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Thursday 27, February 2025

कृष्ण पक्ष प्रथमा, फाल्गुन 2025




पंचांग 28/02/2025 • February 28, 2025

फाल्गुन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत 1946 (क्रोधी संवत्सर), फाल्गुन | प्रतिपदा तिथि 03:16 AM तक उपरांत द्वितीया | नक्षत्र शतभिषा 01:40 PM तक उपरांत पूर्वभाद्रपदा | सिद्ध योग 08:07 PM तक, उसके बाद साध्य योग | करण किस्तुघन 04:47 PM तक, बाद बव 03:16 AM तक, बाद बालव |

फरवरी 28 शुक्रवार को राहु 11:04 AM से 12:29 PM तक है | 05:57 AM तक चन्द्रमा कुंभ उपरांत मीन राशि पर संचार करेगा |

 

सूर्योदय 6:48 AM सूर्यास्त 6:11 PM चन्द्रोदय 6:55 AM चन्द्रास्त 6:43 PM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु वसंत

 

  1. विक्रम संवत - 2081, पिंगल
  2. शक सम्वत - 1946, क्रोधी
  3. पूर्णिमांत - फाल्गुन
  4. अमांत - फाल्गुन

तिथि

  1. शुक्ल पक्ष प्रतिपदा   - Feb 28 06:14 AM – Mar 01 03:16 AM
  2. शुक्ल पक्ष द्वितीया   - Mar 01 03:16 AM – Mar 02 12:09 AM

नक्षत्र

  1. शतभिषा - Feb 27 03:43 PM – Feb 28 01:40 PM
  2. पूर्वभाद्रपदा - Feb 28 01:40 PM – Mar 01 11:22 AM


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मन लगाकर काम करने का महत्व | Man Lga Kar Kam Krne Ka Mehtav

मन लगाकर काम करने का महत्व | Man Lga Kar Kam Krne Ka Mehtav

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अमृतवाणी:- अध्यात्म का नाम है आदर्शवादिता | Adhytam Ka Nam Hai Adarshvadita

अमृतवाणी:- अध्यात्म का नाम है आदर्शवादिता | Adhytam Ka Nam Hai Adarshvadita

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! आज के दिव्य दर्शन 28 February 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



मित्रों, स्वावलंबी जीवन की शिक्षा, स्वावलंबी की जीवन की शिक्षा आप अपने यहां न भी करा सकें तो भी कम से कम अपना काम स्वयं करने वाली बात, बाजार से साग खरीद करके लाने वाली बात, कुएं में से बाल्टी का पानी भरके लाने वाली बात, आपके घर में गाय भैंस हैं तो गोबर उठाने वाली बात, यह सारी की सारी श्रमशीलता की बात है और काम में बेज्जती न समझने की बात है। काम में यहां तो हर काम में बेइज्जती फिर जाती है। चपरासी हर काम के लिए चाहिए। हां, पानी भी पीना है तो चपरासी घंटी बजाएंगे, तब पानी पीने के लिए जाएंगे। यह बराबर वाली मेज पर, उस बराबर वाले प्लेट को आपको आर्डर देनी है कि चपरासी घंटी बजाएंगे, चपरासी आएगा और उसको लेकर के जाएगा। पड़ोस वाली मेज वाले को दे करके आएगा। आपको देने में भाई साहब दिल न लग रहा। आप काम कर लीजिए। उन्होंने कहा, हम कैसे कर सकते हैं? काम करना तो बड़ी बेइज्जती की बात है। जिस काम में यह चीज काम करना, बेइज्जती की निशानी समझी जाती हो और हरामखोरी, जिसको भाग्य की निशानी समझी जाती हो, वह तो कौम नष्ट ही होने वाली है। वह तो मरेगी ही। उसकी तो कभी उन्नति हो ही नहीं सकती। उस आदमी का, तो कौम का, तो पतन हो गया। उस आदमी का, उस देश का तो सर्वनाश होने वाला है, जिसमें काम के प्रति काम के प्रति असम्मान की भावना उत्पन्न हो जाए। उन बच्चों में, मित्रों, हमको उन बच्चों को भी शिक्षण करना पड़ेगा। बच्चों को भी यह बताना पड़ेगा। अभिभावकों को भी बताना पड़ेगा और उनके अध्यापकों को भी बताना पड़ेगा। बच्चों को काम करने की शिक्षा, हेल्प करने की शिक्षाएं, परिश्रम करने की शिक्षाएं, काम में बेइज्जती न समझने की शिक्षाएं, हर काम को छोटे से छोटा समझा जाता है। उस काम को भी अच्छा, शानदार समझने की शिक्षाएं हमको अपने बालकों को देनी चाहिए और हमको जरूर देनी चाहिए।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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अखण्ड-ज्योति से



काश! मनुष्य ने मन की स्वच्छता  का महत्व समझ पाया होता तो उसका जीवन कितने आनन्द और उल्लास के साथ व्यतीत हुआ होता। दूसरों की श्रेष्ठता को देखने वाली, उसमें अच्छाइयाँ तलाश करने वाली यदि अपनी प्रेम-दृष्टि जग पड़े तो बुरे लोगों में भी बहुत कुछ आनन्ददायक, बहुत कुछ अच्छा, कुछ अनुकरणीय हमें दीख पड़े। दत्तात्रेय ऋषि ने जब अपनी दोष-दृष्टि त्यागकर श्रेष्ठता ढूँढ़ने वाली वृत्ति जागृत कर ली तो उन्हें चील, कौए, कुत्ते, मकड़ी, मछली, जैसे तुच्छ प्राणी भी गुणों के भण्डागार दीख पड़े और वे ऐसे ही तुच्छ जीवों को अपना गुरु बनाते गये उनसे बहुत कुछ सीखते गये।

 हम चाहें तो चोरों  से भी सावधानी, सतर्कता, साहस, लगन, ढूँढ़-खोज जैसे अनेक गुण सीख सकते हैं।  वे इस दृष्टि से कहीं अधिक आगे होते हैं। पाप की उपेक्षा कर पुण्य को और अशुभ की उपेक्षा कर शुभ को तलाश करने का स्वभाव यदि बन जाय तो इस सांसर में हमें सर्वत्र ईश्वर ही ईश्वर चमकता नजर आवे। उसकी इस पुण्य कृति में सर्वत्र आनन्द ही आनन्द झरता दीखने लगे। सारी दुनियाँ हमारे लिए उपकार, सहयोग, स्नेह और सद्भावना का उपकार लिए खड़ी है, पर हम उसे देख कहाँ पाते हैं, मन की मलीनता तो हमें केवल दुर्गन्ध सूँघने और गन्दगी ढूँढ़ने के लिए ही विवश किए रहती है।

ईमानदारी और मेहनत से जो कमाई की जाती है उसी से आदमी फलता-फूलता है, यह बात यदि मन में बैठ जाय तो हम सादगी और किफायत का जीवन व्यतीत करते हुए सन्तोष पूर्वक अपना निर्वाह करेंगे। धर्म उपाॢजत कमाई का अनीति से अछूता अन्न हमारी नस-नाड़ियों में रक्त बनकर घूमेगा तो हमारा आत्म-सम्मान और आत्म-गौरव क्यों न आकाश को चूमने लगेगा? क्यों न हम हिमालय जैसा ऊँ चा मस्तक रख सकेंगे? और क्यों हमें हमारी महानता का— उत्कृष्टता का अनुभव होने से अन्तः करण में सन्तोष एवं गर्व भरा न दिखेगा?
 

प्यार आत्मीयता, ममता की आँखों से जब हम दूसरों को देखेंगे तो वे हमें अपने ही दिखाई पड़ेंगे। अपने छोटे से कुटुम्ब को देख-देखकर हमेंं आनन्द होता है। फिर यदि हम दूसरों को—बाहर वालों को भी उसी आँख से देखें तो वे भी अपने ही प्रतीत होंगे। अपने कुटुम्बियों के जब हम अनेक दोष-दुर्गुण हम बर्दाश्त करते हैं, उन्हें भूलते -छिपाते और क्षमा करते हैं, तो बाहर वालों के प्रति वैसा क्यों नही किया जा सकता। उदारता, सेवा, सहयोग, स्नेह, नेकी और भलाई की प्रवृत्ति को यदि हम विकसित कर लें, तो देवता योनि प्राप्त होने का आनन्द हमें इसी मनुष्य जन्म में मिल सकता है। हमारी भलमनसाहत और सज्जनता का कोई थोड़ा दुरूपयोग कर ले, उससे अनुचित लाभ उठा ले , इतने पर भी उस ठगने वाले के स्वयं अपने मन पर भी आपकी सज्जनता की छाप पड़ी रहेगी और वह कभी न कभी उसके लिए पश्चाताप करता हुआ सुधार की ओर चलेगा।

अनेक सन्तों और सज्जनों के ऐसे उदाहरण हैं जिनने दुष्टता को अपनी सज्जनता से जीता है। फिर चालाक आदमी भी तो दूसरे अधिक चालाकों द्वारा ठग लिए जाते हैं, वे भी कहाँ सदा बिना ठगे बने रहते हैं। फिर यदि हमें अपनी भलमनसाहत के कारण कभी कुछ ठगा जान पड़ा तो इसमें कौन-सी बहुत बड़ी बात हो गई जिसके लिए पछताया जाय। छोटा बच्चा जिसे हम अपना मानते हैं जन्म से लेकर वयस्क होने तक हमें ठगता ही तो रहता है, उस पर जब हम नही झुँझलाते तो श्रम-धर्म से परिपूर्ण हृदय हो जाने पर दूसरों पर भी क्यों झुँझलाहट आवेगी।

.... क्रमशः जारी
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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