Wednesday 01, October 2025
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अमृतवाणी: खर्चीली शादियाँ हमें कैसे दरिद्र बनाती हैं पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
खर्चीली शादियां हमें दरिद्र, बीमार और गरीब बनाती हैं। शादियां हिंदुस्तान में एक ऐसी बीमारी हैं। आपने कितनी बीमारियों का नाम सुना होगा — एक का नाम टीबी है, एक का नाम बुखार है, एक का नाम मलेरिया है। फिर एक बीमारी ऐसी है जो गरीबी का मुख्य कारण है।
कोई भी ब्याह, शादी हो — छोटा हो, बड़ा हो — दो हजार, पाँच हजार, दस हजार रुपया खर्च करने पड़ते हैं। और उतना रुपया खर्च न किया जाए, उसके बदले का एक पम्प पानी का लगा दिया जाए, उसके बदले कुछ और दुकान कर ली जाए, कुछ और काम किया जाए, तो घरों की माली हालत सुधरेगी कि नहीं सुधरेगी?
इसलिए माली हालत सुधारने के लिए, गरीबी को दूर करने के लिए — हम ट्यूबवेल तो लगा नहीं सकते, पर हम ये जरूर कर सकते हैं कि खर्चीली शादियों को समाप्त किया जाए।
लोग ऐसी शादियां करें, जिसमें कोई एक पैसा भी खर्च न होता हो। हमारे यहां भी, यहाँ शांतिकुंज में भी, लोग आते हैं। हर साल सैकड़ों शादियां होती हैं। इसमें किसी को न एक पैसा देना पड़ता है, न लेना पड़ता है।
बस आते हैं और यहाँ भोजन कर जाते हैं। और लड़का-लड़की आते हैं, मां-बाप आते हैं और चले जाते हैं। इसके अलावा हमारे यज्ञों में भी तमाम जगह यह होता है कि बिना सगाई, बिना खर्चे की शादियां होती हैं — बिना खर्चे की शादियां, बिना खर्चे की शादियां।
जिसमें न बारात जाएगी, न दहेज दिया जाएगा, न जेवर दिया जाएगा। ये सब काम में जेवरों में कितना रुपया खराब होता है।
सोना, जो कि हमारे राष्ट्रीय बैंकों में जमा होना चाहिए — कोई जेवर पहनता है, कोई क्या करता है — ये सब ब्याह-शादियों में दिखाने के लिए जेवर रखे रहते हैं।
पर जो मेहमान आते हैं, वो भी जेवर पहन के आते हैं। चढ़ावा बहू के लिए — वो भी जेवर बन के आते हैं।
तो ये जेवरों का खंडन भी इसमें हो जाता है। उसमें धूमधाम में बारात चढ़ती है, फलाना होता है, दावतें होती हैं, दहेज देना पड़ता है, मकान बेचना पड़ता है, खेत बेचना पड़ता है।
इन सब कामों को दूर करने के लिए, हमारा तीसरा वाला कार्यक्रम ये है — कि हम खर्चीली शादियों से दूर करेंगे।
अखण्ड-ज्योति से
यह पाँच नियम अनुष्ठान काल में पालन किये जाने चाहिए। जप का शताँश हवन किया जाना चाहिए। प्रतिदिन हवन करना हो तो 27 आहुतियां, अंत में करना हो तो 240 आहुतियों का हवन करना चाहिए। पूर्णाहुति के बाद प्रसाद वितरण, कन्या भोजन आदि का प्रबन्ध अपनी सामर्थ्य अनुसार करना उत्तम है। अच्छा तो यह है कि एक या दो दिन का सामूहिक आयोजन किया जाय, जिसमें गायत्री महाशक्ति का स्वरूप और उपयोग संबंधी प्रवचन हों। अंत में सत्संकल्प दुहराया जाना हमारे हर धर्मानुष्ठान का आवश्यक अंग होना चाहिए।
जो उपयोग अनुष्ठान नहीं कर सकते वे 240 गायत्री चालीसा का पाठ करके अथवा 2400 गायत्री मंत्र लिख कर भी सरल अनुष्ठान कर सकते हैं। इसके साथ पाँच प्रतिबंध अनिवार्य नहीं, पर ब्रह्मचर्य आदि नियम जितने कुछ पालन किए जा सकें, उतना ही उत्कृष्ट माना जावेगा।
युगसृजन अभियान में नवरात्रि पर्व को साधना सत्र के रूप में नियोजित करने और सफल बनाने पर आरंभ से ही बहुत जोर दिया जाता रहा है। इसमें उपासना और साधना के उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। उपासना से आत्मकल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही है। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ-वानर, कृष्णकाल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि महान प्रयोजनों की पूर्ति के लिए सज्जनों की सहकारिता सम्पादित किये बिना और कोई चारा नहीं। देवताओं की संयुक्त शक्ति दुर्गा ने ही उन्हें असुरों के त्रास से छुड़ाया था। ऋषियों का संचित रक्त घट ही सीता को जन्म देकर और दानवी विभीषिकाओं को निरस्त करने का आधारभूत कारण बना था।
.........क्रमश: जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1996
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