Monday 17, February 2025
कृष्ण पक्ष षष्ठी, फाल्गुन 2025
पंचांग 18/02/2025 • February 18, 2025
फाल्गुन कृष्ण पक्ष षष्ठी, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत 1946 (क्रोधी संवत्सर), माघ | षष्ठी | नक्षत्र चित्रा 07:35 AM तक उपरांत स्वाति | गण्ड योग 09:51 AM तक, उसके बाद वृद्धि योग | करण गर 06:14 PM तक, बाद वणिज |
फरवरी 18 मंगलवार को राहु 03:17 PM से 04:40 PM तक है | चन्द्रमा तुला राशि पर संचार करेगा |
सूर्योदय 6:58 AM सूर्यास्त 6:04 PM चन्द्रोदय 11:24 PM चन्द्रास्त 10:13 AM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु शिशिर
- विक्रम संवत - 2081, पिंगल
- शक सम्वत - 1946, क्रोधी
- पूर्णिमांत - फाल्गुन
- अमांत - माघ
तिथि
- कृष्ण पक्ष षष्ठी [ वृद्धि तिथि ]
- Feb 18 04:53 AM – Feb 19 07:32 AM
नक्षत्र
- चित्रा - Feb 17 04:31 AM – Feb 18 07:35 AM
- स्वाति - Feb 18 07:35 AM – Feb 19 10:39 AM
SHRAVAN
*मनुष्य जीवन की सार्थकता उज्ज्वल और उद्दात्त चरित्र से होती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के भागीदार वे होते हैं जिनमें चारित्रिक बल की न्यूनता नहीं पाई जाती। जिस पर सभी लोग विश्वास करते हों, ऐसे ही लोगों की साख औरों पर पड़ती है। पर-उपदेश तो वाक्पटुता के आधार पर धूर्त व्यक्ति तक कर लेते हैं। किन्तु दूसरों को प्रभावित कर पाने की क्षमता, लोगों को सन्मार्ग का प्रकाश दिखाने की शक्ति चरित्रवान् व्यक्तियों में हुआ करती है। सद्-विचारों और सत्कर्मों की एकरूपता को ही चरित्र कहते हैं।*
जिसके विचार देखने में भले प्रतीत हों किन्तु आचार सर्वदा भिन्न हों, स्वार्थपूर्ण हों, अथवा जिनके विचार छल व कपट से भरे हों और दूसरे को धोखा देने, प्रपंच रचने के उद्देश्य से चिन्ह पूजा के रूप में सत्कर्म करने की आदत होती है उन्हें चरित्रवान् नहीं कहा जा सकता। सत्कर्मों का आधार इच्छाशक्ति की प्रखरता है। जो अपनी इच्छाओं को नियन्त्रित रखते हैं और उन्हें सत्कर्मों का रूप देते हैं उन्हीं को चरित्रवान् कहा जा सकता है। संयत इच्छा-शक्ति से प्रेरित सदाचार का ही नाम चरित्र है।*
*विपुल धन सम्पत्ति, आलीशान मकान, घोड़े-गाड़ी, यश, कीर्ति आदि कमाने एवं विविध भाग भोगने की इच्छा आम लोगों में पाई जाती है। बालकों का हित भी इसी में मानते हैं कि उनके लिए उत्तराधिकार में बहुत धन दौलत जमा करके रखी जाय। किन्तु वे यह भूल जाते हैं कि जिस धन से भावी सन्तान आत्म-निर्माण न कर सके वह धन क्या? बिना श्रम उत्तराधिकार में मिला धन घातक होता है। सच्ची बपौती व्यक्ति का आदर्श चरित्र होता है, जिससे बालक अपनी प्रतिभा का स्वतः विकास करते हैं। उज्ज्वल चरित्र का आदर्श भावी सन्तति के जीवन-निर्माण में प्रकाश स्तम्भ का कार्य करता है।*
*समाज का सौन्दर्य, सुख और शान्ति चरित्रवान् व्यक्तियों के द्वारा स्थिर रहती है। दुष्चरित्र और दुराचारी लोगों से सभी भयभीत रहते हैं। उनके पास आने में लोग लज्जा व संकोच अनुभव करते हैं। जो भी उनके सम्पर्क में आता है उसे ही वे अपने दुष्कर्मों की आग में लपेट लेते हैं। ऐसा समाज दुःख, कलह ओर कटुता से झुलसकर रह जाता है। अनेकों प्रकार की भौतिक सम्पत्तियां व सांसारिक सुख सुविधाएं होते हुए भी लोगों को शान्ति उपलब्ध नहीं होती। अधिकतर लोग कुढ़-कुढ़कर जीवन बिताते रहते हैं। यह सब चारित्रिक न्यूनता के कारण ही होता है।*
.... क्रमशः जारी*
पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 9*
जीवन संग्राम में पुरुषार्थ की आवश्यकता | Jeevan Sangram Me Purusharth Ki Avashyakta |
सच्चाई के मार्ग पर चलने वालों को क्यों विरोध सहना पड़ता है?" |
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 18 February 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
सत्यम् शिवम् सुंदरम्, सुंदरम से अध्यात्म शुरू होता है, उसके बाद में शिव पर आता है, उसके बाद में सत्य पर चला जाता है। सीढ़ियाँ हैं, इसकी तीन पहली सीढ़ी है सुंदरम। बच्चों को सुंदर बनाना, सुंदर बनाने का मतलब सजावट करना नहीं, सफाई रखना। सौंदर्य का मतलब सजावट नहीं है, सौंदर्य का मतलब सजावट नहीं है। सुंदर लड़की है, जेवर पहन लिया और लाल रंग की साड़ी पहन ली और ऐसे कर दिया और क्रीम लगा दिया और वह होठों पर लगा दिया, यह नहीं है, वास्तव में यह नहीं है। सफाई क्या है? किसे कहते हैं सौंदर्य? सौंदर्यता केवल सफाई है, सौंदर्यता केवल सफाई है, सौंदर्यता केवल सफाई है। आपकी आँखों की सफाई, कान की सफाई, दांतों की सफाई, कंघी की सफाई, कपड़ों की सफाई, कपड़े के पहनने की सफाई, अगर है तो आपकी सुंदरता क्यों न हो। आपका मकान सफाई का है, उसमें मकड़ी के जाले लगे हुए नहीं हैं, आपने स्वयं उठाकर, स्वयं उठाकर उसको सफाई कर डाला, आपका मकान सुंदर है। आपकी किताबों पर जिल्द आपने स्वयं बना ली और उसको ठीक तरीके से सजा कर के, और कहाँ क्या चीज रखी जानी चाहिए, अगर आपको यह माद्दा है तो सफाई हो गई और आप सौंदर्य के उपासक हो गए। बर्तन आपका कहाँ रखा जाना चाहिए, पानी पीने के बाद में बर्तन की जो जगह है वही रख दिया, तब वह सफाई हो गई और आपने जहाँ का तहाँ पटक दिया उसी का नाम कूड़ा हो गया। आपने अपना कोट खूंटी पर टांग दिया, उसका नाम सफाई हो गई और आपने कोट को मेज के ऊपर पटक दिया, कुर्सी के ऊपर पटक दिया, यह गंदगी हो गई। गंदगी का माद्दा, सफाई का माद्दा इस बात पर टिका हुआ है। आपको हर आदमी की वस्तु, हर आदमी की चीजें, हर आदमी की व्यवस्थाएं कहाँ किस जगह रखी जाती हैं। आपके बच्चे के लिए निशान होना चाहिए। चप्पल जब उसको उतारनी है तो उसी जगह उतारेगा, एक चप्पल वहाँ, एक चप्पल वहाँ। अरे भाई, चप्पल कौन ले गया? अरे भाई, चप्पल कौन ले गया? यह गलत तरीका है। अगर आप इस जरा सी बात को, नाचीज सी बात को अगर आपने छुट्टी दे दी तो आप फिर देखना, वह फाइल कहाँ डाल देता है और किताबें कहाँ डाल देता है और रुपए कहाँ डाल देता है और वह खुद कहाँ डाल देता है, वह सब बड़े होकर के जिंदगी चैपट हो जाएगी। उसको अगर आपने मैनेजमेंट और व्यवस्था नहीं सिखाई, आदमी को बहुत स्ट्रिक्ट होना चाहिए कि वस्तुएं कहाँ रखी जाती हैं, बर्तन कहाँ रखे जाते हैं, नमक कहाँ रखा जाता है, आटा कहाँ रखा जाता है, किताब कहाँ रखी जाती है, क्या चीज कहाँ रखी जाती है, यथा स्थान जो चीज रखी है वो शोभायमान होगी और सुंदर होगी। गंदगी से जद्दोजहद करने का नाम सफाई, जो आदमी गंदगी से डरेगा उसके यहाँ सफाई कभी नहीं रह सकती। गंदगी, सफाई का मतलब, गंदगी से लड़ाई लड़ना, सफाई का मतलब गंदगी से लड़ाई लड़ना, सफाई का मतलब गंदगी से लड़ाई लड़ना।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
ब्रह्म सूक्ष्म और प्रकृति स्थूल है। जीव सूक्ष्म और काया स्थूल है। चिन्तन को सूक्ष्म और क्रिया को स्थूल कहा जा सकता है। इस युग्म समन्वय से ही यौगिकों, रासायनिक पदार्थों, तत्वों एवं निर्जीव अणुओं से बने पदार्थों की शोभा-सुषमा दृष्टिगोचर होती। भौतिकी अत्यन्त कुरूप, कर्कश और निष्ठुर है, उसे जीवन्त बनाने का भार तो कला ही वहन करती है।
शरीर क्या? मल-मूत्र से भरा और हाड़-मांस से बना घिनौना किन्तु किन्तु चलता-फिरता पुतला। जीव क्या है- आपाधापी में निरत, दूसरों को नोंच खाने की कुटिलता में संलग्न- चेतना स्फुल्लिंग। जीवन क्या है- एक लदा हुआ भार जिसे कष्ट और खीज के साथ ज्यों-त्यों करके वहन करना पड़ता है। बुलबुले की तरह एक क्षण उठना और दूसरे क्षण समाप्त हो जाना यही है जीवन की विडम्बना; जिसे असन्तोष और उद्वेग की आग में जलते-बलते गले में बाँधे फिरना पड़ता है। स्थूल तक ही सीमित रहना हो तो इसी का नाम जीवन है पेट और प्रजनन ही इसका लक्ष्य है। लिप्सा और लोलुपता की खाज खुजाते रहना ही यहाँ प्रिय प्रसंग है।
जिनसे बँधा हुआ प्राणी कीट-मरकट की तरह नाचता देखा जाता है। स्थूल जीवन को यदि देखना, परखना हो तो इन प्रपंचना प्रवंचना के अतिरिक्त यहाँ और कुछ दिखाई नहीं पड़ता। भूल-भुलैयों की उलझनें इतनी पेचीदा होती हैं कि उन्हें सुलझाने का जितना प्रयत्न किया जाता है उलटे उतनी ही कसती चली जाती है। रोते जन्म लेता है और रुलाते हुए विदा होता है- यही है वह सब जिसे हम जीवन के नाम से पुकारते हैं।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 3
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