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Books - सभ्यता, सज्जनता और सुसंस्कारिता का अभिवर्धन

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Language: HINDI
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नीति-सदाचार की घटनाओं को भी प्रकाश में लाया जाय

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चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार और ठगी की घटनाएँ समाचार पत्रों में इतनी बड़ी संख्या में छपती हैं कि इस समय जो कुछ भी हो रहा है, जहाँ-तहाँ जो भी घट रहा है, वह गर्हित ही गर्हित है । समाज में बुराइयों के अलावा कहीं भी कुछ ऐसा नहीं दिखाई देता, जिसे शुभ और उज्ज्वल कहा जा सके, जिस पर गर्व और गौरव किया जा सके। किसी भी दिन का समाचार पत्र उठा कर देख लीजिए, इस तरह के समाचार होंगे या राजनीति की उठा पटक बयान बाजी का विश्लेषण। इन समाचारों, विवरणों और विश्लेषणों को पढ़ कर मन में यही प्रतिक्रिया होती है कि सर्वत्र अन्धेरा ही अन्धेरा छाया हुआ है। प्रश्न उठता है कि क्या सचमुच दुनिया में लूटमार, चोरी-डकैती, ठगी और जाल-साजी के अलावा कहीं कुछ भी ऐसा नहीं घटता जिस शुभ कहा जा सके?

लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि जमाना बड़ा खराब आ गया है। इतना खराब समय है कि किसी का विश्वास नहीं किया जा सकता। जो लोग प्रतिदिन समाचार पत्र पढ़ते हैं, उनकी दृष्टि से निम्न प्रकार के शीर्षक अक्सर गुजरते होंगे—निराश प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को छुरा घुसा दिया और खुद भी आत्म हत्या कर ली ‘‘पत्नी ने प्रेमी से मिलकर पति का जहर दे दिया अथवा गुण्डों से मरवा दिया’’। ‘‘पति न पत्नी का हत्या कर दी या नाक काट ली क्योंकि उसे पत्नी के चरित्र पर संदेह हो गया था।’’ ‘‘डाकुओं के एक दल ने गाँव पर हमला कर दिया आर 16 व्यक्तियों का जिनमें स्त्रियाँ तथा बच्चे भी थे गोली से उड़ा दिया। इसके बाद सभी लूटमार कर चलते बने।’’ ‘‘अमुक व्यक्ति ने अपनी संख्या के अधिकारियों के जाली हस्ताक्षर बना कर इतने हजार रुपये बैंक से निकलवा लिये।’’

अब तो ऐसी पत्रिकाएँ भी बड़ी संख्या में छपने लगी हैं जिनमें हर तरह के अपराधों और अपराधियों के चरित्र व जीवन विवरण को बहुत ही चटखारे लेकर छापा जाता है। इस तरह के प्रकाशित होने वाले मासिक तथा पाक्षिक पत्रों की संख्या करीब 1000 बताई गई है। इनमें से कई की प्रसार संख्या 40-50 हजार से लेकर 2-3 लाख तक है। एक प्रसिद्ध पत्रकार ने प्रकाशन नीति के इस परिवर्तन की ओर इंगित करते हुए लिखा था पिछले कुछ महीनों में अधिकाँश मासिक पत्रिकाओं की दृष्टि ने जो करवट बदली है, वह चिन्ता जनक है। इन पत्रिकाओं से प्रकाशित कहानियों और अन्य सामग्री का चयन प्रायः विदेशी पत्र पत्रिकाओं के आधार पर किया जाता है। उनका भारतीयकरण किया जाता है और यह बताने की कोशिश की जाती है कि व सारी घटनाएँ सत्य हैं। इन कहानियों का नायक आमतौर पर कोई अपराधी होता है और अपराध कथाओं को रोमांचक बना कर वीरता की शक्ल दी जाती है।

हो सकता है इस तरह की कहानियाँ किन्हीं सच्ची घटनाओं के आधार पर ही लिखी जाती हों, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या अब प्रकाशित करने के लिए इसी तरह की सामग्री बची है। इसके अतिरिक्त सचमुच कहीं कुछ ऐसा नहीं घटता जो अनुकरणीय और अभिनन्दनीय है। क्या भारतीय दर्शन और अध्यात्म हमारे सामाजिक जीवन का रत्ती भर प्रभावित करने में असमर्थ हो गया है? इन दिनों निश्चित ही ऐसा बहुत कुछ घट रहा है जिसे अनुचित अवांछनीय और अपराध पूर्ण कहा जाए, समाज पूरी तरह तमसाच्छादित नहीं हो गया है। जीवन में अंधेरा है तो उजाला भी कम नहीं है। बहुत कुछ अशुभ और अवांछनीय घट रहा है तो ऐसी घटनाएँ भी कम नहीं है जिन पर गर्व और गौरव किया जा सके तथा यह कहा जा सके कि मनुष्यता जीवित है, धरती पर धर्म और नैतिकता, सहायता तथा मानवता जीवित है।

फिर इस पक्ष को सामने क्यों नहीं लाया जाता? जीवन और जगत् में अन्धकार तथा आलोक दानों का ही अस्तित्व विद्यमान है तो क्या कारण है कि आलोक को उपेक्षित छोड़ दिया जाता है तथा अन्धकार को इतना महत्व दिया जाता है। इसका एक कारण तो समझ में आता है कि जो स्वाभाविक होता है उसकी प्रायः उपेक्षा ही होती है। कोई कुत्ता आदमी को काट ले तो यह कोई खबर नहीं बनती किन्तु कोई आदमी कुत्ते का अपने से काटने लगे तो खबर बन जाती है। कहीं कोई मानवीय सम्वेदना को स्पर्श करने वाली घटना घटती है तो उसे अधिक से अधिक पाँच-सात लाइन में छाप कर इति श्री मान ली जाती हैं जबकि अपराध घटनाओं को लम्बे-चौड़े विवरणों के साथ प्रकाशित किया जाता है। यह नीति आलोक और अन्धकार में असंतुलन उत्पन्न करती है परिणाम स्वरूप दुनिया उससे भी ज्यादा बुरी दिखाई देने लगती है जितनी कि वह है और अच्छाई उससे भी कम अनुभव होती है, जितना कि उसका अस्तित्व है।

आवश्यकता इस बात की है इस असन्तुलन को सन्तुलन में बदला जाए और अपराधों का जितना लम्बा चौड़ा विवरण छापा जाता है। उतना ही विस्तृत विवरण मानवीय आदर्शों को प्रेरणा तथा प्रोत्साहन देने वाली घटनाओं को भी प्रकाशित किया जाए। एक बार यदि अन्धेरे पक्ष की उपेक्षा भी कर दी जाए तो कोई विशेष हानि नहीं होगी जबकि आलोक पक्ष की उपेक्षा करने से बड़ी भारी क्षति हो रही है। कहा जाए कि इस अति से लाग मनुष्यता के प्रति अपनी आस्था टूटती सी अनुभव करने लगे हैं तो भी यह अत्युक्तिपूर्ण नहीं होना चाहिए।

जीवन के इस उज्ज्वल पक्ष को सामने लाने का सिलसिला यदि चल पड़े तो सचमुच ही अनेकों असंख्यों व्यक्तियों को वह आलोक पूर्ण पथ अपनाने की प्रेरणा मिलेगी। यह नहीं भूलना चाहिए कि आलोक अन्धकार को दूर करता है और जीवन को जीने योग्य बनाता है। सुबह की रोशनी में रात की कालिमा भूल जाती हैं। जीवन का उज्ज्वल पक्ष यदि सामने आने लगे तो मनुष्यता के प्रति आस्था को नया जीवन और नया प्राण मिलता है। फिर यह दुनिया उतनी बुरी नहीं दिखाई देती और उसमें रस बना रहता है। प्रकाश की सुनहरी किरणें किसे अच्छी नहीं लगती बसन्त की बयार किसे स्फूर्त नहीं करती।

जीवन के उज्ज्वल पक्ष को सामने लाने की आवश्यकता समझ लेने के बाद प्रश्न यह उठता है कि इसके लिए किया क्या जाए? प्रेस और प्रकाशन तो स्वतन्त्र हैं। सबकी अपनी-अपनी नीतियाँ है और वे इन नीतियों के अनुसार ही संचालित हैं। इसलिए उन्हें बदलना तो अपने हाथ की बात नहीं किन्तु पाठक उन पर दबाव तो डाल ही सकते हैं। प्रत्येक जागरुक और विचारशील व्यक्ति को चाहिए कि वे अपने क्षेत्र में प्रचलित समाचार पत्रों के सम्पादकों से प्रेरणा और प्रकाश प्रदान करने वाली घटनाएँ प्रकाशित करने का अनुरोध करें। एकाध दो व्यक्ति इस तरह का अनुरोध करें तो इसे टाला भी जा सकता है, जब बड़ी संख्या में पाठक इस तरह का अनुरोध करेंगे तो सम्पादकों के लिए इसकी उपेक्षा कर पाना लगभग असम्भव ही होगा। आखिर सम्पादक इसी बहाने से तो इस तरह की घटनाओं को महत्व देते हैं कि पाठक यही माँगता है। पाठक जब इसके विपरीत अनुरोध करेंगे तो सम्पादकों के भीतर विद्यमान नैतिक चेतना अनुकूल स्थिति उत्पन्न करेगी।

जो पत्रिकाएँ केवल अपराध कथाओं पर ही जिन्दा हैं, उनको पढ़ने मँगाना या अपने परिवार के किसी सदस्य के हाथ में जाने देना एकदम रोका जाना चाहिए। उनसे भी अनुरोध किया जा सकता है कि वे अपराध कथाओं के स्थान पर आदर्शवादी, चरित्र निर्माण की प्रेरक कथाएँ प्रकाशित किया करें। उससे किसी की ग्राहक संख्या घटेगी नहीं। प्रमाण के तौर पर अपने मिशन की पत्रिकाओं का उदाहरण दिया जा सकता है।

आदर्शवादी प्रेरणाएँ प्रदान करने वाली घटनाओं को सामने लाने के लिए सहकारी आधार पर स्थानीय प्रकाशन योजनाएँ भी बनाई जा सकती हैं। प्रस्तुतिकरण ठीक बन पड़े तो उनकी सफलता में जरा भी संदेह नहीं है। फिर और लोग भी उसका अनुकरण कर सकते हैं। इस प्रकार जीवन का उज्ज्वल पक्ष सामने लाने के लिए कई प्रयास किये जा सकते हैं। ये आवश्यक भी हैं क्योंकि जीवन का उज्ज्वल पक्ष मन का स्फूर्ति देता है और हृदय में उर्मियाँ उत्पन्न करता है। वह अन्तःकरण की मन्द ध्वनि को मुख-करता है। आवश्यकता केवल इसी बात की है कि इसके महत्व को समझा जाए और उस आलोक को प्रस्तुत किया जाए जिसमें अंधकार को निगलने की अखण्ड शक्ति भरी हुई है।

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