प्रखर प्रतिभा का अर्जन मनोयोग व लगन से
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प्रतिभा पराक्रम, मनोयोग और साहस के सम्मिश्रण से बनती है। वह कितने ही सांसारिक क्रियाकुशल, पुरुषार्थ परायण, स्फूर्तिवान और महत्वाकांक्षी लोगों में भी पायी जाती है। उसे व्यक्तित्व का मूल्य समझने वाले अपनी आदतों को तदनुरूप ढालकर स्वयं भी विकसित कर लेते हैं। कुछ में वह जन्मजात भी होती है, जिसका कारण पूर्व संचित संस्कारों की सम्पदा को ही माना जा सकता है। राजनीति, साहित्य, कला, व्यवसाय आदि क्षेत्र में कितने ही प्रतिभाशाली लोग आये दिन दृष्टिगोचर होने रहते हैं।
प्रखरता इससे आगे की बात है। उसमें अध्यात्म स्तर का पुरुषार्थ अनुदान जुड़ा होता है। वह आदर्शवादी भी होती है और उत्कृष्टता समर्थक उच्चस्तरीय भी। प्रखरता और प्रतिभा का अन्तर स्पष्ट है। प्रतिभा का झुकाव वैभव अर्जित करने के लिए ललकता रहता है और वह आमतौर से भौतिक सफलता सुविधा के लिए ही प्रयुक्त होती रहती है। प्रखरता का रुझान आदर्शों की ओर होता है, वह सम्पदा नहीं महानता अर्जित करती है। उसका उपयोग व्यक्तिगत सुविधा सम्पादन में तो नगण्य ही होता है किन्तु अधिकांश क्षमता सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन में लगी रहती है। प्रायः लोक मंगल के परमार्थ प्रयोजनों में उसे नियोजित रहते देखा गया है।
अध्यात्म क्षेत्र से सम्बन्धित लोगों में प्रतिभा नगण्य और प्रखरता की मात्रा बढ़ी-चढ़ी होती है। ऐसे कम ही लोग हुए हैं, जिनमें दोनों का समन्वय समान स्तर का रहा है। यह आवश्यक नहीं कि जिसमें प्रखरता हो उसमें प्रतिभा का नाम भी न हो। वह होती तो है पर उसका अनुपात अपेक्षाकृत कम ही रहता है। जिस पलड़े पर वजन पड़ेगा उसी को नीचा झुका हुआ पाया जायगा। दोनों में से जो जिसे अभीष्ट होता है वह उसे उपार्जित कर लेता है।
आद्य शंकराचार्य प्रखरता के धनी थे। सोलह वर्ष की आयु से ही वे महामानवों जैसी दृष्टि अपनाकर उसकी पूर्ति में जुट गये और उस तादात्म्य ने उन्हें ऐतिहासिक सफलतायें प्राप्त करने का अवसर दिया। कुमारिल, यह भी अपने समय के असाधारण व्यक्तित्व सम्पन्न थे, पर उनने अपनी विशिष्टता को सामयिक विकृतियों और भ्रान्तियों से जूझने में लगाया। वे चाहते तो उसे विशिष्टता के बदले प्रचुर परिमाण में धन, यश, पद आदि भी उपलब्ध कर सकते थे।
योगी अरविन्द योग्यता की दृष्टि से उच्च पदासीन रह सकते थे। बहुत समय तक रहे भी। बड़ौदा स्टेट के दीवान, नेशनल कॉलेज के संस्थापक और प्रतिभा संपन्न बुद्धिजीवी के रूप में उन दिनों उनकी ख्याति थी। देश भक्ति के क्षेत्र में भी अग्रणी थे, क्रान्तिकारी भी रहे। किन्तु अन्ततः उनकी प्रतिभा प्रखरता में बदली। साधना परायण हुए और योगीराज बने, महर्षि कहलाये। अपने तपोबल से उन्होंने सूक्ष्म वातावरण गरम किया और एक से एक बढ़ी-चढ़ी प्रतिभाओं का अम्बार लगा दिया। इन दिनों जितने महामानव एक साथ एक से एक ऊंचे स्तर के उभरे वैसा इतिहास के अन्य सोपानों में नहीं देखा गया। अरुणाचलम् के महर्षि रमण की तपश्चर्या का समूचे लोकमानस पर क्या प्रभाव पड़ा होगा! इसका अनुमान उनके समीपवर्ती क्षेत्र की प्रतिक्रियाओं को देखकर लगाया जा सकता है। उनके मौन सत्संग में मोर, सर्प, गिलहरी, बन्दर, कबूतर आदि नियमित रूप से आते थे और अपने नियत स्थानों पर बैठकर उस प्रवाह का आनन्द लेते थे। कई बार तो उन्हें बन्दरों के झुण्डों में चल रहे द्वन्द्वों से निपटने के लिए बाहर आना पड़ता, या उन्हीं की भाषा बोलकर वे फैसला करते थे जिसे मानकर वे भावी रीति-नीति अपनाया करते।
चाणक्य की प्रखरता उन्हें प्रधानमन्त्री और विश्वविद्यालय के उच्च पद पर आसीन होने के बाद भी अपरिग्रही बनाये रही। उनका कौशल अद्भुत था, पर निजी प्रयोजनों में उसका एक कण भी प्रयुक्त नहीं हुआ। विदेशी आक्रमणों को निरस्त करने और देश को सुविस्तृत, संगठित एवं समुन्नत बनाने में उनके निर्धारणों ने चमत्कारी भूमिका निबाही। उनके सम्पर्क प्रभाव से एक सामान्य बालक चन्द्रगुप्त महान कहलाया। भगवान बुद्ध को अवतार माना जाता है। यह पद उन्हें अनायास ही नहीं मिला। उत्तराधिकारियों को मिलने वाले सिंहासन या वैभव की तरह उन्हें हस्तगत नहीं हुआ। यात्रा आरम्भ करने से लेकर लक्ष्य तक पहुंचने की लम्बी मंजिल की कष्ट साध्य सफलतायें प्राप्त करने का श्रेय उनकी प्रखरता को ही है। यह एक ऐसी सशक्त आकर्षण शक्ति है किसके कारण न सहयोगी कम पड़ते हैं न साधन। बुद्ध एक मध्यवर्ती स्तर के युवक से बढ़ते-बढ़ते अवतार पद तक पहुंचे। वे अकेले ही गगनचुम्बी नहीं बने। अपने साथ आनन्द, राहुल, कुमार जीव, हर्षवर्धन, अशोक, संघमित्रा, अश्वपति आदि अनेकों हलके-फुलकों को भी आकाश तक उड़ सकने का श्रेय सौभाग्य प्रदान कर सके।
आयुर्विज्ञान क्षेत्र में चरक, सुश्रुत, वागभट्ट आदि ने जिस-जिस स्तर के प्रयोग अनुसंधान किए, उसके लिए समूची मानवता चिरकाल तक कृतज्ञ रहेगी। रसायन शास्त्र के माध्यम से महत्वहीन पदार्थों को मणि-मुक्तकों से बढ़कर—अमृतोपम स्तर का बना देने में उनका कितना बड़ा योगदान रहा, इसका मूल्यांकन यह अनुमान लगाने पर ही हो सकता है कि उन प्रयासों के अभाव में विज्ञान जगत को चिरकाल तक कितनी पिछड़ी स्थिति में पड़ा रहना पड़ता। अन्तरिक्ष विज्ञान के रहस्योद्घाटन करने में भास्कराचार्य, आर्यभट्ट आदि की प्रखरता ने जो प्रस्तुतीकरण किया, उससे मनुष्य ने वह सब जाना जिसके अभाव में उस क्षेत्र की उपलब्धियों से हम सब चिरकाल तक वंचित ही बने रहते और न पूरी हो सकने वाली क्षति उठाते। भाषा के क्षेत्र में पाणिनि, साधना में पातंजलि, कथा-साहित्य में व्यास, दर्शन में कपिल, कणाद का जो योगदान रहा उसकी तुलना सूर्य-चन्द्र के अनुदानों से की जाती रहती है।
मध्यकाल के सरस्वती साधकों में कालिदास, वोपदेव, वरदराज, कैय्यट आदि की भावभरी चर्चा होती रहती है। यह उपार्जन उनका स्कूली नहीं था। वरन् अध्यात्म क्षेत्र के प्रयोग-प्रयत्नों के माध्यम से वे सामान्य होते हुए भी विलक्षण मेधा का परिचय दे सकने में समर्थ हुए। अपनी विद्या का उन्होंने बाजारू उपयोग नहीं किया। जो सृजा, जो किया उसके पीछे भाव-संवेदना एवं ज्ञान गरिमा को अधिकाधिक विकसित करने वाली उत्कण्ठा से ही अनुप्राणित रहे। उपरोक्त नामावली उन लोगों की है जो जन्मजात रूप से मन्द बुद्धि स्तर के थे। इसी श्रृंखला में एक आधुनिक नाम महात्मा आनन्द स्वामी का भी जुड़ता है। वे बाईस वर्ष की आयु तक मूढ़मति समझे जाते रहे किन्तु गायत्री उपासना की चमत्कारी परिणति ने उनका भाग्य ही बदल दिया। अति पूर्वकाल में ऋषि तैत्तरेय ने किसी की उच्द्रिष्ट ज्ञान सम्पदा को ऐसे ही तीतर बनकर निगल लिया था और इतने भर से वे देखते-देखते ब्रह्म विद्या के अधिष्ठाता बन गये थे।
अपने समय के प्रखरता सम्पन्नों में ऐसे कितने ही नाम सम्मिलित होते हैं जिनकी जन्मजात स्थिति आर्थिक, शैक्षणिक, शारीरिक एवं पारिवारिक दृष्टि से सामान्य स्तर की ही थी, पर वे प्रखरता अपनाकर महानता की दिशा में तेजी से बढ़े और वहां पहुंचे जहां से वे अनन्त काल तक असंख्यों को प्रगति-पथ पर बढ़ चलने का मार्ग-दर्शन करते रहेंगे। ऐसे महामानवों में राणाप्रताप, छत्रपति शिवाजी, युग पुरुष गांधी, महामना मालवीय, लोकमान्य तिलक, पंजाब केशरी लाजपतराय, नेताजी सुभाषचन्द्र, चन्द्रशेखर आजाद जैसे राजनैतिक क्षेत्र के महामानवों की गणना की जा सकती है। सामाजिक क्षेत्र में विवेकानन्द, दयानन्द, रामतीर्थ, गुरु गोविन्द सिंह, समर्थ रामदास, कबीर रैदास आदि की सराहना मुक्त कण्ठ से की जा सकती है। सुसम्पन्नों में राजा कर्ण, भामाशाह, जुगलकिशोर बिड़ला जैसों का नाम श्रद्धावनत होकर लिया जाता रहेगा। यह इसलिए नहीं कि वे सर्वोपरि धनाध्यक्ष थे, वरन् इसलिए कि उनकी प्रखरता अपने वैभव को उच्चस्तरीय प्रयोजन में लगा सकने की पृष्ठभूमि बना सकी। आम तौर से लोग वैभव का उपयोग विलास, संचय एवं कुपात्रों पर अनावश्यक भार बखेरने की तरह करते रहते हैं। महर्षि कर्वे जैसी सूझ-बूझ कितनों की होती है कि वे थोड़ी-सी राशि से सन्तान को सुशिक्षित, स्वावलम्बी बनाने के अतिरिक्त अपने अनुदान को लोकहित में लगाने के लिए ब्याज समेत वसूल भी कर लें। इस समुदाय में अहिल्याबाई जैसी महिलाओं का भी उदार स्मरण किया जा सकता है। यों उस पिसनहारी का भी समूची मानवता अभिनन्दन करती रहेगी, जिसने पिसाई करके निर्वाह करने की स्थिति रहने पर भी जो बचा उसे पूरी ईमानदारी से बचाया और लोकमंगल के लिए उदारतापूर्वक अपने हाथों ही विसर्जित कर दिया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर जो कमाते थे उसमें से एक चौथाई से परिवार पोषण करने के उपरान्त तीन-चौथाई अभावग्रस्त छात्रों के निमित्त खर्च कर देते थे। यह सम्पन्नता की चर्चा नहीं वरन् उस प्रखरता का अभिनन्दन है, जिसने खर्च का सही मार्ग सुझाया और थोड़े को भी बीज की तरह बो देने का साहस प्रदान करके बहुमूल्य फसल काटने का सौभाग्य दिलाया। राजा जनक, दानवीर कर्ण जैसे उदारमना भी इसी अपरिग्रही ब्राह्मण परिवार में गिने जाते हैं। हरिश्चन्द्र की साहसिक उदारता का स्मरण अनन्त काल तक किया जाता रहेगा।
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का पालन-पोषण उनकी सौतेली मां ने किया था। गरीबी और कठिनाइयों के बीच दिन काटने वाली इस महिला ने इस बालक को ऐसी प्रेरणायें और नसीहतें दीं जिनसे बच्चे की समझ और शिक्षा ही नहीं, आत्मा भी ऊंची उठती चली गई और वे क्रमिक प्रगति के पथ पर चलते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति ही नहीं, विश्व के महामानवों में से एक बने। एक बार अब्राहम लिंकन से उनकी उन्नति का कारण और शिक्षा का आधार पूछा तो उनने एक शब्द में इतना ही कहा—जन्म दात्री न होते हुए भी जिसने मेरी निर्मात्री होना स्वीकार किया उसी मां का बनाया हुआ मैं खिलौना हूं।
महान वैज्ञानिक टामस अलवा एडीसन बचपन में अत्यन्त मन्द बुद्धि थे। पढ़ने में उनकी अक्ल चलती ही न थी। सो अध्यापक ने बच्चों के हाथों अभिभावक को पत्र भेजा। इसे स्कूल से उठा लें। मन्द बुद्धि होने के कारण वह पढ़ न सकेगा। बच्चे की मां ने भरी आंखों और भारी मन से पत्र पढ़ा। बच्चे को दुलारा और छाती से चिपकाकर कहा—‘मेरे बच्चे, तुम मन्द बुद्धि नहीं हो सकते। मैं स्वयं ही तुम्हें पढ़ाऊंगी, बच्चे को स्कूल से उठा लिया गया और उसकी मां ने पढ़ाना आरम्भ किया। परिणाम सभी के सामने है। बच्चा विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिकों में से एक बना।
प्रश्न न तो उच्चस्तरीय योग्यता का है और न विपुल सम्पन्नता का। वह तो दस्यु तस्करी से भी आती रहती है। कुचक्री, ठग, शोषक, अपराधी प्रवृत्ति के लोग अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान होते हैं। उनमें से अधिकांश की शिक्षा भी बड़ी-चढ़ी होती है। इतने पर भी उन उपलब्धियों का उपयोग उच्च प्रयोजनों के लिए न बन पड़ने के कारण अन्यान्यों के साथ-साथ उनका अपना भी अहित ही होता है। साधन स्वल्प हो, योग्यता थोड़ी हो तो भी प्रखरता के सहारे उन्हें महान प्रयोजनों में लगाकर अनुकरणीय आदर्श पीछे छोड़ा जा सकता है। ऐसा प्रकाश, उत्साह और साहस जिस अन्तःप्रेरणा के आधार पर बन पड़ता है उसे प्रखरता कहते हैं। ऐसे लोगों में राजस्थान बालिका विद्यालय के संस्थापक हीरालाल शास्त्री, सांगरिया विद्यापीठ के जन्मदाता स्वामी केशवानंद, अपंगों के आश्रयदाता बाबा साहब आदि जैसे लगनशील सेवा साधकों को काल गति भी विस्मरण के गर्त में न गिरने देगी।
अध्यात्म क्षेत्र से सम्बन्धित लोगों में प्रतिभा नगण्य और प्रखरता की मात्रा बढ़ी-चढ़ी होती है। ऐसे कम ही लोग हुए हैं, जिनमें दोनों का समन्वय समान स्तर का रहा है। यह आवश्यक नहीं कि जिसमें प्रखरता हो उसमें प्रतिभा का नाम भी न हो। वह होती तो है पर उसका अनुपात अपेक्षाकृत कम ही रहता है। जिस पलड़े पर वजन पड़ेगा उसी को नीचा झुका हुआ पाया जायगा। दोनों में से जो जिसे अभीष्ट होता है वह उसे उपार्जित कर लेता है।
आद्य शंकराचार्य प्रखरता के धनी थे। सोलह वर्ष की आयु से ही वे महामानवों जैसी दृष्टि अपनाकर उसकी पूर्ति में जुट गये और उस तादात्म्य ने उन्हें ऐतिहासिक सफलतायें प्राप्त करने का अवसर दिया। कुमारिल, यह भी अपने समय के असाधारण व्यक्तित्व सम्पन्न थे, पर उनने अपनी विशिष्टता को सामयिक विकृतियों और भ्रान्तियों से जूझने में लगाया। वे चाहते तो उसे विशिष्टता के बदले प्रचुर परिमाण में धन, यश, पद आदि भी उपलब्ध कर सकते थे।
योगी अरविन्द योग्यता की दृष्टि से उच्च पदासीन रह सकते थे। बहुत समय तक रहे भी। बड़ौदा स्टेट के दीवान, नेशनल कॉलेज के संस्थापक और प्रतिभा संपन्न बुद्धिजीवी के रूप में उन दिनों उनकी ख्याति थी। देश भक्ति के क्षेत्र में भी अग्रणी थे, क्रान्तिकारी भी रहे। किन्तु अन्ततः उनकी प्रतिभा प्रखरता में बदली। साधना परायण हुए और योगीराज बने, महर्षि कहलाये। अपने तपोबल से उन्होंने सूक्ष्म वातावरण गरम किया और एक से एक बढ़ी-चढ़ी प्रतिभाओं का अम्बार लगा दिया। इन दिनों जितने महामानव एक साथ एक से एक ऊंचे स्तर के उभरे वैसा इतिहास के अन्य सोपानों में नहीं देखा गया। अरुणाचलम् के महर्षि रमण की तपश्चर्या का समूचे लोकमानस पर क्या प्रभाव पड़ा होगा! इसका अनुमान उनके समीपवर्ती क्षेत्र की प्रतिक्रियाओं को देखकर लगाया जा सकता है। उनके मौन सत्संग में मोर, सर्प, गिलहरी, बन्दर, कबूतर आदि नियमित रूप से आते थे और अपने नियत स्थानों पर बैठकर उस प्रवाह का आनन्द लेते थे। कई बार तो उन्हें बन्दरों के झुण्डों में चल रहे द्वन्द्वों से निपटने के लिए बाहर आना पड़ता, या उन्हीं की भाषा बोलकर वे फैसला करते थे जिसे मानकर वे भावी रीति-नीति अपनाया करते।
चाणक्य की प्रखरता उन्हें प्रधानमन्त्री और विश्वविद्यालय के उच्च पद पर आसीन होने के बाद भी अपरिग्रही बनाये रही। उनका कौशल अद्भुत था, पर निजी प्रयोजनों में उसका एक कण भी प्रयुक्त नहीं हुआ। विदेशी आक्रमणों को निरस्त करने और देश को सुविस्तृत, संगठित एवं समुन्नत बनाने में उनके निर्धारणों ने चमत्कारी भूमिका निबाही। उनके सम्पर्क प्रभाव से एक सामान्य बालक चन्द्रगुप्त महान कहलाया। भगवान बुद्ध को अवतार माना जाता है। यह पद उन्हें अनायास ही नहीं मिला। उत्तराधिकारियों को मिलने वाले सिंहासन या वैभव की तरह उन्हें हस्तगत नहीं हुआ। यात्रा आरम्भ करने से लेकर लक्ष्य तक पहुंचने की लम्बी मंजिल की कष्ट साध्य सफलतायें प्राप्त करने का श्रेय उनकी प्रखरता को ही है। यह एक ऐसी सशक्त आकर्षण शक्ति है किसके कारण न सहयोगी कम पड़ते हैं न साधन। बुद्ध एक मध्यवर्ती स्तर के युवक से बढ़ते-बढ़ते अवतार पद तक पहुंचे। वे अकेले ही गगनचुम्बी नहीं बने। अपने साथ आनन्द, राहुल, कुमार जीव, हर्षवर्धन, अशोक, संघमित्रा, अश्वपति आदि अनेकों हलके-फुलकों को भी आकाश तक उड़ सकने का श्रेय सौभाग्य प्रदान कर सके।
आयुर्विज्ञान क्षेत्र में चरक, सुश्रुत, वागभट्ट आदि ने जिस-जिस स्तर के प्रयोग अनुसंधान किए, उसके लिए समूची मानवता चिरकाल तक कृतज्ञ रहेगी। रसायन शास्त्र के माध्यम से महत्वहीन पदार्थों को मणि-मुक्तकों से बढ़कर—अमृतोपम स्तर का बना देने में उनका कितना बड़ा योगदान रहा, इसका मूल्यांकन यह अनुमान लगाने पर ही हो सकता है कि उन प्रयासों के अभाव में विज्ञान जगत को चिरकाल तक कितनी पिछड़ी स्थिति में पड़ा रहना पड़ता। अन्तरिक्ष विज्ञान के रहस्योद्घाटन करने में भास्कराचार्य, आर्यभट्ट आदि की प्रखरता ने जो प्रस्तुतीकरण किया, उससे मनुष्य ने वह सब जाना जिसके अभाव में उस क्षेत्र की उपलब्धियों से हम सब चिरकाल तक वंचित ही बने रहते और न पूरी हो सकने वाली क्षति उठाते। भाषा के क्षेत्र में पाणिनि, साधना में पातंजलि, कथा-साहित्य में व्यास, दर्शन में कपिल, कणाद का जो योगदान रहा उसकी तुलना सूर्य-चन्द्र के अनुदानों से की जाती रहती है।
मध्यकाल के सरस्वती साधकों में कालिदास, वोपदेव, वरदराज, कैय्यट आदि की भावभरी चर्चा होती रहती है। यह उपार्जन उनका स्कूली नहीं था। वरन् अध्यात्म क्षेत्र के प्रयोग-प्रयत्नों के माध्यम से वे सामान्य होते हुए भी विलक्षण मेधा का परिचय दे सकने में समर्थ हुए। अपनी विद्या का उन्होंने बाजारू उपयोग नहीं किया। जो सृजा, जो किया उसके पीछे भाव-संवेदना एवं ज्ञान गरिमा को अधिकाधिक विकसित करने वाली उत्कण्ठा से ही अनुप्राणित रहे। उपरोक्त नामावली उन लोगों की है जो जन्मजात रूप से मन्द बुद्धि स्तर के थे। इसी श्रृंखला में एक आधुनिक नाम महात्मा आनन्द स्वामी का भी जुड़ता है। वे बाईस वर्ष की आयु तक मूढ़मति समझे जाते रहे किन्तु गायत्री उपासना की चमत्कारी परिणति ने उनका भाग्य ही बदल दिया। अति पूर्वकाल में ऋषि तैत्तरेय ने किसी की उच्द्रिष्ट ज्ञान सम्पदा को ऐसे ही तीतर बनकर निगल लिया था और इतने भर से वे देखते-देखते ब्रह्म विद्या के अधिष्ठाता बन गये थे।
अपने समय के प्रखरता सम्पन्नों में ऐसे कितने ही नाम सम्मिलित होते हैं जिनकी जन्मजात स्थिति आर्थिक, शैक्षणिक, शारीरिक एवं पारिवारिक दृष्टि से सामान्य स्तर की ही थी, पर वे प्रखरता अपनाकर महानता की दिशा में तेजी से बढ़े और वहां पहुंचे जहां से वे अनन्त काल तक असंख्यों को प्रगति-पथ पर बढ़ चलने का मार्ग-दर्शन करते रहेंगे। ऐसे महामानवों में राणाप्रताप, छत्रपति शिवाजी, युग पुरुष गांधी, महामना मालवीय, लोकमान्य तिलक, पंजाब केशरी लाजपतराय, नेताजी सुभाषचन्द्र, चन्द्रशेखर आजाद जैसे राजनैतिक क्षेत्र के महामानवों की गणना की जा सकती है। सामाजिक क्षेत्र में विवेकानन्द, दयानन्द, रामतीर्थ, गुरु गोविन्द सिंह, समर्थ रामदास, कबीर रैदास आदि की सराहना मुक्त कण्ठ से की जा सकती है। सुसम्पन्नों में राजा कर्ण, भामाशाह, जुगलकिशोर बिड़ला जैसों का नाम श्रद्धावनत होकर लिया जाता रहेगा। यह इसलिए नहीं कि वे सर्वोपरि धनाध्यक्ष थे, वरन् इसलिए कि उनकी प्रखरता अपने वैभव को उच्चस्तरीय प्रयोजन में लगा सकने की पृष्ठभूमि बना सकी। आम तौर से लोग वैभव का उपयोग विलास, संचय एवं कुपात्रों पर अनावश्यक भार बखेरने की तरह करते रहते हैं। महर्षि कर्वे जैसी सूझ-बूझ कितनों की होती है कि वे थोड़ी-सी राशि से सन्तान को सुशिक्षित, स्वावलम्बी बनाने के अतिरिक्त अपने अनुदान को लोकहित में लगाने के लिए ब्याज समेत वसूल भी कर लें। इस समुदाय में अहिल्याबाई जैसी महिलाओं का भी उदार स्मरण किया जा सकता है। यों उस पिसनहारी का भी समूची मानवता अभिनन्दन करती रहेगी, जिसने पिसाई करके निर्वाह करने की स्थिति रहने पर भी जो बचा उसे पूरी ईमानदारी से बचाया और लोकमंगल के लिए उदारतापूर्वक अपने हाथों ही विसर्जित कर दिया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर जो कमाते थे उसमें से एक चौथाई से परिवार पोषण करने के उपरान्त तीन-चौथाई अभावग्रस्त छात्रों के निमित्त खर्च कर देते थे। यह सम्पन्नता की चर्चा नहीं वरन् उस प्रखरता का अभिनन्दन है, जिसने खर्च का सही मार्ग सुझाया और थोड़े को भी बीज की तरह बो देने का साहस प्रदान करके बहुमूल्य फसल काटने का सौभाग्य दिलाया। राजा जनक, दानवीर कर्ण जैसे उदारमना भी इसी अपरिग्रही ब्राह्मण परिवार में गिने जाते हैं। हरिश्चन्द्र की साहसिक उदारता का स्मरण अनन्त काल तक किया जाता रहेगा।
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का पालन-पोषण उनकी सौतेली मां ने किया था। गरीबी और कठिनाइयों के बीच दिन काटने वाली इस महिला ने इस बालक को ऐसी प्रेरणायें और नसीहतें दीं जिनसे बच्चे की समझ और शिक्षा ही नहीं, आत्मा भी ऊंची उठती चली गई और वे क्रमिक प्रगति के पथ पर चलते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति ही नहीं, विश्व के महामानवों में से एक बने। एक बार अब्राहम लिंकन से उनकी उन्नति का कारण और शिक्षा का आधार पूछा तो उनने एक शब्द में इतना ही कहा—जन्म दात्री न होते हुए भी जिसने मेरी निर्मात्री होना स्वीकार किया उसी मां का बनाया हुआ मैं खिलौना हूं।
महान वैज्ञानिक टामस अलवा एडीसन बचपन में अत्यन्त मन्द बुद्धि थे। पढ़ने में उनकी अक्ल चलती ही न थी। सो अध्यापक ने बच्चों के हाथों अभिभावक को पत्र भेजा। इसे स्कूल से उठा लें। मन्द बुद्धि होने के कारण वह पढ़ न सकेगा। बच्चे की मां ने भरी आंखों और भारी मन से पत्र पढ़ा। बच्चे को दुलारा और छाती से चिपकाकर कहा—‘मेरे बच्चे, तुम मन्द बुद्धि नहीं हो सकते। मैं स्वयं ही तुम्हें पढ़ाऊंगी, बच्चे को स्कूल से उठा लिया गया और उसकी मां ने पढ़ाना आरम्भ किया। परिणाम सभी के सामने है। बच्चा विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिकों में से एक बना।
प्रश्न न तो उच्चस्तरीय योग्यता का है और न विपुल सम्पन्नता का। वह तो दस्यु तस्करी से भी आती रहती है। कुचक्री, ठग, शोषक, अपराधी प्रवृत्ति के लोग अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान होते हैं। उनमें से अधिकांश की शिक्षा भी बड़ी-चढ़ी होती है। इतने पर भी उन उपलब्धियों का उपयोग उच्च प्रयोजनों के लिए न बन पड़ने के कारण अन्यान्यों के साथ-साथ उनका अपना भी अहित ही होता है। साधन स्वल्प हो, योग्यता थोड़ी हो तो भी प्रखरता के सहारे उन्हें महान प्रयोजनों में लगाकर अनुकरणीय आदर्श पीछे छोड़ा जा सकता है। ऐसा प्रकाश, उत्साह और साहस जिस अन्तःप्रेरणा के आधार पर बन पड़ता है उसे प्रखरता कहते हैं। ऐसे लोगों में राजस्थान बालिका विद्यालय के संस्थापक हीरालाल शास्त्री, सांगरिया विद्यापीठ के जन्मदाता स्वामी केशवानंद, अपंगों के आश्रयदाता बाबा साहब आदि जैसे लगनशील सेवा साधकों को काल गति भी विस्मरण के गर्त में न गिरने देगी।

