विदेशी वस्तुओं का उपभोग, हमारी मानसिक पराधीनता है।
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भारत जब अंग्रेजों का गुलाम था तब यहां व्यापारी अपने देश का निर्मित सामान लाकर बेचा करते थे। ऊंचे दामों पर घटिया माल भी हो तो भारतीय जनता को खरीदना पड़ता, शासक वर्ग अपने देश की बनी वस्तुओं के आगे भारतीय चीजें टिकने नहीं देते थे। और वह सारा पैसा विदेश चला जाता। इस शोषण चक्र को बन्द करने के लिये ही जागरूक और विचारशील लोगों ने स्वाधीनता संग्राम छेड़ा। लोकप्रिय जन नेताओं के स्थान पर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाने लगा। विदेशी कपड़ों की होलियां जलाई गयी, लोगों ने भारत के बाहर बनी हुई वस्तुओं का बहिष्कार किया। केवल इसलिए कि विदेशी व्यापार को निरुत्साहित किया जाये और गरीब देश का पैसा देश में ही रहे।
हांलाकि इन सब आन्दोलनों का ध्येय भारत को स्वतन्त्र कराना था, परन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति का सबसे बड़ा लाभ भी यही आंका गया था, कि हमारे देश का धन हमारे ही राष्ट्र को समृद्ध और उन्नत बनाने में प्रयुक्त हो सके। विदेशी शासन के शोषण चक्र को नष्ट करना एवं राष्ट्र की समृद्धि और विकास के नये द्वार खोलना स्वतन्त्रता का प्रमुख लाभ था।
स्वतन्त्रता प्राप्त हुई। हमें अपने विकास और समृद्धि का आत्माधिकार मिला परन्तु स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद देशवासियों की जिस दिशा में प्रवृत्ति बढ़ी उसे देखकर कहा जाये कि हम अपने प्रयत्न और पुरुषार्थ से प्राप्त की गयी उपलब्धि का लाभ नहीं उठा सके तो कोई आश्चर्य जनक बात नहीं है। स्वाधीनता प्राप्त कर लेने के बाद विदेशी वस्तुओं के प्रति जो मोह भारतीय नागरिकों में जागा है उसे देखकर तो यही लगता है कि स्वाधीनता का परिणाम विपरीत हानिकारक ही रहा। पहले लोग शायद किसी दबाव में आकर बाहर की बनी चीजें खरीदा करते थे परन्तु अब स्वेच्छा से और वह भी शान समझ कर विदेशी माल का उपयोग किया जाता है।
यहां की बात तो छोड़ दी जाये। कोई व्यक्ति विदेश भी जाता है तो चिन्ता यही बनी रहती है कि वहां रहकर किसी भी प्रकार अधिक से अधिक पैसा बचाये और उस पैसे से अपनी पत्नी तथा बच्चों के लिये बढ़िया विदेशी साड़ियां, वहां के बने हुए खिलौने खरीद कर ले जाये। इस कारण वह बड़ी ही कंजूसी से पैसा खर्च करता है तथा विदेशी समाज में वह आदर भी नहीं पा सकता जो कि किसी प्रवासी देशवासी को मिलता है। भारतीय वस्तुओं की ओर जहां दूसरे देशों के नागरिक आकृष्ट हो रहे हैं। यहां की कलात्मक चीजें विदेशी नागरिकों को अपनी ओर आकृष्ट कर रहीं हैं। हमारे देश का उत्पादन दूसरे देशों की मण्डियों में महत्वपूर्ण स्थान लेता जा रहा है। वहीं एक भारतीय का विदेशी माल के प्रति मोह उसे बौद्धिक दृष्टि से भी और नैतिक दृष्टि से भी बौना बना देता है।
इसका अर्थ यही है कि हम राजनैतिक दृष्टि से भले ही स्वतन्त्र हो गये हो मानसिक दृष्टि से अभी भी पराधीन है, दास है। इस दासता से चिपके रहने की ही चेष्टा करते रहना और स्वतन्त्रता तथा स्वराज्य की प्रशंसा करना ये दोनों ही असंगतियां हर दृष्टि से हास्यास्पद ही लगती है। एक ओर जहां भारतीय साड़ियां और वस्त्र विदेशों में लोकप्रिय हो रही है। कांजीवरम और बनारस के जरीदार परिधान जन चर्चा का विषय बने हुए हैं, कश्मीरी हैण्ड एम्बरायड्री के पीछे दुनिया दीवानी होती जा रही है। वहीं फेंच शिफोन और यूरोपीय टेरीलिन, टेरीकॉट तथा नाइलॉन की इच्छा करना कितने छोटे और ओछे मस्तिष्क की उपज है।
नेपाल और तिब्बत की सीमा पर, बम्बई, कलकत्ता व मद्रास के बन्दरगाह पर खुले आम चल रहा, बढ़ रहा, बढ़ रहा तस्कर व्यापार इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि हम विदेशी वस्तुओं के प्रति कितने आसक्त हैं। इस व्यापार के कर्णधार कभी तो कस्टम अधिकारियों की आंखों में धूल झोंकते हैं, कभी पैसे का प्रलोभन देकर उनको अपनी तरु मिला लेते हैं। यह एक प्रत्यक्ष देशघाती तस्कर व्यापार का धन इस प्रकार चोरी छुपे विदेश जाता रहता है। जो काम अंग्रेज सन् 1947 के पूर्व बलपूर्वक करते थे उसे ही आज हम स्वेच्छा से कर रहे हैं। यह कितनी शर्म की बात है।
इस तस्कर व्यापार को प्रश्रय देता है दैनन्दिन जीवन में विदेशी वस्तुओं का उपयोगी करने वाला आम आदमी। जिन कलाइयों पर विदेश में निर्मित घड़ियां बंधती हैं उनमें से अधिकांश तस्करी द्वारा इस देश में लाई गयी हैं। जिन कन्धों पर विदेशी ट्रांजिस्टर झूल रहे हैं उनका एक बड़ा प्रतिशत इस अपराधी पद्धति से भारत में लाया गया है।
कहा यह जाता है विदेशी माल का प्रयोग हम इसलिए करते हैं कि अपने देश में बनी चीजें मजबूत और टिकाऊ नहीं होती। इस समस्या का समाधान दूसरा भी हो सकता है। प्रायः देखा गया है कि ऐसी वस्तुओं में विलासिता के उपकरण ही ज्यादा होते हैं। दैनन्दिन जीवन में उपयोग आने वाली सभी वस्तुएं या तो गांव और शहर में ही निर्मित होती है अथवा क्षेत्रीय उत्पादन से ही उन आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है। कुछ समय के लिए ऐसी वस्तुओं का उपयोग ही रोक दिया जाए जो अपने देश में मजबूत नहीं बनती तो उनकी निर्माता कम्पनियां शीघ्र ही मनोवांछित उत्पादन देने लगेंगी।
दूसरे यह धारण भी भ्रम मात्र है कि हमारे देश में मजबूत व ऊंची श्रेणी का सामान नहीं बनता। जिन देशों की वस्तुएं हम अच्छी समझते हैं वे भी यहां की बनी हुई चीजें अपने यहां मंगवाते हैं। हमारे देश के हाथ करघे से बने वस्त्रों की बराबरी दुनिया में कोई दूसरा देश नहीं कर सकता। सूती कपड़े ब्रिटेन भारत से मंगवाता है और ये वहां उस भाव में बिकते हैं जितने दाम में कि हम यहां टेरीलिन और नायलोन के कपड़े खरीदते हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय साइकिलें, सिलाई की मशीनें, बिजली के पंखे, स्टील की चादरें भारी मात्रा में दूसरे देश मंगवाते हैं। कलात्मकता में भारतीय माल की होड़ दूसरा कर ही नहीं सकता। यही कारण है कि यहां के खंडहरों की मूर्तियां भी विदेशी लोग लाखों रुपये में खरीदते हैं।
फिर अपने देश की चीजों में यदि कुछ कमी भी है तो उसका सुधार उनका प्रयोग करने पर ही होगा। एक दम सर्वोत्तम चीज बना लेना सम्भव नहीं। दूसरे राष्ट्र जो उन्नति की चरम सीमा पर पहुंचे हैं उनकी प्रगति का राज सर्वोत्तम चीजें नहीं वहां के नागरिकों के हृदय में बसने वाली स्वदेशी वस्तुओं के प्रति प्रेम है। विदेशी राष्ट्रों का फैशन और विलासिता के अनुकरण की अपेक्षा यदि हम उन सद्गुणों को सीख पाते जिनके बल पर उन लोगों ने अपने देश को ऊंचा उठाया है तो हमारा राष्ट्र स्वाधीनता पच्चीस वर्षों में उन्नति के न जान किस स्तर को छू लेता।
यह स्मरण रखा जाना चाहिए कि राष्ट्र प्रेम के गीत गा कर ही कोई देश ऊंचा नहीं उठा है। वह ऊंचा उठा है तो वहां के देशवासियों की लगन, निष्ठा और ईमानदारी के बलबूते पर। यहां की मिट्टी की जय बोलकर राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों की इतिश्री नहीं हो जाती देश, जाति और समाज के जिसमें कि हम रहते हैं उसके प्रति हमारे अनेक उत्तरदायित्व है और उन्हें पूरा करने के लिए स्वेच्छया होने देने वाले शोषण के इन क्रम को बन्द करना ही पड़ेगा।
हांलाकि इन सब आन्दोलनों का ध्येय भारत को स्वतन्त्र कराना था, परन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति का सबसे बड़ा लाभ भी यही आंका गया था, कि हमारे देश का धन हमारे ही राष्ट्र को समृद्ध और उन्नत बनाने में प्रयुक्त हो सके। विदेशी शासन के शोषण चक्र को नष्ट करना एवं राष्ट्र की समृद्धि और विकास के नये द्वार खोलना स्वतन्त्रता का प्रमुख लाभ था।
स्वतन्त्रता प्राप्त हुई। हमें अपने विकास और समृद्धि का आत्माधिकार मिला परन्तु स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद देशवासियों की जिस दिशा में प्रवृत्ति बढ़ी उसे देखकर कहा जाये कि हम अपने प्रयत्न और पुरुषार्थ से प्राप्त की गयी उपलब्धि का लाभ नहीं उठा सके तो कोई आश्चर्य जनक बात नहीं है। स्वाधीनता प्राप्त कर लेने के बाद विदेशी वस्तुओं के प्रति जो मोह भारतीय नागरिकों में जागा है उसे देखकर तो यही लगता है कि स्वाधीनता का परिणाम विपरीत हानिकारक ही रहा। पहले लोग शायद किसी दबाव में आकर बाहर की बनी चीजें खरीदा करते थे परन्तु अब स्वेच्छा से और वह भी शान समझ कर विदेशी माल का उपयोग किया जाता है।
यहां की बात तो छोड़ दी जाये। कोई व्यक्ति विदेश भी जाता है तो चिन्ता यही बनी रहती है कि वहां रहकर किसी भी प्रकार अधिक से अधिक पैसा बचाये और उस पैसे से अपनी पत्नी तथा बच्चों के लिये बढ़िया विदेशी साड़ियां, वहां के बने हुए खिलौने खरीद कर ले जाये। इस कारण वह बड़ी ही कंजूसी से पैसा खर्च करता है तथा विदेशी समाज में वह आदर भी नहीं पा सकता जो कि किसी प्रवासी देशवासी को मिलता है। भारतीय वस्तुओं की ओर जहां दूसरे देशों के नागरिक आकृष्ट हो रहे हैं। यहां की कलात्मक चीजें विदेशी नागरिकों को अपनी ओर आकृष्ट कर रहीं हैं। हमारे देश का उत्पादन दूसरे देशों की मण्डियों में महत्वपूर्ण स्थान लेता जा रहा है। वहीं एक भारतीय का विदेशी माल के प्रति मोह उसे बौद्धिक दृष्टि से भी और नैतिक दृष्टि से भी बौना बना देता है।
इसका अर्थ यही है कि हम राजनैतिक दृष्टि से भले ही स्वतन्त्र हो गये हो मानसिक दृष्टि से अभी भी पराधीन है, दास है। इस दासता से चिपके रहने की ही चेष्टा करते रहना और स्वतन्त्रता तथा स्वराज्य की प्रशंसा करना ये दोनों ही असंगतियां हर दृष्टि से हास्यास्पद ही लगती है। एक ओर जहां भारतीय साड़ियां और वस्त्र विदेशों में लोकप्रिय हो रही है। कांजीवरम और बनारस के जरीदार परिधान जन चर्चा का विषय बने हुए हैं, कश्मीरी हैण्ड एम्बरायड्री के पीछे दुनिया दीवानी होती जा रही है। वहीं फेंच शिफोन और यूरोपीय टेरीलिन, टेरीकॉट तथा नाइलॉन की इच्छा करना कितने छोटे और ओछे मस्तिष्क की उपज है।
नेपाल और तिब्बत की सीमा पर, बम्बई, कलकत्ता व मद्रास के बन्दरगाह पर खुले आम चल रहा, बढ़ रहा, बढ़ रहा तस्कर व्यापार इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि हम विदेशी वस्तुओं के प्रति कितने आसक्त हैं। इस व्यापार के कर्णधार कभी तो कस्टम अधिकारियों की आंखों में धूल झोंकते हैं, कभी पैसे का प्रलोभन देकर उनको अपनी तरु मिला लेते हैं। यह एक प्रत्यक्ष देशघाती तस्कर व्यापार का धन इस प्रकार चोरी छुपे विदेश जाता रहता है। जो काम अंग्रेज सन् 1947 के पूर्व बलपूर्वक करते थे उसे ही आज हम स्वेच्छा से कर रहे हैं। यह कितनी शर्म की बात है।
इस तस्कर व्यापार को प्रश्रय देता है दैनन्दिन जीवन में विदेशी वस्तुओं का उपयोगी करने वाला आम आदमी। जिन कलाइयों पर विदेश में निर्मित घड़ियां बंधती हैं उनमें से अधिकांश तस्करी द्वारा इस देश में लाई गयी हैं। जिन कन्धों पर विदेशी ट्रांजिस्टर झूल रहे हैं उनका एक बड़ा प्रतिशत इस अपराधी पद्धति से भारत में लाया गया है।
कहा यह जाता है विदेशी माल का प्रयोग हम इसलिए करते हैं कि अपने देश में बनी चीजें मजबूत और टिकाऊ नहीं होती। इस समस्या का समाधान दूसरा भी हो सकता है। प्रायः देखा गया है कि ऐसी वस्तुओं में विलासिता के उपकरण ही ज्यादा होते हैं। दैनन्दिन जीवन में उपयोग आने वाली सभी वस्तुएं या तो गांव और शहर में ही निर्मित होती है अथवा क्षेत्रीय उत्पादन से ही उन आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है। कुछ समय के लिए ऐसी वस्तुओं का उपयोग ही रोक दिया जाए जो अपने देश में मजबूत नहीं बनती तो उनकी निर्माता कम्पनियां शीघ्र ही मनोवांछित उत्पादन देने लगेंगी।
दूसरे यह धारण भी भ्रम मात्र है कि हमारे देश में मजबूत व ऊंची श्रेणी का सामान नहीं बनता। जिन देशों की वस्तुएं हम अच्छी समझते हैं वे भी यहां की बनी हुई चीजें अपने यहां मंगवाते हैं। हमारे देश के हाथ करघे से बने वस्त्रों की बराबरी दुनिया में कोई दूसरा देश नहीं कर सकता। सूती कपड़े ब्रिटेन भारत से मंगवाता है और ये वहां उस भाव में बिकते हैं जितने दाम में कि हम यहां टेरीलिन और नायलोन के कपड़े खरीदते हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय साइकिलें, सिलाई की मशीनें, बिजली के पंखे, स्टील की चादरें भारी मात्रा में दूसरे देश मंगवाते हैं। कलात्मकता में भारतीय माल की होड़ दूसरा कर ही नहीं सकता। यही कारण है कि यहां के खंडहरों की मूर्तियां भी विदेशी लोग लाखों रुपये में खरीदते हैं।
फिर अपने देश की चीजों में यदि कुछ कमी भी है तो उसका सुधार उनका प्रयोग करने पर ही होगा। एक दम सर्वोत्तम चीज बना लेना सम्भव नहीं। दूसरे राष्ट्र जो उन्नति की चरम सीमा पर पहुंचे हैं उनकी प्रगति का राज सर्वोत्तम चीजें नहीं वहां के नागरिकों के हृदय में बसने वाली स्वदेशी वस्तुओं के प्रति प्रेम है। विदेशी राष्ट्रों का फैशन और विलासिता के अनुकरण की अपेक्षा यदि हम उन सद्गुणों को सीख पाते जिनके बल पर उन लोगों ने अपने देश को ऊंचा उठाया है तो हमारा राष्ट्र स्वाधीनता पच्चीस वर्षों में उन्नति के न जान किस स्तर को छू लेता।
यह स्मरण रखा जाना चाहिए कि राष्ट्र प्रेम के गीत गा कर ही कोई देश ऊंचा नहीं उठा है। वह ऊंचा उठा है तो वहां के देशवासियों की लगन, निष्ठा और ईमानदारी के बलबूते पर। यहां की मिट्टी की जय बोलकर राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों की इतिश्री नहीं हो जाती देश, जाति और समाज के जिसमें कि हम रहते हैं उसके प्रति हमारे अनेक उत्तरदायित्व है और उन्हें पूरा करने के लिए स्वेच्छया होने देने वाले शोषण के इन क्रम को बन्द करना ही पड़ेगा।

