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Books - परिचर्या एवं उसके मूलभूत तत्व

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT


निष्कीटित करने की विधियां

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1. प्राकृतिक रीति से— सूर्य प्रकाश की परा बैंगनी (Ultra violet rays) किरणों में अद्भुत मारक क्षमता होती है और हवा में सुखाने की सामर्थ्य। प्रकृति इन्हीं के माध्यम से वातावरण के जीवाणुओं, विषाणुओं को मारती है। इनके द्वारा यन्त्रों का निष्कीटन तो नहीं किया जा सकता मगर घरों व वस्त्रों को जीवाणुमुक्त अवश्य किया जा सकता है।

2. रासायनिक रीति से— विभिन्न प्रकार के तरल, ठोस व गैसीय रसायनों (Germicides) से कीटाणुओं को तो मारा जाता है; किन्तु शारीरिक जीवाणुओं (बैक्टीरिया) के विनाश योग्य ये नहीं होते।

3. भौतिक रीति से— इसमें उष्मा का सहारा लिया जाता है। उपकरणों को सीधे गरम करके, भाप द्वारा अथवा उबाल कर इसमें निष्कीटण किया जाता है।

इसमें सर्वसामान्य विधि वाष्प द्वारा अथवा उबाल कर निष्कीटित करना है। वाष्प द्वारा यह क्रिया करने के लिए आटोक्लेव नामक एक विशेष यन्त्र होता है जिसके अन्दर रुई, पट्टियां, गद्दियां आदि रख कर यह कार्य किया जाता है; जबकि पानी द्वारा करने के लिए यन्त्रों को उसमें डालकर निश्चित समय तक उबाला जाता है।

एक ज्वर वाले रोगी की परिचर्या— यदि रोगी को तेज ज्वर हो, तो उसके ओढ़ने के वस्त्र कम कर देने चाहिए। तापमान कम करने के लिए यह जरूरी है। एक चादर अथवा कम्बल से काम चल सकता है। शरीर के वस्त्र भी पतले व ढीले हों। जब शरीर से पसीना आने लगे और तापमान घटने के लक्षण दिखाई पड़ें तो कुछ और वस्त्र ओढ़ा देना चाहिए, ताकि बीमार ठंड महसूस न करे। कमरा पर्याप्त हवादार हो तथा उसका तापक्रम स्थिर रहे, तो उत्तम है।

ताजगी के लिए रोगी को प्रतिदिन कम्बल स्नान कराना चाहिए। तापक्रम अधिक हो तो चिकित्सक के परामर्श से ठंडा स्पंज भी किया जा सकता है। इससे बुखार घटने के साथ-साथ रोगी को नींद भी अच्छी आती है।

तेज ज्वर होने की स्थिति में जहां तक संभव हो रोगी को तरल आहार ही देना उत्तम है। इससे विषाक्त तत्व जल्द ही शरीर से बाहर आ जाते हैं। इसके लिए रोगी को इस प्रकार का आहार लेने के लिये परिचारक को हमेशा प्रोत्साहित करते रहना चाहिए। ज्वर यदि लम्बे समय से आ रहा हो, तो चिकित्सक के निर्देश पर हल्का ठोस भोजन भी दिया जा सकता है। 24 घण्टे का एक आहार-चार्ट तैयार कर लेना उपयुक्त है, जिसमें रोगी को तरल-पदार्थ कितना दिया गया तथा मलमूत्र के रूप में कितना परित्याग किया, यह अंकित हो।

वृद्ध तथा दीर्घकालीन रोगी की परिचर्या— पिछले अध्यायों में गम्भीर स्थिति के रोगियों की परिचर्या के लिए जिन नियमों का उल्लेख किया गया है, वही नियमोपनियम इनके साथ भी लागू होते हैं। परिचारक इनका भली प्रकार परिपालन कर उन्हें ढाढ़स व धैर्य बंधा कर उनकी आयुष्य को दीर्घता प्रदान कर सकता है।

वृद्धजनों की परिचर्या— सामान्यतः बूढ़े लोगों की परिचर्या में निम्न बातों का विशेष ध्यान रखा जाता है।

1. कमरा - बूढ़े शरीर में ठंड अधिक महसूस होती है, अस्तु रोगी का कमरा ऐसा होना चाहिए जिससे रोगी को न तो अधिक ठंडक का एहसास हो न अधिक गर्मी लगे। इसके लिए कमरे का तापमान चूल्हे आदि के माध्यम से स्थिर रखना चाहिए। 65-68 डिग्री फै. तापमान सर्वोत्तम है। हवा के झोंकों को रोकने के लिए खिड़कियों में परदे लगे होने चाहिए। कमरा स्वच्छ साफ व सजा हो।

2. पलंग एवं बिछौना - पलंग इतना नीचा हो कि रोगी उस पर बिना कठिनाई के चढ़-उतर सके। बिस्तर संबंधी सावधानी पूर्व वर्णित ढंग से बरती जानी चाहिए। अंग संचालन होता रहे, ताकि जोड़ कड़े न पड़ जायं।

3. रोगी की स्वच्छता - वृद्ध रोगी को सप्ताह में कम-से-कम एक बार अवश्य स्नान कराना चाहिए। स्नान में अधिक समय न लगे, इस बात का ध्यान रहे, अन्यथा रोगी को ठंड लग सकती है। गन्दे वस्त्र बदलते रहना चाहिए।

शरीर अशक्त हो जाने से बिस्तर घाव की संभावना बढ़ जाती है, अतः इसे सदा ध्यान में रखते हुए रोगी की उचित देखभाल करनी चाहिए। अंगों में रक्त-संचार सामान्य बनाये रखने के लिए समय-समय पर उनकी मालिश करनी चाहिए।

नाखूनों, बालों व मुंह की देखभाल तथा साफ सफाई पिछले पृष्ठों में बतायी गयी रीति से करनी चाहिए।

4. भोजन - भोजन हल्का व पौष्टिक हो तथा थोड़े-थोड़े समय बाद अल्प मात्रा में देना चाहिए। इसमें तरल पेय का उपयुक्त परिमाण में समावेश होना चाहिए; किन्तु शाम व रात्रि में इसको कम ही मात्रा में देनी चाहिए, अन्यथा मूत्र-त्याग के लिए बार-बार उठने-बैठने में परेशानी होगी।

5. मलमूत्र त्याग - मलत्याग प्रतिदिन हो तो अत्युत्तम अन्यथा हर दूसरे दिन करा देना चाहिए। कब्जियत होने की स्थिति में चिकित्सक से परामर्श कर हल्का रेचक दिया जा सकता है। प्रायः आयुष्य बढ़ने पर मूत्राशय के पट्ठे कमजोर हो जाने से मूत्र निरंतर बहता रहता है; इससे बिस्तर-घाव होने की संभावना रहती है, अस्तु इस ओर सदा ध्यान रखना चाहिए। शय्या पात्र तथा मूत्रपात्र रोगी के बिस्तर के निकट ही रहने चाहिए, जिससे रोगी यथासमय उनका उपयोग कर सके। यदि रोगी का मूत्र बराबर बहता रहता है, तो रबड़ का शय्या पात्र प्रयोग में लाया जा सकता है; मगर इसे बार-बार खाली करते रहना चाहिए, नहीं तो गीली चमड़ी में बिस्तर-घाव हो सकता है।

मनोविनोद - वृद्धजन को एकाकीपन का एहसास न हो, अस्तु उसे विनोदपूर्ण बातों, हंसी-मजाक में व्यस्त रखना चाहिए। अकेलेपन से उनमें नीरसता ऊब आ सकती है, अतः इसका ध्यान रखना चाहिए और हल्का-फुल्का मनोरंजन अथवा छोटे-मोटे घरेलू कार्य जिससे वह बिना अतिरिक्त दबाव के कर सके, सौंपते रहना चाहिए। इससे वे उत्साहित और जीवन के प्रति अधिक आशावान् बने रहेंगे।

दीर्घकालीन रोगियों की परिचर्या - ऐसे रोगियों के सम्बन्ध में भी प्रायः उन्हीं नियमों को ध्यान से रखा जाता है, जो अधिक आयुष्य वाले रोगियों के संदर्भ में। इस रोग के रोगी युवक और बूढ़े दोनों हो सकते हैं।

1. मानसिक देखभाल— लम्बे काल से चले आ रहे रोग में रोगी अपना धैर्य खो बैठता है, उसकी जीवन के प्रति आशा धूमिल पड़ने लगती है, वह सोचता है कि उसके जीवन के अब चन्द दिन ही शेष हैं। ऐसी स्थिति में परिचारक का कर्त्तव्य है, कि वह उसे जीवन के प्रति आशा बंधाए। यह सही है कि रियूमेआइड आर्थराइटिस (Rheumatoid Arthritis) तथा डिस्सेमीनेटेड एस्क्लेरोसिस (Disseminated Sclerosis) जैसे दीर्घकालीन व्याधियों के ठीक होने में लम्बा समय लगता है, किन्तु यह भी गलत नहीं कि व्यक्ति की मनोदशा का शरीर अथवा रोगों पर गहरा असर पड़ता है। रोगी का चिन्तन, उसकी मानसिक स्थिति जब तक विधेयात्मक नहीं होगी, बीमारी जल्दी ठीक नहीं होगी। अतः इस दशा में परिचारक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

2. कमरा— रोगी का कमरा अपेक्षाकृत अधिक साफ-सुथरा, सजा-धजा हो, तो इससे भी उसकी मानसिक स्थिति प्रभावित होती है, उसमें प्रसन्नता आती है। कमरा पर्याप्त प्रकाश व हवादार हो। अनावश्यक सामान रोगी के कमरे में नहीं रहे, इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए।

3. बिस्तर व पलंग— पलंग सामान्य ऊंचाई का हो, जिससे रोगी को किसी प्रकार की कोई असुविधा न हो। बिछौने पर्याप्त गद्देदार होने चाहिए। रोगी को अधिक आराम पहुंचाने की दृष्टि से हवादार छल्ले, रबड़ की गद्दिया तथा बेड क्रेडल आदि साधनों का आवश्यकतानुसार प्रयोग समीचीन है।

4. स्थिति— रोगी की परिचर्या बैठा कर करना उपयुक्त रहता है। इस स्थिति में उसे श्वांस लेने में कोई कठिनाई नहीं होती; मगर यदि रोगी की स्थिति ऐसी नहीं हो कि वह बैठ सके, तो उसकी देखभाल लिटा कर ही करनी चाहिए, ध्यान इस बात का रखना चाहिए कि कोई भी स्थिति में रोगी बहुत अधिक देर तक न रहे, अन्यथा उस भाग में अनावश्यक दबाव से रक्त-संचार अवरुद्ध हो सकता है अथवा बिस्तर-घाव बन सकते हैं।

पक्षाघात की दशा में पैरों को नीचे लटकने से रोकने के लिए बालू की थैलियों का प्रयोग किया जा सकता है। शक्तिहीन हाथों को तकिये का सहारा देना चाहिए।

5. स्नान— रोगी को स्फूर्ति व ताजगी महसूस हो, इसके लिए स्नान कराना आवश्यक है। सुविधानुसार और रोगी की आवश्यकता को देखते हुए सप्ताह में कम-से-कम दो बार अवश्य स्नान कराना चाहिए। गन्दे वस्त्र समय-समय पर बदलते रहना चाहिए। बालों, नाखूनों की स्वच्छता पर भी ध्यान देना आवश्यक है। रक्त परिभ्रमण बढ़ाने के लिए यदा-कदा अंगों की मालिश लाभकारी है।

6. आहार— आहार पौष्टिक और संतुलित हो; पर इसकी मात्रा कम ही होनी चाहिए। आहार अधिक होने से कसरत के अभाव में रोगी की स्थूलता बढ़ने लगती है। शरीर भारी होने से उन्हें कष्ट होता है। भोजन यथासंभव रोगी की रुचि के अनुरूप हो।

7. मलमूत्र त्याग— आवश्यकतानुसार कमोड अथवा शय्या पात्र का प्रयोग करना चाहिए। जो रोगी अच्छी स्थिति में हों, उठ-बैठ सकते हों, उन्हें विशेष प्रकार की कुर्सी में बैठा कर शौचालय ले जाया जा सकता है। जिसकी स्थिति ऐसी नहीं है, उनकी पूर्ववर्णित ढंग से परिचर्या की जा सकती है।

8. पुनर्वास— रोगी का सदा उत्साहवर्धन करते रहना चाहिए। कई बार सप्ताह-महीनों तक दीर्घ अस्वस्थता के बाद भी रोगी चलने-फिरने की स्थिति में पुनः आ जाते हैं। ऐसी स्थिति में उनके कार्यों की सराहना करने से उनमें आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है। अशक्त पैरों वाले रोगी को इस स्थिति में लाने के लिए चल कुर्सी एवं तीन पैरों वाली छड़ी की सहायता ली जा सकती है। टांगों तथा पट्ठों को मजबूत बनाने के लिए फिजियोथेरेपी और अक्युपेशनल थेरेपी उपलब्ध करना आवश्यक है। ऊब से बचाने के लिए रोगी को छोटे-मोटे काम यथा- टोकरी बुनना, खिलौने बनाना, कालीन बनाना, सिलाई, बुनाई आदि सिखाये जा सकते हैं। इससे उसका समय भी भली प्रकार कटता रहेगा और उसे अपनी उपयोगिता भी महसूस होगी, हीन भावना से बचा रहेगा। इसके अतिरिक्त समय-समय पर सगे-सम्बन्धियों का मिलते रहना, समाचार पत्र व स्वाध्याय के लिए पुस्तकों की व्यवस्था करना ऐसे उपचार हैं जिससे रोगग्रस्त का मनोबल बढ़ता है। अन्य अंगों से अपंग रोगियों की सेवा उपयुक्त साधनों से की जानी चाहिए।

देखा गया है कि जो रोगी अस्पताल में ठीक नहीं हो पाते अथवा नैराश्य से घिरे रहते हैं, उनका शेष जीवन गृह-परिचर्या से आनन्द से बीतता है।

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