Sunday 05, October 2025
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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
गायत्री मंत्र जो है, तीन व्याहृतियाँ हैं।
कितनी व्याहृतियाँ हैं? तीन।
कौन-कौन सी तीन व्याहृतियाँ हैं?
तीन व्याहृतियों के नाम हैं — भूः, भुवः, स्वः।
यही लगाता है न गायत्री में?
हाँ महाराज जी, मैं तो यही तीन लगाता हूँ।
बस, यह तीन हैं बेटे!
"फिर क्यों साहब, तीन ही हैं?"
नहीं बेटे, अभी और रह गईं।
"धत्त तेरे का! तो आपने पहले क्यों नहीं बता दी?"
बेटे, दो खंडों में बताई हैं।
कितनी व्याहृतियाँ हैं?
सात।
सात व्याहृतियाँ कौन-सी हैं?
जो हम प्राणायाम का मंत्र आपसे कराते हैं, तो हम तीन-तीन व्याहृतियाँ वो बताते हैं — शुरू वाली।
और चार और बता देते हैं।
चार कौन-सी?
बेटे, तपः, महः, जनः, सत्यं।
"और पहले क्यों नहीं बताई?"
यह दो खंड हैं।
एक इसका एक खंड वो है — त्रिपदा।
त्रिपदा वो खंड है जो आदमी के अध्यात्म से, आदमी के चिंतन से, दृष्टिकोण से संबंधित है।
और चार चरण, चार और भाग रह गए।
वो कौन-से हैं?
यह है क्रियायोग, और वो है ज्ञानयोग।
यह है विज्ञान भाग, वो है ज्ञान भाग।
दो खंडों में बँटा हुआ है।
गायत्री मंत्र की व्याहृतियाँ दो खंडों में बँटी हुई हैं।
आप यहाँ जाना — सप्तर्षि आश्रम।
उसमें सात ऋषियों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं।
आप देखना, बीच में शंकर जी बैठे हुए हैं, और चारों ओर घूम जाना।
वहाँ सात ऋषियों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं।
सात ऋषियों की मूर्तियों के ऊपर गायत्री मंत्र की सात व्याहृतियाँ लगी हुई हैं।
सात व्याहृतियाँ क्या हैं?
सात ऋषि हैं यह!
"सात व्याहृतियाँ क्या हैं?"
सात ऋषि हैं!
"ऋषि तो एक मनुष्य होते हैं।"
हाँ बेटे, मनुष्य।
"तो भगवान भी मनुष्य थे?"
हाँ, भगवान मनुष्य भी थे।
ऋषि मनुष्य थे, मान लिया।
बेटे, मनुष्य भी ऋषि हुए हैं।
और ऋषि जो बादलों में से रात को निकलते हैं — ये मनुष्य नहीं हैं।
मनुष्य मर जाते हैं।
मनुष्य जला दिए जाते हैं।
मनुष्य की एक सीमा होती है।
श्रीकृष्ण भगवान की एक सीमा थी।
देवकी के यहाँ, वसुदेव के घर में पैदा हुए थे — जेलखाने में।
और देखो, डेरावन में — गुजरात में डेरावन नाम की एक जगह है।
डेरावन के पास श्रीकृष्ण भगवान जब पेड़ के नीचे बैठे हुए थे, तब एक बहेलिया आया।
बहेलिए ने समझा यह हिरण का पैर है, और उसने तीर चलाकर मारा।
श्रीकृष्ण भगवान के पैर में लगा, और पैर से श्रीकृष्ण भगवान घायल हो गए।
घायल होकर उनको सेप्टिक हो गया और वहीं उनकी मृत्यु हो गई।
मृत्यु होने के बाद वहीं पर पड़े रहे।
अर्जुन जब बाद में गए — "गुरुजी उठो, गुरुजी!"
मिलना चाहा, तो वो चले गए।
भाई जो थे, उनमें अतिशयोक्ति कथा आती है।
उनके भाई बलराम ने कहा — "हमारा भैया कहाँ चला गया? हमारा भैया कहाँ चला गया?"
पता लगाते-लगाते श्रीकृष्ण भगवान के पास वो भी पहुँचे।
और वहीं देखा — उनकी लाश पड़ी हुई थी, और कुत्ते खा रहे थे।
वहाँ कोई जलाने वाला भी नहीं था, और वहाँ पर मरे हुए पड़े थे।
यह देखकर भाई को बड़ा दुख हुआ।
उसने वहीं अपना प्राण त्याग दिया — किनने? बलराम ने।
स्कंद पुराण की कथा कह रहा हूँ।
दोनों भाइयों की जब मृत्यु हो गई, तो बस वहीं पड़े रहे।
माँस, माँस गिद्धों ने खा लिया, कुत्तों ने खा लिया, कौवों ने खा लिया।
और अर्जुन को जब यह पता चला — "श्रीकृष्ण भगवान का क्या हुआ?"
तब वो तलाश करने के लिए गए।
स्कंद पुराण की कथा के मुताबिक, उन्होंने दोनों भाइयों की हड्डियों को इकट्ठा करके उनका दाह कर्म किया है।
संस्कार किया है।
श्राद्ध किया है।
तर्पण किया है।
श्रीकृष्ण भगवान क्या हो गए बेटे?
मर गए।
"महाराज जी, मर गए भगवान?"
हाँ, मर गए भगवान।
जो शरीरधारी हैं, सब मरे हैं।
सबको मरना पड़ेगा।
अखण्ड-ज्योति से
इस अद्भुत संसार में विभिन्न प्रवृत्तियों तथा मनोदशाओं के लोग पाये जाते हैं। एक ही स्थिति, परिस्थिति तथा दशा वाले अनेक लोगों में से कोई अत्यधिक दुःखी और व्यग्र देखे जा सकते हैं और अनेक यथासम्भव प्रसन्न तथा संतुष्ट।
निःसन्देह, ऐसे व्यक्ति विचित्र होने के साथ दयनीय भी कम नहीं होते, जो हर समय दुःखी और क्लान्त ही बने रहते हैं। मिलते ही दुःखों, कष्टों तथा कठिनाइयों का रोना लेकर बैठ जाते हैं। आय कम है, खर्चा पूरा नहीं होता, बीवी बच्चे स्वस्थ ही नहीं रहते, दफ्तर में तनाव बना रहता है, तरक्की के चांस आते ही नहीं या आकर निकल जाते हैं, कोई लाभ ही नहीं होता, बेचारे ऑफिसर के अन्याय, रोष अथवा पक्षपात के शिकार बने हुये हैं—इस प्रकार की व्यक्तिगत और समय बहुत खराब आ गया है, संसार विनाश के मुख पर खड़ा है, भ्रष्टाचार चरम-सीमा पर जा पहुंचा है,
मानव जाति का भविष्य खतरे में है, समाज बहुत दूषित हो चुका है, सुधार की सम्भावनायें क्षीण हो गई हैं, बढ़ती हुई वैज्ञानिक प्रगति हानि के सिवाय लाभ तो कर ही नहीं सकती, किसी समय भी युद्ध हो सकता है, मनुष्य का घोर-पतन हो गया है, सदाचार तथा सज्जनता तो कहीं दीखती ही नहीं, मर्यादा और अनुशासन जैसी कोई वस्तु ही नहीं रह गई है—आदि जगबीती सुनाते रहते हैं। उनकी व्यथा-कथा सुनने से ऐसा पता चलता है, मानो संसार के सारे दुःख सारी चिन्तायें इन्हीं बेचारों के भाग्य में भर दी गई हैं। संसार में इन जैसा कष्ट-ग्रस्त दूसरा कोई न होगा।
‘विचार करने की बात है कि जिस मनुष्य के मत्थे, इतनी मुसीबतें तथा चिन्तायें हों, क्या वह सामान्य मनोदशा में संसार के सारे कार्य तथा व्यापार करता रह सकता है। किसी एक वास्तविक चिन्ता के मारे तो मनुष्य का खाना-पीना, सोना-जागना हराम हो जाता है और जब तक वह उससे मुक्ति नहीं पा लेता, चैन की सांस नहीं लेता। परिश्रम और प्रयत्न में एड़ी-चोटी का पसीना एक कर देता है। तब इतनी चिन्ताओं वाले जीवन की गाड़ी ढकेलता हुआ सामान्य गति से चलता रह सकता है—ऐसी आशा नहीं की जा सकती। ऐसे व्यक्ति की केवल दो ही दशायें सम्भव हो सकती हैं—या तो उसे विक्षिप्त हो जाना चाहिये अथवा कोई महान् पुरुष। किन्तु वह इनमें से कुछ नहीं होता। एक सामान्य सा दुःखी तथा क्लान्त व्यक्ति ही बना रहता है।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1968 पृष्ठ 37
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