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Monday 06, October 2025

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आप और गुरुदेव एक हो जाए

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“नानक की खेती: सत्कर्म, भजन और संतोष का संदेश”

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बाबाजी आपने भगवान को देखा हैं?

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अमृतवाणी:- मनन का महत्त्व और स्वरूप | Mnan Ka Mahtav Aur Swaroop

अमृतवाणी:- मनन का महत्त्व और स्वरूप | Mnan Ka Mahtav Aur Swaroop

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अमृत सन्देश:- तीन आरंभिक कदम:- समारोह, प्रकाशन, सत्संग

अमृत सन्देश:- तीन आरंभिक कदम:- समारोह, प्रकाशन, सत्संग

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


त्रिपदा और चतुष्पदा गायत्री | Tripda Aur Chatuspda Gayatri

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139 Anant sambhavanaon se yukt manvi satta.mp4

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!! शांतिकुंज दर्शन 06 October 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



ऋषि आदि जो थे, वो क्या हो गए बेटे? वो मर गए। कब हुए थे, हमें नहीं मालूम है। बहुत पुराने जमाने की बात है। सात मनुष्य हुए थे और बहुत अच्छा काम करते थे। उनका देहांत हो गया। ये सातों ऋषि तो जिंदा हैं।

हाँ बेटे, हम प्राणायाम के समय जिंदा रखते हैं। प्राणायाम करते हैं और साथ सातों ऋषियों के नाम लेते हैं—तपः, महः, जनः, सत्यमः। यह सातों ऋषियों की सात व्याहृतियाँ हैं। और जो बादलों में, आसमान में चमकते हैं, जब तक सृष्टि कायम रहेगी, तब तक साथ-साथ उसका साथ देंगे।

मैं यह कह रहा था आपसे—तीन अंश त्रिपदा है गायत्री का। और एक और उसका भाग है जिसका नाम है चतुष्पदा। यह कौन सा रूप है, आपने कभी बताया ही नहीं बेटे! ये चतुष्पदा जो है, विश्वामित्र कल्प नाम का एक ग्रंथ है, बड़ा कठिन ग्रंथ है। विश्वामित्र कल्प। विश्वामित्र कल्प एक ग्रंथ है। उसमें क्या है? चतुष्पदा गायत्री का तांत्रिक गुण लिखे हुए हैं। तांत्रिक गुणों का वर्णन विश्वामित्र कल्प में आता है।

इसमें चार चरण भी दिए गए हैं। चार चरण क्या? कौन से दिए गए हैं? एक चरण है जो तांत्रिक उपासना में काम आता है। चैथा वाला चरण—"पर्वो रजसे सार्वभौम"। "पर्वो रजसे सार्वभौम"—यह "प्रचोदयात्" के बाद यह चैथा चरण लगाया जाता है।

तो महाराज जी, चतुष्पदी गायत्री प्रकरण मालूम है?

हाँ, मालूम है। "ॐ भूर्भुवः स्वः" एक इसका भाग है। शीर्ष। तीन चरण हैं, तीन चरण। जिसको हमने कल कहा था आपसे—त्रिपदा। और चतुष्पदी इसीलिए है। एक भाग इसका भूर्भुवः स्वः वाला। शीर्ष के बिना मिलाए बिना, गायत्री मंत्र का जप नहीं हो सकता। इसलिए एक चरण वो है, और तीन चरण वो हैं। इसलिए चार टांग वाली हो गई।

अरे, कल तक तो तीन टांग वाली थी, आज चार हो गई?

हाँ बेटे, आज चार हो गई। हमने एक और टांग लगवा ली है। इसीलिए वो तीन टांग वाली को चलने में दिक्कत पड़ती थी। गायत्री माता ने कहा—गुरू जी, हमको तो तीन टांग में तो बहुत परेशानी पड़ती है। तो हमने प्लास्टिक की टांग और लगवा दी। क्या हो गया?

अरे महाराज जी, आप क्या बात करते हैं?

बेटा, हम ऐसे ही बात करते रहते हैं। गायत्री के पाँच मुँह में से एक मुँह है। तू कहे, जितने बना दें! एक मुँह वाली? हमारे तो एक मुँह है और वो हमारी माँ है। तो एक मुँह होना चाहिए। आप तो पंचमुख वाली बना दीजिए?

पंचमुख वाली बना देंगे। हमें क्या दिक्कत पड़ती है? सात मुँह वाली बना दें?

अच्छा, सात मुँह वाली बना देंगे। यह पाँच मुख में पंडितों को झगड़ा पड़ता है। कोई पंडित कहता है—पाँच मुखी है। कोई कहता है—एक मुखी है।

गुरु जी, यह कितनी की है?

अच्छा, अबकी बार हम गायत्री पर आएंगे। तुम कितने मुखी बना दो—सात मुखी बना दो न! इन दोनों का झगड़ा—ना आपका, ना उनका। झगड़ा दोनों को ही काट देंगे। तीसरी और बना देंगे।

ऐसी बन सकती हैं?

हाँ, बन सकती हैं। बन सकती हैं। वास्तव में यह अलंकार हैं। अलंकार हैं किसी विशेष शक्ति की व्याख्या करने के लिए। तरह-तरह के अलंकार हम बना देते हैं। कभी पाँच मुखी बना देते हैं, कभी एक मुखी बना देते हैं। चाहे जितनी भी बना लें।

अरे महाराज जी, ग्यारहमुखी बना देंगे?

ग्यारहमुखी बना देंगे। पर वो रावण की बड़ी बहन हो जाएगी।

यह मूर्ति है गायत्री माता की। बेकार की बक, बक, बक, बक। ग्यारह मुखी है, कोई पाँच मुखी है और एक मुखी है और फलाने मुखी है, ढिकाने मुखी है।

बेटे, कोई मुखी नहीं है। गायत्री, गायत्री एक शक्ति है, जिसको रूहानी और आध्यात्मिक शक्ति कहते हैं।

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गायत्री मंत्र जो है, तीन व्याहृतियाँ हैं।
कितनी व्याहृतियाँ हैं? तीन।
कौन-कौन सी तीन व्याहृतियाँ हैं?
तीन व्याहृतियों के नाम हैं — भूः, भुवः, स्वः।

यही लगाता है न गायत्री में?
हाँ महाराज जी, मैं तो यही तीन लगाता हूँ।
बस, यह तीन हैं बेटे!
"फिर क्यों साहब, तीन ही हैं?"
नहीं बेटे, अभी और रह गईं।
"धत्त तेरे का! तो आपने पहले क्यों नहीं बता दी?"

बेटे, दो खंडों में बताई हैं।
कितनी व्याहृतियाँ हैं?
सात।
सात व्याहृतियाँ कौन-सी हैं?

जो हम प्राणायाम का मंत्र आपसे कराते हैं, तो हम तीन-तीन व्याहृतियाँ वो बताते हैं — शुरू वाली।
और चार और बता देते हैं।
चार कौन-सी?
बेटे, तपः, महः, जनः, सत्यं।
"और पहले क्यों नहीं बताई?"

यह दो खंड हैं।
एक इसका एक खंड वो है — त्रिपदा।
त्रिपदा वो खंड है जो आदमी के अध्यात्म से, आदमी के चिंतन से, दृष्टिकोण से संबंधित है।
और चार चरण, चार और भाग रह गए।
वो कौन-से हैं?

यह है क्रियायोग, और वो है ज्ञानयोग।
यह है विज्ञान भाग, वो है ज्ञान भाग।
दो खंडों में बँटा हुआ है।
गायत्री मंत्र की व्याहृतियाँ दो खंडों में बँटी हुई हैं।

आप यहाँ जाना — सप्तर्षि आश्रम।
उसमें सात ऋषियों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं।
आप देखना, बीच में शंकर जी बैठे हुए हैं, और चारों ओर घूम जाना।
वहाँ सात ऋषियों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं।

सात ऋषियों की मूर्तियों के ऊपर गायत्री मंत्र की सात व्याहृतियाँ लगी हुई हैं।
सात व्याहृतियाँ क्या हैं?
सात ऋषि हैं यह!
"सात व्याहृतियाँ क्या हैं?"
सात ऋषि हैं!
"ऋषि तो एक मनुष्य होते हैं।"
हाँ बेटे, मनुष्य।
"तो भगवान भी मनुष्य थे?"
हाँ, भगवान मनुष्य भी थे।

ऋषि मनुष्य थे, मान लिया।
बेटे, मनुष्य भी ऋषि हुए हैं।
और ऋषि जो बादलों में से रात को निकलते हैं — ये मनुष्य नहीं हैं।
मनुष्य मर जाते हैं।
मनुष्य जला दिए जाते हैं।
मनुष्य की एक सीमा होती है।

श्रीकृष्ण भगवान की एक सीमा थी।
देवकी के यहाँ, वसुदेव के घर में पैदा हुए थे — जेलखाने में।
और देखो, डेरावन में — गुजरात में डेरावन नाम की एक जगह है।
डेरावन के पास श्रीकृष्ण भगवान जब पेड़ के नीचे बैठे हुए थे, तब एक बहेलिया आया।
बहेलिए ने समझा यह हिरण का पैर है, और उसने तीर चलाकर मारा।
श्रीकृष्ण भगवान के पैर में लगा, और पैर से श्रीकृष्ण भगवान घायल हो गए।
घायल होकर उनको सेप्टिक हो गया और वहीं उनकी मृत्यु हो गई।

मृत्यु होने के बाद वहीं पर पड़े रहे।
अर्जुन जब बाद में गए — "गुरुजी उठो, गुरुजी!"
मिलना चाहा, तो वो चले गए।

भाई जो थे, उनमें अतिशयोक्ति कथा आती है।
उनके भाई बलराम ने कहा — "हमारा भैया कहाँ चला गया? हमारा भैया कहाँ चला गया?"
पता लगाते-लगाते श्रीकृष्ण भगवान के पास वो भी पहुँचे।
और वहीं देखा — उनकी लाश पड़ी हुई थी, और कुत्ते खा रहे थे।
वहाँ कोई जलाने वाला भी नहीं था, और वहाँ पर मरे हुए पड़े थे।

यह देखकर भाई को बड़ा दुख हुआ।
उसने वहीं अपना प्राण त्याग दिया — किनने? बलराम ने।
स्कंद पुराण की कथा कह रहा हूँ।

दोनों भाइयों की जब मृत्यु हो गई, तो बस वहीं पड़े रहे।
माँस, माँस गिद्धों ने खा लिया, कुत्तों ने खा लिया, कौवों ने खा लिया।
और अर्जुन को जब यह पता चला — "श्रीकृष्ण भगवान का क्या हुआ?"
तब वो तलाश करने के लिए गए।
स्कंद पुराण की कथा के मुताबिक, उन्होंने दोनों भाइयों की हड्डियों को इकट्ठा करके उनका दाह कर्म किया है।
संस्कार किया है।
श्राद्ध किया है।
तर्पण किया है।

श्रीकृष्ण भगवान क्या हो गए बेटे?
मर गए।
"महाराज जी, मर गए भगवान?"
हाँ, मर गए भगवान।
जो शरीरधारी हैं, सब मरे हैं।
सबको मरना पड़ेगा।

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अखण्ड-ज्योति से



बात दर असल यह होती है कि ऐसे व्यक्ति सामान्यतः दूषित दृष्टिकोण के रोगी होते हैं। निषेधात्मक दृष्टि तथा नकारात्मक मनोवृत्ति के कारण उन्हें संसार की हर बात और हर वस्तु दोषपूर्ण दिखाई देती है। जिस प्रकार जिस रंग का चश्मा आंखों पर चढ़ा लिया जाता है, संसार की प्रत्येक वस्तु उसी रंग की दिखाई देने लगती है। जब कि वह वास्तव में उस रंग की होती नहीं। यही दशा इस प्रकार के लोगों की होती है। दोष-दृष्टि होने से उन्हें दोष के सिवाय किसी व्यक्ति अथवा वस्तु में कोई अच्छाई ही नहीं दिखलाई देती। जब कि संसार में केवल बुराई अथवा कुरूपता ही नहीं है, अच्छाई और सुन्दरता भी है।

चेतन और जड़ से मिलकर बने हुए इस संसार की प्रत्येक वस्तु और व्यक्ति में अच्छाई-बुराई दोनों पाये जाते हैं। कोई भी वस्तु ऐसी न मिलेगी, जो या तो केवल बुरी हों या केवल अच्छी, दिन और रात, शुक्ल-पक्ष और कृष्ण-पक्ष की तरह हर बात के दो पहलू होते हैं। एक वस्तु जो एक स्थिति में बुरी होती है, दूसरी बार वही अच्छी दिखलाई देने लगती है। मनुष्य के भीतर स्वयं दैवी और आसुरी वृत्तियां विद्यमान् रहती हैं। हमारा स्वयं का बच्चा जब किसी समय शरारत या हठ कर रहा होता है, हमें खुद को बड़ा ही ढीठ और खराब मालूम होने लगता है और जब वही बालक दौड़कर पानी ले आता है, अपना पाठ सुना देता है, अच्छी-अच्छी प्यारी बातें करने लगता है, तब हमें बड़ा भला और अच्छा लगने लगता है।

 

इससे वह बच्चा न तो बिल्कुल अच्छा ही माना जायेगा और न सर्वथा खराब या बुरा ही। सड़ा-गला, कूड़ा-कचरा और मल-मूत्र सर्वथा बुरी वस्तुयें मानी जाती हैं, किन्तु जब यही सब पककर खाद बन जाते हैं, तब सभी उसको एक मत से उपयोगी एवं आवश्यक मान लेते हैं और निःसन्देह वह हो भी ऐसा जाता है। तात्पर्य इस संसार की कोई भी वस्तु न तो केवल खराब है और न अच्छी। हर वस्तु के अच्छे-बुरे दोनों पहलू होते हैं। दोष रहित, निर्विकार और सदा शुद्ध तो एक मात्र परमात्म सत्ता ब्रह्म ही है।

संसार तो गुण-दोषों का सम्मिलित स्वरूप है। तथापि जिन मनीषियों और महात्माओं ने अपने को पूर्ण शुद्ध और निर्विकार बना लिया है, उनका कहना तो यहां तक है कि मंगलमय भगवान् की इस मंगलमय सृष्टि में दोष है ही नहीं। उनकी यह रचना भलाई, उत्कृष्टता, स्वच्छता, नैतिकता आदि के दिव्य गुणों के आधार पर की गई है। इसमें गन्दगी, बुराई और अपवित्रता है ही नहीं। पूर्ण शुद्ध-बुद्ध और सुन्दर परमात्मा की कृति में दोष और दूषण सम्भव भी किस प्रकार हो सकते हैं।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1968 पृष्ठ 37

 

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