुबोये रुई के टुकड़ों से करें। फिर कुछ पानी से कुल्ला करने को कहें।
5. तत्पश्चात् होंठ तथा मुख के अन्दर नींबू का लोशन लगा दें।
6. अब गन्दी रुई तथा तश्तरी को हटा लें। रोगी को आराम की स्थिति में कर दें।
बालों की देखभाल— बालों पर ब्रुश-कंघी करने के अतिरिक्त समय-समय पर उनकी धुलाई भी होती रहनी चाहिए।
अभीष्ट वस्तुयें— दो बरसाती के टुकड़े तथा बरसाती का बना कोट। गरम पानी, स्नान तौलिया, तरल साबुन अथवा शैम्पू, एक जग, शाल, बाल्टी।
स्नान प्रक्रिया— (1) रोगी की स्थिति के अनुसार उसे या तो करवट की दशा में अथवा पीठ के बल लिटा दिया जाता है।
(2) रोगी यदि पीठ के बल लेट रहा हो तो गद्दे को लपेट कर सिर के नीचे कर दें। चिलमची स्प्रिंगों पर रखें। उसके किनारों को मोड़ कर चोंगा बना दें और उसे सिर के नीचे रखी बाल्टी में लटका दें।
(3) बिस्तर को बरसातियों से ढक कर एक छोटा कम्बल तथा बरसाती लबादा मरीज के कंधों के चारों ओर लपेटें।
(4) अब बालों को गरम पानी से गीला कर साबुन अथवा शैम्पू से धो डालें।
(5) तत्पश्चात् गरम तौलिये से बालों को भली-भांति सुखा लें। सूखने पर कंघी करके सारा सामान हटा लें।
जुओं से बालों को मुक्त करना— यदि बालों में जुएं पड़ गई हों, तो उन्हें उपचारित कर लें।
आवश्यक सामग्री— सामान्य कंघी तथा सैकर की लीखों वाली कंघी, जो कीटाणुनाशक लोशन में रखी हो। गैलीपोट तथा पिपेट। सफाई का लोशन। बरसाती कोट।
प्रक्रिया— 1. सैकर कंघी से जितनी जुएं निकल सकें, निकाल लें।
2. बालों को अनेक स्थानों से अलग-अलग करके उनमें कीटनाशक लोशन पिपेट से डालें।
3. निम्न लोशन प्रयुक्त किये जा सकते हैं—लिथेन का तेल, अथवा लोरैक्सेन या गेमैक्सीन। इनमें से किसी को भी बालों में डाल कर 6-7 दिन तक छोड़ दें। एक चम्मच लोशन पर्याप्त है।
4. निर्धारित समय के बाद बालों को धो दें। गरम तौलिया से सुखाने के बाद कंघी कर दें।
रोगी की वीक्षण— रोगी की देखभाल करते वक्त परिचारक को रोगी की जांच निम्न संदर्भ में अवश्य करते रहना चाहिए—
1. त्वचा की सामान्य स्थिति 2. तापमान, नाड़ी तथा श्वांस दर, 3. मलमूत्र, 4. वमन, 5. खांसी, बलगम।
इनमें से किसी में भी असामान्यता नजर आने से उसकी रिपोर्ट अविलम्ब चिकित्सक को देनी चाहिए।
त्वचा की सामान्य स्थिति— विभिन्न अंगों की त्वचा के अध्ययन से रोगी की अवस्था अथवा रोग का अनुमान मिल सकता है, अस्तु निम्न संदर्भ में इसका निरीक्षण करें।
(अ) रंग— गुलाबी, नीला (Cyanosis) या पीला, कैसा है? (आ) त्वचा की अवस्था— (1) सूखी या गीली, (2) चिकनी अथवा खुरदरी, (3) गरम या ठंडी, (4) कोई दाग या चकत्ता।
इसके अतिरिक्त रोगी के चेहरे की आकृति, लेटने की स्थिति, सूजन, दर्द आदि से भी महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।

