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Sunday 23, February 2025

कृष्ण पक्ष एकादशी, फाल्गुन 2025




पंचांग 24/02/2025 • February 24, 2025

फाल्गुन कृष्ण पक्ष एकादशी, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत 1946 (क्रोधी संवत्सर), माघ | एकादशी तिथि 01:45 PM तक उपरांत द्वादशी | नक्षत्र पूर्वाषाढ़ा 06:59 PM तक उपरांत उत्तराषाढ़ा | सिद्धि योग 10:05 AM तक, उसके बाद व्यातीपात योग | करण बालव 01:45 PM तक, बाद कौलव 01:22 AM तक, बाद तैतिल |

फरवरी 24 सोमवार को राहु 08:16 AM से 09:41 AM तक है | 12:56 AM तक चन्द्रमा धनु उपरांत मकर राशि पर संचार करेगा |

 

सूर्योदय 6:52 AM सूर्यास्त 6:08 PM चन्द्रोदय 4:09 AM चन्द्रास्त 2:12 PM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु वसंत

 

  1. विक्रम संवत - 2081, पिंगल
  2. शक सम्वत - 1946, क्रोधी
  3. पूर्णिमांत - फाल्गुन
  4. अमांत - माघ

तिथि

  1. कृष्ण पक्ष एकादशी   - Feb 23 01:56 PM – Feb 24 01:45 PM
  2. कृष्ण पक्ष द्वादशी   - Feb 24 01:45 PM – Feb 25 12:47 PM

नक्षत्र

  1. पूर्वाषाढ़ा - Feb 23 06:42 PM – Feb 24 06:59 PM
  2. उत्तराषाढ़ा - Feb 24 06:59 PM – Feb 25 06:30 PM


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आनंद मंगल गायत्री आरती, Anand Mangal, Gayatri Aarti | Gayatri Mahima | Devotional bhakti | Mukesh Ji

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रुद्राक्ष की माला और सिद्धि की खोज | Rudraksh Ki Mala Aur SIddhi Ki Khoj

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

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गुरुजी माताजी
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अखंड दीपक
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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!! आज के दिव्य दर्शन 24 February 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



स्कूल वाले पढ़ाएं, पढ़ाएं, हमको क्या लेना देना, हम किससे बहस करते हैं, लेकिन हमको यह बहस करते हैं कि आदमी की असली जरूरत उसकी भूगोल नहीं है, गणित नहीं है, फिजिक्स नहीं है, और असली महारत जो हमारे बच्चे की है, जिससे उसको उन्नति होने वाली है, व्यक्तित्व का विकास होने वाला है, भविष्य बनना है, उसका स्वभाव बड़ा उत्कृष्ट है। और बच्चों के उदार बनने की शिक्षा पहले दिन से ही देनी चाहिए। कोई चीज घर में आये, बात करना हो, बात कौन करेगा? अपने आप, अपनी मर्जी से, एक-एक बच्चा यह लड़ाई लड़ेगा, हम तो ज्यादा ले लेंगे और ज्यादा खा जाएंगे। और ज्यादा लेंगे तो ज्यादा खा जाएंगे। ज्यादा लेने और ज्यादा खाने वाला अपनी बात को बहुत बारीकी से देखिए, आप बहुत बारीकी से देखिए। जो बच्चा यह कोशिश करता है, हम दूसरे बच्चों की अपेक्षा मिठाई ज्यादा हमको मिल जाए, पैसा ज्यादा हमको मिल जाए, चीज ज्यादा मिल जाए, वो यह समझिए कि वह अभिलाषी है, लेकिन आगे जाकर के इतनी खौफनाक हो जाएगी कि जब भाई भाइयों में पैसे का बंटवारा होने लगेगा, तो एक भाई यह कोशिश करेगा कि मुझे ज्यादा मिल जाए, बाकी बच्चे भूखे रह जाएं। इसीलिए आप यह कोशिश करना, छोटे बच्चों में उदारता के भाव पैदा हों। जब भी आप कोई चीज लाएं, मिठाई लाएं, तो फल लाएं, तो केला लाएं, जितने काटने हों, हर एक को दीजिए। चल बैठ, हां, हां बेटा, सब को बांटा। आज कौन का हिस्सा है? आज रमेश बांटेगा। पहले किसको देना? पहले सबसे छोटी मुन्नी को देगा, फिर कौन देगा? फिर उसको देगा, फिर उसको देगा, फिर अपनी मम्मी को देगा, फिर अपनी ताई को देगा, चाची को देगा, सबसे पीछे कौन खाएगा? सबसे पीछे वाला रमेश खाएगा। हां, सबसे पीछे खाता है, वो कौन होता है? बड़ा आदमी होता है, शानदार आदमी होता है। पहले औरों को खिला, तू बेटा, हां, औरों को खिलाते हैं न, हां, पहले तो नहीं खा सकते, पहले क्यों खा लेंगे? औरों को खिला करके खाएंगे। औरों को खिलाने के लिए आप माद्दा पैदा कीजिए, किस के अंदर? छोटों के अंदर बांटने का माद्दा, वितरण करने का माद्दा। यह काम उन्हीं को सौंपिए, यह काम उन्हीं के द्वारा कराइए, यह काम उन्हीं को दीजिए।

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अखण्ड-ज्योति से



इन थोड़ी सी पंक्तियों में यह विस्तारपूर्वक नहीं बताया जा सकता कि मन की मलीनता को हटा देने पर हम पतन और संताप से कितने बचे रह सकते हैं, और मन को स्वच्छ रखकर उत्थान और आनन्द का कितना अधिक लाभ प्राप्त हो सकता है। यह लिखने−पढ़ने और कहने−सुनने की नहीं, करने और अनुभव में लाने की बात है। लौकिक जीवन को आनन्द और उत्थान की दिशा में गतिवान करने का प्रमुख उपाय यह है कि हम अपने मन को स्वच्छ कर उसकी मलीनताओं को हटावें। मनन करने वाले को ही मनुष्य कहते हैं।

अपनी भीतरी मलीनताओं को खोजना और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करना इस संसार का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। संसार के प्रत्येक महापुरुष को अनिवार्यतः यह पुरुषार्थ करना पड़ा है। क्या यह कोई ऐसा कठिन काम है जो हम नहीं कर सकते? दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, वह अपना मन अपनी बात न माने, यह कैसे हो सकता है। हम अपने आपको तो सुधार ही सकते हैं, अपने आपको तो समझा ही सकते हैं, अपने को तो सन्मार्ग पर चला ही सकते हैं। इसमें दूसरा कोई क्या बाधा देगा? हम ऊँचे उठना भी चाहते हैं और उसका साधन भी हमारे हाथ में है तो फिर उसके लिए पुरुषार्थ क्यों न करें? आत्म−सुधार के लिए, आत्म निर्माण के लिए, आत्म विकास के लिए क्यों कटिबद्ध न हों?

 हमारे आध्यात्मिक लक्ष की आधारशिला मन की स्वच्छता है। जप, तप, भजन, ध्यान, व्रत, उपवास, तीर्थ, हवन, दान, पुण्य, कथा, कीर्तन सभी का महत्व है पर उनका पूरा लाभ उन्हीं को मिलता है जिनने मन की स्वच्छता के लिए भी समुचित श्रम किया है। मन मलीन हो, दुष्टता एवं नीचता की दुष्प्रवृत्तियों से मन गन्दी कीचड़ की तरह सड़ रहा हो तो भजन, पूजन का भी कितना लाभ मिलने वाला है? अन्तरात्मा की निर्मलता अपने आप में एक साधन है जिसमें किलोल करने के लिए भगवान स्वयं दौड़े आते हैं। थोड़ी साधना से भी उन्हें आत्म−दर्शन का मुक्ति एवं साक्षात्कार का लक्ष सहज ही प्राप्त हो जाता है। स्वल्प साधना भी उनके लिए सिद्धि दायिनी बन जाती है।
   

“अखण्ड−ज्योति” निर्माण का मिशन लेकर अग्रसर होती है। अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य को इस ओर ध्यान देना होगा। हम अपने मनों को स्वच्छ करें, अपनी मलीनता को बुहारें और अपने समीपवर्ती, संबंधित, परिचित लोगों को भी वैसी ही प्रेरणा करे। अपना आदर्श उपस्थित करके दूसरों को अनुकरण करने के लिए उदाहरण उपस्थित करना प्रचार का सबसे प्रभावशाली तरीका है, पर शिक्षा, उपदेश, प्रचार, अध्ययन, शिक्षण, पठन, श्रवण आदि का भी कुछ तो प्रभाव पड़ता ही है। दोनों ही माध्यमों से हमें लोक शिक्षण के लिए प्रवृत्त होना चाहिए। जन−मानस की स्वच्छता का अभियान संसार की उत्कृष्ट धर्म सेवा और ईश्वर की सच्ची पूजा ही मानी जायगी। इस दिशा में हमारा उत्साह उठना ही चाहिये। हमारा पुरुषार्थ जागना ही चाहिए, हमारा कदम उठना ही चाहिए।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

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