लोकरंजन को सत्प्रवृत्ति संवर्धन में नियोजित किया जाय
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जर्मनी में शासन सत्ता की बागडोर सँभालते ही हिटलर ने शिक्षा शास्त्रियों, राजनेताओं, विचारकों तथा मनोवैज्ञानिकों का एक सम्मेलन बुलाया। लक्ष्य था—देश को एक निश्चित तरह की विचारधारा में रंगने के लिये कौन-सा माध्यम सर्वाधिक प्रभावशाली हो सकता है? इस विषय में परामर्श लेना। घण्टों विचार-विमर्श होता रहा। अन्ततः सभी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कम समय में जनमानस में एक विशेष प्रकार की विचारधारा भरने के लिये सबसे सशक्त और सफल मनोवैज्ञानिक माध्यम वह हो सकता है जो दृश्य घटनाक्रमों पर आधारित हो। तब तक विश्व रंगमंच पर सिनेमा लोकरंजन के लिये एक लोकप्रिय तंत्र के रूप में आ चुका था और दिन-प्रतिदिन उसके प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ता ही जा रहा था। हिटलर को ऐसा लगा जैसे जिस बात के लिये वह चिन्तित था, उसका समाधान मिल गया हो। ‘उसने सिनेमा के राष्ट्रीयकरण के लिये तुरन्त आदेश दे दिया। देश के निर्माण की उसकी जैसी परिकल्पना थी, क्रियान्वयन के लिये उसने सिनेमातंत्र का भरपूर उपयोग किया। दृश्य, श्रव्य सभी माध्यमों से पूरे जर्मनी में नाजीवाद की उपयोगिता सिद्ध करने के लिये सर्वत्र प्रयास चल पड़े। जिस कार्य में उसे कई दशक लग सकते थे वह कुछ वर्षों में पूरा हो गया। ऐसा मनोवैज्ञानिक वातावरण बनकर तैयार हुआ कि जर्मनी का बच्चा-बच्चा नाजीवाद के रंग में रंग गया। हिटलर ने जैसा चाहा कुछ ही समय में देश को वैसा बनाने में सफल हो गया।
विश्व में पहली बार यह अनुभव किया गया कि लोकरंजन के सीमित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयुक्त होने वाला यही साधन इतना समर्थ और नवनिर्माण की भूमिका संपन्न कर सकने में सफल हो गया। तब से लेकर अब तक विभिन्न देशों ने दृश्य माध्यमों एवं सिनेमा तंत्र का उपयोग समय-समय पर विभिन्न प्रयोजनों के लिये किया है। कम्युनिस्ट देश ब्रेनवाशिंग हेतु— कम्युनिज्म के विचारों में राष्ट्र को रंगने के लिए अनेकों प्रकार के प्रयास इस तन्त्र के माध्यम से करते हैं और पूँजीवादी देश पूँजीवाद की सार्थकता सिद्ध करने के लिये तदनुरूप वातावरण बनाने का प्रयत्न करते हैं। अनेकों देशों में शिक्षा को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिये टेलीविजन, सिनेमा आदि का प्रयोग होने लगा है। रूप ने तो अपने देश से अशिक्षा का निवारण ही इसी के द्वारा किया।
भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ सिनेमा मात्र लोक-रंजन का साधन बनकर रहा है। लोकरंजन भी ऐसा जिससे कोई प्रेरणा कोई दिशा नहीं मिल पाती है। उल्टे सिनेमा से दुष्प्रवृत्तियों को बढ़ावा अधिक मिला है। इस सत्य से कोई भी विचारशील इनकार नहीं कर सका कि देश के किशोरों—युवा पीढ़ी को दिग्भ्रान्त करने में सिनेमा ने अहम् भूमिका निभाई है। मूर्धन्य विभूतियाँ इस क्षेत्र में काम कर रही हैं। विद्वानों, कलाकारों की एक फौज सिनेमा निर्माण के कार्यों में संलग्न है। चाहती तो देश के नवनिर्माण में भी भारी सहयोग दे सकती थी; पर संकीर्ण स्वार्थों में लिप्त होने के कारण देश को उस योगदान से वंचित रहना पड़ रहा है।
अनुमानतः पूरे देश में 10 हजार सिनेमाघर हैं तथा प्रतिदिन लगभग एक करोड़ व्यक्ति सिनेमा देखते हैं। भारत में सिनेमा की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि विश्व का एक गरीब राष्ट्र होते हुए सर्वाधिक फिल्में यहाँ बनती हैं। कभी यह श्रेय जापान और अमेरिका को प्राप्त था पर वे भी इस दिशा में भारत से पीछे रह गये हैं। जबकि उनकी आर्थिक स्थिति अपने देश की तुलना में कई गुनी अच्छी है। उनके समक्ष रोटी जैसी उदर पोषण के अनिवार्य साधनों की कमी नहीं है। अपने यहाँ 50 प्रतिशत व्यक्तियों को एक समय ही भोजन उपलब्ध हो पाता है । अमेरिका में प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय सात हजार आठसौ नब्बे डालर है तथा जापान में पाँच हजार डालर है इसकी तुलना भारत में प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय मात्र 1200 रुपये (लगभग 130 डालर) है। जिससे पेट भरना भी मुश्किल पड़ता है। ऐसी स्थिति में विरोधाभास यह कि अपना देश फिल्मों के निर्माण में सबसे आगे है।
अपने यहाँ 19 प्रमुख भाषाओं में फिल्में बनती हैं—हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला, भोजपुरी, गुजराती, पंजाबी, मराठी, नेपाली, उड़िया, सिन्धी तामिल, मलयालम, कोंकणी, डोंगरी, मणिपुरी, तेलुगू, असमिया तथा कन्नड़। 60 हजार व्यक्ति सिनेमा उद्योग में लगे हैं। 1950 के बाद फिल्म निर्माण की दिशा में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। सन् 1950 से लेकर 1979 के विभिन्न वर्षों में बनने वाली फिल्मों की संख्या इस प्रकार थी—1951 में 219, 1956 में 295, 1961 में 303, 1966 में 316, 1971 में 433, 1976 में 507, 1977 में 557, 1978 में 619 तथा 1979 में 714 (अर्थात् प्रतिदिन 2) भारत के उपरोक्त आंकड़ों के अनुसार यह स्पष्ट हो जाता है कि फिल्म निर्माण की दिशा में हर वर्ष वृद्धि हो रही है। ये फिल्में 19 भाषाओं में विनिर्मित तथा पूरे देश में प्रदर्शित होती हैं।
अधिक परिमाण में फिल्में बनना सार्थक तब सिद्ध होता है जब नवसृजन की प्रेरणायें उभारती—देश के समक्ष प्रस्तुत अनेकानेक सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक समस्याओं के समाधान में सहयोग देतीं। पर इस दृष्टि से देखने पर निराशा ही हाथ लगती है। मूर्धन्य विशेषज्ञों का मत है कि इतनी दिशाविहीन—निरुद्देश्य फिल्में किसी भी देश में नहीं बनतीं, जितनी कि भारत में। ऐसा अनुमान है कि भारत में बने चलचित्रों में से 95 प्रतिशत ऐसे होते हैं जिनसे दर्शकों को कोई सृजनात्मक प्रेरणा नहीं मिलती। इनमें से अधिकाँश मानवी कुत्साओं को भड़काते—दुष्प्रवृत्तियों को उभारते हैं। दर्शकों में से बहुतायत ऐसों की होती है जिनमें मौलिक चिन्तन का अभाव होता है। इनमें भी अपरिपक्व मस्तिष्क वाले किशोरों तथा युवा पीढ़ी की संख्या अधिक होती है। जिनमें जोश तो होता है पर होश नहीं। अपना भला-बुरा सोचने तथा उपयोगी विचारों के बीच चुनाव की क्षमता न होने से अन्तः भटकाव ही हाथ लगता है। मनुष्य की सहज प्रवृत्तियाँ निम्नगामी होती हैं। अभीष्ट प्रेरणा पाकर उन्हें पतन की ओर बढ़ने में सहयोग मिलता है। युवा मस्तिष्क अधिक संवेदनशील होता है। जैसी उसे प्रेरणा मिलती है उसी ओर वह चल पड़ता और वैसी ही गतिविधियाँ अपनाने लगता है। युवावर्ग में अपराध की प्रवृत्ति बढ़ रही है। नैतिकता का बुरी तरह अवमूल्यन हुआ है। कहना न होगा कि सिनेमातंत्र ही इस अवमूल्यन के लिये सबसे अधिक दोषी है।
नैतिक और चारित्रिक पतन का यह एक पक्ष हुआ जिसके लिए सिनेमा सर्वाधिक जिम्मेदार है। हानि के अन्य पक्षों पर तो कम व्यक्तियों का ही ध्यान जा पाता है। मनीषियों ने समय को सर्वोपरि सम्पदा माना है। प्रतिदिन देश की एक करोड़ जनशक्ति सिनेमा देखती है। लगभग तीन घण्टे फिल्म देखने में लगते हैं। घर से आने जाने में भी एक घण्टे से कम समय नहीं लगता है। इस तरह एक फिल्म देखने में कुल चार घण्टे का समय आसानी से खर्च हो जाता है अर्थात् 8 घण्टे श्रम दिन के हिसाब से आधा दिन। एक बार सिनेमा जाने में एक व्यक्ति अपना आधा श्रम दिन बेकार गँवाता है। एक करोड़ व्यक्ति प्रतिदिन के हिसाब से लगभग 4 घण्टे प्रतिदिन (श्रम के घण्टे) अर्थात् 50 लाख श्रमदिनों की बर्बादी होती है।
सिनेमा देखने वालों में से हर स्तर के व्यक्ति होते हैं—अच्छे पदों पर काम करने वाले भी तथा छोटे-बड़े कर्मचारी, मजदूर और विद्यार्थी भी। योग्यता के अनुरूप किसी के समय की कीमत अधिक हो सकती है, और किसी की कम भी। औसतन एक व्यक्ति की दैनिक मजदूरी 20 रुपये भी माना जाय तो प्रतिदिन सिनेमा देखने में गँवाये गये 50 लाख श्रमदिनों की कीमत 10 करोड़ रुपये होती है। न्यूनतम सिनेमा देखने का खर्च प्रति व्यक्ति तीन रुपये भी माना जाय तो एक करोड़ व्यक्तियों का प्रतिदिन तीन करोड़ रुपयों और भी जुड़ जाता है अर्थात् प्रतिदिन नकद पैसों तथा समय की क्षति जोड़ने पर 13 करोड़ रुपये होते हैं। इस तरह एक करोड़ व्यक्तियों के सिनेमा देखने से लगभग 13 करोड़ रुपये प्रतिदिन व्यर्थ जाते हैं। एक माह में यह खर्च तीन अरब 90 करोड़ तथा एक वर्ष में लगभग 46 अरब 80 करोड़ रुपये आता है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार सिनेमा उद्योग से वर्ष 1975 में 2 अरब 25 करोड़ की आमदनी हुई। प्रचलित मान्यता के अनुसार आमदनी का नकद पैसे के रूप में लाभ कहते हैं पर अर्थशास्त्रियों का मत है कि पैसे और समय की बचत कर लेना भी लाभ के अन्तर्गत आता है। सिनेमातंत्र से जितनी आमदनी होती है; उसकी तुलना में समाज की हुई बर्बादी का औसत कई गुना अधिक है। उस बर्बादी को रोक लिया जाय तो आमदनी का नया स्रोत धन की बचत और समय का सदुपयोग द्वारा निकल सकता है।
सिनेमा इस युग में एक नये जादू की तरह आया है। उसने कोमल भावना वाले उदीयमान नवयुवकों को अपने सम्मोहन पाश में कस कर जकड़ा है। यह रास्ता मनोरंजन जन साधारण को अच्छा लगा है और एक प्रकार से सर्वत्र उसका स्वागत हुआ है। संगीत सम्मेलन, कवि सम्मेलन, अभिनय, नृत्य, नाटक आदि के क्षेत्र सिकुड़ते-सिकुड़ते मरणासन्न होते जा रहे हैं, सब की आत्मा धीरे-धीरे सिनेमा में समाती चली जा रही है। विज्ञान का यह जादू जन-मानस पर सीधा प्रभाव डाल रहा है और उसकी गहरी छाप पड़ रही है। कला की चर्चा करनी हो तो अब सिनेमा को प्रमुख स्थान देना पड़ेगा। नई पीढ़ी की मनोभूमि कोमल तो होती ही है, जिस प्रकार उसे ढाले जाने का प्रयास किया जाता है, उसी ढाँचे में ढलती चली जाती है। सिनेमा आज यही कर रहा है। नेता की अपेक्षा अभिनेता बनने का आकर्षण नई पीढ़ी में प्रबल होता जा रहा है।
स्पष्ट है कि सिनेमा यदि आदर्शवादी विचारणाओं और भावनाओं को ही चित्रित कर रहा होता तो स्वास्थ्य मनोरंजन के साथ लोकमंगल की आशाजनक सम्भावनायें प्रस्तुत कर सकता था। पर ‘मरे के मारे शाह मदार’ वाला दुर्भाग्य यहाँ भी आ विराजा। हजार वर्ष की पराधीन, पिछड़ी और पथ भ्रष्ट कौम को स्वस्थ मार्ग दर्शन देने की अपेक्षा सिनेमा उल्टी दिशा में ही घसीटने लग पड़ा। अपने फिल्मों में जो कथानक, अभिनय, गायन, नृत्य, होते हैं उनमें प्रेरक प्रसंग तो यदाकदा ही दिखाई देंगे। अधिकतर कामुकता, अश्लीलता, उग्रता, उच्छृंखलता एवं पशु प्रवृत्ति को भड़काने वाले प्रसंग ही मिलेंगे। इन्हें रुचि पूर्वक देखने वाली जनता किधर चल रही है, इसे सहज ही परखा जा सकता है। सर्व साधारण में विशेषतया नवयुवक नवयुवतियों में जो चर्चा न करने योग्य दुष्प्रवृत्तियाँ आंधी-तूफान की तरह पनप रही हैं और जिनकी प्रतिक्रिया अगले दिनों प्रचुर मात्रा में घटित होने वाली है, अवांछनीय घटनाओं के रूप में सामने आ रही है, उसे हमारा एक दुर्भाग्य ही कहना चाहिए। रेडियो दिन भर सिनेमा के गीत गाता है, हम सब उन्हीं को गुन-गुनाते हैं, लाउडस्पीकरों से यह सुनाई पड़ता है। सिनेमा संगीत ही वस्तुतः आज का युग गायन बन गया है।
अतः सिनेमा माध्यम की उपेक्षा नहीं की जा सकती। उसने लोकरंजन के प्रधान माध्यम की स्थिति प्राप्त करली है। वह अति सशक्त ‘मास-मीडिया’ बन गया है। गरीब-अमीर, देहाती-शहरी, पढ़े, बिना पढ़े, सभी उस मनोरंजन का लाभ लेना चाहते हैं।,
क्या उस माध्यम द्वारा लोक रुचि का परिष्कार हो रहा है। नहीं, वह कामुकता और शृंगार की दुष्प्रवृत्तियों को उद्दीप्त कर मनुष्य की पशु-प्रवृत्तियों को भड़का रहा है। मध्य युगीन सामन्तवाद इसके लिए बदनाम रहा है। पर उन दिनों वह विकृति खुले रूप में अमीर उमरावों, सत्ताधारियों के बीच ही प्रचलित और प्रतिष्ठित थी अब वह इस प्रकार सीमित नहीं, सिनेमा उसे विशाल पैमाने पर फैला रहा है।
सभी फिल्मों में और चाहे जो कुछ कथानक या अन्य नाम मात्र को रहे किन्तु कामुकता, भड़काने वाले अंश उनमें अनिवार्य रूप से जुड़े होंगे। इससे बाल-वृद्ध नर-नारी सभी प्रभावित होते हैं और वासना तथा विद्रूपता के शिकार होते हैं। उससे शारीरिक और मानसिक व्यभिचार की लहर उमड़ती है। इस असंयम का प्रभाव शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक सन्तुलन, नर-नारी के बीच शालीनता की दृष्टि, पारिवारिक निष्ठा, लोक मर्यादा आदि सभी पर अत्यन्त ही विघातक पड़ता है। कामुकता का उद्दीपन वस्तुतः नारी की उत्कृष्टता का वीभत्स तिरस्कार है। एकान्त मिलन के गुह्य कक्ष में जो हाव-भाव, सम्भाषण गायन, अभिनय क्रिया कलाप पति-पत्नी तक सीमित रखे जाने चाहिए और उसमें भी प्रजनन की आवश्यकता पर ही वह उद्दीपन होना चाहिए, खेद है कि वह गुप्त प्रकरण चौराहे पर दिखाये और सुनाये जाने का विषय बन गया है। जो प्रसंग सम्वाद अपनी संस्कृति में गुह्य माने गये हैं और जिन्हें छोटे-बड़े के साथ बैठकर शालीनता पूर्वक नहीं देख सकते। अब वे निर्लज्ज अभिव्यंजना के लिए खुले छोड़ दिये हैं। बाप-बेटी, बहिन-भाई साथ-साथ उन्हें देखते हुए संकोच नहीं करते। यह संकोच व्यतिरेक न जाने पारिवारिक परिजनों के रिश्ते भी जीवित रहने देगा कि नहीं। मर्यादायें टूटी तो पशुता उभरी, पशुओं में बाप बेटी, भाई बहिन, माँ बेटे के बीच प्रजनन का कोई बन्धन नहीं। मनुष्य ने शालीनता और मर्यादा की पवित्रता पर प्रतिबन्ध अपने ऊपर लागू करके पशुओं से ऊँची समाज बनाई है। यदि उसे इस तरह तोड़ा जाता रहा—जैसा कि आज का सिनेमा तोड़ रहा है तो अगले दिनों उन मर्यादाओं का कुछ अस्तित्व बचा रहेगा या नहीं यह कहना कठिन है।
लोकरंजन के इन माध्यमों का प्रवाह निम्नगामी होकर अगणित समस्याओं को जन्म दे सकता है। विगत दिनों एक ऐसा ही उदाहरण सामने आया पेरिस का ओलम्पिया म्यूजिक हाल श्रोताओं से खचाखच भरा था। संगीत का कार्यक्रम आरम्भ हुआ। मधुर स्वर लहरी के मादक प्रभाव से श्रोतागण झूमने लगे। अचानक एक विलक्षण घटना घटी। संगीत की धुन बदली। म्यूजिक कार्यक्रम में उस धुन को बजाये जाने का वह पहला अवसर था। शान्तचित्त दर्शक जो संगीत प्रोग्राम को सुनने में तल्लीन थे, उस परिवर्तित धुन को सुनकर बेचैनी अनुभव करने लगे। उनकी उत्तेजना बढ़ती ही गयी और अनियंत्रण की स्थिति में जा पहुँची। पागलों की तरह श्रोता अपनी-अपनी कुर्सियों को छोड़कर एक दूसरे से संघर्ष पर उतारू हो गये। हाल की कुर्सियाँ उन्होंने फाड़ एवं तोड़ डाली और खिड़कियों में लगे शीशों को चकनाचूर कर दिया। प्रोग्राम सुन रही महिलाएं भी अपना मनःसन्तुलन खो बैठीं और उत्तेजना की स्थिति में स्वयं अपने वस्त्र फाड़ने-चीरने लगी। निर्वस्त्र अवस्था में उनके चीखने-चिल्लाने से हाल गूँज उठा। देखते ही देखते म्यूजिक हाल में अच्छा खासा हंगामा खड़ा हो गया आक्रामक आचरण के कारण श्रोताओं में से अधिकांश घायल हुए। संगीत आयोजकों को बिगड़ती हालत पर काबू पाने के लिए मदद के लिए पुलिस, बुलानी पड़ी। तब कहीं जाकर स्थिति पर नियन्त्रण पाया जा सका। घायल व्यक्तियों को अस्पताल की शरण लेनी पड़ी।
घटना के कारणों की खोज बीन आरम्भ हुई। संगीत आयोजकों के ऊपर घायलों के सगे सम्बंधियों ने हर्जाने के लिए मुकदमा दायर किया। जाँच पड़ताल के दौरान संगीत की धुन की परीक्षा की गयी तो मालूम हुआ कि सारी घटनाओं के लिए जिम्मेदार वह उत्तेजक धुन थी जो पहली बार प्रयोग के तौर पर बजायी गयी थी। रॉक एन्ड पॉप के सम्मिलित स्वरूप से बनी उस संगीत धुन को बजाने पर शासन द्वारा पाबन्दी लगा दी गयी।
ध्वनि विज्ञान के विशेषज्ञों ने अपना निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए कहा कि मनुष्य के स्नायु संस्थान को असाधारण रूप से उत्तेजित करने में वह धुन समर्थ है, जिस पिच और फ्रीक्वेन्सी पर वह धुन तैयार की गयी है, वे मन एवं मस्तिष्क पर भारी दुष्प्रभाव डालते हैं। आक्रामक एवं कामुक मनोवृत्ति को भड़काने में वह विशेष रूप से सहायक है। इस घटना से वैज्ञानिकों को संगीत विद्या पर गहन शोध की प्रेरणा मिली। तालबद्ध, लयबद्ध अनेकानेक ध्वनियों एवं धुनों का प्रयोग परीक्षण किया गया तो मालूम हुआ कि उनमें दोनों तरह की सामर्थ्य विद्यमान है। संगीत शारीरिक स्वास्थ्य और मनःविकास का श्रेष्ठ माध्यम बन सकता है और मानसिक असन्तुलन का कारण भी। ताल, लय के उतार चढ़ाव फ्रिक्वेन्सी तथा धुन में परिवर्तन करके संगीत द्वारा रचनात्मक और ध्वंसात्मक दोनों ही तरह के प्रयोजन पूरे किये जा सकते हैं।
संगीत आदि काल से ही मनुष्य के साथ जुड़ा है तथा मानसिक तुष्टि का लक्ष्य अपने सुमधुर तरंगों द्वारा पूरा करता रहा है। दैनन्दिन अन्य आवश्यकताओं की भाँति आन्तरिक परितृप्ति में संगीत का असाधारण महत्व है। बांसुरी, बीन, शहनाई, सितार की मादक धन अनायास ही हर किसी को आकर्षित करती तथा उनके मन मस्तिष्क और हृदय को पुलकित, प्रमुदित करती है। पर्व, त्यौहारों संस्कारों से लेकर जीवन के हर खुशी एवं शोक के अवसर पर गायन एवं वादन की परम्परा है। यह स्वस्थ परम्परा मनुष्य की मानसिक शक्तियों के विकास में सहायक है।
कहा जा चुका है कि लोकरंजन का यह सशक्त माध्यम रचनात्मक और ध्वंसात्मक दोनों ही प्रयोजन पूरा कर सकता है। साहित्य, चित्रकला की भाँति संगीत जैसे तन्त्र का पिछले कुछ दशकों से भारी दुरुपयोग हो रहा है। पश्चिमी देशों का बढ़ता हुआ प्रभाव संगीत के उस स्वस्थ और सृजनात्मक स्वरूप को नष्ट कर रहा है जो मानवी विकास में विशेष रूप से सहायक सिद्ध हो सकता है। पश्चिमी देशों में कुत्सित भावना को भड़काने वाला संगीत अत्यन्त लोकप्रिय हुआ है जिसने युवा पीढ़ी का उच्छृंखल स्वेच्छाचारी बनाने में विशेष भूमिका निभायी है। दो दशक पूर्व अमेरिका में सर्व प्रथम विल हेेले एन्ड काँमट्स नामक नृत्य संगीत की एक मन्डली तैयार हुई जिसने ऐसी संगीत की परम्परा आरम्भ की। दिग्भ्रांत युवकों, युवतियों ने उसे विशेष रूप से पसन्द किया। आविष्कारक हेले की ख्याति बढ़ी। वह रेडियो स्टेशन पर इलैक्ट्रिक गिटार तथा सैक्सोफोन नामक वाद्य यन्त्र पर संगीत की शिक्षा देने लगा। नाम के अनुरूप सैक्सोफोन वाद्ययन्त्र की यह विशेषता है कि वह सैक्स भावना असाधारण रूप से बढ़ा देता है क्रमशः इस उत्तेजक संगीत की लोकप्रियता बढ़ती ही गयी और कुछ ही समय में अमेरिका की गली-गली में उसकी धूम मच गयी। पॉप-पॉप की तेज आवाज के कारण यह संगीत पॉप संगीत के नाम से विख्यात हुआ जबकि इसका वास्तविक नाम ‘वैवोपालु पॉप’।
इस संगीत की बढ़ती हुई लोक प्रियता को देखकर ओहियो राज्य के एक संगीतज्ञ ने एक नयी तर्ज बनायी और उसका नाम दिया ‘मून डॉग रॉक’ एन्ड रॉल जिसमें युवा वर्ग अपनी सुध-बुध भुलाकर स्वच्छंद आचरण एवं वीभत्स चेष्टाएँ करते हुए नृत्य करते थे। युवकों में बढ़ती उद्दण्डता, उच्छृंखलता तथा स्वेच्छाचार की प्रवृत्ति ने अमेरिका के विचारशील वर्ग का ध्यान आकर्षित किया। पर उनके अनेकों प्रकार के प्रयासों के बावजूद भी उन पर रोकथाम नहीं हो सकी। संगीत के माध्यम से स्वच्छंदता बाद का जो स्वरूप एक बार प्रकट हुआ वह फूलता और फलता गया। उससे निकले विष बीज देश की सीमाओं को लांघकर अन्य प्रगतिशील देशों में जा पहुँचे और जनमानस की प्रसुप्त हीन वृत्ति का खाद पाकर अंकुरित विकसित होने लगे। पश्चिमी देशों में शरीर और मन में उत्तेजना भरने वाले संगीत की इन दिनों धूम है। फिल्में तो इसके बिना सफलता नहीं प्राप्त करतीं।
पिछले कुछ वर्षों से भारतीय सिनेमा निर्माताओं ने भी फिल्मों की सफलता एवं धनोपार्जन के लिए उस संगीत नृत्य एवं वादन का अन्धानुकरण आरम्भ कर दिया है जो जन मानस की हीन वृत्तियों को जमाने और उत्तेजित करने की भूमिका निभाते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार विगत दो वर्षों में भारत में जितने सिनेमा बने उनमें से नब्बे प्रतिशत में किसी न किसी रूप में ऐसे संगीत एवं नृत्य का समावेश था। अब वह संगीत सिनेमा जगत तक ही सीमित नहीं रहा है। भारत के बड़े शहरों में कितने ही नाइट क्लब एसोसिएशन, बार खुल चुके हैं जिनकी रोजी रोटी मात्र ऐसे उत्तेजक अश्लील गायन, वादन एवं नृत्यों के द्वारा चल रही है।
अपने देश के संगीत नाद ब्रह्म की साधना का प्रयोजन पूरा करता रहा है। उसकी सुमधुर , सौम्य स्वर लहरी शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास में आज भी सहायक हो सकती है। पर तब, जबकि संगीत का पावन स्वस्थ स्वरूप प्रचलन में रहे, मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता को बढ़ाने वाले आधुनिक उत्तेजक, वीभत्स गायन, वादन और नृत्य की रोकथाम हो। इस दिशा में उन स्वर साधकों और कला के पुजारियों का भी सहयोग आवश्यक है जो मात्र पैसे के लिए संगीत की शक्ति को अश्लीलता अभिवृद्धि में नियोजित कर रहे हैं उनका भी कर्तव्य है कि अपनी कुचेष्टा को रोकें।
संगीत की प्रभावोत्पादक क्षमता सर्व विदित है। मनुष्य तो क्या पशु पक्षी तक संगीत की सुमधुर ध्वनि पर थिरकने लगते हैं तथा उस प्रभाव से प्रकृति प्रदत्त स्वभाव के विपरीत आचरण करते देखे जाते हैं। इतिहास की प्रख्यात घटना है कि मुगल शासक अकबर किसी कारण से तत्कालीन प्रसिद्ध लोक कवि माघ से क्रुद्ध हो गया था। आवेश की स्थिति में उसने सेनापति को आदेश दिया कि माघ को दूसरे दिन भरे दरबार के सामने मदमस्त हाथी से कुचल दिया जाय। सभासदों को राजा का निर्णय अनुचित जान पड़ा। पर विरोध कौन करता? विरोध का अर्थ था स्वयं के लिए आपत्ति मोल लेना। पर राजा के अनुचित निर्णय से एक बेगुनाह और देश का महान कवि मारा जाय सभासदों को उचित न लगा। महामन्त्री सहित सभासदों की एक गुप्त सभा राजा की अनुपस्थिति में हुई। माघ के बचाव के लिए क्या किया जाना चाहिए, राज्य के मूर्धन्य सदस्यों ने विचार विमर्श किया। लम्बी मंत्रणा के बाद आम सहमति इस बात पर हुई कि संगीत सम्राट तानसेन की मदद ली जाय। योजना गुप्त रखी गयी तथा यह निश्चय हुआ कि जिस समय क्रुद्ध हाथी माघ को मारने के लिए छूटे ठीक उसी समय तानसेन अपनी संगीत लहरी छेड़े । निर्धारित समय पर दूसरे दिन हाथी हुँकार भरते माघ को मारने चला। इसी बीच विलक्षण घटना घटी। तबले के ध्रुपद ताल की तरंगित ध्वनि लहरी ने हाथी को सम्मोहित कर दिया। बढ़ते हुए उसके कदम रुक गये। वह उसी स्थान पर शराबी की भाँति झूमने और नृत्य करने लगा। आये दर्शक भी मन्त्र मुग्ध बने इस अविश्वसनीय दृश्य को देख रहे थे। पर जब तक संगीत चलता रहा हाथी अपनी स्थान से टस से मस नहीं हुआ। अकबर को पूरी बात मालूम हुई। साथ ही अपने गलत निर्णय का भान भी हुआ। संगीत की चमत्कारी शक्ति के कारण पागल हाथी से महान कवि की रक्षा हुई।
बैजू-बाबरा के सम्बन्ध में प्रख्यात है कि जब वह रागनियां छेड़ता था, तो तपती धूप में भी घने बादल आकाश में मण्डराने लगते और वर्षा आरम्भ हो जाती थी। दीपक राग की उच्चस्तरीय सिद्ध के अभ्यास से बुझे हुए दीपकों को भी अपने आप जल उठना होता था। अब तो वे घटनाएँ मात्र किम्वदन्ती बन कर रह गयी हैं। ऐसे नादयोगी अब कहीं नहीं मिलते। तो भी संगीत की शक्ति का अस्तित्व भले बुरे रूपों में एक शक्ति के रूप में आज भी संसार में मौजूद है।
अन्तः सम्वेदनाओं को उभारने में कला साहित्य भाषण उद्बोधन की उपेक्षा संगीत कहीं अधिक समर्थ होता है। विचार अभिव्यक्ति के अन्य माध्यम विचार जगत् को प्रभावित कर पाते हैं, पर संगीत की पहुँच अन्तःकरण के मर्मस्थल तक है। समस्त कलात्मक विभूतियों में उसे सर्वश्रेष्ठ माना गया है। बीन की मधुर ध्वनि हर किसी को आकर्षित करती है। विषैले सर्प तक उस आवाज से मन्त्र-मुग्ध होकर दौड़ते हुए चले आते हैं। रणभेरी की आवाज सुनकर सैनिकों ही नहीं सामान्य मनुष्यों में भी वीरता एवं साहस के भाव संचरित होने लगते हैं। शहनाई की भावुकता प्रख्यात है। विवाह जैसे पुनीत अवसर पर अन्य वाद्य यन्त्रों की तुलना में उसे अधिक महत्व दिया जाता है। संगीत शास्त्र के मर्मज्ञों का मत है कि शहनाई की मादक ध्वनि नये जीवन में प्रविष्ट करने वाले युगल की भावनाओं को तरंगित करती तथा जीवन पर्यन्त परस्पर एक अविच्छिन्न सूत्र में बंधे रहने के लिए सूक्ष्म प्रेरणा तथा प्रभाव छोड़ती है। स्वर के उतार चढ़ाव, गति एवं क्रम को बदल देने से कितना आश्चर्यजनक परिवर्तन हो जाता है यह संगीत में देखा जा सकता है। शहनाई विवाह के सुअवसर पर बजायी जाती और मृत्यु जैसे शोकावसर पर भी। पर एक में नव जीवन का उत्साह-उमंग उमड़ता है। जबकि दूसरे में सभी शोकातुर हो उठते हैं। मृत्यु पर बजने वाली शहनाई कितनों को रुला देती है।
संगीत न केवल विद्या है वरन् एक महाशक्ति है। मन मस्तिष्क की परितृप्ति के अनेकानेक दृश्य अदृश्य साधन हैं स्वाध्याय, दृश्यावलोकन आदि। पर भावनाओं की तृप्ति संगीत के माध्यम से होती है। प्राचीन काल में संगीत के बल पर प्राकृतिक शक्तियों को भी मनचाही दिशा में मोड़ा जा सकना सम्भव था। वह नाद ब्रह्म की साधना थी—उथले मनोरंजन का माध्यम नहीं। जब तक संगीत साधना का विषय रहा तब तक न केवल उसका प्रभाव मनुष्य पर देखा गया वरन् पशुओं को मुग्ध करने साँपों का शमन करने, पागल, जंगली हाथियों को वश में करने से लेकर, फूल खिला देने, पत्थर पिघला देने जैसे असम्भव कार्य तक सम्पन्न कर सकना सम्भव था। पर कालान्तर में संगीत साधना न रहकर मात्र मनोरंजन का विषय भर बनकर रह गया। तो भी उसकी प्रभावोत्पादक क्षमता कम नहीं हुई। उसका प्रत्यक्ष प्रभाव आज भी देखा और अनुभव किया जा सकता है। मधुर गीत और संगीत सुनकर लोग झूमने लगते हैं। अनचाहे भी अधिकाँश व्यक्ति उस धारा में बहने लगते हैं जो स्वर साधक न बहादी हो।
सिनेमा आज संगीत के बलबूते ही इतनी अधिक लोकप्रियता प्राप्त कर रहा है। संगीत को यदि उसमें से निकाल दिया जाय तो उसकी लोकप्रियता दिन प्रतिदिन घटती जायेगी। अब तो वैज्ञानिक भी स्वीकार करने लगे हैं कि संगीत न केवल भावना को तरंगित करता है वरन् शारीरिक स्वास्थ्य पर भी उसका असाधारण प्रभाव पड़ता है। साउण्ड थैरेपी चिकित्सा जगत में नयी उपचार पद्धति के रूप में विकसित हो रही है। मनोरोगों में तो संगीत चिकित्सा रामबाण समझी जा रही है। कितने ही देशों में इस पर गहन अनुसंधान चल रहे हैं।
प्राचीन काल में इन सूक्ष्म विशेषताओं के कारण ही संगीत कला को सर्वाधिक ख्याति मिली थी। दृष्टा ऋषि उन सूक्ष्म प्रभावों से सुपरिचित थे, जहाँ आज के वैज्ञानिकों के निष्कर्ष पहुँच रहे हैं। यही कारण है कि उन्होंने हर महत्वपूर्ण पक्ष में संगीत का समावेश किया था। अपने यहाँ लगभग समस्त महत्वपूर्ण धार्मिक साहित्य काव्यमय है। वेदों की ऋचायें छन्द बद्ध हैं। सामवेद को तो संगीत विद्या का प्रणेता ग्रन्थ समझा जाता है। पुराण काव्यमय हैं। राम एवं कृष्ण के जीवन वृत्तांत काव्यमय हैं। देवी, देवताओं की स्तुति में गाये जाने वाले स्तोत्र स्तवन, भजन-कीर्तन तथा आरतियाँ संगीत मय हैं। हिन्दू धार्मिक वाङ्मय का लगभग नब्बे प्रतिशत भाग काव्यमय है।
संगीत के पतन एवं पराभव का युग मुगल काल से आरम्भ हुआ। देश में उनका आधिपत्य होते ही संगीत ने शृंगार परक रूप धारण कर लिया और कुत्सा भड़काने का एक माध्यम बन गया। कहते हैं कि तत्कालीन हिन्दू राजाओं का अधःपतन उस समय से आरम्भ हुआ जब वे शृंगारिकता में अत्यधिक रस लेने लगे। जनमानस भी आलसी, अकर्मण्य निर्बल और अस्वस्थ बनता गया। फलतः वीरोचित पुरुषार्थ जाता रहा। जीवट के अभाव से पराधीनता का बेड़ियों में जकड़ना पड़ा। समीक्षकों का मत है। मुगलों के हाथों से भारत की सत्ता छीन लेने में अँग्रेज इसलिए सफल हुए कि मुगल शासकों ने भी वही गल्ती दुहरायी जो हिन्दू शासकों ने की थी और अन्ततः अँग्रेज भी उसी चपेट में आये। अपनी सक्रियता जागरुकता तथा कुटनीति के कारण उन्होंने भारत में अंग्रेजी शासन की नींव डाली पर विलासिता के कारण उनका मनोबल जाता रहा और भारतीय जन मानस की जागृत चेतना उन पर चढ़ दौड़ी। फलतः उन्हें यहाँ से भागना पड़ा।
पर एक बार जो संगीत की दुर्दशा आरम्भ हुई वह रुकी नहीं। व्यावसायिक क्षेत्रों में भी इस शक्ति का धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है। बीड़ी, सिगरेट, साबुन तेल पाउडर तथा सौन्दर्य प्रसाधनों का प्रचार संगीत के माध्यम से होता है। बड़े शहरों से लेकर छोटे देहातों तक सड़कों और गलियों में विभिन्न कम्पनियों के प्रचारक भौंड़े भद्दे और अश्लील गीत-गाते, बजाते-घूमते, देखे जा सकते हैं। संगीत की सहोदरा नृत्य कला है। उसका दुरुपयोग खुले रूप में देखा जा सकता है। विज्ञापन प्रचार के लिए नारियों के अभद्र अश्लील और नग्न भाव भंगिमाएँ देखकर सिर शर्म से झुक जाता है। किसी भी विचारशील की आत्मा इस कला की दुर्दशा देखकर दुखी हुए बिना नहीं रहती। रेडियो, सिनेमा टेलीविजन जैसे संचार तंत्रों ने तो लगता है कि यह संकल्प ले लिया हो कि संगीत की शक्ति का नियोजन जन मानस की कुत्सा भड़काने में ही करेंगे।
इस शृंखला में कितनी ही अश्लील कड़ियां जुड़ती जा रही हैं। कहा जा चुका है कि सौम्य सुमधुर संगीत की स्वर लहरियाँ शरीर मन और आत्मा के विकास में सहायक होती हैं पर दुरुपयोग चल पड़े तो संगीत अधःपतन का कारण बन सकता है। पश्चिम की भौतिकवादी सभ्यता का प्रभाव देश की सुशिक्षित युवा पीढ़ी पर पड़ा है। संगीत कला भी उससे प्रभावित हुई है। यूरोपीय देशों में उत्तेजक गायन वादनों को इन दिनों सर्वाधिक महत्व मिल रहा है। पिछले कुछ दशकों में रॉक एण्ड रॉल, पॉप तथा डिस्को जैसे कितने ही नृत्य सम्मिलित संगीत का आविष्कार हुआ है जिनके विषय में मनःशास्त्र विशारदों का कहना है कि वे मानवी कुत्साओं को भड़काने में सर्वाधिक सहायक सिद्ध हो रहे हैं। पश्चिमी संगीत परम्परा में सुरीली धुन या गायन को महत्वपूर्ण नहीं समझा जाता। आमतौर पर वाद्य यन्त्रों के साथ गायन का सामंजस्य स्थापित करके उत्तेजक रसानुभूति पैदा कर देना ही सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। मुक्ति और स्वच्छन्दता का जो मुखर स्वर ‘पॉप’ में सुनने को मिलता है वह अन्य प्रकार के संगीत में नहीं है।
रॉक एण्ड रॉल नृत्य के आविष्कारक एल्विल प्रेस्ले को भारी सफलता पश्चिमी देशों में मिली। स्वच्छंदवादी विचारधारा के समर्थक युवा पीढ़ी ने उसका भरपूर स्वागत किया। बढ़ती हुई लोकप्रियता को देखते हुए रॉक एण्ड रॉल का सम्राट कहा जाने वाले प्रेस्ले के मन में यह विचार आया कि किसी नयी पद्धति की खोज करनी चाहिए जो और भी उत्तेजक हो तथा सेक्स भावना को भड़काती हो। इस विचार से प्रेरित होकर उसने शब्द विज्ञान का विशद अध्ययन किया तथा संगीत के साथ उसके प्रभावों का परिचय प्राप्त किया। पॉप संगीत की रचना उसने तत्पश्चात की। संगीत शस्त्र के विशेषज्ञों का मत है कि रॉक एण्ड रॉल पर बोली जाने वाली ध्वनि ऊ ऊ ऊ की कराहें सेक्स भावना को असाधारण रूप से बढ़ा देती हैं। इसमें टीन कनस्तर पीट-पीटकर गला फाड़ कर चिल्लाने लगना तथा फूहड़ ढंग से कुल्हे मटकाने जैसा क्रम और जुड़ गया जिसने पॉप को जन्म दिया। इस संगीत न स्वेच्छाचार को अत्यधिक बढ़ावा दिया।
दुर्भाग्यवश भारत में भी उस फूहड़ संगीत की लोक प्रियता बढ़ रही है जो यूरोपीय देशों के चारित्रिक अधःपतन का कारण बन रही है। कैबरे नृत्य को प्रत्येक सिनेमा की सफलता के लिए आवश्यक समझा जा रहा है। व्यावहारिक सफलता के लिए चल-चित्र निर्माता उन सारे गुणों को अपना रहे हैं, जिनसे जन-मानस की भावना को पोषण मिलता हो। निस्सन्देह यह युवा पीढ़ी को पतन की ओर ढकेलने की एक मनोवैज्ञानिक साजिश है जो मनोरंजन के नाम पर चल-चित्रों में भारी लोकप्रियता प्राप्त कर रही है।
यहाँ न तो संगीत रूपी लोकरंजन के स्वरूप को अनुपयोगी ठहराया जा रहा है और न ही सिनेमा जैसे सशक्त तंत्र को निरर्थक ही कहा जा रहा है वरन् उन तथ्यों पर प्रकाश डाला जा रहा है जिनके कारण अपने देश में लोकरंजन के ये माध्यम अपनी उपादेयता नहीं सिद्ध कर पा रहे हैं। कहा जा चुका है कि जनमानस में भली-बुरी प्रेरणायें भरने का यह सबसे सशक्त मनोवैज्ञानिक माध्यम है। जिसका सदुपयोग कितने ही देशों ने नवनिर्माण के लिए किया है तथा कितने ही कर रहे हैं। समय और धन के रूप में बर्बादी की गणना इसलिये की जा रही है, क्योंकि सिनेमा जैसा तन्त्र अपने देश में जन-कुत्सा भड़काने में संलग्न होकर पतनोन्मुखी गतिविधियों को ही बढ़ावा दे रहा है। दोष तन्त्र का नहीं उस पर आधिपत्य रखने वाले उन समर्थ सम्पन्न व्यक्तियों का है जो धन की संकीर्ण स्वार्थपरता से अभिप्रेरित होकर कला के देवता का कीचड़ में धकेलने में तत्पर हैं। समाज और देश की जिन्हें थोड़ी भी चिन्ता नहीं है। पैसा ही उनका इष्ट ह जिसके लिये वे सामाजिक हितों की बलि देने में थोड़ा भी नहीं हिचकते।
अपेक्षा इनसे कुछ विशेष नहीं की जा सकती। अपवादों की बात अलग है। पर मात्र उससे बात नहीं बनती। बहुतायत तो सिनेमा तन्त्र पर आधिपत्य रखने वाले ऐसे व्यक्तियों की है जो संकीर्ण स्वार्थपरता के दलदल से निकलने को तैयार नहीं हैं। ऐसी स्थिति में प्रयास जन-स्तर पर ही करना होगा। एक तरीका यह हो सकता है कि सिनेमा उद्योग के समानान्तर एक नया ऐसा सिनेमा तन्त्र खड़ा कर दिया जाय जिसका एकमात्र लक्ष्य हो—नवसृजन की—समाज एवं देश के सर्वांगीण विकास की प्रेरणायें उभारना। इसके लिए धनशक्ति और प्रबुद्ध जनशक्ति की आवश्यकता पड़ेगी। थोड़े से भावनाशील ऐसे निकल आयें जो इस कार्य के लिए पूँजी लगाने के लिए तैयार हो जायं और थोड़े प्रतिभावान ऐसे मिल जायँ जो अपनी विभिन्न प्रकार की क्षमताओं को इसमें नियोजित कर सकें तो शुभारम्भ की बात बन सकती है।
मात्र कोसते रहने से समाधान नहीं निकलता—कुछ ठोस कदम उठाने से निकलेगा। गाँधीजी का खादी ग्रामोद्योग विदेशी सामानों के विरोध में उभर कर सामने आया, जन-जन में लोकप्रिय हुआ। उत्कृष्टता हर किसी को प्रिय है पर ऐसी प्रेरणा देने के लिए सशक्त आधार चाहिए। मनोरंजन मनुष्य की एक आवश्यक माँग है। जनमानस की इस माँग की आपूर्ति प्रचलित सिनेमातंत्र भली, बुरी प्रेरणाओं के साथ कर रहा है। उत्कृष्ट फिल्मों का निर्माण होने लगे तो कोई कारण नहीं है कि नवनिर्माण का महान् प्रयोजन पूरा न होता रह सके। बुराई को देखकर बुराई पनपती और अच्छाई से सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलता है। अच्छी फिल्मों के निर्माण के लिए तन्त्र खड़ा होते ही पुराने सिनेमा निर्माताओं को अपना ढर्रा बदलने के लिए विवश होना पड़ेगा। लोकरंजन का यह समर्थ माध्यम यदि स्वस्थ मनोरंजन के साथ-साथ सत्प्रवृत्ति संवर्धन की प्रेरणा उभारने में जुट जाय तो देश की प्रगति में असाधारण सहयोग मिल सकता है।

