प्रतिभा पर आयु का सीमा-बन्धन नहीं
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सामान्य धारणा है कि प्रौढ़ावस्था में शरीर के साथ-साथ मनुष्य का मस्तिष्क भी ढलने लगता है और चिन्तन तंत्र काम करना बन्द कर देता है, कल्पना शक्ति कमजोर पड़ जाती है व दिमाग की रचनात्मक सामर्थ्य क्षीण हो जाती है, पर वस्तुतः ऐसी बात है नहीं। संसार में अनेक महत्वपूर्ण कार्य लोगों ने ढलती आयु में ही सम्पन्न किये हैं। कई लोगों ने जीवन की इस ढलान में अनेक ऐसी रचनायें की जो उन्हें अमर बना गयीं। कइयों ने इस अवस्था में ऐसी प्रतिभा का परिचय दिया जिसे अद्भुत ही कहा जा सकता है। अनेकों ने इसी उम्र में अपने जीवन को सही-सही समझा और उसका सदुपयोग किया जबकि अन्य अनेक ऐसे भी हुए हैं जिनने जीवन के इसी दौर में कुछ ऐसे कार्य कर दिखाये जिन्हें शेष जीवन की तुलना में श्रेष्ठ व मूल्यवान कहा जा सके।
ऐसे महान् पुरुषों में कुछ हैं—महान दार्शनिक सन्त सुकरात, प्लेटो, पाइथागोरस, होमर, आगस्टस, खगोलशास्त्री गैलीलियो, प्रसिद्ध कवि हेनरी वर्ड्सवर्थ, वैज्ञानिक थामस अल्वा एडीसन, वैज्ञानिक निकोलस, कोपरनिकस, विख्यात वैज्ञानिक न्यूटन, सिसरो, अलबर्ट आइन्स्टीन, टेनिसन, महात्मा टालस्टाय इत्यादि।
सुकरात ने साठ वर्ष पार करने के उपरान्त यह अनुभव किया कि बुढ़ापे की थकान और उदासी को दूर करने के लिए संगीत अच्छा माध्यम हो सकता है, अतः उन्होंने गाना सीखना आरम्भ किया और बजाना भी—यह क्रम उन्होंने मरते दम तक जारी रखा। वे 60 वर्ष की उम्र में अपने अत्यन्त महत्वपूर्ण तत्वदर्शन की विशद व्याख्या करने में भी जुटे हुए थे। यही बात प्लेटो के सम्बन्ध में भी थी, वे अपनी 80 वर्ष की आयु तक बराबर कठोर परिश्रम करते रहे। 81 वर्ष की अवस्था में हाथ में कलम पकड़े हुए उन्होंने मृत्यु का आलिंगन किया।
टेनिसन ने 80 वर्ष की परिपक्व अवस्था में अपनी सुन्दर रचना ‘क्रासिंग दी वार’ दुनिया को प्रदान की। राबर्ट ब्राउनिंग अपने जीवन के संध्याकाल में बहुत सक्रिय बने रहे। उन्होंने 77 साल की उम्र में मृत्यु के कुछ पहले ही दो सर्वसुन्दर कवितायें ‘रेवेरी’ और ‘एवीलॉग टु आसलेण्डी’ लिखीं। एच.जी. वेल्स ने 70 वर्ष की अपनी वर्षगांठ के उपरांत भी पूरे चुस्त और कर्मठ रहते हुए एक दर्जन से ऊपर पुस्तक की रचना की। सिसरो ने अपनी मृत्यु के एक वर्ष पूर्व 63 वर्ष की आयु में अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘ट्रीटाइज ऑन ओल्ड एज’ की रचना की। कीरो ने 70 साल की उम्र में ग्रीक भाषा सीखी थी। थियोसॉफी की संस्थापिका मैडम ब्लेवटस्की ने मृत्यु शैया पर ही अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ ‘सिक्रेट डॉक्ट्रिन्स’ की रचना की थी, जो कि 6 खण्डों में है। प्लूटार्क यूनान के माने हुए साहित्यकार हुए हैं, उन्होंने 75 वर्ष की आयु के बाद लैटिन भाषा पढ़नी आरम्भ की थी। इटली के प्रख्यात उपन्यासकार वोकेशियो को ढलती उम्र में साहित्यकार बनने की बात सूझी। उस ओर वह पूरी दिलचस्पी के साथ जुटे और अन्ततः मूर्धन्य कथ कार बनकर चमके। इसी प्रकार दार्शनिक फ्रेंकलिन की विश्वव्यापी ख्याति है, वे 50 वर्ष की आयु तक दर्शनशास्त्र से अपरिचित रहे। इसके प्रति रुझान इसके बाद ही जन्मा और वह उन्हें विश्व-विख्यात बनाकर ही रहा।
संसार में कुछ ऐसे भी व्यक्ति हुए हैं जिन्हें जीवन के पूर्वार्ध में विज्ञान का अक्षर ज्ञान भी नहीं था, पर जीवन यात्रा के उत्तरार्ध में उनने विज्ञान को अपनी बहुमूल्य सेवायें दीं और मूर्धन्य विज्ञानी बने। सर हेनरी स्पेलमैन अग्रगण्य विज्ञानवेत्ता हुए हैं, वे 60 वर्ष तक दूसरी तरह के काम करते रहे। इस उम्र में उन्हें वैज्ञानिक बनने की सूझी सो उन्होंने साइन्स की पुस्तकें पढ़नी आरम्भ कीं और उस दिशा में उनकी बढ़ती दिलचस्पी ने उन्हें उच्चकोटि की वैज्ञानिक सफलतायें प्रदान कीं।
अनेक भारतीय मनीषियों- विद्वानों ने भी जीवन के अन्तिम पड़ाव में ऐसी प्रतिभा का परिचय दिया है। बाण भट्ट ने अपनी अमर कृति ‘कादम्बरी’ का सृजन जीवन के अन्तिम दिनों में ही आरम्भ किया था और उसे अधूरा छोड़कर चल बसे थे। बाद में उनके बेटे ने उस कार्य को पूरा किया। कालिदास की रुचि जीवन के उत्तरार्ध में ही साहित्य क्षेत्र में बढ़ी थी। आदि कवि कहलाने का सौभाग्य महर्षि बाल्मीकि ने अपनी प्रौढ़ावस्था में ही प्राप्त किया था। छायावाद के जनक कहलाने वाले कवि जयशंकर प्रसाद की जब मृत्यु हुई तो वे ‘इरावती’ नामक उपन्यास लिखने में जुटे हुए थे। जीवन के अन्तिम चरण में विनोबा चीनी भाषा सीख रहे थे। संस्कृत के पारंगत सातवलेकर जब 75 वर्ष के थे तब वेदों का भाष्य आरम्भ किया और सारे आर्षग्रंथों का सटीक अनुवाद कर ‘जीवेम् शरदः शतम्’ की उक्ति सार्थक की।
पश्चिम एवं भारत के ये कुछ ऐसे मनीषी, विद्वान, वैज्ञानिक थे जिनकी रचनात्मक शक्ति का ह्रास उनकी ढलती उम्र के कारण कतई नहीं हुआ था और जिन्होंने अपने बुढ़ापे में भी बड़े महत्वपूर्ण एवं उपयोगी काम करके मानवता की अपूर्व सेवा की, पर देश-विदेश में ऐसी प्रतिभायें सिर्फ साहित्य क्षेत्र में ही पैदा नहीं हुई। राजनीति क्षेत्र में भी अनेक ऐसे नक्षत्र जन्मे जो वृद्धावस्था के बावजूद राजनीति में अपना वर्चस्व बनाये रहे। महात्मा गांधी, विंस्टन चर्चिल, बेंजामिन, फ्रैंकलिन, डिजरैली, ग्लेडस्टोन आदि ऐसे ऐतिहासिक पुरुष हैं जो अपनी वृद्धावस्था की चुनौतियों के बावजूद बहुत सक्रिय बने रहे। अपने देश की अमूल्य सेवा में वे अनवरत रूप से लगे रहे।
मूर्धन्य वैज्ञानिक सापेक्षवाद के आविष्कारक आइन्स्टीन विद्यार्थी जीवन में मन्द बुद्धि माने जाते थे। एक दिन उन्हें विद्यालय से निष्कासित भी कर दिया गया, कारण था क्लास में हाजिर जवाबी का अभाव। विषयों-प्रश्नों की गहराई में वे इस हद तक चले जाते थे कि उत्तर तुरन्त नहीं सूझता था। अध्यापक तथा विद्यार्थीगण इसी कारण उनकी क्षमता का मूल्यांकन नहीं कर पाते, पर सभी जानते हैं कि आरम्भ में मन्दबुद्धि समझा जाने वाले यह बालक इतिहास प्रसिद्ध वैज्ञानिक बना—जिसकी बुद्धि का लोहा सभी मानते हैं।
विलक्षण प्रतिभा के ऐसे अगणित प्रमाण मिले हैं जिनका कोई सीधा सम्बन्ध बुद्धिलब्धि (इन्टेलीजेन्स क्वोसेण्ट) से नहीं है। वह मान्यता भी पुरानी पड़ती जा रही है कि प्रतिभा प्रकृति प्रदत्त एक स्थायी जन्मजात अनुदान है। ‘इन्टेलीजेन्स कैन वी टॉट’ पुस्तक के लेखक आर्थर लिण्डा के अनुसार कई व्यक्तियों में उनके जीवन के दौरान आई.क्यू. स्तर बढ़ता देखा गया है जबकि स्कूल में आई.क्यू. परीक्षण के आधार पर अति मेधावी घोषित छात्र आगे चलकर निष्फल सिद्ध हुए हैं। प्रतिभा के मनोवैज्ञानिक परीक्षणों को चुनौती देने वाले ऐसे उदाहरण भी हैं जो बताते हैं कि यह पद्धति कितनी अपूर्ण और एकांगी है। मन्द बुद्धि घोषित पर अद्भुत मेधा सम्पन्न व्यक्तियों के प्रमाण इस क्षेत्र में नये सिरे से सोचने तथा अनुसंधान करने की प्रेरणा देते हैं।
न्यूयार्क में 1939 में भ्रूण के परिपक्व होने के तीन माह पूर्व जुड़वे बच्चों ने जन्म लिया। नाम पड़ा चार्ल्स और जार्ज। तीन वर्ष की आयु में उनका बौद्धिक परीक्षण किया गया, परीक्षण कर्त्ताओं ने उन्हें मन्दमति का घोषित किया। इनकी आई.क्यू. 60 से 70 के बीच थी जो सामान्य से भी कम थी। न्यूयार्क स्टेट साइकेट्रिक इन्स्टीट्यूट के डॉ. विलियम हार्विज ने सन् 1963 में इस युग्म का परीक्षण किया। उन्हें इनमें विलक्षणता का आभास मिला, उन्होंने जार्ज से एक जन्म तिथि बताकर उस पर पड़े दिन उस क्रम में आगे पड़ने वाले विभिन्न तारीखों तथा दिनों का ब्यौरा पूछा। कुछ ही सैकिण्ड में उसने सही-सही विवरण प्रस्तुत कर दिया, सैकड़ों हजारों वर्ष पूर्व अमुक दिन को कौन सी तारीख तथा माह था—पूछे जाने पर बिना अधिक समय लगाये चार्ल्स तथा जार्ज दोनों ही बताते थे। आने वाले सैकड़ों वर्षों बाद की जानकारियां भी शत-प्रतिशत सही देते थे जबकि उन्हें कैलेन्डर के नियमों का कुछ भी ज्ञान न था। लम्बे समय तक डॉ. हार्विज कारणों की खोज-बीन करते रहे, पर विलक्षणता का रहस्योद्घाटन न हो सका। अन्ततः वे यह कहकर चुप हो गये कि—‘प्रतिभा के अविज्ञान स्रोत मानव मस्तिष्क में विद्यमान हैं—जिसकी कोई जानकारी विज्ञान एवं मनोविज्ञान को नहीं है।’
इंग्लैण्ड का जेडेदिया बक्सन नामक व्यक्ति भी चार्ल्स-जार्ज की तरह की अद्भुत मेधा का धनी था। बचपन में वह इतना मूर्ख समझा जाता था कि उसके माता-पिता ने पढ़ाना भी उचित न समझा। अक्षर ज्ञान की भी उसे शिक्षा न मिली, पर आश्चर्य यह कि कुछ ही वर्षों बाद वह गणित के जटिल प्रश्नों को हल करने लगा। उसकी स्मृति विलक्षण थी, एक बार वह थियेटर में ड्रामा देख रहा था। एक घण्टे के भीतर अभिनेता ने जितने सम्वाद बोले, उनके शब्दों की सही संख्या तथा नर्तकी द्वारा नृत्य में उठाये गये कदमों की कुल संख्या बताकर उसने सबको आश्चर्यचकित कर दिया। जुबान पर सभी सम्वाद ऐसे रटे जान पड़ रहे थे कि उनका पूर्ववत् अभ्यास किया गया हो। प्रामाणिकता की परीक्षा कितनी ही बार विशेषज्ञों द्वारा की गयी, पर हर बार उन्हें ‘बक्सन’ की प्रतिभा का लोहा मानना पड़ा। एक बार उसे 365, 365, 365, 365, 365 जैसी संख्या का एक साथ गुणा करने को दिया गया। एक मिनट में ही उसने सही गुणा करके सबको हैरत में डाल दिया। उल्लेखनीय बात यह थी कि उसे गणित के आधुनिक नियमों का आरम्भिक ज्ञान तक न था।
अपने परीक्षण के दौरान डॉ. डी.सी. रीफ् तथा एल. एच. स्नीडर ने एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण प्रस्तुत किया जो 4 अंकों के वर्गमूल तथा 6 अंकों के घनमूल को क्रमशः चार सैकिण्ड तथा छह सैकिण्ड में हल कर देता था। यह घटना सन् 1931 की है।
1970 में डेविड एस. विस्कोट नामक एक विद्वान ने बोस्टन की एक महिला हैरियट का अध्ययन किया। वह विलक्षण प्रतिभा की धनी निकली। मोजार्ट, बीथोवियन स्कवर्ट, डेबूसी, प्रोकोफियेव वर्डी जैसे विश्वविख्यात तथा अन्य भी अगणित संगीतज्ञों के समकक्ष उन्हीं जैसी हैरियट संगीत की धुनें निकाल लेती थी। आश्चर्य की बात यह है कि उसने संगीत का कभी अभ्यास नहीं किया था, न ही उसे लय, ताल, स्वर, रागनियों का ही कुछ ज्ञान ही था।
जॉन वॉन न्यूमेन नामक विद्वान को मूर्धन्य गणितज्ञ की पदवी मिली है। वह कठिन गणित के प्रश्नों का उत्तर बिना गुणा-भाग किये, बिना किसी यन्त्र का प्रयोग किये देने के लिए विख्यात है। यूरोपीय विद्वान समय-समय पर उनसे गणित की समस्याओं पर विचार विमर्श करने आते रहते हैं। भारत की सुप्रसिद्ध शकुन्तला देवी की तरह अमरीकी चीफ जस्टिस चार्ल्स इवान ह्य जेश के मस्तिष्क को भी इलेक्ट्रानिक कम्प्यूटर माना जाता है। एक बार उन्होंने अपने स्टेनोग्राफर को एक भाषण दो घण्टे बाद उसे बिना पढ़े ही, बिना एक भी गलती किये क्रमबद्ध दुहरा दिया, उनकी अद्भुत मेधा अमरीका में चर्चा का विषय है।
वैज्ञानिक क्षेत्र में मस्तिष्क की विलक्षणताओं के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार की अटकलें लगायी जा रही है। कुछ वैज्ञानिक इसका सम्बन्ध मस्तिष्क के प्रोटोन रसायन से जोड़ते हैं। कुछ का मत है कि मस्तिष्क के अन्तराल में कम्प्यूटर जैसी कोई अविज्ञात प्रणाली भी कार्यरत है। दूसरी ओर पेलो अल्टो सकूल ऑफ प्रोफेशनल साइकोलॉजी के डॉ. टी.एल. ब्रोंक ने प्रतिभा का सम्बन्ध मस्तिष्क के वाम भाग से जोड़ते हुए कहा है कि यह क्षेत्र असीम संभावनाओं का छुपा भण्डार है, जिसका अध्ययन गम्भीरतापूर्वक करना होगा।
वैज्ञानिकों की अटकलों तथा मनोवैज्ञानिक क्षेत्र के प्रयोग-परीक्षणों से निकले निष्कर्षों के आधार पर मानसिक प्रतिभा के कारणों की स्पष्ट व्याख्या कर सकना मुश्किल है। बुद्धि विश्लेषण एवं प्रखरता के निर्धारण के लिए बनाये गये बुद्धिलब्धि जैसे माप-दण्ड अत्यन्त बौने सिद्ध होते हैं। यथार्थता यह है कि इन परीक्षणों से बुद्धि चातुर्य का प्रत्यक्ष स्थूल पक्ष ही पकड़ में आता है। इन्टेलीजेन्स का वह पक्ष जो महान तथा महत्वपूर्ण आविष्कारों का जन्मदाता है—किसी भी तरह इन परीक्षणों की सीमा में आ नहीं पाता। सशक्त कल्पनाओं, प्रखर विचारों का इनसे परिचय नहीं प्राप्त किया जा सकता। हिमनदों में बर्फ के शिलाखण्डों का तीन चौथाई हिस्सा पानी के भीतर डूबा रहता है एक चौथाई ऊपर दिखाई पड़ता है। प्रतिभा की भी लगभग ऐसी ही स्थिति होती है। एक मोटा और अत्यन्त छोटा पक्ष ही बुद्धि का व्यक्त रूप में सामने आता है, उसी को लेकर मनुष्य अपने दैनन्दिन जीवन के क्रिया-कलापों को गतिशील रखता है। अधिकांश भाग तो प्रसुप्त स्थिति में दबा पड़ा है तथा उपयोग में नहीं आ पाता है।
जन्मजात प्रतिभा की विलक्षणता का कुछ सुनिश्चित कारण मनःशास्त्री तथा न्यूरोलॉजिस्ट नहीं बता पाते। आनुवांशिकी से जोड़े जाने वाले तीर-तुक्कों की भी अब सटीक संगति नहीं बैठती। आनुवंशिकी के नियमों को झुठलाने वाले विपरीत तथ्य एवं प्रमाण भी देखे जाते हैं। मूर्ख माता-पिता से मेधावी तथा मेधावी के मूर्ख पैदा होने के उदाहरण भी समय-समय पर मिलते हैं। सबसे अधिक रहस्यमय तथा चौंकाने वाली वे घटनायें होती हैं जिनमें बिना शिक्षण प्राप्त किये विशिष्ट स्तर की प्रतिभा किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में अकस्मात उभरती दिखायी पड़ती है। आश्चर्य तो तब होता है जब चिर-प्रयत्न के बाद भी प्रौढ़ों में वैसी विशिष्टता देखने को नहीं मिलती जो बालकों में अनायास ही प्रकट हो जाती है। कई बार ऐसी घटनाओं में पूर्वजन्मों के संचित संस्कार भी कारण हो सकते हैं।
वस्तुतः मनुष्य अपने जीवन में, किसी क्षेत्र विशेष में सफल होने का भरपूर प्रयत्न करता है। अधिकांश में उसे सफलता मिलती भी है, उस विषय विशेष में वह मर्मज्ञ भी बन जाता है, पर कई बार लाख प्रयत्न के बावजूद भी वह अपनी मेहनत के अनुरूप योग्यता विकसित नहीं कर पाता। इसका यह अर्थ कदापि नहीं समझा जाना चाहिए कि उसका इस जीवन का प्रयास सर्वथा निरर्थक गया। वस्तुतः ऐसे ही पुरुषार्थ अगले जन्म में प्रतिभा बनकर प्रकट होते और लोगों को हैरत में डालते हैं—आये दिन ऐसी घटनायें प्रकाश में आती रहती हैं।
जापान के हनावा होकाइशी अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण ज्ञान के अवतार कहे जाते थे। सन् 1722 में जन्म लेकर 101 वर्ष की अवस्था में सन् 1823 में मरने वाले हनावा की 7 की उम्र में नेत्र ज्योति चली गयी थी। नेत्रहीन होकर भी उन्होंने 40 हजार से अधिक पुस्तकें पढ़ डालीं, उनके मस्तिष्क में ज्ञान का असीम भण्डार जमा हो गया था। मित्रों के आग्रह पर मस्तिष्क में संचित ज्ञान भण्डार को जब पुस्तक के रूप में छापा गया तो उसके 2820 खण्ड बने।
स्काटलैंड के जेम्स क्रिस्टल ने 12 वर्ष की अल्पायु में ही अरबी, ग्रीक, यहूदी तथा फ्लैमिश सहित विश्व की 12 भाषायें सीख ली थीं।
फ्रांस में जन्मे लुईस कार्डक 4 वर्ष की आयु में अंग्रेजी, फ्रांसीसी, जर्मन तथा अन्य यूरोपीय भाषायें बोल लेते थे। जब वे 6 माह के थे तभी से बाइबिल पढ़ने लगे थे, 6 वर्ष के हुए तो गणित, इतिहास, भूगोल के प्रकाण्ड पंडित बन गये।
ब्लेट्स पास्कल ने 12 वर्ष की अवस्था में ध्वनि शास्त्र पर निबन्ध लिखकर सारे फ्रांस को आश्चर्य में डाल दिया था।
जॉन फिलिप बराटियर को 14 वर्ष की आयु में ही डॉक्टर आफ फिलॉसफी की उपाधि मिल गई। उनकी स्मरण शक्ति इतनी तीव्र थी कि जो पढ़ते-सुनते उन्हें याद हो जाता उसे बाद में हूबहू वैसा ही सुना देते।
पेरिस विश्व विद्यालय के इतिहास में सबसे छोटी आयु 16 वर्ष का प्रोफेसर डिनेस ली फेवे रहा है। वह यूनानी तथा लैटिन भाषाओं का पारंगत माना जाता था और अपना विषय पढ़ाने में विशिष्ट समझा जाता था।
ट्रिनिटी कॉलेज का एक विद्यार्थी अपने अध्ययन काल में ही एक दूसरे मैरी लैण्ड कॉलेज में प्रकृति विज्ञान का प्रोफेसर नियुक्त हो गया। वह पढ़ता भी रहा और पढ़ाता भी। नियुक्ति के समय कुछ डिग्रियां दो वर्ष के भीतर प्राप्त कर लेने की शर्त उस पर लगायी गई थी। वह उसने समय से पूर्व ही पूरी कर दी, साथ ही अपने कॉलेज की पढ़ाई भी यथावत् जारी रखी।
इसी प्रकार लेबनान के केण्टुकी नगर का माट्रिन जे. स्पैल्डिंग 14 वर्ष की आयु में प्रोफेसर बना। उन दिनों वह सेन्ट मैरीज कॉलेज में विद्यार्थी था किन्तु गणित सम्बन्धी उसकी अद्भुत प्रतिभा को देखते हुए उसे उसी कॉलेज में उस विषय के प्रोफेसर की जिम्मेदारी भी सौंप दी गई। बड़ा होने पर उसे वाल्टीमोर के आर्क विशप पद पर प्रतिष्ठित किया गया।
हालैण्ड-लेडन का जान डाइस्की पूरे 17 वर्ष का भी नहीं होने पाया था कि उसे इंग्लैण्ड के राजा किंग जेम्स प्रथम ने राजकीय धर्मोपदेशक नियुक्त किया—तब तक वह न केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ बन चुका था वरन् हिब्रू और यूनानी भाषाओं में भी प्रवीण था।
सेना में भर्ती होते समय मारक्लिस डी. नैनाजिस की आयु मात्र आठ वर्ष की थी। इतनी छोटी आयु में उसने यह प्रवेश नियमानुसार नहीं, अपनी विशिष्ट प्रतिभा का प्रमाण देकर पाया था। उसने पूरे 52 वर्ष तक फ्रांसीसी सेना में काम किया। इस बीच क्रमशः ऊंचे पदों का अधिकारी बनते-बनते फील्ड मार्शल बन गया था। इसी पद में सेवा करते-करते उसकी मृत्यु हुई। सेवा निवृत्ति के नियम उस पर लागू नहीं किये गये थे।
एक अंग्रेज कवियत्री अपनी अठारह वर्ष की आयु में ही इतनी ख्याति प्राप्त कर चुकी थी कि उस आयु में संसद सदस्यता के लिए खड़े होने पर उसे भारी बहुमत से सफलता मिली।
अमेरिकी पाल मार्फी ने स्नातकोत्तर परीक्षा ही नहीं वकालत की पदवी भी 19 वर्ष की आयु में प्राप्त कर ली थी। उन दिनों परीक्षा देने में आयु का कोई प्रतिबन्ध नहीं था इसलिए प्रवेश और उत्तीर्ण होने पर ऐतराज नहीं उठा, पर उस मासूम को डिग्री देते समय विश्वविद्यालय ने उस पर विशिष्ट प्रतिबन्ध अंकित किया कि वह 21 साल को होने तक वकालत का व्यवसाय न कर सकेगा।
इंग्लैण्ड के रोज पब्लिक स्कूल में फिलिप हैरिंघम तब विद्यार्थी ही था, पर विद्यालय की प्रबन्ध समिति ने उसे पढ़ते रहने के साथ-साथ हैडमास्टर का पद संभाल लेने के लिए भी सहमत कर लिया। तब वह मात्र 16 वर्ष का था, उसने अपनी शिक्षा जारी रखी और सौंपी गई जिम्मेदारी भी भली-भांति निबाही।
फ्रांस की ग्राण्ड असेम्बली के संसद सदस्य जीन वैप्टिस्ट टैस्टे को 13 वर्ष की आयु में ही चुन लिया गया था, उसमें उन दिनों बड़े तेजस्वी व्यक्ति ही चुने गये थे। फ्रांसीसी विद्रोह के उपरान्त वही उच्चतम शासन संस्था थी।
पैरिस की रॉयल लायब्रेरी का सर्वोच्च अधिकारी फैन्कोडसे आगस्टे को जब पदासीन किया गया तब 12 वर्ष का था। कुछ ही वर्ष बाद वयस्क होने से पूर्व उसे सम्पूर्ण पुस्तकालयों की संचालन समिति का अध्यक्ष बना दिया गया। उसका पुस्तकीय ज्ञान तथा पुस्तकों का संचालन सम्बन्धी कौशल असाधारण था।
जर्मनी के एल्डोर्फ विश्वविद्यालय का रीडर काउण्टवान पपनेहम नियुक्त हुआ तब वह 14 वर्ष का था। इसके बाद उसने सेना में प्रवेश किया और जीवन भर हर महत्वपूर्ण लड़ाई में प्रमुख पद संभालता रहा। उसने छोटी-बड़ी 101 लड़ाइयों की कमान संभाली और लड़ते-लड़ते ही शहीद हुआ।
विक्टर डी. ज्वाय जब फ्रांसीसी एकेडमी की सदस्या चुनी गई तब वे 13 वर्ष की थीं। उन्हें वाल्टेयर की कृतियां कण्ठस्थ याद थीं, यह साहित्य 36 भागों में है और उसमें तीस लाख ग्रन्थ हैं।
सिओल में एक तीन वर्षीय कोरियाई बालक जोग अंग ने कोरियाई तथा अंग्रेजी भाषा पर अधिकार प्राप्त कर लिया था। वह दोनों भाषायें धड़ल्ले से बोलता था और बिना किसी साहित्यिक त्रुटि के ठीक प्रकार लिखता था।
छपरा—बिहार में जन्मा एक सन्तोष नामक बालक जन्म के तीसरे वर्ष से ही अपनी संगीत प्रतिभा का असाधारण परिचय देने लगा था। जिन वाद्य यन्त्रों को उसने कभी देखा न था उन्हें सामने प्रस्तुत करने पर वह इस प्रकार बजाने लगा मानो उनमें वह पहले से ही पारंगत हो। इस विलक्षणता के प्रदर्शन भारत के अनेक प्रमुख नगरों में हुए, लाखों दर्शक आश्चर्यचकित रह गये।
स्वीडन के वैरान गुस्ताफ हेमफील्ड जब 14 वर्ष के थे तब यूरोप में प्रचलित 9 भाषाओं में धड़ल्ले से बोलने और लिखने लगे थे। आगे उन्होंने हिब्रू पर भी अधिकार पाया। मात्र प्रतिभा के आधार पर नहीं उनके चरित्र-चिन्तन की उत्कृष्टता को ध्यान में रखते हुए स्वीडन सरकार ने उन्हें उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश भी बनाया। ये सारी घटनायें पूर्वजन्म में व्यक्ति द्वारा क्षेत्र विशेष में किये गये प्रयास-अभ्यास की ओर इंगित करती हैं। जो प्रयास पिछले जन्म में अधूरा रह जाता है अथवा कठिन प्रयत्न के बावजूद जिसमें सफलता नहीं मिल पाती उसमें अगले जन्म में स्वल्प अभ्यास से ही ऐसी प्रतिभा विकसित होती है जिसे आश्चर्यजनक कहा जा सके। ‘तत्र तं बुद्धि संयोग लभते पौर्वदैहिकम.....’ के रूप में गीताकार ने भी इसकी ही पुष्टि की है।
ऐसे महान् पुरुषों में कुछ हैं—महान दार्शनिक सन्त सुकरात, प्लेटो, पाइथागोरस, होमर, आगस्टस, खगोलशास्त्री गैलीलियो, प्रसिद्ध कवि हेनरी वर्ड्सवर्थ, वैज्ञानिक थामस अल्वा एडीसन, वैज्ञानिक निकोलस, कोपरनिकस, विख्यात वैज्ञानिक न्यूटन, सिसरो, अलबर्ट आइन्स्टीन, टेनिसन, महात्मा टालस्टाय इत्यादि।
सुकरात ने साठ वर्ष पार करने के उपरान्त यह अनुभव किया कि बुढ़ापे की थकान और उदासी को दूर करने के लिए संगीत अच्छा माध्यम हो सकता है, अतः उन्होंने गाना सीखना आरम्भ किया और बजाना भी—यह क्रम उन्होंने मरते दम तक जारी रखा। वे 60 वर्ष की उम्र में अपने अत्यन्त महत्वपूर्ण तत्वदर्शन की विशद व्याख्या करने में भी जुटे हुए थे। यही बात प्लेटो के सम्बन्ध में भी थी, वे अपनी 80 वर्ष की आयु तक बराबर कठोर परिश्रम करते रहे। 81 वर्ष की अवस्था में हाथ में कलम पकड़े हुए उन्होंने मृत्यु का आलिंगन किया।
टेनिसन ने 80 वर्ष की परिपक्व अवस्था में अपनी सुन्दर रचना ‘क्रासिंग दी वार’ दुनिया को प्रदान की। राबर्ट ब्राउनिंग अपने जीवन के संध्याकाल में बहुत सक्रिय बने रहे। उन्होंने 77 साल की उम्र में मृत्यु के कुछ पहले ही दो सर्वसुन्दर कवितायें ‘रेवेरी’ और ‘एवीलॉग टु आसलेण्डी’ लिखीं। एच.जी. वेल्स ने 70 वर्ष की अपनी वर्षगांठ के उपरांत भी पूरे चुस्त और कर्मठ रहते हुए एक दर्जन से ऊपर पुस्तक की रचना की। सिसरो ने अपनी मृत्यु के एक वर्ष पूर्व 63 वर्ष की आयु में अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘ट्रीटाइज ऑन ओल्ड एज’ की रचना की। कीरो ने 70 साल की उम्र में ग्रीक भाषा सीखी थी। थियोसॉफी की संस्थापिका मैडम ब्लेवटस्की ने मृत्यु शैया पर ही अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ ‘सिक्रेट डॉक्ट्रिन्स’ की रचना की थी, जो कि 6 खण्डों में है। प्लूटार्क यूनान के माने हुए साहित्यकार हुए हैं, उन्होंने 75 वर्ष की आयु के बाद लैटिन भाषा पढ़नी आरम्भ की थी। इटली के प्रख्यात उपन्यासकार वोकेशियो को ढलती उम्र में साहित्यकार बनने की बात सूझी। उस ओर वह पूरी दिलचस्पी के साथ जुटे और अन्ततः मूर्धन्य कथ कार बनकर चमके। इसी प्रकार दार्शनिक फ्रेंकलिन की विश्वव्यापी ख्याति है, वे 50 वर्ष की आयु तक दर्शनशास्त्र से अपरिचित रहे। इसके प्रति रुझान इसके बाद ही जन्मा और वह उन्हें विश्व-विख्यात बनाकर ही रहा।
संसार में कुछ ऐसे भी व्यक्ति हुए हैं जिन्हें जीवन के पूर्वार्ध में विज्ञान का अक्षर ज्ञान भी नहीं था, पर जीवन यात्रा के उत्तरार्ध में उनने विज्ञान को अपनी बहुमूल्य सेवायें दीं और मूर्धन्य विज्ञानी बने। सर हेनरी स्पेलमैन अग्रगण्य विज्ञानवेत्ता हुए हैं, वे 60 वर्ष तक दूसरी तरह के काम करते रहे। इस उम्र में उन्हें वैज्ञानिक बनने की सूझी सो उन्होंने साइन्स की पुस्तकें पढ़नी आरम्भ कीं और उस दिशा में उनकी बढ़ती दिलचस्पी ने उन्हें उच्चकोटि की वैज्ञानिक सफलतायें प्रदान कीं।
अनेक भारतीय मनीषियों- विद्वानों ने भी जीवन के अन्तिम पड़ाव में ऐसी प्रतिभा का परिचय दिया है। बाण भट्ट ने अपनी अमर कृति ‘कादम्बरी’ का सृजन जीवन के अन्तिम दिनों में ही आरम्भ किया था और उसे अधूरा छोड़कर चल बसे थे। बाद में उनके बेटे ने उस कार्य को पूरा किया। कालिदास की रुचि जीवन के उत्तरार्ध में ही साहित्य क्षेत्र में बढ़ी थी। आदि कवि कहलाने का सौभाग्य महर्षि बाल्मीकि ने अपनी प्रौढ़ावस्था में ही प्राप्त किया था। छायावाद के जनक कहलाने वाले कवि जयशंकर प्रसाद की जब मृत्यु हुई तो वे ‘इरावती’ नामक उपन्यास लिखने में जुटे हुए थे। जीवन के अन्तिम चरण में विनोबा चीनी भाषा सीख रहे थे। संस्कृत के पारंगत सातवलेकर जब 75 वर्ष के थे तब वेदों का भाष्य आरम्भ किया और सारे आर्षग्रंथों का सटीक अनुवाद कर ‘जीवेम् शरदः शतम्’ की उक्ति सार्थक की।
पश्चिम एवं भारत के ये कुछ ऐसे मनीषी, विद्वान, वैज्ञानिक थे जिनकी रचनात्मक शक्ति का ह्रास उनकी ढलती उम्र के कारण कतई नहीं हुआ था और जिन्होंने अपने बुढ़ापे में भी बड़े महत्वपूर्ण एवं उपयोगी काम करके मानवता की अपूर्व सेवा की, पर देश-विदेश में ऐसी प्रतिभायें सिर्फ साहित्य क्षेत्र में ही पैदा नहीं हुई। राजनीति क्षेत्र में भी अनेक ऐसे नक्षत्र जन्मे जो वृद्धावस्था के बावजूद राजनीति में अपना वर्चस्व बनाये रहे। महात्मा गांधी, विंस्टन चर्चिल, बेंजामिन, फ्रैंकलिन, डिजरैली, ग्लेडस्टोन आदि ऐसे ऐतिहासिक पुरुष हैं जो अपनी वृद्धावस्था की चुनौतियों के बावजूद बहुत सक्रिय बने रहे। अपने देश की अमूल्य सेवा में वे अनवरत रूप से लगे रहे।
मूर्धन्य वैज्ञानिक सापेक्षवाद के आविष्कारक आइन्स्टीन विद्यार्थी जीवन में मन्द बुद्धि माने जाते थे। एक दिन उन्हें विद्यालय से निष्कासित भी कर दिया गया, कारण था क्लास में हाजिर जवाबी का अभाव। विषयों-प्रश्नों की गहराई में वे इस हद तक चले जाते थे कि उत्तर तुरन्त नहीं सूझता था। अध्यापक तथा विद्यार्थीगण इसी कारण उनकी क्षमता का मूल्यांकन नहीं कर पाते, पर सभी जानते हैं कि आरम्भ में मन्दबुद्धि समझा जाने वाले यह बालक इतिहास प्रसिद्ध वैज्ञानिक बना—जिसकी बुद्धि का लोहा सभी मानते हैं।
विलक्षण प्रतिभा के ऐसे अगणित प्रमाण मिले हैं जिनका कोई सीधा सम्बन्ध बुद्धिलब्धि (इन्टेलीजेन्स क्वोसेण्ट) से नहीं है। वह मान्यता भी पुरानी पड़ती जा रही है कि प्रतिभा प्रकृति प्रदत्त एक स्थायी जन्मजात अनुदान है। ‘इन्टेलीजेन्स कैन वी टॉट’ पुस्तक के लेखक आर्थर लिण्डा के अनुसार कई व्यक्तियों में उनके जीवन के दौरान आई.क्यू. स्तर बढ़ता देखा गया है जबकि स्कूल में आई.क्यू. परीक्षण के आधार पर अति मेधावी घोषित छात्र आगे चलकर निष्फल सिद्ध हुए हैं। प्रतिभा के मनोवैज्ञानिक परीक्षणों को चुनौती देने वाले ऐसे उदाहरण भी हैं जो बताते हैं कि यह पद्धति कितनी अपूर्ण और एकांगी है। मन्द बुद्धि घोषित पर अद्भुत मेधा सम्पन्न व्यक्तियों के प्रमाण इस क्षेत्र में नये सिरे से सोचने तथा अनुसंधान करने की प्रेरणा देते हैं।
न्यूयार्क में 1939 में भ्रूण के परिपक्व होने के तीन माह पूर्व जुड़वे बच्चों ने जन्म लिया। नाम पड़ा चार्ल्स और जार्ज। तीन वर्ष की आयु में उनका बौद्धिक परीक्षण किया गया, परीक्षण कर्त्ताओं ने उन्हें मन्दमति का घोषित किया। इनकी आई.क्यू. 60 से 70 के बीच थी जो सामान्य से भी कम थी। न्यूयार्क स्टेट साइकेट्रिक इन्स्टीट्यूट के डॉ. विलियम हार्विज ने सन् 1963 में इस युग्म का परीक्षण किया। उन्हें इनमें विलक्षणता का आभास मिला, उन्होंने जार्ज से एक जन्म तिथि बताकर उस पर पड़े दिन उस क्रम में आगे पड़ने वाले विभिन्न तारीखों तथा दिनों का ब्यौरा पूछा। कुछ ही सैकिण्ड में उसने सही-सही विवरण प्रस्तुत कर दिया, सैकड़ों हजारों वर्ष पूर्व अमुक दिन को कौन सी तारीख तथा माह था—पूछे जाने पर बिना अधिक समय लगाये चार्ल्स तथा जार्ज दोनों ही बताते थे। आने वाले सैकड़ों वर्षों बाद की जानकारियां भी शत-प्रतिशत सही देते थे जबकि उन्हें कैलेन्डर के नियमों का कुछ भी ज्ञान न था। लम्बे समय तक डॉ. हार्विज कारणों की खोज-बीन करते रहे, पर विलक्षणता का रहस्योद्घाटन न हो सका। अन्ततः वे यह कहकर चुप हो गये कि—‘प्रतिभा के अविज्ञान स्रोत मानव मस्तिष्क में विद्यमान हैं—जिसकी कोई जानकारी विज्ञान एवं मनोविज्ञान को नहीं है।’
इंग्लैण्ड का जेडेदिया बक्सन नामक व्यक्ति भी चार्ल्स-जार्ज की तरह की अद्भुत मेधा का धनी था। बचपन में वह इतना मूर्ख समझा जाता था कि उसके माता-पिता ने पढ़ाना भी उचित न समझा। अक्षर ज्ञान की भी उसे शिक्षा न मिली, पर आश्चर्य यह कि कुछ ही वर्षों बाद वह गणित के जटिल प्रश्नों को हल करने लगा। उसकी स्मृति विलक्षण थी, एक बार वह थियेटर में ड्रामा देख रहा था। एक घण्टे के भीतर अभिनेता ने जितने सम्वाद बोले, उनके शब्दों की सही संख्या तथा नर्तकी द्वारा नृत्य में उठाये गये कदमों की कुल संख्या बताकर उसने सबको आश्चर्यचकित कर दिया। जुबान पर सभी सम्वाद ऐसे रटे जान पड़ रहे थे कि उनका पूर्ववत् अभ्यास किया गया हो। प्रामाणिकता की परीक्षा कितनी ही बार विशेषज्ञों द्वारा की गयी, पर हर बार उन्हें ‘बक्सन’ की प्रतिभा का लोहा मानना पड़ा। एक बार उसे 365, 365, 365, 365, 365 जैसी संख्या का एक साथ गुणा करने को दिया गया। एक मिनट में ही उसने सही गुणा करके सबको हैरत में डाल दिया। उल्लेखनीय बात यह थी कि उसे गणित के आधुनिक नियमों का आरम्भिक ज्ञान तक न था।
अपने परीक्षण के दौरान डॉ. डी.सी. रीफ् तथा एल. एच. स्नीडर ने एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण प्रस्तुत किया जो 4 अंकों के वर्गमूल तथा 6 अंकों के घनमूल को क्रमशः चार सैकिण्ड तथा छह सैकिण्ड में हल कर देता था। यह घटना सन् 1931 की है।
1970 में डेविड एस. विस्कोट नामक एक विद्वान ने बोस्टन की एक महिला हैरियट का अध्ययन किया। वह विलक्षण प्रतिभा की धनी निकली। मोजार्ट, बीथोवियन स्कवर्ट, डेबूसी, प्रोकोफियेव वर्डी जैसे विश्वविख्यात तथा अन्य भी अगणित संगीतज्ञों के समकक्ष उन्हीं जैसी हैरियट संगीत की धुनें निकाल लेती थी। आश्चर्य की बात यह है कि उसने संगीत का कभी अभ्यास नहीं किया था, न ही उसे लय, ताल, स्वर, रागनियों का ही कुछ ज्ञान ही था।
जॉन वॉन न्यूमेन नामक विद्वान को मूर्धन्य गणितज्ञ की पदवी मिली है। वह कठिन गणित के प्रश्नों का उत्तर बिना गुणा-भाग किये, बिना किसी यन्त्र का प्रयोग किये देने के लिए विख्यात है। यूरोपीय विद्वान समय-समय पर उनसे गणित की समस्याओं पर विचार विमर्श करने आते रहते हैं। भारत की सुप्रसिद्ध शकुन्तला देवी की तरह अमरीकी चीफ जस्टिस चार्ल्स इवान ह्य जेश के मस्तिष्क को भी इलेक्ट्रानिक कम्प्यूटर माना जाता है। एक बार उन्होंने अपने स्टेनोग्राफर को एक भाषण दो घण्टे बाद उसे बिना पढ़े ही, बिना एक भी गलती किये क्रमबद्ध दुहरा दिया, उनकी अद्भुत मेधा अमरीका में चर्चा का विषय है।
वैज्ञानिक क्षेत्र में मस्तिष्क की विलक्षणताओं के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार की अटकलें लगायी जा रही है। कुछ वैज्ञानिक इसका सम्बन्ध मस्तिष्क के प्रोटोन रसायन से जोड़ते हैं। कुछ का मत है कि मस्तिष्क के अन्तराल में कम्प्यूटर जैसी कोई अविज्ञात प्रणाली भी कार्यरत है। दूसरी ओर पेलो अल्टो सकूल ऑफ प्रोफेशनल साइकोलॉजी के डॉ. टी.एल. ब्रोंक ने प्रतिभा का सम्बन्ध मस्तिष्क के वाम भाग से जोड़ते हुए कहा है कि यह क्षेत्र असीम संभावनाओं का छुपा भण्डार है, जिसका अध्ययन गम्भीरतापूर्वक करना होगा।
वैज्ञानिकों की अटकलों तथा मनोवैज्ञानिक क्षेत्र के प्रयोग-परीक्षणों से निकले निष्कर्षों के आधार पर मानसिक प्रतिभा के कारणों की स्पष्ट व्याख्या कर सकना मुश्किल है। बुद्धि विश्लेषण एवं प्रखरता के निर्धारण के लिए बनाये गये बुद्धिलब्धि जैसे माप-दण्ड अत्यन्त बौने सिद्ध होते हैं। यथार्थता यह है कि इन परीक्षणों से बुद्धि चातुर्य का प्रत्यक्ष स्थूल पक्ष ही पकड़ में आता है। इन्टेलीजेन्स का वह पक्ष जो महान तथा महत्वपूर्ण आविष्कारों का जन्मदाता है—किसी भी तरह इन परीक्षणों की सीमा में आ नहीं पाता। सशक्त कल्पनाओं, प्रखर विचारों का इनसे परिचय नहीं प्राप्त किया जा सकता। हिमनदों में बर्फ के शिलाखण्डों का तीन चौथाई हिस्सा पानी के भीतर डूबा रहता है एक चौथाई ऊपर दिखाई पड़ता है। प्रतिभा की भी लगभग ऐसी ही स्थिति होती है। एक मोटा और अत्यन्त छोटा पक्ष ही बुद्धि का व्यक्त रूप में सामने आता है, उसी को लेकर मनुष्य अपने दैनन्दिन जीवन के क्रिया-कलापों को गतिशील रखता है। अधिकांश भाग तो प्रसुप्त स्थिति में दबा पड़ा है तथा उपयोग में नहीं आ पाता है।
जन्मजात प्रतिभा की विलक्षणता का कुछ सुनिश्चित कारण मनःशास्त्री तथा न्यूरोलॉजिस्ट नहीं बता पाते। आनुवांशिकी से जोड़े जाने वाले तीर-तुक्कों की भी अब सटीक संगति नहीं बैठती। आनुवंशिकी के नियमों को झुठलाने वाले विपरीत तथ्य एवं प्रमाण भी देखे जाते हैं। मूर्ख माता-पिता से मेधावी तथा मेधावी के मूर्ख पैदा होने के उदाहरण भी समय-समय पर मिलते हैं। सबसे अधिक रहस्यमय तथा चौंकाने वाली वे घटनायें होती हैं जिनमें बिना शिक्षण प्राप्त किये विशिष्ट स्तर की प्रतिभा किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में अकस्मात उभरती दिखायी पड़ती है। आश्चर्य तो तब होता है जब चिर-प्रयत्न के बाद भी प्रौढ़ों में वैसी विशिष्टता देखने को नहीं मिलती जो बालकों में अनायास ही प्रकट हो जाती है। कई बार ऐसी घटनाओं में पूर्वजन्मों के संचित संस्कार भी कारण हो सकते हैं।
वस्तुतः मनुष्य अपने जीवन में, किसी क्षेत्र विशेष में सफल होने का भरपूर प्रयत्न करता है। अधिकांश में उसे सफलता मिलती भी है, उस विषय विशेष में वह मर्मज्ञ भी बन जाता है, पर कई बार लाख प्रयत्न के बावजूद भी वह अपनी मेहनत के अनुरूप योग्यता विकसित नहीं कर पाता। इसका यह अर्थ कदापि नहीं समझा जाना चाहिए कि उसका इस जीवन का प्रयास सर्वथा निरर्थक गया। वस्तुतः ऐसे ही पुरुषार्थ अगले जन्म में प्रतिभा बनकर प्रकट होते और लोगों को हैरत में डालते हैं—आये दिन ऐसी घटनायें प्रकाश में आती रहती हैं।
जापान के हनावा होकाइशी अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण ज्ञान के अवतार कहे जाते थे। सन् 1722 में जन्म लेकर 101 वर्ष की अवस्था में सन् 1823 में मरने वाले हनावा की 7 की उम्र में नेत्र ज्योति चली गयी थी। नेत्रहीन होकर भी उन्होंने 40 हजार से अधिक पुस्तकें पढ़ डालीं, उनके मस्तिष्क में ज्ञान का असीम भण्डार जमा हो गया था। मित्रों के आग्रह पर मस्तिष्क में संचित ज्ञान भण्डार को जब पुस्तक के रूप में छापा गया तो उसके 2820 खण्ड बने।
स्काटलैंड के जेम्स क्रिस्टल ने 12 वर्ष की अल्पायु में ही अरबी, ग्रीक, यहूदी तथा फ्लैमिश सहित विश्व की 12 भाषायें सीख ली थीं।
फ्रांस में जन्मे लुईस कार्डक 4 वर्ष की आयु में अंग्रेजी, फ्रांसीसी, जर्मन तथा अन्य यूरोपीय भाषायें बोल लेते थे। जब वे 6 माह के थे तभी से बाइबिल पढ़ने लगे थे, 6 वर्ष के हुए तो गणित, इतिहास, भूगोल के प्रकाण्ड पंडित बन गये।
ब्लेट्स पास्कल ने 12 वर्ष की अवस्था में ध्वनि शास्त्र पर निबन्ध लिखकर सारे फ्रांस को आश्चर्य में डाल दिया था।
जॉन फिलिप बराटियर को 14 वर्ष की आयु में ही डॉक्टर आफ फिलॉसफी की उपाधि मिल गई। उनकी स्मरण शक्ति इतनी तीव्र थी कि जो पढ़ते-सुनते उन्हें याद हो जाता उसे बाद में हूबहू वैसा ही सुना देते।
पेरिस विश्व विद्यालय के इतिहास में सबसे छोटी आयु 16 वर्ष का प्रोफेसर डिनेस ली फेवे रहा है। वह यूनानी तथा लैटिन भाषाओं का पारंगत माना जाता था और अपना विषय पढ़ाने में विशिष्ट समझा जाता था।
ट्रिनिटी कॉलेज का एक विद्यार्थी अपने अध्ययन काल में ही एक दूसरे मैरी लैण्ड कॉलेज में प्रकृति विज्ञान का प्रोफेसर नियुक्त हो गया। वह पढ़ता भी रहा और पढ़ाता भी। नियुक्ति के समय कुछ डिग्रियां दो वर्ष के भीतर प्राप्त कर लेने की शर्त उस पर लगायी गई थी। वह उसने समय से पूर्व ही पूरी कर दी, साथ ही अपने कॉलेज की पढ़ाई भी यथावत् जारी रखी।
इसी प्रकार लेबनान के केण्टुकी नगर का माट्रिन जे. स्पैल्डिंग 14 वर्ष की आयु में प्रोफेसर बना। उन दिनों वह सेन्ट मैरीज कॉलेज में विद्यार्थी था किन्तु गणित सम्बन्धी उसकी अद्भुत प्रतिभा को देखते हुए उसे उसी कॉलेज में उस विषय के प्रोफेसर की जिम्मेदारी भी सौंप दी गई। बड़ा होने पर उसे वाल्टीमोर के आर्क विशप पद पर प्रतिष्ठित किया गया।
हालैण्ड-लेडन का जान डाइस्की पूरे 17 वर्ष का भी नहीं होने पाया था कि उसे इंग्लैण्ड के राजा किंग जेम्स प्रथम ने राजकीय धर्मोपदेशक नियुक्त किया—तब तक वह न केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ बन चुका था वरन् हिब्रू और यूनानी भाषाओं में भी प्रवीण था।
सेना में भर्ती होते समय मारक्लिस डी. नैनाजिस की आयु मात्र आठ वर्ष की थी। इतनी छोटी आयु में उसने यह प्रवेश नियमानुसार नहीं, अपनी विशिष्ट प्रतिभा का प्रमाण देकर पाया था। उसने पूरे 52 वर्ष तक फ्रांसीसी सेना में काम किया। इस बीच क्रमशः ऊंचे पदों का अधिकारी बनते-बनते फील्ड मार्शल बन गया था। इसी पद में सेवा करते-करते उसकी मृत्यु हुई। सेवा निवृत्ति के नियम उस पर लागू नहीं किये गये थे।
एक अंग्रेज कवियत्री अपनी अठारह वर्ष की आयु में ही इतनी ख्याति प्राप्त कर चुकी थी कि उस आयु में संसद सदस्यता के लिए खड़े होने पर उसे भारी बहुमत से सफलता मिली।
अमेरिकी पाल मार्फी ने स्नातकोत्तर परीक्षा ही नहीं वकालत की पदवी भी 19 वर्ष की आयु में प्राप्त कर ली थी। उन दिनों परीक्षा देने में आयु का कोई प्रतिबन्ध नहीं था इसलिए प्रवेश और उत्तीर्ण होने पर ऐतराज नहीं उठा, पर उस मासूम को डिग्री देते समय विश्वविद्यालय ने उस पर विशिष्ट प्रतिबन्ध अंकित किया कि वह 21 साल को होने तक वकालत का व्यवसाय न कर सकेगा।
इंग्लैण्ड के रोज पब्लिक स्कूल में फिलिप हैरिंघम तब विद्यार्थी ही था, पर विद्यालय की प्रबन्ध समिति ने उसे पढ़ते रहने के साथ-साथ हैडमास्टर का पद संभाल लेने के लिए भी सहमत कर लिया। तब वह मात्र 16 वर्ष का था, उसने अपनी शिक्षा जारी रखी और सौंपी गई जिम्मेदारी भी भली-भांति निबाही।
फ्रांस की ग्राण्ड असेम्बली के संसद सदस्य जीन वैप्टिस्ट टैस्टे को 13 वर्ष की आयु में ही चुन लिया गया था, उसमें उन दिनों बड़े तेजस्वी व्यक्ति ही चुने गये थे। फ्रांसीसी विद्रोह के उपरान्त वही उच्चतम शासन संस्था थी।
पैरिस की रॉयल लायब्रेरी का सर्वोच्च अधिकारी फैन्कोडसे आगस्टे को जब पदासीन किया गया तब 12 वर्ष का था। कुछ ही वर्ष बाद वयस्क होने से पूर्व उसे सम्पूर्ण पुस्तकालयों की संचालन समिति का अध्यक्ष बना दिया गया। उसका पुस्तकीय ज्ञान तथा पुस्तकों का संचालन सम्बन्धी कौशल असाधारण था।
जर्मनी के एल्डोर्फ विश्वविद्यालय का रीडर काउण्टवान पपनेहम नियुक्त हुआ तब वह 14 वर्ष का था। इसके बाद उसने सेना में प्रवेश किया और जीवन भर हर महत्वपूर्ण लड़ाई में प्रमुख पद संभालता रहा। उसने छोटी-बड़ी 101 लड़ाइयों की कमान संभाली और लड़ते-लड़ते ही शहीद हुआ।
विक्टर डी. ज्वाय जब फ्रांसीसी एकेडमी की सदस्या चुनी गई तब वे 13 वर्ष की थीं। उन्हें वाल्टेयर की कृतियां कण्ठस्थ याद थीं, यह साहित्य 36 भागों में है और उसमें तीस लाख ग्रन्थ हैं।
सिओल में एक तीन वर्षीय कोरियाई बालक जोग अंग ने कोरियाई तथा अंग्रेजी भाषा पर अधिकार प्राप्त कर लिया था। वह दोनों भाषायें धड़ल्ले से बोलता था और बिना किसी साहित्यिक त्रुटि के ठीक प्रकार लिखता था।
छपरा—बिहार में जन्मा एक सन्तोष नामक बालक जन्म के तीसरे वर्ष से ही अपनी संगीत प्रतिभा का असाधारण परिचय देने लगा था। जिन वाद्य यन्त्रों को उसने कभी देखा न था उन्हें सामने प्रस्तुत करने पर वह इस प्रकार बजाने लगा मानो उनमें वह पहले से ही पारंगत हो। इस विलक्षणता के प्रदर्शन भारत के अनेक प्रमुख नगरों में हुए, लाखों दर्शक आश्चर्यचकित रह गये।
स्वीडन के वैरान गुस्ताफ हेमफील्ड जब 14 वर्ष के थे तब यूरोप में प्रचलित 9 भाषाओं में धड़ल्ले से बोलने और लिखने लगे थे। आगे उन्होंने हिब्रू पर भी अधिकार पाया। मात्र प्रतिभा के आधार पर नहीं उनके चरित्र-चिन्तन की उत्कृष्टता को ध्यान में रखते हुए स्वीडन सरकार ने उन्हें उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश भी बनाया। ये सारी घटनायें पूर्वजन्म में व्यक्ति द्वारा क्षेत्र विशेष में किये गये प्रयास-अभ्यास की ओर इंगित करती हैं। जो प्रयास पिछले जन्म में अधूरा रह जाता है अथवा कठिन प्रयत्न के बावजूद जिसमें सफलता नहीं मिल पाती उसमें अगले जन्म में स्वल्प अभ्यास से ही ऐसी प्रतिभा विकसित होती है जिसे आश्चर्यजनक कहा जा सके। ‘तत्र तं बुद्धि संयोग लभते पौर्वदैहिकम.....’ के रूप में गीताकार ने भी इसकी ही पुष्टि की है।

