तापक्रम, नाड़ी तथा श्वांस दर
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तापक्रम—
मनुष्य एक उष्ण रक्तीय जीव है, जिससे उसके शरीर का तापमान सदा स्थिर रहता है। सामान्य स्थिति में यह 97 डिग्री फा. से 98.6 डिग्री फा. के बीच होता है, किन्तु रोग अथवा बुखार की स्थिति में यह घट-बढ़ सकता है, जिसकी जानकारी थर्मामीटर से की जाती है। प्रायः शरीर का तापमान जानने के लिए फारनहीट तापक्रम मापक का प्रयोग किया जाता है।
तापमान लेने
के स्थान— शरीर का तापक्रम अनेक स्थानों से प्राप्त किये जा सकते हैं यथा- मुंह से, बगलों से, मल द्वार से एवं जंघाओं से।
मुख
का तापक्रम लेना - (1) इसके लिए रोगी को पीठ के बल लिटाना अभीष्ट है।
(2) थर्मामीटर का डिटॉल व पानी के घोल में भली-भांति धोकर सुखा लें।
(3) उसकी धुण्डी को रोगी की जीभ के नीचे मध्य में रखें तथा रोगी से होठ बन्द करने को कहें, किन्तु दांतों से वह थर्मामीटर दबाये नहीं, इस बात का ध्यान रहे।
(4) दो मिनट बाद निकाल कर तापक्रम पढ़ लें। फिर डिटॉल पानी के मिश्रण में धो व पोंछ कर रख लें।
सावधानियां—
वैसे यह तापक्रम मापने की सर्वसामान्य विधि है, किन्तु निम्न स्थितियों में इसका प्रयोग न करें।
(1) यदि मरीज छोटा बच्चा हो। (2) रोगी को जब नाक से सांस लेने में कठिनाई हो। (3) बेहोश हो। (4) गरम पेय या ठंडा जल पीने के तुरन्त पश्चात्।
बगलों
का तापक्रम लेना— (1) थर्मामीटर की स्वच्छता सम्बन्धी पूर्ववत् सावधानी बरती जाती है।
(2) अब तापक्रम मापक को रोगी की कांख से दबा कर इस प्रकार रखा जाता है, कि घुण्डी का सम्पर्क त्वचा से भली प्रकार बना रहे।
(3) दो मिनट पश्चात् तापक्रम पढ़ लिया जाता है।
सावधानियां - निम्न स्थितियों में
इसका प्रयोग न करें—
(1) गरम पानी से रोगी को नहलाने के तुरन्त बाद।
(2) यदि उस भाग में गरम पानी की बोतल रखी हो।
नब्ज़
देखना— नब्ज़ दिल की धड़कन बताने वाली एक धमनी है। इससे प्रायः रोगी की दशा का पता चलता है। सामान्यतः नब्ज़, कलाई के समीप अंगूठे की ओर की धमनी से देखी जाती है। नव जवानों में इसकी दर 60-80 धड़क कर प्रति मिनट होती है, किंतु औसत 72 धड़कन प्रति मिनट मानी जाती है। भिन्न-भिन्न स्थितियों में यह बदलती रहती है। आयु बढ़ने से घटती है, व्यायाम व कसरत करने की स्थिति में यह तेज हो जाती है।
विधि—
(1) रोगी को आराम से लेटे या कुर्सी पर बैठे रहने दीजिए।
(2) अब रोगी की हथेली ऊपर कर बाजू को बाहर की ओर घुमा कर नीचे सहारा देते हुए उसकी कलाई पकड़ें।
(3) कलाई इस प्रकार पकड़ें कि रोगी के अंगूठे की जड़ से होकर निकलने वाली धमनी के ऊपर परिचारक की प्रथम तीन उंगलियां पड़ें और अंगूठा कलाई के ठीक पीछे हो।
(4) एक कलाई घड़ी के माध्यम से प्रति मिनट नाड़ी की गति गिन लें।
श्वसन-दर— सामान्य स्थिति में युवकों में यह 15-20 प्रति मिनट होती है। युवकों में इसकी गणना छाती एवं पेट के चढ़ाव-उतार से की जा सकती है, जबकि बच्चों में उतार-चढ़ाव अनुभव करने के लिए परिचारक को छाती पर हाथ रखना आवश्यक हो सकता है। श्वांस क्रिया में श्वांस, प्रश्वासंय व ठहराव तीनों सम्मिलित हैं।
पाखाना—
सामान्य स्थिति में इसका रंग भूरा तथा नरम ठोस होता है। प्रायः 24 घण्टे में एक बार मल त्याग को सामान्य माना जाता है। इस संदर्भ में निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए।
1. इसकी आवृत्ति। 2. इसकी प्रकृति, यथा—ठोस व कड़ा या पानी जैसा पतला अथवा पतला आंव युक्त। 3. रंग; इन्हें नोट कर चिकित्सक को दिखाना चाहिए।
मूत्र—
स्वस्थ अवस्था में इसका रंग स्वच्छ जल जैसा होता है, किन्तु बीमारी की स्थिति में रंग बदल भी सकता है। एक स्वस्थ युवक दिन में प्रायः 4-5 बार मूत्र त्याग करता है। इससे अधिक व कम असामान्य माना जाता है।
इस
संदर्भ में निम्न बातें नोट करनी चाहिए।
1. मात्रा- 24 घण्टे में रोगी कितना मूत्र-त्याग करता है। यह इस बात पर निर्भर है, कि उसे तरल भोजन कितना दिया गया है। अतः दोनों बातों को ध्यान में रखते हुए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। मधुमेह, तथा क्रोनिक नेफ्राइटिस में मूत्र का मात्रा बढ़ जाती है, जबकि ज्वर वमन, एक्युट नेफ्राईटिस में परिमाण घट जाता है।
2. आवृत्ति- मूत्राशय में सूजन होने से इसकी बारम्बारता बढ़ जाती है।
3. रंग- बीमारी की स्थिति में इसका रंग धुंए जैसा, गहरा भूरा, हरा, नीला, लाल हो सकता है।
4. अवशेष- मूत्र को थोड़ी देर तक स्थिर छोड़ देने से पात्र के पैंदे में कोई अवशेष तो नहीं बचता। बचता हो तो चिकित्सक को दिखाना चाहिए।
शय्या
पात्र एवं मूत्रपात्र— मलमूत्र-त्याग के लिए विशेष आकार-प्रकार के पात्र, इस्पात, चीनी मिट्टी अथवा एनेमल के बने होते हैं। मूत्र पात्र प्रायः पुरुष रोगियों के उपयोग के लिए होते हैं। शय्या पात्र पुरुष-स्त्री दोनों प्रकार के रोगियों के लिए प्रयुक्त होते हैं। सामान्य प्रयोग में गोल शय्या पात्र व परफैक्शन शय्या पात्र ही आते हैं। किन्तु जिनके लिए हिलना-डुलना संभव नहीं उनके लिए स्लिपर शय्या पात्र प्रयोग में लाया जाता है।
वमन
(Vomit)— उल्टी के सम्बन्ध में निम्न जानकारी चिकित्सक को देनी चाहिए।
1. दिन में कितनी बार कै हुई। 2. उल्टी से पहले मिचली आती थी या नहीं। 3. कै के वक्त अथवा उससे पहले दर्द था या नहीं। यदि था तो क्या उल्टी से ठीक हो गया। 4. भोजन के बाद कै हुई या उससे पूर्व। 5. कै में जो कुछ निकला उसका रंग कैसा था?
खांसी
एवं बलगम— खांसी कई स्थितियों में होती है- सामान्य सर्दी-जुकाम में, एवं फेफड़ों के संक्रमण की स्थिति में, अतः इसका सावधानी से निरीक्षण करना चाहिए। यदि खांसी के साथ बलगम आये, तो रोगी को चीनी मिट्टी का बना ढक्कनयुक्त बलगम-पात्र देना चाहिए। बलगम पात्र से चिपके नहीं, इसके लिए उसमें डिटॉल का घोल अथवा थोड़ा सोड़ा बाईकार्ब जैसी कीटनाशक दवा रख देनी चाहिए। बेहतर हो इसके लिए कागज का ढक्कनदार पात्र प्रयुक्त किया जाय, जिसे बलगम सहित बाद में जला दिया जाय।
बलगम
का नमूना इकट्ठा करने के लिए शीशे का कीट रहित पात्र प्रयोग में लाया जाता है। नमूना प्रातःकाल कुछ खाने अथवा मुंह धोने से पूर्व लेना चाहिए।
खांसी
सम्बन्धी निम्न जानकारी चिकित्सक को देनी चाहिये—
1. खांसी का स्वरूप कैसा था—सूखी बलगम रहित अथवा गीली बलगम युक्त। 2. कितनी बार हुई, एक समय में कितनी देर रही, किस समय सामान्य रूप से आती हैं। 3. खांसी के वक्त किसी प्रकार का दर्द अथवा उल्टी?
संक्रमण की
रोकथाम— संक्रमण से बचने के लिए निम्न बातों पर ध्यान देना नितान्त आवश्यक है—
(अ) स्वच्छता— स्वच्छता, स्वस्थता की जननी है। स्वच्छता चाहे व्यक्तिगत हो या स्थान सम्बन्धी, दोनों उत्तम स्वास्थ्य की आवश्यक शर्त हैं, अस्तु इन पर ध्यान देना अपरिहार्य है।
(1) व्यक्तिगत स्वच्छता- उत्तम स्वास्थ्य के लिए पहली आवश्यकता व्यक्तिगत सफाई की है। शारीरिक स्वच्छता के लिए प्रतिदिन स्नान तथा प्रत्येक अंग को भली-भांति रगड़ कर साफ करना चाहिए। सदा स्वच्छ-साफ वस्त्र पहनना ही स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। शरीर के किसी अंग में किसी प्रकार का घाव अथवा चोट हो, तो उसे सदा दवा लगा कर ढक कर रखना चाहिए।
(2) स्थान की स्वच्छता- व्यक्ति यदि स्वयं की सफाई रखता हो, किन्तु जहां रह रहा हो, वहां गन्दगी फैली हो, मक्खियां भिनभिनाती हों, कूड़े बिखरे हों, तो खुद की स्वच्छता का लाभ वह नहीं ले पायेगा। इसके लिए स्थान की स्वच्छता जरूरी है। कूड़ेदान सदा ढके होने चाहिए। कमरों में प्रकाश व हवा के आवागमन के लिए वेंटीलेशन की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। भोजन को ढक कर रखना चाहिए।
(आ) उत्तम स्वास्थ्य— भोजन-वस्त्र के अतिरिक्त स्वास्थ्य संबंधी कुछ ऐसे मूलभूत नियम हैं, जिनका हर किसी को पालन करना परमावश्यक है।
1. भोजन समय पर और संतुलित लेना चाहिए। 2. पर्याप्त विश्राम तथा रात्रि में गहरी नींद सोना चाहिए। 3. हल्का-फुल्का व्यायाम एवं स्वस्थ वायु का सेवन। 4. ऋतु के अनुरूप वस्त्रों का प्रयोग। 5. शरीर-मन को ताजगी-स्फूर्ति देने के लिए दिनचर्या में उपयुक्त मनोरंजन का समावेश हो।
(इ) सरकारी व्यवस्था— स्वास्थ्य संवर्धन के लिए सरकार भी अनेक प्रकार के कदम उठाती रहती है, जिनमें प्रमुख है- 1. स्वच्छ, शुद्ध जल की व्यवस्था। 2. गली-कूचों व नदियों की सफाई। 3. वायुशोधन के लिए वृक्षारोपण एवं हरी-भरी पार्क की व्यवस्था। 4. खाद्य की शुद्धता पर नियंत्रण।
(ई) संक्रमण होने पर बरती जाने वाली सावधानियां— संक्रामक रोग की स्थिति में रोगी को पृथक कमरे में रखना चाहिए, ताकि उसकी छूत दूसरों को न लगे, साथ ही उसकी परिचर्या में पर्याप्त सावधानी बरती जानी चाहिए। परिचारक को उसके कमरे में सदा उपयुक्त चोगा (एप्रन) पहन कर मुंह व नाक को मुखावरण (Mask) से ढक कर जाना चाहिए, जिससे कि वह स्वयं रोग से संक्रमित न हो जाय। परिचर्या के बाद मुखावरण एवं चोगा उतार कर हाथ भली प्रकार धोना चाहिए। रोगी द्वज्ञरा प्रयुक्त वस्तुओं का प्रयोग उन्हें निष्कीटित करने के उपरान्त ही करना स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम है।
बैक्टीरिया का
विनाश— इस क्षेत्र में अग्रणी कार्य रसायज्ञ फ्रांसीसी लूईस पास्चर ने किया। जब से इसकी उत्पत्ति संबंधी ज्ञान प्राप्त हुआ है, इन्हें नष्ट करना भी संभव हो गया है। पास्चर के ज्ञान का प्रथम प्रयोग चिकित्सा क्षेत्र में लार्ड लिस्टर ने किया। इन्हीं दोनों के प्रयासों का परिणाम है कि आज यह विधि (कीटाणुरहित) चिकित्सा क्षेत्र में इतना आगे बढ़ सकी।
प्रयोग में
आने वाले कुछ प्रचलित शब्द - 1. सैप्सिस (Sepsis) - बैक्टीरिया के संक्रमण से किसी अंग में मवाद भर जाना सैप्सिस कहलाता है।
2. एसैप्सिस (Atsepsis) - संक्रामक बैक्टीरिया से मुक्ति मिलना एसैप्सिस कहलाता है।
3. एण्टीसैपसिस (Anitsepsis) - उन औषधियों का प्रयोग जो हानिकारक बैक्टीरिया की उत्पत्ति को रोकती हो। एण्टीसैप्टिक औषधियां ऐसे रसायन होती हैं, जो जीवाणुओं की उत्पत्ति व वृद्धि को तो रोकती हैं, पर उन्हें मारने की क्षमता उनमें नहीं होती।
4. जीवाणुरहित करना (Disinfection) - किसी भी विधि से जीवाणुओं का नाश करना डिसइन्फेक्शन कहा जाता है।
5. निष्कीटन (Sterilization) - यह भी जीवाणु नाश करने की एक विधि है, किन्तु इसमें प्रायः गरमी (भाप, अथवा उबलता जल) का प्रयोग किया जाता है।
मरहम-पट्टी के वक्त हाथ की स्वच्छता— यन्त्र-उपकरणों को तो निष्कीटित किया जा सकता है, पर हाथ जैसे शारीरिक अंगों को निष्कीटित नहीं किया जा सकता, अतः घावों की मरहम-पट्टी के वक्त इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि हाथों के सम्पर्क से घाव किसी जीवाणु से संक्रमित न हो जाय। इसके लिए परिचर्या से पूर्व हाथों व नाखूनों की अच्छी तरह सफाई कर लेनी चाहिए। सफाई के पश्चात् निष्कीटित किये परिचर्या के यन्त्रों के अतिरिक्त और किसी भी वस्तु को नहीं छूना चाहिए। शल्य क्रिया में इस कार्य के लिए रबड़ के दस्ताने प्रयोग में लाये जाते हैं।

