समृद्धि भी अनिवार्य, पर उपार्जन नीतियुक्त हो
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जनमानस में एक भ्रान्ति यह बैठी हुई है कि नीति और ईमानदारी के मार्ग पर चलने वाला भौतिक दृष्टि से घाटे में रहता है, जबकि बेईमानी-अनीति की आड़ में अधिक कमाया जा सकता है। यह प्रतिपादन उन अदूरदर्शी व्यक्तियों का है, जो भौतिक प्रगति के शाश्वत नियमों से अपरिचित है अथवा बेईमानी को लाभदायक ठहराने का समर्थन वे करते हैं, जो आलसी और प्रमादी हैं। कठोर श्रम से जी चुराते हैं। ऐसे व्यक्ति सम्पन्नता हासिल करने के लिए ‘शार्टकट’ के रूप में बेईमानी को ही आदर्श बना लेते हैं और यह कहते फिरते हैं कि आज न तो ईमानदारी का युग रहा है और न ही ईमानदार व्यक्तियों का। सचमुच ही ऐसे व्यक्तियों को दूरदर्शी ही कहा जायगा।
यह तथ्य भली-भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिए कि मात्र करते रहने भर से—बेईमानदारी की बातों का समर्थन भर करने से अभीष्ट परिणाम में सफलता नहीं मिल जाती। प्रामाणिकता, श्रमनिष्ठा तथा कार्य कुशलता भौतिक प्रगति के लिए आवश्यक विशेषतायें ईमानदारी के अभिन्न अंग हैं। जहाँ कहीं भी-जिस भी दिशा में इनका प्रयोग किया जायेगा, चमत्कारी परिणाम निकलेंगे और समृद्धि का पथ−प्रशस्त होगा। बाजार में निकलते ही हर व्यक्ति ऐसी दुकान की खोजबीन करता है जहाँ वस्तुएँ सही कीमत पर टिकाऊ और अच्छे स्तर की मिलें। ऐसी ही दुकानें चलती भी हैं जहाँ वस्तुएँ प्रामाणिक एवं उचित कीमत पर मिलती हैं। कितने ही दुकानों के नाम—टाइटिल लाखों-करोड़ों रुपयों में बिक जाते हैं। इसका कारण दुकानदार द्वारा उपार्जित की गई प्रामाणिकता की वह ‘साख’ होती है जो ‘टाइटिल’ के खरीददार के लिए विशेष लाभकारी सिद्ध होती है।
ईमानदारी का मार्गावलम्बन व्यक्ति और समाज दोनों ही के लिए लाभप्रद है, इस सत्य को समाजशास्त्र एवं अर्थशास्त्र के नियमों द्वारा भी समझा जा सकता है। घटिया स्तर की अनुचित कीमत पर वस्तुएँ बेचने वाले दुकानदार अथवा निर्यात करने वाली फर्मे कुछ समय तक ही दूसरों को धोखा दे सकती हैं। ठगे गए व्यक्ति उनसे दुबारा वस्तुएँ नहीं खरीदते जबकि अपनी प्रामाणिकता का सिक्का जमा लेने वालों की बिक्री दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है। इस तरह बेईमान दुकानदार जहाँ अधिक कीमत लेकर सीमित वस्तुओं की बिक्री कर पाता है, उचित लाभांश लेने वाला ईमानदार दुकानदार अधिक बेच लेता है और कुल आर्थिक लाभ की दृष्टि से नफे में रहता है। उसे अतिरिक्त फायदा यह होता है कि ग्राहकों की संख्या बढ़ती जाती है। प्रकारान्तर से उसे समाज सेवा एवं देश सेवा का श्रेय भी मिल जाता है। उचित कीमत पर प्रामाणिक एवं ऊँचे स्तर की वस्तुएँ समाज को उपलब्ध करा देना एक व्यवसाय होते हुए भी समाज सेवा ही कही जायेगी। किसी भी देश की भौतिक प्रगति भी इस बात पर अवलम्बित है कि देश में उत्पादन का स्तर कैसा है तथा उनमें कितनी अधिक प्रामाणिकता जुड़ी हुई है। इस तरह ईमानदारी के अवलम्बन पर ही व्यक्ति समाज और राष्ट्र तीनों ही की प्रगति एवं समुन्नति निर्भर करती है। इस तथ्य की जितनी उपेक्षा होगी वह समाज एवं देश उतना ही पिछड़ जाएगा।
व्यक्ति, समाज और राष्ट्र तीनों ही की प्रगति में ईमानदारी कितनी अधिक लाभकारी हो सकती है इसे एक छोटे से देश जापान में देखा जा सकता है। 11 करोड़ की जनसंख्या तथा 1,43,574 वर्गमील के क्षेत्रफल वाले इस देश को द्वितीय विश्वयुद्ध ने बर्बाद कर दिया था। देश की आर्थिक व्यवस्था चरमरा सी गई थी। पर अपने कठोर पुरुषार्थ द्वारा मात्र तीन दशकों में ही जापान विश्व के मूर्धन्य सम्पन्न राष्ट्रों में जा खड़ा हुआ है। विश्व बाजार में दिनोंदिन जापान की साख देशवासियों की श्रमनिष्ठा एवं प्रामाणिकता के कारण बढ़ती ही जा रही है। अन्तर्राष्ट्रीय साझा बाजार में सर्वाधिक माँग एवं खपत जापान की विनिर्मित वस्तुओं की है। यह ख्याति उसे यों ही नहीं मिली वरन् उसने इसके लिए पूरी-पूरी कीमत चुकाई है। विश्व के मूर्धन्य व्यवसायिक राष्ट्रों के विशेषज्ञों न जापान की व्यापारिक एवं आर्थिक सफलता का रहस्योद्घाटन करने पर एक ही तथ्य पाया कि उनकी श्रमनिष्ठा एवं ईमानदारी ही बढ़ती हुई लोकप्रियता का प्रमुख कारण है।
दूसरे महायुद्ध के बाद लड़खड़ाई औद्योगिक स्थिति को पुनः स्थापित करने के लिए वहाँ के व्यापारियों एवं उद्योगपतियों ने विश्वभर के पेटेण्ड्स तथा टेक्नालाजियों को छान मारा। लक्ष्य था—कम से कम कीमत पर बढ़िया स्तर की टिकाऊ वस्तुएँ किस तरह विनिर्मित की जा सकती हैं? जापानवासी हर नई सर्वोत्तम तकनीकी को सीखने—जानने के लिए सदा उत्सुक एवं तत्पर रहते हैं। उनके क्रियान्वयन के लिए वे कठोर श्रम करते हैं। व्यक्तियों की उन्नति समाज की सामूहिक उन्नति पर निर्भर है, हर व्यक्ति का यह सुदृढ़ विश्वास है। मूर्धन्य व्यवसाइयों एवं उद्योगपतियों की नीति अपने देश की भाँति यह नहीं रहती कि शेयर होल्डरों को कितना अधिक लाभांश किया जा सकता है। अपितु यह रहती है कि लम्बे समय तक बाजार में तथा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अपनी व्यवसायिक प्रतिष्ठा कैसे कायम रखी जा सकती है। इसके लिए वे वस्तुओं का स्तर बढ़ाने, सुन्दर एवं टिकाऊ बनाने के लिये हर सम्भव प्रयास करते हैं। लाभांश कम से कम लेने से वस्तुओं की माँग विश्व बाजार में अधिक होगी यह ध्यान रखते हुए ही उनके मूल्य का निर्धारण किया जाता है। विनिर्मित वस्तुओं का ‘क्वालिटी कन्ट्रोल’ जापान का प्रमुख लक्ष्य है। हर कर्मचारी, हर मजदूर—अपना नैतिक कर्तव्य मानता है और उसके लिये तन-मन से प्रयत्नशील रहता है।
अपनी तकनीकी विशेषताओं के लिए कभी अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैण्ड, जर्मनी जैसे देश विश्वविख्यात थे। वे अधिक से अधिक वस्तुओं का निर्यात भी करते थे। अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में इन्हीं का पहले बोलबाला था किन्तु जापान ने इन सभी औद्योगिक राष्ट्रों को अब पीछे धकेल दिया है। स्वस्थ व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा में वह सबसे आगे निकल गया है। स्थिति यहाँ तक जा पहुँची है कि उपरोक्त देशों में विनिर्मित वस्तुओं की माँग एवं निर्यात कम हो जाने से उनकी आर्थिक व्यवस्था लड़खड़ा गई है। अमेरिका एवं ब्रिटेन जैसे औद्योगिक देशों में भी जापान में बनी वस्तुओं की माँग निरन्तर बढ़ती जा रही है। एक आंकड़े के अनुसार अकेले अमेरिका में प्रतिदिन छह हजार जापानी मोटर गाड़ियों का आयात होता है। अमेरिकी कार बाजार में जापान 23 प्रतिशत का साझीदार है। बेल्जियम के एक तिहाई बाजार पर जापान ने कब्जा कर रखा है। ‘ग्रेट ब्रिटेन’ तथा स्वीडेन का हर छह गाड़ियों में से एक जापानी है। टोयोटा, माजदा, होंडा जैसी मोटर गाड़ियों की माँग जापान से विश्वभर में बढ़ती जा रही है।
अन्य छोटी-छोटी जापान की बनी वस्तुएँ सर्वोत्तम एवं सर्वाधिक प्रामाणिक मानी जा रही है। टेलीविजन, कैमरा, मोटर पार्टस्, मशीनें, घड़ियाँ तथा इलेक्ट्रानिक्स के सामान निर्यात करने में जापान अग्रणी है। विश्व का कोई भी देश ऐसा नहीं है जो स्तर की दृष्टि से जापान का मुकाबला कर सके। कम कीमत और ऊँचे स्तर के कारण ही यूरोपीय आर्थिक समुदाय के द्वारा जापान प्रति दिन सात लाख टेलीविजन सैट बेचता है। प्रति वर्ष अकेले पश्चिम जर्मनी लगभग 15 लाख टेलीविजन सैट जापान से आयात करता है। उल्लेखनीय है कि कभी पश्चिम जर्मनी इन वस्तुओं के निर्यात के लिए विश्वविख्यात था। यूरोपीय साझा बाजार के पर्यवेक्षण से प्राप्त एक रिपोर्ट के अनुसार यूरोप देश 60 प्रतिशत मशीनें जापान से खरीदते हैं। वर्ष 1980 में यूरोप में जापानी मोटर गाड़ियों की माँग कुल खपत की 5 प्रतिशत थी अब वह 25 प्रतिशत जा पहुँची है। कई यूरोपीय देशों ने तो अपनी औद्योगिक स्थिति सन्तुलित बनाये रखने के लिए अब जापानी सामानों के आयात पर कड़ा प्रतिबन्ध लगाना आरम्भ कर दिया है। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा में भाग लेने वाले कितने ही पश्चिमी व्यापारियों ने जापान की बढ़ती ख्याति को देखकर उसे ‘जायन्ट कार्टेल’—कहकर पुकारना आरम्भ कर दिया है। इस वाक्य का अर्थ यह है कि समूचे विश्व के उद्योग तन्त्र पर जापान हावी होता जा रहा है तथा उससे प्रतियोगिता करना असम्भव है।
यूरोपीय आर्थिक समुदाय जापान की बढ़ती लोकप्रियता से चिन्तित हो उठा है। कारण यह है कि जापान स्वयं तो वस्तुओं का दूसरा देशों से कम से कम आयात करता है पर अपनी वस्तुओं का अधिक से अधिक निर्यात विकसित औद्योगिक देशों को भी करने लगा है जिनकी कीमत तो कम होती ही है, उनका स्तर भी अधिक उत्तम होता है अपेक्षाकृत उन देशों में बनने वाली वस्तुओं के। इस तरह इन देशों द्वारा उत्पादित सामानों की तुलना में वे ही वस्तुएँ आयातित जापानी सामानों की गुणवत्ता एवं कम कीमत के कारण अधिक लोकप्रिय बन रही है।
अपने कठोर श्रम एवं बेमिसाल ईमानदारी के कारण जापान ने मात्र तीन दशकों से कुछ ही अधिक वर्षों में ही असाधारण भौतिक प्रगति की है। सामूहिक प्रगति में—देश की उन्नति में अपनी भी उन्नति सन्निहित है। जापान वासियों ने इस तथ्य को भली-भाँति समझा और उसके लिए प्रयत्न किया है। काम के प्रति अटूट निष्ठा और ईमानदारी का अवलम्बन ही समाज एवं देश की प्रगति का स्थाई आधार है, इस सत्य को जापान वासियों ने पूरी तरह साकार कर दिखाया है, परिणाम सामने है। हर व्यक्ति की व्यक्तिगत आय भी बढ़ी है। द्वितीय महायुद्ध के बाद जापान के लिये भोजन एवं वस्त्र की व्यवस्था जुटा पाना भी कठिन पड़ रहा था। आज प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 5 हजार डालर है। समृद्धि के साथ-साथ अपनी प्रामाणिकता के कारण जापान ने असाधारण ख्याति अर्जित की है।
देश ही नहीं विश्व के मूर्धन्य समृद्ध व्यक्ति भी अपनी ईमानदारी के कारण ही आगे बढ़े हैं। टाटा, बाटा, फोर्ड, रॉकफेलर जैसे विश्व के विख्यात उद्योगपतियों ने प्रामाणिकता एवं श्रमशीलता को अपना अभिन्न सहचार बनाया और क्रमश; भौतिक क्षेत्र में आगे बढ़े। आज भी भौतिक सफलता के ये सिद्धान्त शाश्वत हैं। प्रगति का मार्ग हर किसी के लिए खुला पड़ा है बशर्ते कि वह कीमत चुकाने के लिए तैयार हो।
बेईमानी के शार्टकट द्वारा सम्पन्न बनने की अदूरदर्शिता हर दृष्टि से हानिकारक है। ऐसे व्यक्ति नीति-अनीति का भी ध्यान नहीं रखते। एक बार में ही अधिक कमाने की ललक उनसे कितने ही ऐसे कृत्य करा देती है जिन्हें अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है। मिलावट के धन्धे के कारण कितने ही निरपराधों को जीवन तक से हाथ धोना पड़ता है। अन्ततः लाभ उनका भी नहीं होता। अप्रामाणिकता की पोल खुलते ही हर व्यक्ति उनसे घृणा करता है और एक न एक दिन व्यवसाय ठप्प पड़ जाता है। यही बात अधिक कीमत लेने वाले वस्तुओं के निर्माण का रास्ता गिराने वाले के साथ लागू होती है। भौतिक क्षेत्र में स्थायी रूप से वे ही आगे बढ़ते हैं जो प्रामाणिक तथा ईमानदार हैं—श्रमशीलता जिनका आदर्श है। अपने देश के भौतिक क्षेत्र में पिछड़ेपन का भी कारण यही है कि श्रम की अवमानता तथा प्रामाणिकता का अभाव। दुकानदार, कर्मचारी, व्यवसायी उद्योगपति भी अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाह ठीक प्रकार करने लगें तो कोई कारण नहीं है कि देश की समृद्धि न बढ़े। व्यक्ति भौतिक प्रगति भी इस लक्ष्य की पूर्ति पर ही निर्भर करती है।

