Tuesday 04, February 2025
आत्सुधर से ही सच्ची शांति संभव है, Aatmasudhar Se Hi Sacchi Shanti Sambhav Hai
प्रयागराज महाकुम्भ में भोजन सेवा करते गायत्री परिजन |
प्रार्थना आत्मा का संबल | Prarthana Aatma Ka Sanmbal
पूज्यवर की अभिलाषा | Pujyavar ki Abhilasha
देवत्व परास्त हो जाय, धर्म हार जाय, विवेक कराहता रहे, चिर-संचित मानव-सभ्यता को निर्बल कर दिया जाय, यह नहीं होने दिया जायेगा। लड़ाई जारी रखी जायेगी, दुनिया के योद्धा, नेता, धनी, बुद्धिमान्, विद्वान साथ न दें तो निराश न बैठा जायेगा। रीछ-वानरों को-अपने नगण्य स्तर के परिजनों को लेकर अखण्ड-ज्योति आगे आयेगी, और सोने की लंका में साधन सम्पन्न-कुम्भकरणों, मेघनाथों, रावणों को ललकारेगी। विजय दूर हो तो हर्ज नहीं। आगे बढ़ना और लड़ना अपना काम है, सो उसे बिना राई-रत्ती हिचकिचाहट लाये, दिन-दूने-रात चौगुने उत्साह के साथ जारी रखा जायेगा।
अभिलाषा इतनी भर है कि अपने परिवार से जो आशायें रखी गई हैं, उन्हें कल्पना मात्र सिद्ध न होना पड़े। अखण्ड-ज्योति परिजन अपना उत्साह खो न बैठें और जब त्याग, बलिदान की घड़ी आवे, तब अपने को खोटा सिक्का सिद्ध न करने लगें। मनुष्य की महानता उसकी उन सत्प्रवृत्तियों की चरितार्थ करने में है, जिनसे दूसरों को प्रकाश मिले। जिसमें ऐसा कुछ नहीं- जो उदरपूर्ण और प्रजनन प्रक्रियाओं तक सीमाबद्ध है, उसे नर-पशु ही कहा जा सकता है। हम नहीं चाहते कि हमारे बड़ी आशाओं के साथ संजोये हुए सपनों की प्रतिमूर्ति- परिजन उसी स्तर के चित्र हों, जिसका कि घर-घर में कूड़ा-कटकर भरा पड़ा है।
इस महत्वपूर्ण वेला में जो अपने कर्त्तव्यों का स्मरण रख सकें और जो उसके लिये वासना और तृष्णा को एक सीमा में नियन्त्रित रखकर कुछ अवसर अवकाश युग की पुकार- ईश्वरीय पुकार को सुनने, समझने और तद्नुसार आचरण करने में लग सकें, वे ही हमारी आशाओं के केन्द्र हो सकते हैं। उन साथी, सहचरों, में हम आगे बढ़ते और निर्धारित मोर्चों पर लड़ते हुए आगे बढ़ेंगे।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति, दिसम्बर 1966, पृष्ठ 65
शान्तिकुञ्ज प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष, Shantikunj-Pratyaksh Kalpavriksha
श्रद्धा और विश्वास के बिना भक्ति अधूरी है | जानिए इसका रहस्य! |
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 04 February 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
हमको अपने बच्चों के लिए आज के जमाने में जो सबसे ज्यादा ध्यान देने की बात है, वह यह है कि अगर आपने बुरे लोगों की संगति से अपने बच्चों को बचा दिया, तो उनकी बहुत बड़ी सेवा कर दी और उनकी बड़ी वाली सहायता कर दी है। बच्चा नाखुश होता है, तो होने दीजिए। सारे के सारे खुश हो, कोई जरूरी नहीं है कि आपका बच्चा जो कुछ भी कहे, उसकी हां में हां मिलाते चले जाएं और मुन्ना मुन्ना कहते रहे। प्यार करने का मैं बहुत हिमायती हूँ, आदमी को खूब प्यार करना चाहिए, अपने बच्चों को लेकिन प्यार करने के तरीके होते हैं। मैंने आपसे क्या बात कहा? कि हमारे प्यार में और हमारी अहिंसा में ये पूरी-पूरी गुंजाइश है कि जब कोई डाकू और बदमाश और अवांछनीय तत्व जो समाज में फैले हुए हैं, उनके साथ हम संघर्ष करें और उन पर मुकदमा चलने दे और उनको जेल खाने भिजवाएं। किनको, जो गुंडे और बदमाश, चोर और डाकू हैं। हमारे प्रेम में और अहिंसा में सुधार करने के लिए पूरी-पूरी गुंजाइश है और हमारे अहिंसा में, बच्चों के प्यार में पूरी-पूरी गुंजाइश है, क्योंकि बच्चों को मिठाई खिलाओ और उनको प्यार करो और साथ में लेकर के चलें हैं और अपने साथ रखें, उनको और उनके लिए अच्छे इंतजाम करें। लेकिन उस प्यार में पूरी गुंजाइश है फिर हम अपने बच्चों के साथ में कड़ाई के साथ में और सख्ती के साथ में पेश आएं, उनके साथ में टेढ़ी नजर भी रखें।
पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
आप कैसे सौभाग्यशाली हैं? आपको तो सहारा भी मिल गया। आमतौर से लोग अकेले ही मंजिल पार करते हैं, अकेले ही चलते हैं; पर आपको तो अकेले चलने के साथ लाठी का सहारा भी है, आप उस सहारे का क्यों नहीं लाभ उठाते? आप लोग पैदल सफर करते हैं, आपके लिए तो यहाँ सवारी भी तैयार खड़ी है, फिर आप लाभ क्यों नहीं उठाते? शान्तिकुञ्ज के वातावरण को केवल यह आप मत मानिये कि यहाँ दीवारें ही खड़ी हुईं हैं, आप यह मत सोचिये कि यहाँ शिक्षण का कुछ क्रम ही चलता रहता है, यह मत सोचिये कि यहाँ कुछ व्यक्ति विशेष ही रहते हैं।
आप यह भी मानकर चलिये कि यहाँ एक ऐसा वातावरण आपके पीछे-पीछे लगा हुआ है, जो आपकी बेहद सहायता कर सकता है। उस वातावरण से निकली प्राण की कुछ धाराओं को, जिसने खींचकर आपको यहाँ बुलाया है और आप जिसके सहारे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, उस वातावरण, प्रेरणा और प्रकाश को चाहें तो आप एक नाम यह भी दे सकते हैं—पारस।
पारस उस चीज का नाम है, जिसको छू करके लोहा भी सोना बन जाता है। आप लोहा रहे हों, पहले से; आपके पास एक पारस है, जिसको आप छुएँ, तो देख सकते हैं किस तरीके से काया बदलती है? आप अभावग्रस्त दुनिया में भले ही रहे हों पहले से, आपको सारी जिंदगी यह कहते रहना पड़ा हो कि हमारे पास कमियाँ बहुत हैं, अभाव बहुत हैं, कठिनाइयाँ बहुत हैं; लेकिन यहाँ एक ऐसा कल्पवृक्ष विद्यमान है कि जिसका आप सच्चे अर्थों में सहारा लें, तो आपकी कमियाँ, अभावों और कठिनाइयों में से एक भी जिंदा रहने वाला नहीं हैं, उसका नाम कल्पवृक्ष है। कल्पवृक्ष कोई पेड़ होता है कि नहीं, मैं नहीं जानता।
न मैंने कल्पवृक्ष देखा है और न मैं आपको कल्पवृक्ष के सपने दिखाना चाहता हूँ; लेकिन अध्यात्म के बारे में मैं यकीनन कह सकता हूँ कि वह एक कल्पवृक्ष है। अध्यात्म कर्मकाण्डों को नहीं, दर्शन को कहते हैं, चिंतन को कहते हैं। जीवन में हेर-फेर कर सके, ऐसी प्रेरणा और ऐसे प्रकाश का नाम अध्यात्म है। ऐसा अध्यात्म अगर आपको मिल रहा हो तो यहाँ मिल जाए या मिलने की जो संभावनाएँ हैं, उससे आप लाभ उठा लें, तो आप यह कह सकेंगे कि हमको कल्पवृक्ष के नीचे बैठने का मौका मिल गया है। यहाँ का वातावरण कल्पवृक्ष भी है, यहाँ का वातावरण-पारस भी है और यहाँ का वातावरण अमृत भी है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
वांग्मय न. 68 पृष्ट 3.12
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