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Books - प्रतिभा पुरुषार्थ की चेरी

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प्रतिभा-पुरुषार्थ की चेरी

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मिशिंग पोर्ट ह्यूरन के एक स्कूल की अध्यापिका अन्य बच्चों को शिक्षित और योग्य बना रही थी, परन्तु उसका बच्चा एकदम मन्दबुद्धि था। न पढ़ने में जी लगता, न दिमाग ही चलता था। सिर तो बहुत बड़ा था परन्तु बुद्धि-शून्य। डॉक्टरों ने यहां तक कह दिया था कि यह शिक्षा के नाम पर ए. बी. सी. भी नहीं सीख पायेगा।

परन्तु इसी बुद्धिहीन बालक ने आगे चलकर एक ऐसे यन्त्र का आविष्कार किया जो सभ्य समाज के मनोरंजन का प्रधान साधन बन गया। वह यन्त्र है—ग्रामोफोन। यद्यपि आजकल तो यत्र-तत्र रेडियो और ट्रांजिस्टर ही दिखाई देते हैं। परन्तु एक समय ग्रामोफोन घर-घर बजाये जाते थे। आज भी इनका अपना महत्व है। उत्सव, समारोहों और आयोजनों में तेज और मधुर आवाज के गीत-संगीत का प्रसारण ग्रामोफोन द्वारा ही होता है।

एडिसन पढ़ नहीं सकेगा यह जानकर माता बड़ी दुखी हुई। उसने एक अखबार कार्यालय में अपने बेटे को नौकरी दिला दी। पोर्ट ह्यूरन से डैट्रायट तक वह रेलगाड़ी में अखबार बेचने जाया करता था। गार्ड ने पार्सल के डिब्बे में उसका स्थान नियत कर दिया। एडिसन इस काम को बड़ी लगन और अध्यवसाय से करता था। उसे बड़ा मजा आने लगा अपने काम में। साथ ही एक चिन्ता भी हुई, मालिक ने यदि अप्रसन्न होकर या उससे कम पारिश्रमिक लेने वाला लड़का मिल जाने पर काम से भगा दिया तो वह क्या करेगा?’ पराश्रयी जीवन अनिश्चित ही रहता है। नौकरी, जो केवल मालिक की खुशी पर निर्भर है, में भविष्य किसी प्रकार निश्चित नहीं होता है। फिर एडिसन के पास कोई योग्यता भी तो नहीं थी, न ही अपना छोटा-मोटा धन्धा चलाने योग्य थोड़ी-सी आर्थिक पूंजी। ऐसी दशा में उचित यही लगता है कि अपनी योग्यता और क्षमता का विकास किया जाय ताकि संस्थान के मालिक भी उस आदमी की आवश्यकता अनुभव करें और नौकर भी स्वयं को स्वामी की दया पर नहीं अपनी योग्यता और आत्म-विश्वास के बल पर स्वाभिमान का जीवन व्यतीत कर सके।

एडिसन ने इधर-उधर से थोड़ा-सा टाइप जुटाया और गाड़ी के डिब्बे में ही छोटा-सा प्रेस बना लिया। इस कार्य का कुछ अनुभव भी उनके पास था। महंगी मशीनें खरीदना तो संभव था नहीं इसलिए प्रूफ उतारने की मशीन से ही वह अखबार छापता। प्रेस में छपे अखबारों के साथ-साथ वह अपने अखबार भी बेचता था। सौभाग्य से पाठक उसके अखबार को पसन्द करने लगे।

इसी समय एक घटना ऐसी घटी जिसके कारण उसकी प्रगति का नया द्वार खुला। रेलगाड़ी जिसमें एडिसन आया-जाया करता था, एक स्टेशन से गुजर रही थी। एक नन्हा बालक रेल की पटरी की ओर कौतूहल से दौड़ रहा था। नासमझ और अबोध होने के कारण शायद वह रेल के पहियों से कट भी सकता था। एडिसन ने उस बालक को देखा और वह चलती गाड़ी से ही कूद गया। बालक को उसने पकड़ लिया रेलगाड़ी निकल गयी। चलती गाड़ी से कूदने के कारण उसे चोट भी आई।

वह बालक स्टेशन के तार बाबू का था। बाबू ने उसे धन्यवाद दिया। परिचय और काम धन्धे के बारे में पूछा। एडिसन ने सब बता दिया। बाबू ने सलाह दी कि तुम तार भेजने का काम सीख लो। किसी भी अवसर पर मानवीय कर्तव्यों का पालन मनुष्य में आत्म संतोष ही नहीं कई भौतिक लाभ भी प्रस्तुत कर सकता है।

उसने तार भेजने का काम सीखना स्वीकार कर लिया, कुछ ही दिनों में वह तार भेजना सीख गया। बाबू ने अपने प्रभाव का प्रयोग कर उसे उसी रेलवे स्टेशन पर काम दिलवा दिया। दिन में उक्त बाबू तार भेजता था और रात में एडिसन। इधर उसकी रुचि विज्ञान और यन्त्रों की ओर भी बढ़ी। रात भर काम से थक जाने के कारण दिन में नींद आ जाती थी। एडिसन ने अपनी नींद में कटौती कर प्रयोग का काम आरम्भ किया। यहीं एक बड़ी मनोरंजक घटना घटी। दिन भर प्रयोगशाला में काम करने पर रात को एडिसन को झपकी आने लगती। इस पर अफसर ने एडिसन को यह सख्त आज्ञा दी कि वह प्रति आधा घण्टे पर एक अक्षर तार द्वारा उसके पास भेजता रहे। एडिसन के सामने समस्या आ गई। अपनी बुद्धि से उसने ऐसा यन्त्र बनाया जिसका घड़ी के साथ सम्बन्ध जोड़ देने पर वह अक्षर अपने आप तार द्वारा उस अफसर तक पहुंच जाता। अधिकारी को जब पता चला तो एडिसन को काम से निकाल दिया गया।

परन्तु यहां रहकर उसने अपने कार्य में इतनी निपुणता प्राप्त कर ली कि उसे दूसरी जगह नौकरी मिलने में कोई दिक्कत नहीं हुई। जीवन लक्ष्य के साधक अविराम चलते ही रहते हैं ‘मंजिल’ तक। शोध और अनुसंधान उनके प्रिय विषय थे। वे बोस्टन पहुंचे, आगे बढ़ने के लिए सहायक वातावरण मिल जाने से वे वहीं रुक गये और अपने अनुसंधान कार्य में जुट गये। तार प्रेषण के क्षेत्र में उन्होंने यहां कई आविष्कार किये। एक समय में दो और एक साथ दो-दो तार दो अलग-अलग जगह भेजने आदि की कई विधियां खोज निकालीं और ऐसे यन्त्रों का निर्माण भी किया।

एडिसन ने पहले के वैज्ञानिकों द्वारा प्राप्त की गई सफलताओं का भी अध्ययन किया। वह एक ऐसे यन्त्र के निर्माण की कल्पना करने लगा जिसमें ध्वनि को अंकित किया जा सके और पुनः उसे बजाया जा सके। कल्पना, श्रम, मनोयोगों के बल पर साकार होती है। वे अपने अनुसंधान कार्य में पूरी तरह तन-मन से जुट गये। इस तन्मयतापूर्ण श्रम ने ही संसार में महान व्यक्तियों को ऊंचा उठाया है।

इसी मनोयोग और एकाग्रता से प्रयत्न करते-करते एडिसन की साधना सफल हुई और सन् 1876 में उसने ग्रामोफोन का आविष्कार कर लिया—जिसमें बाद में सुधार हुये। रेडियो, ट्रांजिस्टर आदि प्रचलित साधनों का ग्रामोफोन पितामह है और उसका जनक था—बचपन का मन्दबुद्धि और गंवार परन्तु अध्यवसाय तथा श्रम के बल पर श्रेष्ठतम् महान् वैज्ञानिक एडिसन।

सफलता ऐसों के कदम चूमती है :

स्वस्थ आकांक्षायें ही प्रेरणा की केन्द्र बिन्दु हैं। आगे बढ़ने, ऊंचा उठने, विकास की ओर निरन्तर अग्रसर होने की आकांक्षा न उठी होती, तो मनुष्य आदिम अवस्था में ही पड़ा रहता। आज की प्रगतिशील स्थिति में पहुंच पाना सम्भव न हो पाता। आकांक्षाओं की प्रेरणा से ही पुरुषार्थ को गतिशील होने का अवसर मिला और विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ। मनःशास्त्री कहते हैं कि मनुष्य की दृश्यमान हलचलों का कारण आकांक्षायें हैं। प्रतिभा, धन, प्रतिष्ठा अथवा श्रेय की आकांक्षा के इर्द-गिर्द ही संसार की गति है। जीवन से वे तिरोहित हो जांय तो कुछ शेष बचता नहीं। निष्क्रिय और निश्चेष्ट जीवन का अभिशाप लद जाता है। मानव समाज का गहन अध्ययन करने वाले मनोविज्ञानी कहते हैं कि जिस समाज अथवा राष्ट्र की आकांक्षायें जितनी प्रबल होंगी, भौतिक दृष्टि से वे उतने ही सम्पन्न होंगे।

आकांक्षाओं की पूर्ति में अभीष्ट स्तर की प्रतिभा एवं पुरुषार्थ का होना आवश्यक है। अन्यथा वे मात्र ललक बन कर रह जाती हैं, जिनका कुछ प्रतिफल निकलता नहीं। साथ ही उनकी दिशाधारा का रचनात्मक होना भी उतना ही आवश्यक है, नहीं तो उनकी परिणति स्वयं एवं समाज दोनों ही के लिए अहितकर होती है।

नाम कमाने की आकांक्षा अधिकांश व्यक्तियों के मन में होती है। कुछ सम्पदा संग्रह का मार्ग चुनते हैं, कुछ प्रतिभार्जन का तथा कुछ शक्ति संग्रह का, अपनी स्थिति का सही मूल्यांकन करके तदनुरूप प्रयास करते हैं वे सफल भी होते हैं, पर अधिकांश को इच्छाओं का उनकी स्थिति से तालमेल बैठता नहीं। वे अभीष्ट स्तर का पुरुषार्थ नहीं कर पाते फलतः उन्हें असफलता ही हाथ लगती है।

इसके विपरीत संसार में ऐसे व्यक्ति समय-समय पर विभिन्न देशों में पैदा हुए हैं, जिन्होंने अपनी सामर्थ्य को समाज की भौतिक समृद्धि बढ़ाने में खपाया। सम्पदा एवं प्रतिष्ठा की कामना से दूर रहकर वे योगी की तरह कार्य में लगे रहे। उनके काम ही बाद में उनके नाम बन गये। ऐसे व्यक्तियों में आविष्कारक वैज्ञानिकों की एक बड़ी संख्या है, जिनमें से कुछ का नाम उल्लेखनीय हैं।

गेब्रियल डेनियल फारेनहाइट ने दुकानदारी के कार्य में विफल होकर भौतिकी का अध्ययन शुरू किया, व्यवसाय अपनाया—कांच का फुलाना तथा भौतिकी यन्त्रों का निर्माण करना। 1724 में उसने 0 डिग्री से 212 डिग्री अक्षांक वाले तापमापी का निर्माण किया। जल के अतिशीत होने तथा दाब बदलने के साथ-साथ उबाल बिन्दु बदलने का सिद्धान्त खोजने का श्रेय भी ग्रेब्रियल को ही है। उसका नाम ‘फारेनहाइट’ ही ताप मापने की इकाई बना।

जेम्स वॉट से सुधरे हुए भाप इंजन का निर्माण किया। अपनी अनवरत लगन के कारण विश्व विख्यात वैज्ञानिक बना। ‘वॉट’ बिजली को मापने की एक इकाई है जिसे सभी जानते हैं।

एलेसांद्रो वोल्टा अत्यन्त प्रतिभाशाली छात्र था। वह पाविया विश्वविद्यालय (इटली) में भौतिकी का अध्यापक नियुक्त हुआ। वहीं कार्य करते हुए वह अनुसंधान कार्य में लगा रहा। उसने स्थिर विद्युत को जमा करने वाले उपकरण इलेक्ट्रो फोटीक, सेल, वोल्टेनिक सेल तथा बैटरी का निर्माण किया। धारा विद्युत सिद्धान्त की प्रस्तुति वोल्टा विभवान्तर मापन की एक इकाई है।

सोने में मिलावट ज्ञान करने के जिस सिद्धान्त का आविष्कार यूनान के महान गणितज्ञ आर्कीमीडिस ने किया, वह आज भी ‘आर्कीमीडिस सिद्धान्त’ के रूप में विख्यात तथा मान्यता प्राप्त है।

ग्रैवियल फेलोपियो इटली में चिकित्सा शास्त्री थे तथा पैडुआ विश्वविद्यालय में शरीर रचना-विज्ञान और वनस्पति शास्त्र विभाग के अध्यक्ष रहे। शरीर रचना विभाग पर उन्होंने एक बृहद् ग्रन्थ लिखा। गर्भाशय नली एवं कर्ण पटल तन्त्रिका जैसे आन्तरिक अवयवों का पता लगाया। माता-स्तन पायियों के जननांग में पायी जाने वाली एक नली जिससे होकर अण्ड या डिम्ब गर्भाशय में पहुंचता है, की खोज फेलोपियो ने ही की। उसके नाम पर ही उस नलिका का नाम फेलोपियो ट्यूब पड़ा।

मार्सेलो मैलपिघी, इटली के बोलोना तथा पीसा विश्वविद्यालयों में चिकित्सा विज्ञान के प्राध्यापक रहे। भ्रूण विज्ञान, ऊतक विज्ञान तथा पादप शरीर रचना विज्ञान के विद्वान थे। उन्होंने शरीर विज्ञान पर दो महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं तथा वनस्पति विज्ञान में अनेकों खोजें कीं। त्वचा की परत के ठीक बाद पायी जाने वाली बाह्य त्वचा की एक परत की खोज उन्होंने की, जिसमें निरन्तर कोशिकाओं का विभाजन होता रहता है तथा त्वचा को गहरा रंग देने वाला रंजक पदार्थ ‘मेलानिन’ पाया जाता है। उस परत का नाम ‘मैलपिघियन परत’ पड़ा।

कार्ल फ्रीडरिक गॉस, चौदह वर्ष की अल्पायु में ‘गैस्यूकिलडीय ज्यामिती’ और अठारह वर्ष की आयु में गणित की नयी परिकलन विधि प्रस्तुत करने वाले जर्मन भौतिकविद् थे, उन्होंने ग्रहों की कक्षा का परिकलन करने की विधि का भी आविष्कार किया। चुम्बकीय क्षेत्र घनत्व की इकाई—‘गॉस’, कार्ल फ्रीडरिक गॉस की ही खोज है। ‘आन्द्रेमारी एम्पियर’ फ्रांस के प्रसिद्ध भौतिकविद् तथा रसायन शास्त्री थे। वे बारह वर्ष की आयु में ही ‘अवकलन गणित’ के विशेषज्ञ हो गये। एम्पीयर ने सबसे पहले यह बताया कि चुम्बकीय पदार्थों में चुम्बकत्व का मूल स्रोत एक विद्युत धारा होती है न कि चुम्बकीय ध्रुव धारा। विद्युत की इकाई ‘एम्पीयर’ मारी एम्पीयर का ही एक आविष्कार है।

जार्ज सियन ओम म्यूनिख विश्व विद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक थे। उन्होंने विभवांतर विद्युतधारा तथा विद्युत प्रतिरोध के बीच गणितीय सम्बन्ध की खोज की तथा डी.सी. विद्युत परिपथों की गणितीय व्याख्या की। ‘ओम’ विद्युत प्रतिरोध मापने की एक व्यावहारिक इकाई है।

जेम्स प्रस्काट जुल ब्रिटिश भौतिकविद् थे। उन्होंने ताप के यान्त्रिक सिद्धान्त, गैसों के ‘अंगु गणित सिद्धान्त’ तथा गैसीय अणु के वेग के आकलन सिद्धान्त की खोज की। ‘जूल-सेण्टीमीटर ग्राम-सैकेंड प्रणाली में ऊर्जा की इकाई के रूप में प्रेस्काट का नाम अमर है।

लुई पाश्चर विख्यात फ्रांसीसी रसायनज्ञ तथा लाइल विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र के प्राध्यापक थे। किणवन प्रक्रिया पर उन्होंने विशद् अध्ययन-अनुसंधान किया। पास्चराइजेशन-तपोपचार द्वारा दूध आदि तरल पदार्थों में हानिकारी जीवाणुओं को नष्ट करने की विधि की खोज पाश्चर की ही देन है। इस खोज से तरल पदार्थ अधिक समय तक सुरक्षित रखे जा सकते हैं।

जेम्स क्लार्क मेक्सवेल महान ब्रिटिश भौतिकविद् कैंब्रिज विश्वविद्यालय के प्राध्यापक थे। उन्होंने विद्युतधारा तथा चुम्बकीय क्षेत्र के बीच परस्पर क्रिया की स्थापना की जो, सम्वाद प्रेषण के उपकरणों के विकास का आधार बनी। उनका नाम मैक्सवेल-सेन्टीमीटर-ग्राम-सेकण्ड प्रणाली में चुम्बकीय फ्लक्स की इकाई के रूप में प्रख्यात है। विज्ञान क्षेत्र में ऐसे अगणित नाम हैं जो वैज्ञानिकों के कामों के कारण जाने जाते हैं। न्यूटन, डाल्टन, मैडम क्यूरी, आइन्स्टीन जैसे नामों की लम्बी श्रृंखला है, जिन्होंने अपनी विलक्षण प्रतिभा का सुनियोजन करके अद्भुत आविष्कारों को जन्म दिया, जिनसे समस्त मानव जाति किसी न किसी रूप में लाभान्वित हो रही है।

श्रेय अर्जित करने के लिए आवश्यक नहीं कि मनुष्य बुद्धिमान हो। ऐसे व्यक्ति तो थोड़े से होते हैं, पर महानता का मार्ग हर किसी के लिए खुला है। अन्वेषण बुद्धि की कमी किसी में नहीं है। हर कोई अपने ही प्रयत्नों से उस मार्ग में आगे बढ़ता चल सकता है। पर हित हेतु प्रतिभा का अवलम्बन लेने वाले परमार्थ परायणों का यश इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अमर है। उनका अनुगमन कर श्रेय अर्जित कर सकना हर किसी के लिए सम्भव है।
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