Saturday 01, February 2025
विद्या और ज्ञान का त्यौहार बसंत पंचमी |Vidya Aur Gyan Ka Tyohar Vasant Panchmi #
गुरु को वरण करने की शर्त | Guru Ko Varan Karne Ki Shart |
संस्कार और जीवन में सफलता | Sanskar Aur Jivan Me Safalta
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 01 February 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
अकबर बादशाह बिल्कुल बिना पढ़ा था, केवल साइन करना और अपनी दस्तखत करना अकबर, इतना बस जानता था, लेकिन अकबर ने कितना बड़ा मुग़ल साम्राज्य, कितना बड़ा हिंदुस्तान के तवारीखों में क्या खड़ा कर दिया, आपको मालूम है? क्या कहां तक पढ़ा था, एम.ए. तो नहीं किया था, नहीं, बिना पढ़ा आदमी था, जाने क्या कर डाला उसने, और रवींद्रनाथ ठाकुर कहां तक पढ़े थे, सातवें दर्जे तक पढ़े हुए थे, आपको मालूम होना चाहिए, और उसकी वाइफ (सुचितामणि), जो हमारे यूपी के, हमारे यूपी के शिक्षा मंत्री अंग्रेजों के जमाने में थे, लिपीडाइरो नाम का इलाहाबाद से अखबार निकलता था, वह मैट्रिक तक भी नहीं पढ़े थे, इतनी कम कम शिक्षाएं थीं, मित्रों, लेकिन कम कम शिक्षाओं के होते हुए भी, किस कदर किस कदर विकसित होते हुए चले गए, वह थे, उनके स्वभाव और संस्कार, वह न मालूम, उनके मां-बाप ने पैदा कर दिए थे या उन्होंने स्कूलों में पढ़ लिए थे या कहां से लेकर के आए थे, हमें मालूम नहीं है, लेकिन असली कीमत और असली संपदा उनकी वह थी, जिसको हम स्वभाव और संस्कार कहते हैं, स्वभाव और संस्कारों का शिक्षण करने के लिए हमें क्या करना पड़ेगा? हमें अपने बच्चों के बच्चों को भी नसीहत देनी पड़ेगी और उनके अभिभावकों को और उनके माता-पिता को भी नसीहत देनी पड़ेगी।
पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
अखण्ड-ज्योति परिवार में हर जाति एवं उपजाति के लोग मौजूद हैं। उसकी छाँट करके प्रारम्भिक रूप में प्रगतिशील जातीय सभाएं गठित कर दी जावेंगी, पर उतने थोड़े लोगों के संगठन किसी जाति पर व्यापक प्रभाव कहाँ डाल सकेंगे? उन्हें अपने-अपने संगठनों का व्यापक विस्तार करना होगा। प्रगतिशीलता का तात्पर्य और उद्देश्य समझाने के लिए उन्हें अपने-अपने कार्य क्षेत्र में दर दर मारा-मारा फिरता पड़ेगा। संगठन का उद्देश्य और कार्यक्रम समझ लेने पर ही तो कोई उससे प्रभावित होगा और उसमें सम्मिलित होने की तैयारी करेगा।
कहने पर से तो इन संस्थाओं के सदस्य सब लोग बन नहीं जायेंगे और यदि बन भी गये तो उनमें वह साहस कहाँ से आवेगा, जिसके बल बूते पर वह बहती नदी के प्रवाह को चीर कर उलटी चलने वाली मछली की तरह नवीन परम्परा स्थापित करने का आदर्श उपस्थित कर सकें निश्चय ही इसके लिए व्यापक प्रचार और प्रयास की जरूरत होगी। जन-संपर्क बनाने के लिए दौरे करने पड़ेंगे, उद्देश्य को समझा सकने वाला साहित्य-जनता तक पहुँचना पड़ेगा और उनके मस्तिष्क में वह भावना भरनी पड़ेगी जिससे वे युगधर्म को पहचान सकें और प्रतिगामिता की हानियों और प्रगतिशीलता के लाभों से परिचित हो सकें।
जातियों के क्षेत्र छोटे-छोटे हैं बिखरे हुए पड़े हैं, उन बिखरे हुए मन को को एक सूत्र में पिरोने में कितने मनोयोग की आवश्यकता है उसे कार्यक्षेत्र में उतरने वाले ही जानते हैं। कितना विरोध, कितना उपहास, कितना व्यंग सहना पड़ता है, कितना समय नष्ट करना पड़ता है उसे वही सहन कर सकेगा जिसमें त्यागी तपस्वी जैसी भावना विद्यमान हो। घर बैठे मुफ्त में यश को लूट भागने वाले बातूनी लोग इस प्रयोजन को पूरा कहाँ कर सकेंगे? इसलिए सबसे पहली आवश्यकता ऐसे भावनाशील लोगों की ही पड़ेगी, जो युग की सब से बड़ी आवश्यकता-सामाजिक क्रान्ति के लिए अपनी सच्ची श्रद्धा को अञ्जलि में लेकर संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए साहस पूर्ण कदम बढ़ा सकें।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मार्च1964 पृष्ठ 52
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