Tuesday 25, February 2025
कृष्ण पक्ष त्रयोदशी, फाल्गुन 2025
पंचांग 26/02/2025 • February 26, 2025
फाल्गुन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत 1946 (क्रोधी संवत्सर), माघ | त्रयोदशी तिथि 11:08 AM तक उपरांत चतुर्दशी | नक्षत्र श्रवण 05:23 PM तक उपरांत धनिष्ठा | परिघ योग 02:57 AM तक, उसके बाद शिव योग | करण वणिज 11:08 AM तक, बाद विष्टि 10:05 PM तक, बाद शकुनि |
फरवरी 26 बुधवार को राहु 12:30 PM से 01:55 PM तक है | 04:37 AM तक चन्द्रमा मकर उपरांत कुंभ राशि पर संचार करेगा |
सूर्योदय 6:50 AM सूर्यास्त 6:10 PM चन्द्रोदय 5:42 AM चन्द्रास्त 4:27 PM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु वसंत
- विक्रम संवत - 2081, पिंगल
- शक सम्वत - 1946, क्रोधी
- पूर्णिमांत - फाल्गुन
- अमांत - माघ
तिथि
- कृष्ण पक्ष त्रयोदशी
- Feb 25 12:47 PM – Feb 26 11:08 AM - कृष्ण पक्ष चतुर्दशी
- Feb 26 11:08 AM – Feb 27 08:54 AM
नक्षत्र
- श्रवण - Feb 25 06:30 PM – Feb 26 05:23 PM
- धनिष्ठा - Feb 26 05:23 PM – Feb 27 03:43 PM
SHRAVAN
महादेव शिव की महिमा | Mahadev Shiv Ki Mahima
आंतरिक दुर्बलताओं से लड़ें, Aantarik Durbalataon Se Lade
मनोविश्लेषण आधुनिक समय का एक विशेष तथा नवीन विज्ञान माना जा रहा है। यह मनोविज्ञान पाश्चात्य देशों के लिये कोई नवीन अथवा विज्ञान हो सकता है। किन्तु भारत के लिये यह एक प्राचीन विषय है। दुःख सुख की अनुभूतियां, काम क्रोध, लोभ-मोह आदि की वृत्तियों, उनका कारण एवं निवारण का उपाय इस देश का चिर परिचित तथा प्राचीन विषय है। अन्तर केवल यह है कि भारत के प्राचीन वेत्ताओं ने इस विषय को दर्शन का नाम दिया था और आज के पाश्चात्य विद्वानों ने इसे मनोज्ञान अथवा मानस-विज्ञान की संज्ञा दी है। ध्येय दोनों का मनःस्थिति द्वारा आन्तरिक सुख शान्ति ही रहा है।
सुख-दुःख की अनुभूति मन में होती है। अस्तु, मन की स्थिति पर सुख दुःख का आना जाना स्वाभाविक है। पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्य सांसारिक प्राणी है। उसका संसार के विषयों की ओर झुकाव होना अनिवार्य है। संसार में जहां इच्छा, अभिलाषाओं तथा कामनाओं का बाहुल्य है वहां शोक संघर्षों की भी कमी नहीं है। संसार में निवास करने वाला मनुष्य इन अवस्थाओं से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। कामनायें होंगी, अभाव खटकेगा, फलस्वरूप मन को अशान्ति होगी। मन अशांत रहने पर तरह-तरह की बाधाओं तथा व्यामोहों का जन्म होगा और चिन्ताओं की वृद्धि होगी, जिसका परिणाम दुःख के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता।
पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों का यह कथन किसी प्रकार भी गलत नहीं कहा जा सकता। निःसन्देह बाधाओं का यही क्रम है जिससे मनुष्य को दुःख का अनुभव करने के लिये विवश होना पड़ता है। किन्तु उनके इस कथन से जो यह ध्वनि निकलती है कि मनुष्य को दुःख होना ही स्थायी अनुभूति है अथवा सांसारिक स्थिति के अनुसार पीड़ा उसका प्रारब्ध भाग है—ठीक नहीं।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 8
जाने क्यों हैं देवों के देव महादेव | Jane Kyun Hai Devo Ke Dev Mahadev
देवत्व की शक्ति को जागृत करने के लिए 5 आसान तरीके। अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य
प्रज्ञेश्वर महादेव दर्शन : महाशिवरात्रि के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।
महाशिवरात्रि के इस पावन पर्व पर आपको सुख, शांति और समृद्धि की शुभकामनाएं।
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🕉️ 🙏🏻देवाधिदेव महादेव भगवान भोलेनाथ के आराधना के पावन पर्व महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ 🕉️🙏🏻
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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 26 February 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जो बया का घोंसला, जो बनता है, बया का जो घोंसला बनता है, काहे से बनता है? छोटे-छोटे तिनकों से बनता है, लेकिन वह तिनके बड़ी तमीज के साथ, सभ्यता के साथ, मनोयोग के साथ, व्यवस्था के हिसाब से लगाए जाते हैं। इसलिए बया का घोंसला कैसा खूबसूरत और कैसा मजबूत और कितना शानदार बन जाता है। और वह कबूतर, कबूतर जो है, यहां पर एक तिनका डाल दिया, एक तिनका वहां डाल दिया, एक तिनका वहां डाल दिया, फूहड़पन से तिनके वही होते हैं, बल्कि छतरी से और बड़े होते हैं। बया के घोसले के माफिक तिनके तो जरा-जरा से होते हैं, और कबूतर के तिनके और बड़े होते हैं, लेकिन वह फूहड़पन से और बेवकूफी से एक यहां पटक दिया और एक यहां डाल दिया। सब जैसे हवा का झोंका आया और वह घोंसला भी गिरा, अंडे भी गिरे और बच्चे भी मरे, सब गिर, मर के खत्म हो जाते हैं। बेवकूफी है न? व्यवस्था करना नहीं आता, न हर चीज को सही तरह से काम नहीं करता, न मनोयोग से काम नहीं करता। न मनोयोग से काम नहीं करेगा, मित्रों, उस कबूतर की तरीके से अपनी जिंदगी की प्रत्येक सुविधा और उन्नति के समय को बर्बाद करता हुआ चला जाएगा और तबाह करता हुआ चला जाएगा। और जो उसकी दौलत, मालदारी थोक की वजह से इसको भोग करता हुआ चला जाएगा। आप इस बात को निकाल दीजिए दिमाग में से, जितनी जल्दी निकालना हो, उतनी जल्दी निकाल दीजिए। हमने अपने बेटी और पोतों के लिए, औलाद के लिए, हमने बहुत सारा पैसा जमा करके रख दिया है, किराए भाड़े की आमदनी करके रख दिया है, किराए भाड़े की आमदनी करके रख दिया है और बैंक में रुपया जमा कर दिया। यह मित्रों, आपने तबाही का रास्ता तय कर दिया है। आप सही मानिए, आपने उसकी तबाही का रास्ता खड़ा कर दिया। अगर आपने उसे गरीब रखा होता और इस तरीके से बाहर विदेशों में, बाहर विदेशों में, छोटेपन से ही स्वावलंबी बनाने की शिक्षाएं देते हैं, वैसे ही आपने भी दी होती, तो मजा आ जाता।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
'इ' में त्रितापहारिणी शक्ति है। 'व' अक्षर में अमृतवर्षा समायी है। तभी तो शिव में कल्याण की शाश्वतता और निरंतरता है। यही सत्य, शिव शब्द का सम्यक अर्थ है। शिव में जीवन और जगत् दोनों हैं। जब जीवन व जगत के प्रत्येक घटनाक्रम में अपने कल्याण की शाश्वतता व निरंतरता की सतत अनुभूति होने लगे, तब समझो कि शिव तत्त्व की अनुभूति होने लगी।
शिव नाम स्मरण होता रहे, तो स्वतः ही विवेक का तृतीय नेत्र खुल जाता है। साथ ही अंतश्चेतना दुर्गुणों, दुष्प्रवृत्तियों से विमुख होकर वैराग्य की ओर अग्रसर हो जाती है। शिव ही सृजन व संहार हैं। उनके लास्य में सृष्टि और उसकी समस्त सकारात्मकता का सृजन है, तो उनके तांडव में संपूर्ण नकारात्मक व असुरता का संहार समाहित है। शिव में शास्त्र व संस्कृति, दोनों समाये हैं। शिव-शिव कहते हुए, शिव का ध्यान करते हुए चित्त में उत्पन्न प्रकाश, शास्त्रों का बोध पाने की एवं शास्त्र रचने की सहज सामर्थ्य प्रदान करता है। साथ ही शिव की चेतना से उत्पन्न हुए एकता, समता व शुचिता के गुण मानव की सर्वोच्च संस्कृति का निर्माण करते हैं।
महाशिवरात्रि का महापर्व फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। वैसे तो हिंदू ग्रंथों तथा मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव को प्रत्येक माह की चतुर्दशी तिथि प्रिय है, परंतु सभी चतुर्दशी तिथियों में फाल्गुन माह की चतुर्दशी तिथि भगवान शिव को अतिप्रिय है। सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण तीनों गुणों में से तमोगुण की अधिकता दिन की अपेक्षा रात्रि में अधिक है। इस कारण भगवान शिव ने अपने निराकार के प्रतीक लिंग के प्रादुर्भाव के लिए फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की मध्यरात्रि को चुना।
महाशिवरात्रि पर्व का महत्त्व सभी पुराणों में मिलता है। गरुड़ पुराण, पद्म पुराण, स्कंद पुराण, शिव पुराण तथा अग्नि पुराण सभी में महाशिवरात्रि पर्व की महिमा का वर्णन मिलता है। शिवरात्रि पर्व के बारे में केवल एक प्रकार की कथा नहीं है; कई कथाएँ हैं, परंतु सभी कथाओं का स्वरूप तथा वर्णन समान ही है। इस दिन व्यक्ति व्रत रखते हैं तथा शिव महिमा का गुणगान करते हैं और शिव भगवान की बिल्वपत्रों से पूजा-अर्चना करते हैं। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार इस सृष्टि से पहले सत् और असत् नहीं थे, केवल भगवान शिव थे।
महाशिवरात्रि के बारे में कहा गया है कि जिस शिवरात्रि में त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा अमावस्या तीनों ही तिथियों का स्पर्श होता है- उस शिवरात्रि को अति उत्तम माना गया है। महाशिवरात्रि के विषय में अनेक मान्यताएँ हैं। उनमें से एक मान्यता के अनुसार- भगवान शिव जी ने इस दिन ब्रह्मा के रूप में भद्र रूप में अवतार लिया था। इस दिन प्रलय के समय प्रदोष के दिन भगवान शिव तांडव करते हुए समस्त ब्रह्मांड को अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म कर देते हैं। इस कारण इसे महाशिवरात्रि कहा गया है। इसी कारण महाशिवरात्रि को कालरात्रि भी कहा जाता है। भगवान शिव सृष्टि के विनाश तथा पुनः स्थापना, दोनों के मध्य एक कड़ी जोड़ने का कार्य करते हैं। प्रलय का अर्थ है-कष्ट, और पुनः स्थापना का अर्थ है सुख। अतः ज्योतिषशास्त्र में भगवान शिव को सुख देने का आधार माना गया है, इसीलिए शिवरात्रि पर अनेकों ग्रंथों में अनेक प्रकार से भगवान शिव की आराधना करने की बात कही गई है। अनेक प्रकार से अनुष्ठान करने का महत्त्व भी बताया गया है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति फरवरी 2020 पृष्ठ 12-13
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