प्रसव एवं उसका प्रबन्ध
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शिशु जनने के काम में तत्काल कोई चिकित्सक या धात्री (Mid-wife) घर पर उपस्थित न हो सके, अथवा यदि किसी कारणवश माँ को अस्पताल ले जाने की व्यवस्था नहीं बन पायी, तो धात्री के आने तक माँ को प्रथम सहायता देनी चाहिए। यह कर्त्तव्य परिचारक का होता है। माँ को प्रसव में सहायता देने के लिए परिचारक को निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।
1. माँ को किसी प्रकार का संक्रमण न हो— प्रसवकाल में माँ की देखभाल में निरत परिचारक को अपनी पूर्ण स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए, अन्यथा उससे प्रसूतिका को गम्भीर खतरा हो सकता है। गर्भाशय में बच्चा बच्चेदानी की भीतरी दीवार से नाल के माध्यम से जिस स्थान से जुड़ा होता है, गर्भपात अथवा प्रसव के पश्चात् वहां एक घाव-सा बन जाता है। यहां बड़ी संख्या में रक्त वाहिनियां खुलती हैं। यदि किसी भांति यहां संक्रमण हो जाय, तो जीवाणु रक्त संचरण तन्त्र में फैल जायेंगे और दूसरे अंग-अवयवों को भी संक्रमित कर प्रसूता के लिए घातक स्थिति उत्पन्न कर देंगे। अस्तु किसी भी ऐसे व्यक्ति को, जो किसी छूत रोग यथा- जुकाम, टी.बी. आदि से ग्रसित हो, उस महिला के निकट नहीं आने देना चाहिए, जो या तो शिशु को जन्म दे रही हो या जन्म दिये 10 दिन से अधिक न हुए हों। इस काम में माँ की परिचर्या कर रहे व्यक्ति को उसके कमरे में स्वच्छ दस्ताने पहन कर ही जाना चाहिए।
2. प्रसूता का मनोबल बनाये रखना— प्रसव-पीड़ा के पूर्वाग्रह से महिलाएं ऐसे ग्रसित होती हैं कि उस काल में हल्की पीड़ा भी उन्हें बढ़ी-चढ़ी महसूस होती है। मान्यता की अतिरंजना के कारण ऐसा होता है। पीड़ा का भय उनकी जेहन में इस कदर समाया होता है कि यथार्थ न होते हुए भी वस्तुस्थिति वैसी बन जाती है और उन्हें कठिनाई का आभास होता है, किन्तु जो महिलाएं इसे सहज रूप में लेती हैं, उन्हें पीड़ा सामान्य अनुभव होती है और सरलता से झेल जाती हैं।
ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर परिचारक का यह कर्त्तव्य है कि वह उसी धीरज बंधाये, सांत्वना दे एवं सही स्थिति से अवगत कराये।
घर में प्रसव— घर पर शिशु जन्म देने के लिए कुशल धात्री की आवश्यकता पड़ती है अतः इसकी व्यवस्था पहले से कर लेनी चाहिए। छात्री के आने तक मां की देखभाल की जिम्मेदारी परिचारक की है। उसे यह जिम्मेदारी तत्परता पूर्वक निभानी चाहिए।
यदि परिचारक पीड़ा की प्रथम अवस्था में प्रसूतिका के घर आता है, तो सबसे पहले उसे यह पता लगाना चाहिए चिकित्सक अथवा धात्री आयी या नहीं। यदि नहीं, तो उन्हें तुरन्त इसकी सूचना देनी चाहिए। उनके आ जाने पर परिचारक उनके कार्यों में हाथ बटा सकता है।
प्रसव के दौरान प्रसव-पीड़ा ही मां के लिए कठिनाई भरी घड़ी होती है। इसकी प्रथम अवस्था भिन्न-भिन्न स्त्रियों में भिन्न-भिन्न अवधि की होती है; किन्तु पहले जन्म में यह प्रायः 16 घण्टे की होती है, जो बाद के प्रसव में घट कर 6-7 घण्टे रह जाती है। आरम्भ में पीड़ा हल्की व क्रमहीन सिकुड़नों के रूप में होती है, जो शनैः-शनैः तेज और क्रमबद्ध होती जाती है। आवृत्ति-भी तदनुरूप बढ़ती है। दर्द कूल्हे के पृष्ठ भाग से आरम्भ होकर जंघाओं तक संचारित होता है।
प्रसव-पीड़ा की प्रथम अवस्था में परिचारक का सहयोग— यदि धात्री के आने में देर हो, तो परिचारक को निम्न सहयोग करना चाहिए-
1. मिडवाइफ (धात्री) द्वारा बतायी प्रसव-सामग्री, पलंग के वस्त्र, मां तथा बच्चे के लिए गरम कपड़े, नवजात शिशु को लपेटने के लिए तौलिया आदि एकत्रित कर लेने चाहिए।
2. पीड़ा की प्रथम अवस्था में सगर्भा को अल्प भोजन दिन में कई बार तथा पर्याप्त मात्रा में पेय देना चाहिए। पीड़ा के कारण यदि वह ठोस भोजन न ले सके, तो तरल भोजन देना चाहिए।
3. इस अवस्था में उससे हर दो घण्टे पर मूत्र त्याग करने के लिए कहना चाहिए। सोने से पूर्व व उठने के पश्चात् भी ऐसा ही निर्देश दें।
4. इस स्थिति में पूर्ण विश्राम आवश्यक है, अतः यदि गर्भवती में थकान के चिन्ह दिखायी पड़ें, तो आराम की सलाह दें।
5. प्रथम अवस्था की समाप्ति के आस-पास मां को तंग वस्त्र के स्थान पर ढीले वस्त्र पहनने के लिए कहना चाहिए। इसके लिए नाइट गाउन उपयुक्त है।
6. उत्तम हो, सगर्भा को प्रसव पूर्व की विभिन्न अवस्थाओं का परिचय पहले ही दे दिया जाय और यह भी बता दिया जाय कि उन अवस्थाओं में अधिक आराम की स्थिति अनुभव करने के लिए उसका उपक्रम क्या हो। यथा- गर्भाशय के संकुचन के समय श्वांस क्रिया के सही होने से अधिक सुख का अनुभव आदि।
7. अंगों में ऐंठन के वक्त प्रायः बेचैनी अनुभव होती है। ऐसी स्थिति में पीड़ित पुट्ठों की मालिश से अथवा पैर की गोल गद्दी (Ball of the foot) पर दबाव डालने तथा मां को अपने पैर का उंगलियां ऊपर-नीचे चलाते रहने से आराम मिलता है।
धात्री बुलाने का उपयुक्त समय— निम्न लक्षण दृष्टिगोचर होने से धात्री को अवश्य बुला लेना चाहिए- 1. जब दर्द काफी बढ़ जाये और गर्भवती बेचैन हो रही हो। 2. गर्भाशय से पानी निकल पड़े। 3. गर्भाशय-संकुचन हर 10 मिनट पर हो रहा हो। 4. नब्ज़ तेज हो गई हो। 5. गर्भाशय में शिशु की गति बढ़ जाये। 6. जब पीड़ा की द्वितीय अवस्था के चिन्ह दृष्टिगोचर हों।
पीड़ा की दूसरी अवस्था के लक्षण— 1. संकुचन अधिक प्रबल व हर 5 मिनट पर हो। 2. हर सिकुड़न के साथ मां जोर लगाती हो। 3. रक्त-स्राव आरम्भ हो जाये। 4. पानी की थैली फट कर पानी निकल पड़े। इस स्थिति तक डॉक्टर अथवा धात्री न पहुंची हो, तो उन्हें अविलम्ब बुलाना चाहिए।
बिस्तर— प्रसव काल में बिस्तर को गन्दा होने से बचाने के लिए उसे विशेष रीति से लगाया जाता है। यदि धात्री समय पर न पहुंच पायी हो तो प्रसूता का बिस्तर निम्न प्रकार से लगाना चाहिए।
1. गद्दे के ऊपर बड़ा भूरे रंग का कागज का चद्दर अथवा बरसाती का बड़ा टुकड़ा। इनके बगलों को गद्दे के नीचे अच्छी तरह दबा देना चाहिए। 2. बिछौने को अधिक सुरक्षित रखने के लिए इनके नीचे साफ समाचार पत्र भी बिछाये जा सकते हैं। 3. इन सबके ऊपर धुली स्वच्छ चादर। 4. प्रसवोपरान्त बिछाने के लिए एक चादर व कम्बल तह करके बगल की कुर्सी पर रख लिया जाता है।
स्वच्छ गद्दिया (Sanitary Towel)— इन्हें प्रसव पीड़ा के वक्त प्रयोग में लाया जाता है। पैकेट से निकालते समय इनके फंदों को पकड़ना चाहिए। तथा कम-से-कम स्पर्श हो, इसका ध्यान रहे। एक बार पैकेट खुल जाने के बास उसे किसी स्वच्छ वस्त्र में लपेटकर रखना चाहिए।
तात्कालिक प्रसव— जब प्रसूता तत्काल बच्चा जनने वाली हो और उस समय तक डॉक्टर अथवा मिटवाइफ उपस्थित न हो सकी हों, तो पूर्व वर्णित रीति से बिस्तर लगाया जाता है। मां को बायीं ओर के बल लेटने को कहा जाता है तथा घुटने ऊपर मोड़ दिये जाते हैं।
शिशु-जन्म के पश्चात् बच्चे की टांग पकड़ कर उल्टा लटका दिया जाता है, ताकि गले-मुंह में यदि म्युकस (Mucus) प्रवेश कर गया हो, तो बाहर निकल जाये, किन्तु ऐसा करते वक्त ध्यान यह रखना चाहिए कि नाल खिंच न जाय, क्योंकि बच्चा अभी इसके द्वारा प्लेसेंटा से जुड़ा होता है। बालक को नैपकिन में लपेट कर मां के समीप लिटा दें। मां को कम्बलों से भली भांति ढक दें, पर ध्यान रहे, शिशु का मुंह न ढक जाय। कोई छोटा स्वच्छ पात्र मां के पैरों के बीच रख दिया जाता है, ताकि प्लासेण्टा बाहर निकले तो उसी में गिरे। अब सब कुछ मिडवाइफ या चिकित्सक के आने तक यथावत् रहने दें।
प्रसूतिका-गृह में जाने से पूर्व परिचारक को अपने नाक और मुंह मुखावरण से ढक लेना चाहिए अथवा एक बड़ा रूमाल बांध लेना चाहिए।
प्रसव के उपरान्त रक्त-स्राव— जब प्लासेण्टा गर्भाशय से पृथक होकर बाहर आता है तो कतिपय रक्त-स्राव होता है और थोड़े समय बाद स्वतः रुक जाता है। रक्त स्राव की स्थिति में चिकित्सक के नहीं आने तक मां को ढाढ़स बंधाते रहना चाहिए। उसे यह न अनुभव होने पाये कि वह किन्हीं अयोग्य व अनुभवहीन व्यक्तियों की देख-रेख में है। उसका कमरा गरम रखना चाहिए। खिड़कियां खोल कर ताजी हवा आने देनी चाहिए। पीने को पेय देना चाहिए।
शिशु का दम घुटना— यदि नवजात शिशु नीला पड़ा हो, तो निश्चय ही उसकी श्वांस अवरुद्ध है। जन्म लेते ही शिशु के सांस नहीं लेने के कारण रक्त में कार्बनडाय ऑक्साइड की अधिकता के कारण यह रंग-परिवर्तन होता है। ऐसी स्थिति में उसे पैरों के सहारे उल्टा लिटा कर उसके नाक-मुंह से म्युकस निकाल देना चाहिए। स्वच्छ छोटे कपड़े के टुकड़े से मुंह को भीतर से पोंछ देना चाहिए। श्वांस लेते ही बच्चा प्राकृतिक रंग प्राप्त कर लेगा।
संक्षोभ (Shock)— यदि शिशु जन्म लेते ही बिल्कुल श्वेत पड़े, तो समझना चाहिए कि वह संक्षोभ से पीड़ित है। इस दशा में उसका सावधानी से उपचार करना चाहिए। पूर्ववत् नाक-मुंह से म्युकस साफ कर देना चाहिए। उसे अधिक हिलाना-डुलाना ठीक नहीं। चिकित्सक को अविलम्ब बुलाना चाहिए, तब तक उसे मां के साथ लिटा दें और कम्बल से ढक दें।

