Wednesday 19, February 2025
कृष्ण पक्ष सप्तमी, फाल्गुन 2025
पंचांग 20/02/2025 • February 20, 2025
फाल्गुन कृष्ण पक्ष सप्तमी, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत 1946 (क्रोधी संवत्सर), माघ | सप्तमी तिथि 09:58 AM तक उपरांत अष्टमी | नक्षत्र विशाखा 01:30 PM तक उपरांत अनुराधा | ध्रुव योग 11:33 AM तक, उसके बाद व्याघात योग | करण बव 09:58 AM तक, बाद बालव 11:02 PM तक, बाद कौलव |
फरवरी 20 गुरुवार को राहु 01:54 PM से 03:18 PM तक है | चन्द्रमा वृश्चिक राशि पर संचार करेगा |
सूर्योदय 6:56 AM सूर्यास्त 6:05 PM चन्द्रोदय 12:21 AM चन्द्रास्त 11:28 AM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु वसंत
- विक्रम संवत - 2081, पिंगल
- शक सम्वत - 1946, क्रोधी
- पूर्णिमांत - फाल्गुन
- अमांत - माघ
तिथि
- कृष्ण पक्ष सप्तमी
- Feb 19 07:32 AM – Feb 20 09:58 AM - कृष्ण पक्ष अष्टमी
- Feb 20 09:58 AM – Feb 21 11:58 AM
नक्षत्र
- विशाखा - Feb 19 10:39 AM – Feb 20 01:30 PM
- अनुराधा - Feb 20 01:30 PM – Feb 21 03:53 PM
SHRAVAN
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काम-विषयक सदाचार चरित्र की सर्वश्रेष्ठ विशेषता और कसौटी मानी गई है। कुछ अर्थों में ‘‘चरित्र’’ शब्द से मर्यादित कामोपभोग का ही अर्थ लगाया जाता है। जिन देशों में स्त्री-पुरुषों के बीच की शील मर्यादाएं निश्चित नहीं, वहां भारी विश्रृंखल पैदा हुआ देखा जाता है। पाश्चात्य देश इस कुटिल प्रवंचना में ग्रसित होने के कारण अपना श्रेय खो चुके हैं। पाश्चात्य सिद्धान्तों पर आधारित इस घृणित दुष्प्रवृत्ति के कारण भारतीय संस्कृति और समाज कम अस्त-व्यस्त नहीं हुआ।
इस विषैली कामुकता की दुर्भाग्यपूर्ण स्वच्छन्दता ने आज सारे सामाजिक ढांचे को ही खोखला कर दिया है। इसके दुष्परिणाम भी बुरी तरह से लोगों को आहत बनाने में लगे हैं। स्वास्थ्य की दुर्दशा, अशक्तता, अपहरण, हत्या और आत्म-हत्याओं के आज जितने दृश्य दिखाई दे रहे हैं उन सबका अधिकांश कारण मनुष्य का चारित्रिक पतन ही है। सदाचार की सीमायें जब तक निर्धारित न होंगी और दुराचार पर जब-तक प्रतिबन्ध न लगेगा तब-तक समाज में सुख शान्ति और व्यवस्था का स्थापित होना प्रायः असम्भव ही है।
भीतर-बाहर से पवित्र रहने, शुद्ध आचरण करने, श्रेष्ठ पुस्तकों के स्वाध्याय, सत्संग, शक्ति पुरुषार्थ, आत्मिक-प्रसन्नता के आधार पर ही मनुष्य की उन्नति सम्भव है। आत्म-नियन्त्रण, संयम और सम्भाषण से न केवल अपने को वरन् अपने पास-पड़ोस और सम्पर्क में आने वालों को भी सुख मिलता है। मानवता का विकास भी इसी से सम्भव है कि दूसरों को भी अपने ही समान समझें और सबके साथ सद्व्यवहार करें। यह सब चरित्रवान् व्यक्ति के लक्षण हैं। जिनके द्वारा दूसरों को भी आत्म-कल्याण की प्रेरणा मिले वही चरित्र के सच्चे धनी कहे जा सकते हैं।
पर-निन्दा, छिद्रान्वेषण, झूठ, छल, कपट, व्यभिचार, लोलुपता ये सब आसुरी प्रवृत्तियां हैं। इनसे विनाशकारी परिणाम ही उपस्थित होते हैं। पर आत्म-संयम और स्वत्वाभिमान के द्वारा वैयक्तिक व सामाजिक सभी प्रकार की श्रेष्ठताओं का उदय होता है। चरित्र-साधना का मूलाधार मानसिक पवित्रता है। जीवन के प्रत्येक छोटे-मोटे व्यवसाय व क्रिया-कलापों में मानसिक स्थिति का प्रभाव पड़ता ही है। आत्मिक पवित्रता का परिणाम सदाचरण है जिससे सुख मिलता है। कुविचारों से कुकर्म उठ खड़े होते हैं, जिससे कष्ट, क्लेश और मुसीबतें आ उपस्थित होती हैं। इसलिए छोटे-से-छोटे कार्य में भी पवित्रता का भाव बनाये रखने से चारित्रिक-विकास होता है। प्रातःकाल सोकर उठने से दिन भर कार्यरत रहने और सायंकाल निद्रा-माता की गोद में जाने तक जितने कर्म हमें करने पड़ें उनमें पवित्रता का भाव बना रहे तो ही किसी को चरित्रवान् कहलाने का सौभाग्य प्राप्त होता है। यह एक साधना है जिसकी सिद्धियां अनन्त हैं।
चरित्र का आधार धर्म है। मन, वचन और कर्म के धार्मिक कृत्यों के निर्वाह को सदाचार कहा जाता है। इससे चरित्र बनता है। मानवता से ओत-प्रोत भावनाओं से चरित्र की रक्षा सम्भव है। अतएव अपने जीवन में उदारतापूर्वक धार्मिक भावनाओं को धारण किए रहने से चारित्रिक-बल प्रगाढ़ बना रहता है। बुद्धि, धन या शरीर बल तब तक सुख नहीं दे सकते जब तक चरित्र में मानवता, बुद्धि में धर्मभाव और शरीर से सत्कर्म नहीं बन पड़ते।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 10
भगवान की भक्ति का प्रभाव | Bhagwan Ki Bhakti Ka Prabhav
पुरुषार्थ की दिशा | Purusharth Ki Diksha | जीवन पथ के प्रदीप | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या
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!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 20 February 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
चुड़ैल वह होती है जो मरने के बाद में पकड़ लेती है मार डालती है और काट खाती है और फूहड़ कौन होती है वही होती है चुड़ैल, चुड़ैल मरने के बाद में फूहड़ हो जाती है हमें नहीं मालूम है पर जिंदा रहने पर चुड़ैल जरूर होती हैं कौन सी वाली जो सब सामान नरक जैसा पड़ा हुआ है सब गंदगी पड़ी हुई है न कभी पेशाब घर में पानी डालती हैं कम्बख्त न उसमें से चैके में बर्तन तो मांज देती हैं बर्तन मांज देती हैं पर जो नाली है नाली में जिसमें वो सब आटा निमटा हुआ चला जाता है और आटे में गिड़ारे और कीड़े पड़ते चले जाते हैं और सरक सरक के सरक सरक करके आंटे तक आ जाते हैं चैके तक आ जाते हैं गंदगी से लोगों ने लड़ना ही नहीं सीखा गंदगी से लोगों ने लड़ना ही नहीं सीखा गंदगी से लोगों ने लड़ना ही नहीं सीखा गंदगी से लड़ने की शिक्षा यह मित्रों आध्यात्मिकता मैं पढ़ाऊँगा तो ये कहेंगे ये क्या आध्यात्मिकता पढ़ाते हैं आप तो वह बताइए मंत्र कौन सा संतोषी माता का मंत्र बेटा यही है संतोषी माता का मंत्र और मैं क्या संतोषी माता का मंत्र बताऊंगा नहीं साहब कोई ऐसा मंत्र बताइए ऐसा जादू बताइए ऐसा ताबीज बताइए मेरे बच्चे के सिर पर हाथ फेर दीजिए जादू जादू फूंक दीजिए बच्चा है पागल आदमी है मैं क्या जादू फूंक दूंगा जादू कोई दुनिया में नहीं है जादू यही है कि हर आदमी में जिंदगी को ढंग से और व्यवस्था से अपना काम करना सीखा है और जिंदगी के क्रियाकलाप को अपने ढंग से इस्तेमाल करना सीखा है जादू यही है और कोई जादू नहीं है दुनिया में इसीलिए मित्रों क्या करना पड़ेगा हमको अपने बालकों के भीतर यह विशेषता पैदा करनी पड़ेगी कि वह मुस्तैद हो अपने हर काम को ठीक तरीके से संभाले यह माँ बाप ही उनको सिखाएं, गंदगी से लड़ना सिखाएं गंदगी से लड़ना सिखाएं मैले कपड़े को धोना सिखाएं, दांतों को मांजना सिखाएं, नाली में पानी डालना सिखाएं, पेशाब घर को धोना सिखाएं और टट्टी के भीतर टट्टी के भीतर भंगन नहीं आई मेहतरानी नहीं आई मेहतरानी आए तो उसके तुरंत बाद हमको घरवालों को खड़ा होना चाहिए और जो उसमें कमी रह गई हो पूरी करनी चाहिए ताकि हमारा घर ताकि हमारा शौचालय हमारा पखाना चैके के बराबर शुद्ध पवित्र दिखाई पड़े गांधी जी ने हमको पहले पहले दिन यही सिखाया था कि हमारा चैके में और टट्टी में हमें कोई फर्क नहीं होना चाहिए चैके में बदबू अगर हमको नापसंद है तो हमको टट्टी में भी बदबू नापसंद होनी चाहिए यह क्या है यह जीवन के उन्नति के मार्ग हैं यह वह मार्ग है इन छोटे-छोटे संस्कारों को जो विकसित करता हुआ आदमी दूसरे गुण और दूसरे अच्छे कामों और जिम्मेदारियों पर सवार होता है तो यही छोटे गुण उसके अंदर उन बड़े कामों में जाकर के ज्यादा से ज्यादा उन्नति के माध्यम बन जाते हैं और उन्नति के आधार बन जाते हैं।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
व्यक्तित्व क्या है- आस्था। मनुष्य क्या है- श्रद्धा। चेष्टाएँ क्या हैं- आकांक्षा की प्रतिध्वनि। गुण, कर्म स्वभाव अपने आप ने बनते हैं न बिगड़ते हैं। आस्थाएँ ही आदतें बनकर परिपक्व हो जाती हैं तो उन्हें स्वभाव कहते हैं। अभ्यासों को ही गुण कहते हैं। कर्म आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए शरीर और मन को संयुक्त रूप से जो श्रम करना पड़ता है, उसी को कर्म कहते हैं। इन तथ्यों को समझ लेने के उपरान्त यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्तित्व के स्तर और उसकी प्रतिक्रिया के रूप में आने वाले सुख-दुःखों की अनुभूति होती रहती है।
प्रसन्नता और उद्विग्नता को यों परिस्थितियों के उतार-चढ़ावों से जोड़ा जाता है, पर वस्तुतः वे मनःस्थिति के सुसंस्कृत और अनगढ़ होने के कारण सामान्य जीवन में नित्य ही आती रहने वाली घटनाओं से ही उत्पन्न अनुभूतियाँ भर होती हैं। कोई घटना न अपने आप में महत्वपूर्ण है और न महत्व हीन। यहाँ सब कुछ अपने ढर्रे पर लुढ़क रहा है। सर्दी-गर्मी की तरह भाव और अभाव का, जन्म-मरण और हानि-लाभ का क्रम चलता रहता है। हमारे चिन्तन का स्तर ही उनमें कभी प्रसन्नता अनुभव करता और कभी उद्विग्न हो उठता है। अनुभूतियों में परिस्थितियाँ नहीं, मनःस्थिति की भूमिका ही काम करती है।
जीवन के सफेद और काले पक्ष को समझ लेने के उपरान्त, सहज ही यह प्रश्न उठता है कि- क्या ऐसा सम्भव नहीं है कि परिस्थितियों के ढाँचे में ढले- लोक-प्रवाह में बहते हुए, संग्रहीत कुसंस्कारों से प्रेरित, वर्तमान अनगढ़ जीवन को; अपनी इच्छानुसार- अपने स्तर का फिर से गढ़ा जाय और प्रस्तुत निकृष्टता को उत्कृष्टता में बदल दिया? उत्तर ‘ना’ और ‘हाँ’ दोनों में दिया जा सकता है। ‘ना’ उस परिस्थिति में जब आन्तरिक परिवर्तन की उत्कट आकांक्षा का अभाव हो और उसके लिए आवश्यक साहस जुटाने की उमंगें उठती न हों। दूसरों की कृपा सहायता के बलबूते उज्ज्वल भविष्य के सपने तो देखे जा सकते हैं, पर वे पूरे कदाचित ही कभी किसी के होते हैं।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 4
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