Friday 03, October 2025
गुण कर्म स्वभाव की श्रेष्ठता
अमृतवाणी:- जाने गायत्री मंत्र के रहस्य : साधना के सूत्र - भाग 2 | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 03 October 2025 !!
अमृतवाणी: गायत्री यज्ञ से जीवन में क्या बदलता है पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
एक कार्यक्रम हमारा है, हमारा नहीं, गवर्मेन्ट का है, गवर्मेन्ट का है। अल्प बचत योजना है। घरों में जो डिब्बे रखते हैं लोग और पैसे जमा करते हैं, बच्चों को जमा करना सिखाते हैं, फिर उसमें टिकट लगा देते हैं, फिर उसके बदले का सर्टिफिकेट मिल जाता है। और वो पैसा जमा करो, कुछ ना कुछ जमा करो, आगे के लिए आपको काम आएगा, बुढ़ापे में काम आएगा, बच्चों की शिक्षा के काम आएगा, हारी बीमारी के काम आएगा। और सबसे बड़ी ये है कि जमा की हुई पूंजी अगर बैंक में तुमने रखी हुई है, घर में जमीन में गाड़ दी है तो अलग, लेकिन अगर आपने बैंक में जमा की हुई है तो बैंक का रुपया आपके और काम आता है, उद्योग की वृद्धि में आता है, इस काम में आता है। इसलिए अल्प बचत योजना के बारे में हम पूरा-पूरा ध्यान देते हैं।
नौवां कार्यक्रम परिवार नियोजन।
परिवार नियोजन धार्मिक संस्थाओं में केवल हिंदुस्तान में एक है, एक है, ये एक हैं हम, जो बराबर ये कहते हैं कि आप बच्चे पैदा करना बन्द कीजिए, कसम लीजिए। दो बच्चे हो गए बहुत हैं, नहीं हुआ है तो उससे भी अच्छे हैं। ये कहने के बारे में फैमिली प्लानिंग के गवर्मेन्ट के सेंटर जहां कहीं होते हैं, जहां कहीं शिविर लगते हैं, वहां हम लोगों को भिजवाते हैं। ये हमारा बराबर काम रहा। और एक संस्था सारे हिंदुस्तान में अगर कोई संस्था ऐसी है कि जिसने परिवार नियोजन के लिए, धार्मिक होते हुए भी, धार्मिक संस्था होते हुए भी खुलेआम कहा है, जोर देके कहा है, फैमिली प्लानिंग के लिए कहा है, और गवर्मेन्ट के सहयोग के लिए कहा है।
बाकी आदमी ये तो कहते हैं संयम से रहिए, ब्रह्मचर्य से रहिए। अरे कौन संयम से रहेगा, कौन ब्रह्मचर्य से रहेगा? संयम, ब्रह्मचर्य की अपेक्षा फैमिली प्लानिंग के जो तरीके हैं, उसके लिए लोगों को प्रोत्साहन करना — ये हमारा नौवां कार्यक्रम है।
दसवां कार्यक्रम ये है कि हिंदुस्तान में कुरीतियां ढेरों फैली हुईं हैं।
कुरीतियां कौन-कौन सी फैली हुई हैं? एक तो छुआ-छूत है, एक नीच-ऊँच है — बामण, बामण में फरक; बनिए, बनिए में फरक; ठाकुर, ठाकुर में फरक; चमार, चमार में फरक — सब में फरक है साहब। ये हमारा बिरादरी का नहीं है, ये हमारा ये है — जात में से जात, जात में से जात। तो हमको एक जाति, सारे जाति — मनुष्य जाति है। लिंग भेद को दूर करना। स्त्रियां हैं, घूंघट मारेंगी, घूंघट घर में, पर्दे में रहेंगी, काम नहीं करेंगी — नहीं। सब मनुष्य एक हैं।
सब मनुष्य मात्र की समानता का काम आना चाहिए।
ये हमारा दसवां कार्यक्रम है।
फिर एक बात सुन लीजिए — दस कार्यक्रमों को लेकर के हम चलते हैं। और हमारा प्रचार करने का सारा कार्यक्रम और हमारे धार्मिक सम्मेलनों का नाम देना — धार्मिक सम्मेलनों में गायत्री यज्ञ का नाम देते हैं हम। गायत्री बुद्धि की देवी है और यज्ञ कर्म का देवता है। इसमें खर्च किससे कहते हैं? उसी से कहते हैं — गुड़ जरा सा और घी जरा सा लिया और उसकी आहुति दे देते हैं। यज्ञशाला बनाने का सामान हम ले जाते हैं।
ये एक सिंबल है, ये प्रतीक है, ये एक मूर्ति है, ये गंगाजल है। इसके सामने प्रतिज्ञा कराते हैं — बस ये बात है। यज्ञ हमारा और। और कोई हम सामान हम फूंकते हैं? कि घी फूंकते हैं? कोई आटा फूंकते हैं? कोई हम गेहूं जलाते हैं? चावल जलाते हैं? — नहीं। नहीं बिल्कुल, कभी नहीं हमने आज तक। और जब तक हमारे यज्ञ होंगे, किसी को ये करने की जरूरत नहीं है कि — "ये दकियानूसी आदमी है और ये दकियानूसी आदमी लोगों को खराब करेगा।
अखण्ड-ज्योति से
एक प्रसिद्ध चित्रकार के जीवन की एक घटना हैं। उसके पास एक धनी कलाप्रेमी चित्र खरीदने आया। उसने एक चित्र को देखकर उसका दाम पूछा। चित्रकार ने उसकी कीमत 50 गिन्नी बताई। कला प्रेमी ने छोटे से चित्र की अधिक कीमत पर आश्चर्य जताया। इस पर कलाकार ने कहा- पूरे तीन साल निरंतर परिश्रम करने के बाद मैं इस योग्य बना हूं कि ऐसे चित्र को चार दिनों में बना सकता हूँ। इसके पीछे मेरा वर्षों का अनुभव, साधना और योग्यता छिपी हुई है। कला प्रेमी उत्तर से संतुष्ट हुआ और उसने चित्र खरीद लिया। यदि चित्रकार अपनी कला का मूल्य कम लगाता तो निश्चय ही उसे कम मूल्य मिलता, पर उसके आत्म विश्वास और कला साधना की जीत हुई।
चित्रकार ने अपने को जितना मूल्यवान समझा, संसार ने उतना ही महत्व स्वीकार किया। हमें उतना ही सम्मान, यश, प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, जितना हम स्वयं अपने व्यक्तित्व का लगाते हैं। शांत चित्त से कभी-कभी अपने चरित्र की अच्छाइयों, श्रेष्ठताओं और उत्तम गुणों पर विचार करें। आप जितनी देर तक अपनी अच्छाइयों पर मन एकाग्र करेंगे, उतना वे आपके चरित्र में विकसित होंगी। बुराइयों को त्यागने का अमोघ उपाय यह है कि हम एकान्त में अपने चरित्र, स्वभाव और श्रेष्ठ गुणों का चिन्तन करें और इससे दिव्यताओं की अभिवृद्धि करते रहें।
मनुष्य के मन में ऐसी अद्ïभूत गुप्त चमत्कारी शक्तियां दबी पड़ी रहती हैं कि वह जिन गुणों का चिन्तन करता है, गुप्त रूप से वे दिव्य गुण उसके चरित्र में बढ़ते-पनपते रहते हैं। आत्म निरीक्षण के माध्यम से आप अपने दैवीय विशिष्ट गुण को बखूबी मालूम कर सकते हैं अथवा किसी योग्य चिकित्सक की सहायता ले सकते हैं। अब्राहम लिंकन की उन्नति का गुर यही था। उसने निरंतर ध्यान और मनोवैज्ञानिक अध्ययन द्वारा अपने छिपे हुए गुणों को खोज निकाला। वह उसी दिशा में निरंतर उन्नति करता गया। एक चिरप्रचलित उक्ति है- ‘मनुष्य अपने मन में स्वयं को जैसा मान बैठा है, वस्तुत: वह वैसा ही है।’
प्राय: हम देखते हैं कि अनेक अभिभावक दूसरों के बच्चों की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं और अपने बच्चे की बुराई। वे बच्चों को डांटते-फटकारते हैं। नतीजतन उनके बच्चे बड़े होकर घर से भाग जाते हैं या घर पर नहीं टिकते। अभिभावक अपने बच्चों का कम मूल्य लगाते हैं, फलस्वरूप समाज भी उन्हें घटिया दर्जे का ही मानता है। आप कभी-कभी अपने गुणों, अपनी विलक्षण प्रतिभा, अपनी विशेष ईश्वरीय देन के बारे में खूब सोचिए। त्रुटियों की उपेक्षा कर श्रेष्ठताओं की सूची बनाइए।
उन्हीं पर विचार और क्रियाएं एकाग्र कीजिए। यह अपनी श्रेष्ठताएं विकसित करने का मनोवैज्ञानिक मार्ग है। प्रिय पाठक, आपको अपनी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक और अनेक शक्तियों का ज्ञान नहीं है। आप नेत्रों पर पट्टी बांधे अन्धा-धुन्ध आगे मार्ग टटोल रहे हैं। यदि आप अपनी गुप्त शक्तियों के सहारे आगे बढऩे लगें, मन को सृजनात्मक रूप में शिक्षित कर लें तो जीवन फूलों की सेज प्रतीत होगा और अनेक कार्य आप पूर्ण करने लगेंगे।
आप ताकत की दवाइयां खाते हैं। पौष्टिक अन्न लेते हैं। डंड, मुद्ïगर और तरह-तरह की कसरतें करते हैं। पर सच तो यह है कि शक्ति कहीं बाहर से नहीं आती, वह स्वयं हमारे अन्दर ही मौजूद है। जो हमारे मन की अवस्था के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है। डेढ़ पसली के महात्मा गांधी के शरीर में एक दृढ़ निश्चयी मन की ही ताकत थी। उस मन की शक्ति से ही उन्होंने विदेशी राष्ट्र की जड़ें खोखली कर दी थीं। आप में भी असीम शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। उनकी खोज की जाय, तो निश्चय ही आप संसार को चमत्कृत कर सकते हैं। अब आज से आप नए सिरे से अपने व्यक्तित्व का मूल्यांकन कीजिए।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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