Saturday 01, March 2025
शुक्ल पक्ष तृतीया, फाल्गुन 2025
पंचांग 02/03/2025 • March 02, 2025
फाल्गुन शुक्ल पक्ष तृतीया, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत 1946 (क्रोधी संवत्सर), फाल्गुन | तृतीया तिथि 09:02 PM तक उपरांत चतुर्थी | नक्षत्र उत्तरभाद्रपदा 08:59 AM तक उपरांत रेवती 06:39 AM तक उपरांत अश्विनी | शुभ योग 12:39 PM तक, उसके बाद शुक्ल योग | करण तैतिल 10:35 AM तक, बाद गर 09:02 PM तक, बाद वणिज |
मार्च 02 रविवार को राहु 04:46 PM से 06:12 PM तक है | 06:39 AM तक चन्द्रमा मीन उपरांत मेष राशि पर संचार करेगा |
सूर्योदय 6:46 AM सूर्यास्त 6:12 PM चन्द्रोदय 8:01 AM चन्द्रास्त 8:59 PM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु वसंत
- विक्रम संवत - 2081, पिंगल
- शक सम्वत - 1946, क्रोधी
- पूर्णिमांत - फाल्गुन
- अमांत - फाल्गुन
तिथि
- शुक्ल पक्ष तृतीया
- Mar 02 12:09 AM – Mar 02 09:02 PM - शुक्ल पक्ष चतुर्थी
- Mar 02 09:02 PM – Mar 03 06:02 PM
नक्षत्र
- उत्तरभाद्रपदा - Mar 01 11:22 AM – Mar 02 08:59 AM
- रेवती - Mar 02 08:59 AM – Mar 03 06:39 AM
- अश्विनी - Mar 03 06:39 AM – Mar 04 04:29 AM
SHRAVAN
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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जिस आदमी को मार्केटिंग आता है, वह बहुत जानकार आदमी है और जो आदमी मार्केटिंग सीख गया, वह सब काम सीख गया। पैसे आप दीजिए मत, पैसे आप लेकर के जाएं, इसके लिए शिक्षण करने दीजिए, किस तरीके से कहां खर्च किया जाएगा। चटोरा मत होने दीजिए। चटोरा आपका बच्चा हो गया तो आप ख्याल रखना, आगे जाकर के अपनी सेहत खराब कर लेगा। जिस आदमी का जीभ पर काबू नहीं है, वह सेहत खराब करेगा। जिस आदमी का जीभ पर काबू नहीं है, वह सेहत खराब करेगा। जिस आदमी का जबान पर काबू नहीं है, वह मित्रों वह कभी स्वस्थ नहीं रह सकता। वह अभी यह खाएगा, अभी यह खाएगा, अभी यह खाएगा, और बाजार में से खाएगा, घर में से खाएगा, मसाले डालेगा और मिर्ची डालेगा, ज्यादा खा जाएगा, यह करेगा, वह तो बीमार ही पड़ेगा। जिस आदमी को जुबान पर काबू नहीं आया, वह बच्चों को जुबान पर काबू करना सिखाना चाहिए और दूसरे-दूसरे बच्चे, जब बाजार में से कोई कुल्फी की बर्फ लेके खा रहे हों, तो उसके मन में यह भाव होना चाहिए कि यह तो गंदे लड़के हैं और हम कैसे खाते हैं? ये कुल्फी की बर्फ, जाने कैसे बनाई है, कैसे बर्फ बनाई है? हम नहीं खा सकते और हम क्यों खाएंगे? यह मान का और स्वाभिमान का भाव उसके अंदर आना चाहिए। चटोरेपन से दूर रहने की नसीहत दें। चटोरेपन से दूर होने की शिक्षाएं बच्चों को वहीं से देनी चाहिए। यह जरा-जरा सी बात मैं कह रहा था, आप तो समझ रहे होंगे कि गुरुजी आज तो आपने बहुत छोटी-छोटी बातें बता दी। बेटा, मैं क्या कह सकता हूं, यह छोटी-छोटी बातें ही हैं जिनसे कि आदमी के स्वभाव बनते हैं, उसके गुण बनते हैं, कर्म बनते हैं। महान तो दुनिया में कितने लोग हुए हैं इन छोटी-छोटी राई राई की नोक के बराबर और एक कानी कौड़ी के बराबर बातों के फलस्वरूप विकसित हुए हैं और महापुरुष बने हैं। इन्हीं में कमी आ जाने की वजह से, जो कि छोटी उम्र में कमी आ जाती है, उन्हीं का, उन्हीं का होते होते, आदमी कहां से कहां जा पहुंचता है। रेलगाड़ी का एक दिन आपको उदाहरण दे रहा था। रेलगाड़ी का सिग्नल गिराते हैं और सिग्नल गिराते हैं और सिग्नल गिरा करके गाड़ियों की दो पटरियां मिला दी जाती हैं। जरा सी घूम जाती हैं, घूम जरा सी होती है। लेकिन उस पर घूमती हुई गाड़ी एक मुंबई जा पहुंचती है। एक बार हम सिग्नल गिरा देते हैं और वह उसके पाइंट रेलगाड़ी के मिल जाते हैं और उसी पर चलते हुए रेलगाड़ी मुंबई जा पहुंचती है। जमीन आसमान का फर्क पड़ जाता है। यह सिग्नल गिराने की विधियां हैं, यह बालकपन की हैं, बालकपन की हैं। अगर आप इसी से अपने बच्चे को संस्कारवान और सुयोग्य और सुसंस्कृत बना दिया, बड़े होने पर वह बड़ा शानदार आदमी बनेगा और महापुरुष बनेगा और व्यवस्था करने वाला बनेगा और खुशहाल बनेगा और स्वस्थ बनेगा और निरोग बनेगा। अपने जीवन में गरीबी के दिनों के, गरीबी की परिस्थितियों में रह करके भी वह विकासोन्मुख होगा।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
हमारे आध्यात्मिक लक्ष्य की आधारशिला मन की स्वच्छता है। जप, तप, भजन, ध्यान, व्रत, उपवास, तीर्थ, हवन, दान, पुण्य, कथा, कीर्तन सभी का महत्व है पर उनका पूरा लाभ उन्ही को मिलता है जिनने मन की स्वच्छता के लिए भी समुचित श्रम किया है। मन मलीन हो, दुष्टता एवं नीचता की दुष्प्रवृत्तियों से मन गन्दी कीचड़ की तरह सड़ रहा हो तो भजन-पूजन का भी कितना लाभ मिलने वाला है? अन्तरात्मा की निर्मलता अपने आप में एक साधन है जिसमें किलोल करने के लिए भगवान स्वयं दौड़े आते हैं। थोड़ी साधना से भी आत्म-दर्शन का, मुक्ति एवं साक्षात्कार का लक्ष्य सहज ही प्राप्त हो जाता है। स्वल्प साधना भी उनके लिए सिद्धिदायिनी बन जाती है।
‘सुमनस्’ शब्द संस्कृत भाषा में बहुत ही प्रतिष्ठा का प्रतीक है। जिसका मन स्वच्छ होता है उसे ‘सुमनस्’ कहकर सम्मानित किया जाता है। ऋषि लोग प्रसन्न होकर किसी को ‘सौमनस्’ अर्थात् सुन्दर मन वाला होने का आशीर्वाद दिया करते थे। प्रस्तुत-इस निकम्में प्राणी मनुष्य में यदि कोई विशेषता हो सकती है तो वह उसकी मानसिक स्वच्छता ही है। जिसे यह सम्पदा प्राप्त हुई उसका जीवन सच्चे अर्थों में सफल हो गया। स्वच्छ मन वाले मानवों का देव समाज जहाँ बढ़ता है, वहीं स्वर्ग बन जाता है। स्थान चाहे पृथ्वी हो या कोई और लोक, वहीं रहेगा जहाँ ऊँचे मन वाले मनुष्य रहेंगे। किसी राष्ट्र की दौलत सोना, चाँदी नहीं वरन् वहाँ उच्च मन वाली जनता ही है। श्रेष्ठ मनुष्य का मूल्य सोने और चाँदी के पहाड़ से अधिक है। गाँधी और बुद्ध की कीमत रूपयों में नहीं आँकी जा सकती।
आम लोगों की मनोभूमि तथा परिस्थिति, कामना, वासना, लालसा, संकीर्णता और कायरता के ढर्रे में घूमती रहती है। इस चक्र में घूमता रहने वाला किसी तरह जिन्दगी के दिन ही पूरे कर सकता है। तीर्थयात्रा, व्रत, उद्यापन, कथा, कीर्तन, प्रणाम, प्राणायाम जैसे माध्यम मन बहलाने के लिए ठीक हैं, पर उनसे किसी को आत्मा की प्राप्ति या ईश्वर दर्शन जैसे महान् लाभ पाने की आशा नहीं करनी चाहिए। उपासना से नहीं, साधना से कल्याण की प्राप्ति होती और जीवन साधना के लिए व्यक्तिगत जीवन में इतना आदर्शवाद तो प्रतिष्ठापित करना होता है जिसमें लोक-मंगल के लिए महत्वपूर्ण स्थान एवं अनुदान सम्भव हो सके।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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