Friday 21, February 2025
कृष्ण पक्ष नवमी, फाल्गुन 2025
पंचांग 22/02/2025 • February 22, 2025
फाल्गुन कृष्ण पक्ष नवमी, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत 1946 (क्रोधी संवत्सर), माघ | नवमी तिथि 01:19 PM तक उपरांत दशमी | नक्षत्र ज्येष्ठा 05:40 PM तक उपरांत मूल | हर्षण योग 11:55 AM तक, उसके बाद वज्र योग | करण गर 01:19 PM तक, बाद वणिज 01:43 AM तक, बाद विष्टि |
फरवरी 22 शनिवार को राहु 09:42 AM से 11:06 AM तक है | 05:40 PM तक चन्द्रमा वृश्चिक उपरांत धनु राशि पर संचार करेगा |
सूर्योदय 6:54 AM सूर्यास्त 6:07 PM चन्द्रोदय 2:18 AM चन्द्रास्त 12:15 PM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु वसंत
- विक्रम संवत - 2081, पिंगल
- शक सम्वत - 1946, क्रोधी
- पूर्णिमांत - फाल्गुन
- अमांत - माघ
तिथि
- कृष्ण पक्ष नवमी
- Feb 21 11:58 AM – Feb 22 01:19 PM - कृष्ण पक्ष दशमी
- Feb 22 01:19 PM – Feb 23 01:56 PM
नक्षत्र
- ज्येष्ठा - Feb 21 03:53 PM – Feb 22 05:40 PM
- मूल - Feb 22 05:40 PM – Feb 23 06:42 PM
SHRAVAN
*आत्मा पर से मल-आवरण भी तो हटें, Aamta Par Se Mal Aavaran Bbhi To Hate
*राजा जनक का योग का रहस्य* *Raja Janak Ka Yog Ka Rehsay
*तप किये बिना किसी की आत्मोन्नति नहीं हो सकती।* *गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी*
कल न जाने क्या होगा? नौकरी मिलेगी या नहीं, कक्षा में उत्तीर्ण होंगे या अनुत्तीर्ण, लड़की के लिये योग्य वर कहाँ मिलेगा, मकान कब तक बन कर पूरा होगा, कहीं वर्षा न हो जाय, जो पकी फसल खराब हो जाय आदि बातों की निराशाजनक कल्पना द्वारा आप मन में घबराहट न पैदा किया करें। जो होना है, वह एक निश्चित क्रम से ही होगा, तो फिर घबराने, व्यर्थ विलाप करने अथवा भविष्य की चिन्ता में पड़े रहने से क्या लाभ? अवाँछित कल्पनाएं करेंगे तो आपका जीवन अस्त-व्यस्त होगा और व्यर्थ की कठिनाई से आप अपने को पीड़ित अनुभव करते रहेंगे।*
*समय पर कार्य प्रायः सभी के पूरे हो जाते हैं, इसलिये प्रयास तो जारी रखें, पर घबराहट पैदा कर काम को बोझीला न बनायें। आपका मन भार-मुक्त रहेगा, तो काम अधिक रुचि और जागरुकता के साथ कर सकेंगे। यह स्थिति आपको प्रसन्नता भी देगी और सफलता भी ।
*घबराने वाले व्यक्ति फूहड़ माने जाते हैं, उनका कोई काम सही नहीं होता। पुस्तकें लिये बैठे हैं, पर फेल हो जाने की घबराहट सता रही है। फलतः पेज तो खुला है, पर मन कहीं और जगह घूम रहा है। एक गलती आप से हो गई है, उसे छिपाने के चक्कर में आपका दिमाग सही नहीं है, कहीं गड्ढे में गिर जाते हैं, कहीं बर्तनों से टकरा कर पाँव फोड़ लेते हैं। सही काम के लिये मन में घबराहट का बोझ न डाला करिये। फल-कुफल की परवाह किये बिना स्वस्थ और पूरे मन से काम किया कीजिए।
स्टेशन की ओर तो जा ही रहे हैं, रेलगाड़ी मिलेगी या नहीं? मस्तिष्क को इस फिसाद में फंसाने का क्या फायदा? यही तो होगा कि गाड़ी स्टेशन पहुँचने के पूर्व छूट जाय और आपको जहाँ जाना है, वहाँ कुछ विलंब से पहुँचना हो। आप जहाँ जा रहे हैं या जो कुछ पूरा कर रहे हैं। उसका भी तो यही लक्ष्य होगा कि वह कार्य पूरा हो प्रसन्नता मिले, पर अगली प्रसन्नता के लिये अब की प्रसन्नता क्यों नष्ट करते हैं? पहले से ही मन को अलमस्त क्यों नहीं रखते, यही तो होगा कि कार्य कुछ थोड़ा विलंब से होगा।*
... क्रमशः जारी*
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
भगवान की भक्ति में आवेश और जोश | Bhagwan Ki Bhakti Me Aavesh Aur Josh
धर्म की प्रथम घोषणा | Dharm Ki Pratham Ghoshna |
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 22 February 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
इंसान को इंसान की इज्जत करना यह मनुष्यता का प्राथमिक चिन्ह है आपको मालूम नहीं है डाकुओं को फांसी दी जाती है वहां भी जो फांसी लगाने वाले जाते हैं जल्लाद से लेकर के और दूसरे मजिस्ट्रेट तक वह भी काला गाउन पहन करके जाते हैं और काली पट्टी बांधकर के जाते हैं क्योंकि इंसान को मारा जा रहा है फांसी दी जा रही है लेकिन इंसानियत की इज्जत की जा रही है और आदमी की इज्जत की जा रही है आपका गुस्सा हो जाना और गरम हो जाना और लड़ मरना और चपत मारना और गुस्सा मारना और अपनी बहन को मार देना और काट खाना ऐसे पहले दिन हो पूछिये हाय बेटा ये क्या था यह तो बहन बहन तो कैसी बड़ी होती है बहन तो कैसी प्यारी होती है बहन को काटता है हा हा ये भी एक तरीका है माफी मांग इससे माफी मांग हाथ जोड़ बहन जी अब आपके बाल कभी नहीं उखाड़ूँगा और अब आपको गाली कभी नहीं दूंगा माफी मांग यह तेरी बहन है बहन कैसी प्यारी होती है बहन कैसी प्यारी होती है भइया बहन कैसे अच्छे होते हैं बहन भाई में कितना प्यार होता है आधा घण्टा आप समय खराब कीजिए और बहन को उसने तपाक से मार दिया आप उसको ध्यान कीजिए हमने बहुत गलती कर डाली और अब यह गलती मत होने दीजिए अगर वह बहन को मारना सीख गया छोटे भाई को बड़े भाई को मारना सीख गया और बहन भाई लड़ना सीख गए हैं तो अपने बाप से लड़े बिना नहीं रह सकते वो बाप के बराबर का हो जाएगा अब तक वह छोटे बच्चे बराबर के हैं इसीलिए छोटे बच्चों में लड़ाई होती है और फिर फिर वो भी बाप के बराबर का हो जाएगा 5 फुट 3 इंच का बाप है और 5 फीट 4 इंच का बेटा है अब दोनों बराबर के हुए कि नहीं हुए अब हो गए अब लड़ने में क्या कमी, क्यों कमी करनी चाहिए और किस बात की कमी रह गई? लंबाई बराबर है, वजन बराबर है, ऊंचाई बराबर है, बल्कि सही बात यह है कि वह पढ़ा और भी ज्यादा है, बाप तो मैट्रिक पास था और उसने तो इंटरमीडिएट पास कर लिया है अब तो वह बड़ा हो गया क्यों नहीं लड़ेगा जरूर लड़ेगा लड़ना ही चाहिए उसको और बाप के गाल में चपत मारनी चाहिए जब भाई के गाल में चपत मार सकता था तो बाप के गाल में चपत मारने में क्या हर्ज है वह तो सब है इंसान, इंसान सब एक है। इसीलिए करना क्या पड़ेगा कि हमको इन बच्चों पर सारे का सारा ध्यान एकाग्र करना पड़ेगा अगर आप घर की शांति को रखना चाहते हैं और भाई भाइयों में बड़े होने के बाद में बंटवारा न हो जाए और यह अलग दुकान लेकर के चले न बैठे और अलग लेकर के न बैठे और भाई-भाइयों की मोहब्बत खत्म हो जाए तो यह ये ये सिखाना उस समय काफी नहीं है जबकि बच्चे बड़े हो गए और उनकी बीवियां आ गई और वह अलग हो गए यह बात आपको वहां से सिखानी चाहिए थी कहां से जब वह भाई को मारने लगा था बहन को मारने लगा था उसी दिन से सिखाना चाहिए था राम भरत की कहानी सुनानी चाहिए थी आपको कि राम और भरत किस मोहब्बत से रहते थे |
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
आत्मोत्कर्ष की आकांक्षा बहुत लोग करते हैं, पर उसके लिए न तो सही मार्ग जानते हैं और न उस पर चलने के लिए अभीष्ट सामर्थ्य एवं साधन जुटा पाते हैं। दिग्भ्रान्त प्रयासों का प्रतिफल क्या हो सकता है? भटकाव में भ्रमित लोग लक्ष्य तक किस प्रकार पहुँच सकते हैं? आज की यही सबसे बड़ी कठिनाई है कि आत्म-विज्ञान का न तो सही स्वरूप स्पष्ट रह गया है और न उसका क्रिया पक्ष- साधन विधान ही निर्भ्रान्त है। इस उलझन में एक सत्यान्वेषी जिज्ञासु को निराशा ही हाथ लगती हैं।
हमें यहाँ अध्यात्म के मौलिक सिद्धान्तों को समझना होगा। व्यक्ति के व्यक्तित्व में से अनगढ़ तत्वों को निकाल बाहर करना और उसके स्थान पर उस प्रकाश को प्रतिष्ठापित करना है जिसके आलोक में जीवन को सच्चे अर्थों में विकसित एवं परिष्कृत बनाया जा सके। इसके लिए मान्यता और क्रिया क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन प्रस्तुत करने पड़ते हैं। वे क्या हों, किस प्रकार हों, इसका शिक्षण थ्योरी और प्रेक्टिस के दोनों ही अवलम्बन साथ-साथ लेकर चलना होता है।
थ्योरी का तात्पर्य है वह सद्ज्ञान, वह आस्था विश्वास जो जीवन को उच्चस्तरीय लक्ष्य की ओर बढ़ चलने के लिए सहमत कर सके। इसे आत्मज्ञान, ब्रह्म-ज्ञान, तत्वज्ञान और सद्ज्ञान के नामों से जाना समझा जाता है- योग इसी को कहते हैं। ब्रह्म विद्या का तत्त्वदर्शन यही है। प्रेक्टिस- का तात्पर्य है वे साधन विधान जो हमारी क्रियाशीलता को दिशा देते हैं और बताते हैं कि जीवनयापन की रीति-नीति क्या होनी चाहिए और गतिविधियाँ किस क्रम से निर्धारित की जानी चाहिए? साधनात्मक क्रिया कृत्यों का यह उद्देश्य समझ लिया जाय तो फिर किसी को भी न तो अनावश्यक आशा बाँधनी पड़ेगी और न अवांछनीय रूप से निराश होना पड़ेगा।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 5
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