Saturday 04, October 2025
सद्गुणों को बढ़ाने का सबसे आसान तरीका क्या है?
आद. डॉ. चिन्मय पंड्या जी का पोलैंड प्रवास | करपाच नगर में सम्मान एवं भारतीय ध्यान केंद्र का अवलोकन
श्रद्धा | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या
संयम का संगीत | Sanyam Ka Sangeet | Shraddheya Dr. Pranav Pandya | श्रद्धेय डॉ प्रणव
नारी जागरण शक्ति का उदय
अमृत सन्देश:- यू.के. के परिजनों का अनुकरणीय प्रयास
जीवन में सच्ची शांति के दर्शन | Jeevan Me Sachchi Shanti Ke Darshan | Pt Shriram Sharma Acharya
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
अमृतवाणी:- त्रिपदा गायत्री का रहस्य | Gayatri Tripda Ka Rehsay पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
!! शांतिकुंज दर्शन 04 October 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आप बताइए, अंतरंग को हम नहीं बता सकते और न आप जान सकते हैं। जानने के लिए आपकी आँखें होनी चाहिए। "दिव्यं ददामि ते चक्षुः", तुझे दिव्य चक्षु देते हैं। देखने के लिए दिव्य चक्षु आपके भीतर नहीं हैं। इसीलिए हम सिर्फ इतना ही बताते हैं कि हम एक पंडित हैं, एक व्यक्ति हैं और गायत्री उपासक हैं।
हमारे वरदान और आशीर्वाद से आदमियों का भला हो जाता है। आदमी के बाल-बच्चे हो जाते हैं, बीमारी दूर हो जाती है और नौकरी में उन्नति हो जाती है। यह सब हो जाता है।
"महाराज जी, इतना क्या बता रहे हैं?"
बेटे, विज्ञान बता रहे हैं। और क्या बताएँ? यह बेटा, विज्ञान है। यह हमारे विज्ञान का परिणाम है, और हमारे ज्ञान का।
ज्ञान का हम नहीं बता सकते। ज्ञान को हम कैसे बताएँ तुझे?
"आपके गुरुजी कैसे हैं?"
600 वर्ष के हो गए हैं।
"कितने लंबे हैं?" — इतने लंबे हैं।
"दाढ़ी कितनी बड़ी है?" — इतनी बड़ी है।
"और बताइए?" — बस हो गया। और क्या बताएँ?
"नहीं महाराज जी, उनकी जीवात्मा को बताइए। जीवात्मा से सुनने की इच्छा है।"
पर उसका कोई प्रभाव तुम्हारे ऊपर पड़ने वाला नहीं है। प्रभाव पड़ने वाला है, किन्तु तुम यही पूछते रहते हो — "हमको कोई दिखा ले, हमको लिवा लाना, हमको दिखा लाना। आपके गुरुजी कहाँ रहते हैं, दिखा लाना।"
मूर्ख कहीं का! क्या दिखा लाना? शक्ल दिखा लाएँगे? हाँ, शक्ल दिखा लाएँगे।
भौतिक — भौतिक ही आदमी की दृष्टि है। इसलिए कल हमने भौतिक इसका स्वरूप बता दिया था। गायत्री मंत्र का भौतिक स्वरूप क्या हो सकता है, और उससे भौतिक लाभ क्या हो सकते हैं।
आध्यात्मिक लाभ इससे लाखों गुना, करोड़ों गुना ज्यादा हैं। जड़ जमीन में होती है, दिखाई नहीं देती, पर होती है। पेड़ जितना बड़ा होता है, उतनी ही गहरी उसकी जड़ होती है। जड़ दिखती है? नहीं, हमें नहीं दिखती।
बेटे, बरगद का वृक्ष जितना ऊपर से बड़ा होता है, ठीक उतनी ही गहरी उसकी जड़ होती है।
आप खुदाई करके देखिए — मोटी जड़ें, महीन जड़ें, बारीक जड़ें — सब कितनी लंबाई में फैली हुई होती हैं। ठीक उतनी ही लंबाई में, जितनी कि वह वृक्ष बाहर फैला हुआ होता है।
आदमी का भौतिक विस्तार — जिसे आप रिद्धियाँ, सिद्धियाँ, चमत्कार, वैभव या वर्चस्व कह सकते हैं — वह जितना बड़ा होगा, ठीक उसी अनुपात में, उसी गहराई का उसका अंतरंग भी होगा।
अंतरंग कैसा हो सकता है? यह हम तुम्हें बता रहे थे। बहिरंग समझाने के बाद अब अंतरंग। हमने पिछले दो-तीन दिनों की व्याख्याओं में बताया कि अध्यात्म का अंतरंग क्या हो सकता है।
त्रिपदा गायत्री — यह क्या हो सकती है?
त्रिपदा, यानी तीन चरण —
जो हमारे रिश्तों से संबंध रखते हैं,
जो हमारे चिंतन से,
हमारे दृष्टिकोण से,
और हमारी आस्थाओं से संबंध रखते हैं।
आप बताइए, अंतरंग को हम नहीं बता सकते और न आप जान सकते हैं। जानने के लिए आपकी आँखें होनी चाहिए। "दिव्यं ददामि ते चक्षुः", तुझे दिव्य चक्षु देते हैं। देखने के लिए दिव्य चक्षु आपके भीतर नहीं हैं। इसीलिए हम सिर्फ इतना ही बताते हैं कि हम एक पंडित हैं, एक व्यक्ति हैं और गायत्री उपासक हैं।
हमारे वरदान और आशीर्वाद से आदमियों का भला हो जाता है। आदमी के बाल-बच्चे हो जाते हैं, बीमारी दूर हो जाती है और नौकरी में उन्नति हो जाती है। यह सब हो जाता है।
"महाराज जी, इतना क्या बता रहे हैं?"
बेटे, विज्ञान बता रहे हैं। और क्या बताएँ? यह बेटा, विज्ञान है। यह हमारे विज्ञान का परिणाम है, और हमारे ज्ञान का।
ज्ञान का हम नहीं बता सकते। ज्ञान को हम कैसे बताएँ तुझे?
"आपके गुरुजी कैसे हैं?"
600 वर्ष के हो गए हैं।
"कितने लंबे हैं?" — इतने लंबे हैं।
"दाढ़ी कितनी बड़ी है?" — इतनी बड़ी है।
"और बताइए?" — बस हो गया। और क्या बताएँ?
"नहीं महाराज जी, उनकी जीवात्मा को बताइए। जीवात्मा से सुनने की इच्छा है।"
पर उसका कोई प्रभाव तुम्हारे ऊपर पड़ने वाला नहीं है। प्रभाव पड़ने वाला है, किन्तु तुम यही पूछते रहते हो — "हमको कोई दिखा ले, हमको लिवा लाना, हमको दिखा लाना। आपके गुरुजी कहाँ रहते हैं, दिखा लाना।"
मूर्ख कहीं का! क्या दिखा लाना? शक्ल दिखा लाएँगे? हाँ, शक्ल दिखा लाएँगे।
भौतिक — भौतिक ही आदमी की दृष्टि है। इसलिए कल हमने भौतिक इसका स्वरूप बता दिया था। गायत्री मंत्र का भौतिक स्वरूप क्या हो सकता है, और उससे भौतिक लाभ क्या हो सकते हैं।
आध्यात्मिक लाभ इससे लाखों गुना, करोड़ों गुना ज्यादा हैं। जड़ जमीन में होती है, दिखाई नहीं देती, पर होती है। पेड़ जितना बड़ा होता है, उतनी ही गहरी उसकी जड़ होती है। जड़ दिखती है? नहीं, हमें नहीं दिखती।
बेटे, बरगद का वृक्ष जितना ऊपर से बड़ा होता है, ठीक उतनी ही गहरी उसकी जड़ होती है।
आप खुदाई करके देखिए — मोटी जड़ें, महीन जड़ें, बारीक जड़ें — सब कितनी लंबाई में फैली हुई होती हैं। ठीक उतनी ही लंबाई में, जितनी कि वह वृक्ष बाहर फैला हुआ होता है।
आदमी का भौतिक विस्तार — जिसे आप रिद्धियाँ, सिद्धियाँ, चमत्कार, वैभव या वर्चस्व कह सकते हैं — वह जितना बड़ा होगा, ठीक उसी अनुपात में, उसी गहराई का उसका अंतरंग भी होगा।
अंतरंग कैसा हो सकता है? यह हम तुम्हें बता रहे थे। बहिरंग समझाने के बाद अब अंतरंग। हमने पिछले दो-तीन दिनों की व्याख्याओं में बताया कि अध्यात्म का अंतरंग क्या हो सकता है।
त्रिपदा गायत्री — यह क्या हो सकती है?
त्रिपदा, यानी तीन चरण —
जो हमारे रिश्तों से संबंध रखते हैं,
जो हमारे चिंतन से,
हमारे दृष्टिकोण से,
और हमारी आस्थाओं से संबंध रखते हैं।
अखण्ड-ज्योति से
जीव चार प्रकार के कहे गए हैं – बद्ध, मुमुक्षु, मुक्त और नित्य। संसार मानो जाल है और जीव मछली। ईश्वर, यह संसार जिनकी माया है, मछुए हैं। जब मछुए के जाल में मछलियाँ पड़ती हैं, तब कुछ मछलियाँ जाल चीरकर भागने की अर्थात् मुक्त होने की कोशिश करती हैं। उन्हें मुमुक्षु जीव कहना चाहिए।
जो भागने की चेष्टा करती हैं, उनमें से सभी नहीं भाग सकतीं। दो-चार मछलियाँ ही धड़ाम से कूदकर भाग जाती हैं। तब लोग कहते हैं, वह बड़ी मछली निकल गयी। ऐसे ही दो-चार मनुष्य मुक्त जीव हैं। कुछ मछलियाँ स्वभावत: ऐसी सावधानी से रहती हैं कि कभी जाल-सहित इधर से उधर भागती हैं, और सीधे कीच में घुसकर देह छिपाना चाहती हैं। भागने की कोई चेष्टा नहीं, बल्कि कीच में और गड़ जाती हैं। ये ही बद्ध जीव हैं। बद्ध जीव संसार में अर्थात् कामिनी कांचन में फँसे हुए हैं, कलंकसागर में मग्न हैं, पर सोचते हैं कि बड़े आनन्द में हैं !
जो मुमुक्षु या मुक्त हैं, संसार उन्हें कूप जान पड़ता है, अच्छा नहीं लगता। इसीलिए कोई-कोई ज्ञान-लाभ, ईश्वरलाभ हो जाने पर शरीर छोड़ देते हैं, परन्तु इस तरह का शरीरत्याग बड़ी दूर की बात है।
‘‘बद्ध जीवों – संसारी जीवों को किसी तरह होश नहीं होता। कितना दुख पाते हैं, कितना धोखा खाते हैं, कितनी विपदाएँ झेलते हैं, फिर भी बुद्धि ठिकाने नहीं आती। ऊँट कटीली घास को बहुत चाव से खाता है। परन्तु जितना ही खाता है उतना ही मुँह से धर-धर खून गिरता है, फिर भी कँटीली घास को खाना नहीं छोड़ता! संसारी मनुष्यों को इतना शोकताप मिलता है, किन्तु कुछ दिन बीते कि सब भूल गए।
राम कृष्ण परमहंस
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